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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

प्रथम तरंग २११
अथाऽशोककुलोत्पन्नो यद्वाऽन्याभिजनोद्भवः ।
भूमिं दामोदरो नाम जुगोप जगतीपतिः ॥ १५३ ॥
१५३. तत्पश्चात् अशोक कुलोत्पन्न अथवा अन्य कुलोद्भव दामो र नामक राजा भूमि-
रक्षक हुआ ।
ऋद्ध्या जाज्वलितस्योच्चैर्माहेश्वरशिखामणेः ।
अद्यापि श्रूयते यस्य प्रभावो भुवनाद्भुतः॥ १५४ ॥
१५४. ऋद्धि से जाज्वल्यमान, माहेश्वर२ शिवउ सकों में शिखामणि, जिस राजा के
अद्भुत प्रभाव की गाथा भुवन मे आज भी सुनी जाती है ।
जलोक योगी अवधूत का शिष्य था । उसने योगा-
भ्यास किया । जल का बांधन, उसके अन्दर प्रवेश
कर रहना यौगिक क्रियाओ से सम्बन्ध रखता है ।
उसका अन्तिम समय में योग द्वारा प्राण विसर्जन
करना उसे राज योगी के साथ ही साथ राजर्षियो की
श्रेणी में रख देता है ।
१५३ (१) दामोदर द्वितीय : आइने अकबरी
ने राजा का नाम दामोदर दिया है । उसके अनुसार
कुछ लोंगो का कहना है वह अशोक का वंशज था ।
कुछ कहते हैं, वह अन्य वंश का था । राजा धार्मिक
था । एक भक्त को अपमानित करने के कारण
उसके शाप द्वारा सर्प हो गया था ।
कल्हण ने दामोदर द्वितीय की इतिहास सामग्री
छविल्लकार से ली है। तत्कालीन प्रचलित ग्रन्थो,
शिलालेखों, अग्रहारो एवं मन्दिरों में प्राप्त कुछ संग्रहों
पर दामोदर द्वितीय का वर्णन किया है ।
मुहम्मद आजिम इतिहासकार के अनुसार
दामोदर उद्र वह स्थान है, जहाँ ब्राह्मणो ने राजा को
सर्प होने का शाप दिया था। यह सरोवर राजधानी
मे ७ मील पर है । यहाँ अब भी कथा प्रचलित है
कि राजा सर्प के रूप में इस स्थान पर प्रकट.
होता है ।
हुसन लिखता है—दामोदर राजा जलोक का
भाई था । पसन्दी और उमद. खूबियो में उसका
हमसर था । तख्त सल्तनत पर बैठकर मख्लूक खुदा
को अद्ल और अहसान के जरिए आराम असाइश
बख्शी । मौजा 'गोट सवू' इसी राजा का बनाया हुआ
है । करेवा दामोदर पर अपनी राजधानी के लिए
कशोर इमारतो वाला एक शहर तामीर किया ।
कैफियत-एक दिन श्राद्ध के तकरीब पर दरयाए
झेलम पर गुशल के लिए जाता था । रास्ते में दो
बरहमनो ने उससे खाना माँगा । राजा ने कहा ।
गुशल और श्राद्ध के बाद मैं तुम्हें खीर कर दूँगा ।
इस पर इन बरहमनो ने राजा के हक में दुआए बद
कर दी । इसके नतीजे में राजा की शक्ल साँप की
हो गयी । बरसो तक राजा मजकूर जंगलों में
परेशान था । इस वांकया की पूरी तफसील करेवा
दामोदर के जिकर में गुजर चुकी है । राजा दामोदर
की मुद्दत सल्तनत ३२ साल थी ।
हसन के वर्णन का कोई आधार तथा सत्यता
नही हैं । कल्हण निश्चित नही कहता कि दामोदर
कौन था । ? उसकी वंश परम्परा क्या थी ? इतना
अवश्य निश्चयपूर्वक उसके वर्णन से निष्कर्ष निकाला
जा सकता है । वह जलोक का पुत्र नही था । अशोक
का वंशज हो भी सकता है और नहीं भी । इसका
केवल मात्र अनुमान किया जाता है । प्रत्यक्ष प्रमाण
अभी तक नही मिल सका है । हसन का यह कहना
कि वह राजा जलोक का भाई था किसी प्रमाण से
अबतक सिद्ध नही हो सका है ।
वह किस कुल का था ? किस प्रकार कश्मीर
का राज्य प्राप्त किया ? उसके उत्तराधिकार का रूप
क्या था ? सभी कुछ अज्ञात इतिहास के गर्भ में है ।

