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समयसार (प्राकृत गाथा एवं हिन्दी-अंग्रेजी व्याख्या)

समयसार (प्राकृत गाथा एवं हिन्दी-अंग्रेजी व्याख्या)

Samayasara of Acharya Kundakunda with Hindi Commentary

आचार्य कुन्दकुन्द / अमृतचन्द्र सूरि द्वारा

DevanagariHindipublished226 पृष्ठ

पृष्ठ 160, कुल 226 में से

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पृष्ठ 160

अध्याय - 9
मैं दृष्टा मात्र हूँ -
पण्णाए घेत्तव्वो जो दट्ठा सो अहं तु णिच्छयदो।
अवसेसा जे भावा ते मज्झ परे त्ति णादव्वा॥ (9-11-298)
प्रज्ञा के द्वारा इस प्रकार ग्रहण करना चाहिये कि जो देखने वाला दृष्टा है, निश्चय से
वह मैं हूँ; शेष जो भाव हैं, वे मुझसे पर हैं, यह जानना चाहिये।
Through self-discrimination, one must realize that ‘I’ is really
the ‘seer’ who sees; and, further, that all other dispositions are
not part of oneself.
मैं ज्ञातामात्र हूँ -
पण्णाए घेत्तव्वो जो णादा सो अहं तु णिच्छयदो।
अवसेसा जे भावा ते मज्झ परे त्ति णादव्वा॥ (9-12-299)
प्रज्ञा के द्वारा इस प्रकार ग्रहण करना चाहिये कि जो जानने वाला ज्ञाता है, निश्चय से
वह मैं हूँ; शेष जो भाव हैं, वे मुझसे पर हैं, यह जानना चाहिये।
Through self-discrimination, one must realize that ‘I’ is really
the ‘knower’ who knows; and, further, that all other dispositions
are not part of oneself.
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