२१२ राजतरंगिणी
हरप्रसादपात्रेण सच्चरित्रानुरागिणा ।
बबन्ध सुखिना सख्यं येन वैश्रवणः स्वयम् ॥ १५५ ॥
१५५. उस हर प्रसाद पात्र एवं सच्चरित्रानुरागी सुखी राजा से स्वयं वैश्रवण १ मैत्री
सूत्र में बँधे थे।
कुबेर इव यो राज्ञामग्र्यः स्वाज्ञाविधायिनः ।
आदिश्य गुह्यकान्दीर्घं गूढसेतुमबन्धयत् ॥ १५६ ॥
१५६. कुबेर तुल्य राजाओं में अग्र उसने आज्ञानुवर्ती गुह्यकों को आदेश देकर दीर्घ गूढ
सेतु २ बँधवाया।
यदि वह अशोक वंशोत्पन्न होता तो भारत य इतिहास
इस पर प्रकाश अवश्य डालता । अब तक की प्राप्त
सामग्रियों के आधार पर अशोक के किसी दामोदर
पौत्र का होना नही मिलता है।
१५४ (१) माहेश्वर : कल्हण ने राजा को
यहाँ पर शिव के उपासक रूप में उपस्थित किया है।
उसने महेश्वर शब्द का प्रयोग किया है। कल्हण ने
श्लोक संख्या १३५ में भी जलोक के लिये माहेश्वर
शब्द का प्रयोग किया है। यह राजा निस्सन्देह अपने
पूर्व राजा जलोक के समान महेश किंवा शिव का
उपासक था। अन्यथा उसे उत्तराधिकार मिलना
कठिन होता ।
यह जनता अथवा मन्त्रिमण्डल द्वारा निर्वाचित
राजा था। अथवा जलोक कुलावतंस था। यह सब
अप्रकट है। यहाँ केवल एक कड़ी माहेश्वर शब्द उसे
जलोक से जोडती है। यह श्लोक और श्लोक
संख्या १३५ इस बात को प्रमाणित करते है कि
जलोक तथा दामोदर दोनो का मत एक था। वे
एक ही देव के उपासक थे ।
माहेश्वर शिव के एक अवतार हुए हैं। शिव के
अडतालीस नामो में एक नाम महेश्वर है। आठ
मातरः में एक माहेश्वरी है।
१५५ (१) वैश्रवण : अथर्ववेद (८.२० २६) में
कुबेर वैश्रवण का उल्लेख मिलता है। शतपथ
ब्राह्मण (१७:४.१ १०) के अनुसार कुबेर वैश्रवण
एक राजा है। राक्षस उनकी प्रजा है। तैत्तिरीय
अरण्यक (१.३१.३) ने कुबेर को एक देवता रूप में
प्रस्तुत किया है। वे नमस्करणीय है। प्रार्थित है।
वैवस्वत मन्वन्तर में विश्रवा ऋषि का इसे
पुत्र कहा गया है। इनकी माता इडविटा थी।
उनकी माता का नाम मंदाकिनी भी मिलता है।
धनपतित्व के निमित्त इसने तपस्या की। कुबेर
हो गया। जिस स्थान पर तपस्या की थी वह
महाभारत (श. ४६:२२) के अनुसार कौबेर तीर्थ
हो गया। देवी पार्वती की ओर इसने एक बार
देखा तो इसका बांया नेत्र नष्ट हो गया। दक्षिण
भाग पीला पड़ गया। इसलिये उसका नाम एकाक्ष
पिंग्लू हो गया।
उत्तर दिशा का अधिपति माना गया है।
उत्तरस्थित यक्ष लोक में निवास करता है। यक्षों
के अधिपतित्व प्राप्त की कामना से इसने तपस्या
की थी। तपस्या स्थान कावेरी नर्मदा संगम
माना गया है। गन्धमादन पर्वत शिखर पर इसका
निवास स्थान है। मेरु पर्वत के उत्तर विभावरी
भी इसका एक निवास स्थान है। वृद्धि तथा ऋद्धि
इसकी शक्तियां है। इसकी सभा का नाम कुबेर
सभा है। कुबेर की एक पत्नी का नाम भद्रा है।
इसकी पूरी का नाम अलकापुरी है। पूर्व जन्म से
कापिल्य नगरी में अग्निहोत्री यज्ञदत्त का गुणनिधि
नामक पुत्र था। मुचकुंद से इसका संवाद, ब्राह्मण
क्षत्रिय एकता होने पर राज्य सुख की वृद्धि होतो

प्रथम तरंग २१३

है, हुआ था। (म. श. ७५) इसका एक नाम
सोम है। एतदर्थ उत्तर दिशा का नाम सौम्य
पड़ा है।
वैश्रवण कुबेर के पिता विश्रवस पुलस्त्य एवं
हविर्भू का पुत्र कहा गया है। (भा० ४:१:३६-
३७) ब्रह्माण्ड पुराण में इसकी माता का नाम
इलविला दिया गया है। वह तृणविन्दु तथा
अलंबुषा की कन्या थी। (३:७:३९-४२) किन्तु
वायु पुराण में इसकी माता का नाम द्रविडा दिया
गया है। (८६:१६) इसको नव पत्नियां थीं।
(म. व. २५९:६०) इसकी एक पत्नी केशिनी से
रावण, कुम्भकर्ण, विभीषण तथा कन्या शूर्पणखा
हुई थी। महाभारत के अनुसार इसकी पुण्योत्कटा,
राका एवं मालिनी तीन पत्नियां राक्षसी थी। महा-
भारत वनपर्व (२५९:७-८) में मालिनी का विभी-
पण, पुण्योत्कटा का रावण और कुम्भकर्ण तथा
राका का पुत्र खर और कन्या शूर्पणखा कही गयी है।
१५६(१) गुह्यक : दश देवयोनियों में यक्षों
तुल्य एक योनि है। अमरकोश के अनुसार दस
निम्नलिखित देवयोनियां हैं :
विद्याधराप्सरो-यक्ष-रक्षो-गन्धर्व-किन्नराः ।
पिशाचो गुह्यकः सिद्धो भूतोऽमी देवयोनयः ॥
॥१:१:११॥
कुबेर को गुह्यकेश्वर तथा वैश्रवण भी कहा
गया है। गुह्यक उन लोगों के लिये प्रयुक्त किया
गया है, जो कुबेर के धनकोष की रक्षा करते थे।
उनके स्वामी को गुह्यकेश्वर कहा गया है।
कुबेरस्त्यम्बकसखो यक्षराड् गुह्यकेश्वरः ।
॥१:२:७१॥
मनुष्यधर्मा धनदो राजराजो .धनाधिपः ।
किन्नरेशो वैश्रवणः पौलस्त्यो नरवाहनः ॥
॥१:२:७२॥
भास्कर्य किंवा मूर्तिकला विकास में कुबेर
तथा यक्षों का प्रमुख स्थान है। कुबेर की अलका-

पुरी का सुन्दर वर्णन मेघदूत में कालिदास ने किया
है। यक्ष का स्वामी कुबेर है। बौद्ध मूर्तियों में
कुबेर तथा यक्ष भगवान् की पूजा करते दिखाये
गये हैं।
गुह्यक शब्द का एक जाति के रूप में प्रयोग
मिलता है। उन्हें देवयोनि के अन्तर्गत एक जाति
महाभारत ने माना है। (आदि पर्व १८६:७) इस
जाति के लोग द्रौपदी के स्वयंवर के समय उपस्थित
थे। गुह्यकेश्वर अर्थात् कुबेर की सभा में गुह्यकों
का रहना कहा गया है। (सभा पर्व १०.३)
गन्धमादन पर्वत पर उनका निवास स्थान था।
भीमसेन ने उन्हें वहीं अपनी गदा द्वारा हत किया
था। (शल्य पर्व ११:५५-५) गुह्यक को यक्ष भी
कहा गया है (१०.१५)।
पुराणों में कुबेर के अनुयायी तथा दानव
गुह्यक कहे गये हैं। (भागवत पुराण १.९.३,
१०:३४:२८, २:१०:३७, ४:४:३४) गुह्यक जाति
हिमालय में निवास करती थी। (भागवत ४:५:२६
४:१०:५) वे माया विद्या में निपुण थे। (भागवत
पुराण १०.५५.२३) गुह्यकों के देवता शिव थे।
वे शिव के अनुयायी थे। (भागवत पुराण ६३:१०)
गुह्यकों ने पुण्यात्माओं के सम्पर्क से स्वर्ग प्राप्ति
की थी। (भागवत पुराण ११:१२:३, १४.५, )
गुह्यकों को यक्षों तथा राक्षसों की श्रेणी में रखा
गया है। (ब्रह्माण्ड पुराण ३:७:१६७, ४:२:२६,
(मत्स्यपुराण १३:१७, १२१, २)। गुह्यकों
के आचरण तथा कर्त्तव्यों का विशद वर्णन मत्स्य
पुराण (१८०.९०, २४६:५३,) तथा वायु पुराण
(अध्याय ६९ तथा १०१) में मिलता है। गुह्यक
वर्ग को वायु पुराण (अध्याय ३०) में हिमालयवासी
गुह्यक कहा गया है-शंकर पार्वती के साथ
विराजमान थे। उस समय आदित्यगण, वसुगण,
अश्विनीकुमार, गुह्यकों को साथ लेकर वैश्रवण
कुबेर, सनत्कुमार, परमर्षि, अंगिरादि देवर्षि, विश्वा-
वसु गन्धर्व, नारद, कैलास निवासी यक्षराज, महा-

२१४ राजतरंगिणी
मुनि उसता, तथा अप्सराएँ उमा शंकर की उपा-
सना करने लगीं ।
हरिवंश पुराण मे कैलास शिखर पर गुह्यको
के साथ कुबेर के आगमन का वर्णन मिलता है।
(८५।१०) मैने इस विषय पर प्रकाश यक्षो से
सम्बन्धित परिशिष्ट में डाला है। यक्ष जाति की
गुह्यक जाति एक शाखा किंवा वर्ग थी। उनमे
तथा यक्षों मे भिन्नता मालूम होती है। गुह्यक
भर्गो का उत्तरदायित्व सम्पत्ति की रक्षा करना था।
उनका काम सैनिको का था। वे प्रतिहारी थे।
वे साधारणतया शस्त्रोपजीवी थे। पहरा, चौकी,
तथा रक्षादि करते थे। शस्त्रादि चलाते थे।
उन्होने महाभारत युद्ध मे भाग लिया था। यक्ष
जाति के होते हुए भी, उन्हें अलग गुह्यक संज्ञा
उसी प्रकार दी गयी थी, जैसे हिन्दु होने पर भी
क्षत्रियो की अलग जाति शस्त्रोपजीवी होने के
कारण हो गयी थी।
वायु पुराण (अध्याय १०१) से प्रकट होता
है कि गुह्यक लोग सत्य अर्थात् ब्रह्म लोक में देवतायो
के साथ रहते थे। सत्य लोक सातवां किंवा अन्तिम
लोक है। उसमे समस्त देवगण, गन्धर्वो, अप्सराओं,
यक्षो तथा गुह्यको के साथ स्वर्ग लोक मे निवास
करते हैं। वायु पुराण (अध्याय ६९) मे गन्धर्व,
गुह्यक, यक्ष तथा पिशाचो को असुरदेव की श्रेणी मे
रखा गया है। परन्तु यहाँ पर सर्प, भूत, पिशाच,
नाग एवं मनुष्यो को पृथ्वी लोक का निवासी बताया
गया है। इस गुह्यको का स्थान पिशाचो तथा मनुष्यो
से ऊपर रखा गया है।
गुह्यको की उत्पत्ति के विषय मे वायु पुराण
(अध्याय ९:३२,३०:४) में क्या आता है—'ब्रह्मा
मे रजस्तम प्रधान दूसरा शरीर धारण किया। उस
अन्धकार में क्षुधातुर होकर उन्होंने दूसरी प्रजा
उत्पन्न की। वह प्रजा जल को भक्षण करने के
लिये कटिवद्ध हो गयी। हम जल को रक्षा करते हैं।
कहने हुए जो उत्पन्न हुए वे क्रोधी निशाचर राक्षस
हुए। जिन लोगों ने कहा हम जल को खा जायेंगे।
नष्ट कर देंगे। अतएव उनका नाम राक्षस पड़ा। यक्ष
धातु पालनार्थक है। अतएव उनका यक्ष नाम पड़ा।
अ० ९।
भागवत (१:९:३) मे श्रीकृष्ण, अर्जुन, युधि-
ष्ठिर आदि के रथ पर जाने की शोभा के वर्णन में
उसकी तुलना गुह्यकों सहित कुबेर से की गयी है।
वहाँ पर गुह्यकों को कुबेर का साथी कहा गया हैं।
स्कन्द (२:१०:३७) मे भगवान् के स्थूल तथा
सूक्ष्म रूपों का वर्णन किया गया है। सिद्ध, चारण,
गन्धर्व, विद्याधर, असुर, गुह्यक, किन्नर, अप्सराएँ,
नाग, सर्प, किंपुरुष, उरग, मातृकाएँ, राक्षस,
पिशाच, प्रेत, भूत, विनायक, कूष्माण्ड, उन्माद,
वैताल, यातुधान के वर्ग में गुह्यकों को रखा गया
है। (स्कन्द ११:१२:३,१४:५)
दक्ष यज्ञ मे सती के प्राण विसर्जन काल में
गुह्यक तथा प्रमथ गणों का उपस्थित होना प्रकट होता
है। मालूम होता है शिव के पार्षद गुह्यक तथा
प्रमथ गण सती के साथ दक्ष यज्ञ मे गये थे। सती
के प्राण विसर्जन के साथ ही गुह्यको तथा प्रमथो ने
क्रुद्ध होकर, दक्ष यज्ञ मे विघ्न डाला था। अस्त्र-
शस्त्रो से आक्रमण किया था। उनके भयंकर आक्रमण
के वेग को देखकर भृगु ने यज्ञ द्वारा महर्षी ऋभु
नामक देशो को उत्पन्न किया। जलती लकड़ियों
द्वारा प्रथमगण तथा गुह्यकों पर वे आक्रमण कर,
उन्हे भगाने मे समर्थ हुए थे।
दक्ष यज्ञ के प्रसंग मे गुह्याकलय अर्थात् गुह्यको
के निवास स्थान का उल्लेख किया गया है।
सती की प्राणाहुती से क्रुद्ध होकर, वीरभद्र ने दक्ष
के मस्तक को यज्ञ की दक्षिणाग्नि में डाल दिया।
यज्ञ को विध्वंस कर गुह्याकालय लौट गये। यहाँ
पर गुह्याकालय हिमालय स्थित कैलाश के समीप
का स्थान होना चाहिए। वायु पुराण ने हिमालय का
यही अंचल गुह्यको का निवास स्थान बताया है।

प्रथम तरंग २१५

उसम मृगया निमित्त हिमालय गया था।
वहाँ उसको हत्या कर दी गयी थी । ध्रुव अत्यन्त
क्रुद्ध होकर, रुद्रों के अनुचरों से सेवित उत्तर दिशा
में हिमालय के द्रोणी अर्थात् घाटी में गये । वहाँ
नगर गुह्यकों से जनाकीर्ण था । (भागवत ४.१०
:५) यहां पर भी यही निर्देश किया गया है।
गुह्यक लोग उत्तर दिशा में हिमालय की घाटी
किंवा द्रोणी में रहते थे ।
श्री कृष्ण द्वारा गुह्यक शंखचूड के वध की
कथा भागवत ( १०:३४:२८ ) में कही गयी है।
गोपियों को एक समय शंखचूड गुह्यक लेकर,
उत्तरदिशा की ओर भाग चला । श्री कृष्ण उस
समय गुह्यक के पास पहुँचे । गुह्यक गोपियों को
छोड़कर भागा । श्री कृष्ण ने उसका पीछा किया ।
उसका वध किया । मणि लेकर वापस लौट आये ।
इससे दो बातें स्पष्ट होती हैं। गुह्यक दस्यु
आदि का अनुचित कार्य करते थे। उनका निवास
स्थान उत्तर दिशा था । मथुरा से उत्तर दिशा
पंजाब, कश्मीर, हिमाचल पड़ता है । उत्तर दिशा
का अर्थ प्रायः हिमालय का उत्तरीय पर्वतीय
अंचल माना जाता है ।
प्रद्युम्न तथा शम्बरासुर वध के प्रसंग में
गुह्यकों का पुनः उल्लेख भागवत ( १०:५५ २३ )
में किया गया है। शम्बरासुर ने यक्ष, गन्धर्व,
पिशाच, नाग और राक्षसों की सैकड़ों माया का
प्रयोग किया । गुह्यक मायावी थे । युद्ध में माया
का प्रयोग करते थे । अन्य पुराणों में भी इस
प्रकार का उल्लेख किया गया है । शम्बर ने गुह्यकों
की माया का प्रयोग किया है। यहाँ गुह्यकों ने
युद्ध में भाग नहीं लिया । परन्तु उनको युद्ध नीति
का प्रयोग शम्बर ने प्रद्युम्न के विरुद्ध किया था।
भागवत (११:१२:३) में पुनः दैत्य, राक्षस,
गन्धर्व, अप्सरा, नाग, सिद्ध, चारण, गुह्यक को
एक ही वर्ग में रखा गया है। गुह्यकों के पूर्वज
ब्रह्मर्षि थे। देवयोनि वर्ग में थे । इसका उल्लेख

भागवत (११ १४.५) में किया गया है । इन
ब्रह्मर्षियों की संतान देवता, दानव, गुह्यक, मनुष्य,
सिद्ध, गन्धर्व, विद्याधर, चारण, किन्देव, नाग,
किन्नर, राक्षस, और किम्पुरुष आदि थे । अपना वंश
वृक्ष इन्ही ब्रह्मर्षियो से प्राप्त किया था ।
रामायण में कैलास के समीप गुह्यको के रहने
की बात कही गयी है । सुग्रीव ने उत्तर दिशा में
देवी सीता को खोजने के लिये, जिन देशो तथा
जातियों का नाम लिया है, उनमें गुह्यक हैं ।
वाल्मीकि रामायण किष्किन्धा काण्ड सर्ग ४३,
श्लोक ३ में उल्लेख आता है—वहाँ यक्षो के स्वामी
विश्रवाकुमार श्रीमान् राजा कुबेर जो समस्त विश्व
के लिये वन्दनीय हैं तथा धनदाता हैं, वह यक्ष
राजा गुह्यको के साथ निवास करते है ।'
कल्हण के गुह्यक शब्द के व्यवहार से
गुह्यक जाति की सत्यता तथा वास्तविकता पर
विशेष प्रकाश पडता है । पुराणों में गुह्यको को
यक्षों का एक वर्ग माना है। इसका उल्लेख कर
चुका हूँ । कल्हण के इस शब्द से कि राजा ने
गुह्यको से सहायता अर्थात् काम लिया, इससे
मालूम होता है, उस समय गुह्यक नामक जाति
कश्मीर में रहती थी । जाति परिश्रमी थी ।
निपुण थी ।
पुल बनाना आज भी शिल्पक कार्य समझा
जाता है । किसी कश्मीर कलाकार की सहायता नही
ली गयी । गुह्यकों की सहायता पुल बनाने के
लिये ली गयी, इसका अर्थ है। यह जाति इस
कला में निपुण थी । यक्ष नाम की भी जाति थी,
गुह्यक नाम की भी जाति थी । कश्मीर में रहती
थी । यक्षों गन्धर्वों को कालान्तर में मानव विशेष
समझ लिया गया । इसी प्रकार गुह्यकों को भी
मानव विशेष समझा गया ।
कल्हण के वर्णन से स्पष्ट हो जाता है। गुह्यक
एक जाति थी । इस जाति के लोग कश्मीर में
आवाद थे । घोर निर्माण कला में निपुण थे ।

२१८ राजतरंगिणी
स हि कारयितुं यक्षैर्यतते स्म स्वमण्डले ।
दीर्घानश्ममयान्सेतूंस्तोयविप्लवशान्तये ॥ १५६ ॥
१५६. उस राजा ने स्वमण्डल में जल¹ विप्लव शान्त करने के लिये यक्षों² की सहायता से
पाषाण मय दीर्घ सेतुओं के निर्माण का यत्न किया था।

ऊँचा होने पर उसे ऊँचे स्थान में पहुँचाया जा सकता
है। राजा दामोदर द्वारा बसाये नगर को आज भी
स्मृति स्थानीय लोगो में है।
१५८ (१) विघ्न : कल्हण ने कुटिल तथा तुच्छ
मनुष्यों द्वारा परोपकारी कार्यों में बाधा डालने की
मनोवृत्ति को धिक्कारा है। उस लोकोत्तर कार्य को
उन्नतआत्मायो का कार्य कहा है। और इस प्रकार के
कार्यों में अरुचि रखने तथा बाधा डालने वालो को
उनकी पूर्व जन्म की पुण्यशीलता का अभाव होना
उनमें माना है। वह यहाँ पर कर्मसिद्धान्त का
प्रतिपादन करता है। वह महात्मा गान्धी के समान
मनुष्य को बुरा नही कहता परन्तु उनके कर्म को बुरा
कहता है। कर्म द्वारा मनुष्य पुण्यात्मा एवं दुरात्मा
दोनो होता है। अतएव सुकर्म करने वाले श्लाघ्य हैं।
दुष्कृति करनेवाले धिक्कार के पात्र हैं।
१५९ (१) जल प्लावन : कश्मीर को प्रकृति
ने हराभरा नन्दन उद्यान तुल्य अतिरम्य बनाया
है तथापि कश्मीर मण्डल पर प्रकृति की ही वक्र दृष्टि
रहती है। जल एवं अग्नि कश्मीर, मुख्यतया श्रीनगर,
के शत्रु रहे हैं। जल विप्लव, जलप्लावन वर्षा के द्वारा
पहाड़ों का गिरना आदि साधारण बातें हैं। घनघोर
वर्षा यदि लगातार तीन दिन तक कश्मीर में हो जाय
तो जल विप्लव सदृश दृश्य दिखायी पड़ता है। इनसे
कश्मीर की रक्षा करने का स्तुत्य प्रयास प्रायः सभी
राजाओं ने किया है। राजा ने भी यक्षों की सहायता
लम्बे बाँध बँधाने के लिये ली थी। यक्ष शब्द
के प्रयोग से यही प्रकट होता है। राजा का सेतु
निर्माण कार्य असाधारण था। साधारण पुरुषार्थ मात्र
से सम्भव नहीं था। अतः कल कश्मीरी मुसलमान
कश्मीर के बने पुराने मन्दिरों तथा अन्य निर्माण में लगे
विशाल शिलाखण्ड को देखकर उन्हे जिन तथा परियो
का काम कहते हैं। इसका कारण यह है कि मुसलिम
काल में किसी बड़ी पत्थरो की इमारत की रचना
नही हुई। पुराने पत्थरो को तोड कर निःसंकोच
उनका प्रयोग नवीन निर्माण मे किया जाता रहा है।
१५९ (२) यक्ष : कल्हण कश्मीर में प्रचलित
किंवदन्ती की ओर संकेत करता है। प्राचीन विशाल
इमारतों का निर्माण, जिनमें विशाल शिलाखण्ड लगे
हैं, उन्हें यक्षों का निर्माण, मानवीय शक्ति के परे
होने के कारण मानता है। कल्हण ने जिन भव्य
भवनों तथा निर्माणों का वर्णन किया है उनमें बहुतों
के ध्वंसावशेष वर्तमान हैं। कश्मीरी मुसलमान
उन्हे जिन तथा परियों का बनाया मानते हैं। कारण
स्पष्ट है। आज भी उन शिलाखण्डों को देखकर
आश्चर्य होता है। ये किस प्रकार मानवों की स्वल्प
शक्ति से उठाये और भवनों में लगाये गये होंगे।
यक्ष शब्द ऋग् तथा अथर्व वेद में अनेक स्थलों
पर आया है। (ऋग्वेद १:१९०:४, ४:४:१३,
५:१०:४, ७:५३:१६, १०:८८:१३, ७:६१:५;
अथर्व वेद ८:६:२५, १०:२.३२, १०:७:३८,
१०:८.४३, ११:२:४)
वायु, मत्स्य, ब्रह्माण्ड पुराणों में यक्ष शब्द प्रायः
गन्धर्व तथा किन्नर के साथ आता है। ये हिमालय
प्रदेश निवासी जातियाँ थी। अलवेरूनी ने गन्धर्वों को
गायक जाति में गिना है। गन्धर्वों का संगीत तथा
नृत्य पेशा था और आज भी है।
गन्धर्वान् किन्नरान् यक्षान् रक्षोविद्याधरांस्तथा ।
क्लापग्रामकांश्चैव तथा किं पुरुषाद् रम्यान् ॥
अग्नि पुराण (१९:१८) में 'कश्यपपत्नीखशा-
जाता.' अर्थात् कश्यप की पत्नी खशा से यक्षों की
उत्पत्ति का उल्लेख किया गया है।

प्रथम'तरंग २१९
यक्षों का वर्णन महाभारत में यथेष्ट रूप से
मिलता है। गुह्यकों के सन्दर्भ में यक्षों का उल्लेख
किया गया है। महाभारत में उन्हें देव योनि में रखा
गया है। विराट अण्ड द्वारा ब्रह्मादि के उत्पन्न होने के
पश्चात् यक्षों की उत्पत्ति बताई गयी है। महाभारत
आदि पर्व (१:३५) में यक्षों को पुलस्त्य मुनि की
सन्तान कहा गया है। आदि पर्व (६६:७) में
राक्षस रावण पुलस्त्य का नाती था। अतएव यक्षों
का सम्बन्ध राक्षसों से मिलाने का प्रयास किया
गया है।
यक्ष मानव थे। श्री शुकदेव जी ने यक्षों को
महाभारत की कथा सुनायी थी (आदि पर्व १:१०८)
यक्षों ने कुबेर का राजपद पर अभिषेक किया
था। (वन पर्व १११:१०:११) पाण्डव भीमसेन
ने यक्षों तथा राक्षसों को पराजित कर भगा दिया
था। (वन पर्व १६०:५७-५८) सुन्द-उपसुन्द ने
इनको पराजित तथा पीड़ित किया था। (वन पर्व
२०८:७)
यम ने यक्ष का रूप धारण कर युधिष्ठिर से
प्रश्नोत्तर किया था। यक्ष के प्रश्नों का उत्तर देकर,
धर्मराज युधिष्ठिर ने चारो भाइयो को जीवित किया
था। (वनपर्व ३१४:४७।)
प्रायः देवताओं की मूर्तियों पर यक्षगण आकाश
में उड़ते उन्हें माला पहनाते, पुष्प वर्षा करते हुए
दिखाये जाते हैं। भगवान् बुद्ध की मूर्ति में भी
शिरोभाग के दोनो पाश्र्वों में उड़ते यक्ष, माला सहित
उत्कीर्ण किये मिलते हैं।
ब्रह्माण्ड तथा वायु पुराणों के अनुसार वे राक्षस
तथा खसा की सन्तान हैं। वे अपनी माता को
खा जाना चाहते थे अतएव उनका नाम यक्ष पड़ा।
यक्षो के रूप का वर्णन किया गया है। उन्हें चार
हाथ तथा चार पैर वाला दिखाया गया है। रात्रि में
अपने आहार निमित्त विचरण करते हैं। एक यक्ष
वमुरुचि का रूप धारण कर अप्सरा क्रथस्थला के
साथ नन्दन में निवास किये थे। उससे रजत नामक
पुत्र उत्पन्न हुआ। यक्ष अपने पुत्र के साथ हिमालय
में निवास निमित्त आया था।
ब्रह्माण्ड (३:७:६०, १००-१७, २२:१४,
४१:३०, ७१:१११,) भागवत आदि पुराणो में यक्षो
की उत्पत्ति की एक और कथा है। कश्यप पिता
तथा विश्वा माता का पुत्र यक्ष था। (भागवत
(२.६:१३, ६०८२४, १०:३:२७, ६२:१८, ८५.४१
ब्रह्माण्ड पुराण २:३२:१-२, ३५:१९१, ३६:११८)
पुराणो में उन्हें रुद्र का अनुयायी कहा गया है।
उनके स्वामी का नाम कुबेर दिया गया है। भागवत
(४:१०:४,११:१६:१६,२३:२४) तथा मत्स्य पुराण
(८:५) के अनुसार ब्रह्मा ने यक्षों का अधिनायकत्व
शूलपाणी को दिया था। वृत्र की सहायता इन्द्र के
विरोध में यक्षो ने की थी। दक्ष यज्ञ में सती के
साथ गये थे। भागवत (६:१०२०,४:४.४:३४)
उनके खेलों का वर्णन भागवत पुराण (१०:९०:९)
मे किया गया है। हरि की भक्ति के कारण यक्षो
ने मोक्ष प्राप्त किया था। भागवत (७:७:५०)।
ब्रह्मा के समीप जब ककुद्मी गये थे तो उनका अनर्त
राज्य यक्षों ने ले लिया था। भागवत (९:३:३६)
देवो के साथ भगवान् कृष्ण को यक्ष देखने आये थे।
भागवत (७:८:३८,९:३१:२) रावण ने यक्षों को
परास्त किया था। ब्रह्माण्ड पुराण (३:७:२५५)। वे
पित्रो की पूजा करते थे। भागवत पुराण (३:१०:३८,
१११, ११:८१, ४:२:२६, १४:४, २०:५०, ३०:९,
३३:७५)।
मत्स्य पुराण (अध्याय २३) में वर्णन मिलता
है कि देव गुरु बृहस्पति की पत्नी तारा के कारण
शंकर तथा चन्द्रमा में युद्ध हुआ। उसमें यक्षो के
स्वामी कुबेर ने वैताल, यक्ष, नाग तथा किन्नरो की
सेना के साथ शंकर की सहायता निमित्त युद्ध में
भाग लिया था।
मत्स्य पुराण (अ० १८०) में यक्षों के विषय
में एक रोचक कथा दी गयी है। उससे यक्षों के व्यव-
हार, आचरण तथा धर्म पर प्रकाश पड़ता है। इसका
सम्बन्ध हरिकेश यक्ष से है।

यहाँ पृष्ठ का पंक्ति-दर-पंक्ति लिप्यंतरण दिया गया है:

२२० राजतरंगिणी

[बायाँ स्तम्भ]
पूर्णभद्र यक्षो का राजा था। उसका पुत्र हरि-
केश था। हरिकेश शिव का उपासक बन गया। पूर्ण
भद्र ने अपनी पुरातन परम्परा पर पुत्र का ध्यान
आकर्पित करते हुए कहा- रुद्र की उपासना उचित
नहीं है। हमारा काम मानवों से भिन्न है। यक्ष
स्वभाव से क्रूर होते हैं। कच्चा मांस खाते हैं।
कुत्सित जीवों का भक्षण करते हैं। हिंसक होते हैं।
न हि यक्षकुलीनानामेतं मूढ व्रतं तव।
गुह्यका यत यूयं वै स्वभावक्रूरचेतसः॥
क्रव्यादारचैव किंभक्षा हिंसाशीलाइच पुत्रक।
मैवं कार्षीर्न ते वृत्तिरेवं ॰ । महात्मना ॥
पिता की बात न मानकर हरिकेश काशी आकर
तपस्या करने लगा। तपस्या से प्रसन्न होकर शिव ने
हरिकेश से वर माँगने के लिये कहा। हरिकेश ने
शिव भक्ति का वर माँगा। शिवने प्रसन्न होकर यक्ष
को वरदान दिया - 'यक्ष, तुम सबके पूज्य गणो के
स्वामी तथा धनपति होगे। प्राणियो से अजेय होंगे।
अन्नदाता होगे। क्षेत्रपाल होगे। उद्भ्रम तथा संभ्रम
नामक दो गण तुम्हारे होंगे। तुम दण्डपाणि होगे।'
काशी तथा मथुरा दोनो स्थानो पर यक्ष लोग
अपने पुरातन धार्मिक परम्परा के स्थान पर शिव की
उपासना अपना लिये। यक्षों ने लौकिक किंवा जातीय
धर्म तथा रीतियो के स्थान पर शैव मत स्वीकार कर
लिया। उन्हें शिव के गणो मे सम्मिलित कर लिया
गया। वे शिव के भक्त तथा अनुयायी हो गये थे।
भागवत (२:६:१३) मे विराट् पुरुष के वर्णन
के प्रसंग में देवता, दैत्य, मनुष्य, नाग, यक्षो, मृग,
गन्धर्व, अप्सरा, राक्षस, भूत, प्रेत, विद्याधर, सर्पादि
को एक वर्ग मे रखकर उन्हे विराट् पुरुष माना
गया है।
भागवत (६:८ २४) मे नारायण कवच के वर्णन
मे कूष्माण्ड, विनायक, यक्ष, राक्षस, भूत, प्रेतादि को
कौमोदकी गदा से नष्ट करने की प्रार्थना की गयी है।
देवराज इन्द्र के विरुद्ध जाते हुए यक्षों का वर्णन
किया गया है। दैत्य, दानव, यक्ष, राक्षस सुवर्ण के

[दायाँ स्तम्भ]
साज सामान से सुसज्जित होकर देवराज इन्द्र की
सेना की बाढ़ रोकने के लिये आये थे। (भा०६:१०
२०)।
नृसिंह अवतार के समय भगवान् के समीप जय-
जयकार करते आने वालों में-सिद्ध, विद्याधर, महा-
नाग, मनु, प्रजापति, गन्धर्व, अप्सरायें, चारण, यक्ष,
किम्पुरुष, वैताल, सिद्ध, किन्नर, सुनन्द तथा कुमुद
आदि विष्णु के सभी पार्षद वहाँ आये। भागवत
(७:८:३८) यहाँ पर विष्णु के पार्षद रूप से यक्षों
का वर्णन किया गया है।
रेवत ने कुशस्थली नामक नगर बसाया था।
उनके ५० ककुद्मी थे। वे ब्रह्मा से भेंट करने गये
थे। लौटकर अपने नगर में आये। देखा कि उनके
वंशजों ने यक्षों के भय से नगर का त्याग कर दिया
था। भागवत पुराण (९:३:३५)।
भागवत (१०:६:२७) में यक्षों को भूत, प्रेत,
पिशाच, राक्षस और विनायक के वर्ग में रखा गया
है। भागवत पुराण (१०:३२:१६) में यक्षों को
पुनः देवता, गन्धर्व, सिद्ध, चारण, दैत्य, विद्या-
धर तथा मनुष्यो के साथ वर्णन किया गया है।
भागवत पुराण (१०:९०:९) में भगवान् अपनी
पत्नियो के साथ बिहार करने की उपमा यक्षराज
कुबेरका यक्षिणियों के साथ बिहार करने के साथ
देते हैं।
उद्धव के प्रश्नों का उत्तर देते हुए कृष्ण ने
अपने विराट् स्वरूप का वर्णन किया है। उसमें कहा
है- 'मैं दैत्यो में दैत्यराज प्रह्लाद, नक्षत्रो में चन्द्रमा,
ओषधियो में सोमरस एवं यक्षराक्षस मे कुबेर हूँ।
(११:१६:१६)।
यक्षों को 'धन कृपण' कहा गया है 'जो मनुष्य,
देवता, ऋषि, पितर, प्राणी, जाति, भाई, कुटुम्बी
और धन के भागीदारों को उनका भाग देकर सन्तुष्ट
नहीं रखता और न स्वयं ही उपभोग करता है वह
यक्ष के समान धन की रखवाली करने वाला कृपण
है।' भा० (११:२३:२४)।

प्रथम तरंग २२१

रामायणकार को यक्षो का ज्ञान था। सुग्रीव ने
बन्दरों को सीता के अन्वेषणार्थ जिन देशों तथा
जातियो में जाने का नाम लिया था उनमें यक्ष का
भी नाम है। यह जाति कैलास के समीप उत्तर मे
निवास करती थी। (वाल्मीकि रामायण किष्किन्धा
काण्ड सर्ग ४३:२३) ।
मत्स्य पुराण (अध्याय १२१) में यक्षों के निवास-
स्थान के सम्बन्ध में उल्लेख है -- कैलास पर्वत के
पूर्व और उत्तर दिशा में दिव्य सुवेल नामक पर्वत तक
फैला रत्नों की तरह जाज्वल्यमान चन्द्रप्रभा गिरि
है। उसके समीप अच्छोद सरोवर है। उस सर से
अच्छोद नदी निकली है। नदी के तट पर चैत्ररथ
वन है। उसके समीपस्थ पर्वत पर मणिभद्र क्रूरकर्मा,
यक्ष सेनापति, गुह्यकों से रक्षित निवास करता है।
कैलास के दक्षिण और पूर्व दिशा मे हेमशृंग
किंवा लोहित नामक एक पर्वत है। उसके पाद
प्रदेश में लोहित सरोवर है। उससे लौहित्य महानद
निकला है। उसके तट पर विशोक वन है। वहाँ
परम धार्मिक मणिधर यक्ष एवं सौम्य गुह्यकों द्वारा
रक्षित निवास करता है।
ककुद्मी कैलास के पश्चिम ककुद्मान पर्वत पर
रुद्र (वृष नन्दिकेश्वर) की उत्पत्ति हुई थी। त्रिक-
कूट के सम्मुख त्रैककुद कज्जल तुल्य शैल है। यहाँ
वैद्युत पर्वत है। उस पाद में मानस दिव्य सरोवर
है। उससे सरयू नदी निकली है। उसके तट पर
वैभाज दिव्य वन है। वहाँ प्रहेति का पुत्र कुबेर का
सेवक ब्रह्मघाती पौरुषशाली राक्षस निवास
करता है।
वायु पुराण (अध्याय ३६) में यक्षों का
निवास स्थान दिया गया है-शतशृंग पर्वत पर
अत्यन्त बली यक्षों के सौ पुर हैं।
वायु पुराण (अध्याय ६९) में यक्षों के विषय
में उल्लेख मिलता है-
पुण्यजन नामक यक्ष, गुह्यक नाम से प्रसिद्ध
यक्ष, एवं देवजन नामक यक्षादि गुह्यकों के
अन्तर्गत हैं। अगस्त्य, पौलस्त्य तथा विश्वामित्र
के गोत्रों में उत्पन्न होने वाले राक्षस तथा यक्षों
के राजा कुबेर हैं। अलका नगरी के कुबेर अधी-
श्वर हैं। यक्ष केवल आँखों से देखकर रक्त मास
एवं चर्बी पी जाते हैं। राक्षस शरीर के भीतर
प्रवेश कर पी जाते हैं। पिशाच पीड़ित कर पीते हैं।
सभी लक्षणों से सम्पन्न देवताओं के समान, अधि-
कारी, तेजस्वी, बलवान्, ऐश्वर्यशाली, इच्छानुसार
रूप धारण करने वाले, शक्तिशाली, विक्रमी, लोकों
द्वारा पूजनीय, सूक्ष्म स्वरूप धारण करने वाले,
तेजस्वी, यक्षादि के योग्य वरदान देने वाले, यक्ष
परायण एवं देवताओं के समान धर्मात्मा होते हैं,
उन्हें असुर कहा जाता है।
गन्धर्वों का प्रभाव देवताओं की अपेक्षा तीन-
चौथाई हीन होता है। अर्थात् गन्धर्वों में देवताओं
का चतुर्थांश प्रभाव हीन है। गुह्यक का प्रभाव यक्षों
के प्रभाव का चतुर्थांश होता है। अर्थात् गुह्यकों में
केवल सोलहवां भाग देवताओं के प्रभाव का शेष
रहता है। राक्षसों का प्रभाव गुह्यकों अर्थात् यक्षों
तुल्य होता है। यक्षों से तीन गुने हीन प्रभाव
पिशाच होते हैं। रूप, वायु बल, धर्म, ऐश्वर्य,
बुद्धि, तपस्या, शास्त्र बल एवं पराक्रम में गन्धर्व,
यक्ष, राक्षस, पिशाच चार देवयोनियों में उत्पन्न
होने वाले, वर्ग सुर तथा असुरों की अपेक्षा हीन
होते हैं।
उक्त उद्धरणों से यक्षों के सम्बन्ध में कुछ बातें
स्पष्ट होती है। (१) यक्ष देवयोनि में थे। मानव
थे। (२) उन्हें गन्धर्व, राक्षस तथा पिशाचो के वर्ग
में रखा गया है। (३) सुरों की अपेक्षा असुरों के
वर्ग में उन्हें अधिक रखा गया है। (४) वे हिमालय
निवासी थे। उनका आवास कैलास के आसपास
था। (५) वे आसुरी मत, मांसादि खाने तथा रक्त
पात करने वाले थे। किन्तु कालान्तर में वे शिव के
अनुयायी हो कर शैवमतावलम्बी हो गये थे। ६)
कुबेर उनका राजा था। वे युद्ध मे भाग लेते थे।

२२२ राजतरंगिणी
तपोविभूतयोऽचिन्त्या द्विजानामुग्रतेजसाम् ।
तादृशामपि ये कुर्युः प्रभावस्य विपर्ययम् ॥ १६० ॥
१६०. उग्र तेजस्वी द्विजों की तपो विभूतियाँ अचिन्त्य होती हैं क्योंकि उन जैसे राजाओं
का भी प्रभाव जिन्होंने नष्ट कर दिया है।
दायादादिबलैर्नष्टा दृष्टा भूयः समुत्थिता ।
श्रीर्विप्रावज्ञया शप्तान्नपुनःसंभवा पुनः ॥ १६१ ॥
१६१. दायाद¹ आदि के बल से नष्ट श्री का पुनरुत्थान देखा गया है किन्तु विप्रों की
अवज्ञा द्वारा नष्ट श्री का होना असंभव है।
श्राद्धार्थमुत्थितः स्नातुं द्विजैः कैश्चिद् बुभुक्षितैः ।
प्राक्स्नानाद्भोजनं राजा स कदाचिदयाच्यत ॥ १६२ ॥
१६२. किसी समय राजा श्राद्ध निमित्त स्नान करने के लिये उठा। उसी समय कुछ
बुभुक्षु ब्राह्मणों ने राजा से स्नान के पूर्व ही भोजन मांगा।
(७) मत परिवर्तन के कारण उन्हें शिव का गण बना
लिया गया था। (८) गुह्यक लोग यक्षों की एक
शाखा थे। (९) उनका सम्बन्ध भारत के उत्तर-
पश्चिम सीमा तथा पर्वतीय भागों में रहने के
कारण असुरों से होना स्वाभाविक था तथा उनका
आचार-विचार प्रारम्भ से असुरों से मिलता था।
(१०) यक्ष कश्मीर के सीमान्त मेरु के दक्षिण
तथा कैलास के पश्चिम अर्थात् कश्मीर की उत्तरी
पूर्वी तथा उत्तरे-पश्चिमी सीमा पर रहते थे।
मैंने गुह्यकों के संदर्भ में लिखते हुए यक्षों के
विषय में कुछ लिखा है। कल्हण ने यक्षों का विवेचन
यहाँ शिल्पी के रूप में किया है। वे सेतु निर्माण करने
में निपुण थे। पुराणों में यक्षों को वस्तुपूरक माना
है। कहीं-कहीं उन्हें इतर योनि भी माना गया है।
आँखों में पड़ने वालों के रूप में भी चित्रित किया
गया है। कल्हण ने इन सब कपोलकल्पनाओं को
छोड़ते हुए वास्तविकता का परिचय दिया है।
ने यक्षों को एक जाति के रूप में चित्रित किया
और उनका मुख्य काम शिल्प था। राज्य में
देवर्... दूर करने के लिये राजा ने यक्षों द्वारा
किया गया है। ये राजा दामोदर के समय
गुह्यकों के साथ कश्मीर में आबाद थे। गुह्यक
और यक्ष दोनों शिल्पों के रूप में चित्रित किये गये
हैं। किन्तु कल्हण ने गुह्यकों का विवरण केवल
सेतु के सम्बन्ध में दिया है। और यक्षों का सेतु
अर्थात् बाँध बनाने के सम्बन्ध में किया है।
अतएव गुह्यक यदि सेतु बनाने में प्रवीण थे तो
यक्ष जलाभाव दूर करने के लिये बाध बनाने में
चतुर दिखायी पड़ते हैं।
१६१ (१) दायाद : दायाद शब्द का अर्थ
उत्तराधिकारी—पुत्र, भाई, बन्धु होता है।
दाय भाग हिन्दू कानून इसी शब्द के आधार पर
बना है। कल्हण, राजा का बल किस प्रकार
नष्ट होता है, इस ओर संकेत करता है। कश्मीर
में राजा गण अपने उत्तराधिकारियों तथा सम्ब-
न्धियों से बहुत परेशान किये गये थे। उनके कारण
कश्मीर के राजा तथा कश्मीर राज्य दुर्बल होता
रहा है। दिल्ली में मुसलिम बादशाहों को सर्वदा
अपने सम्बन्धियों से भय बना रहता था। उत्तरा-
धिकार के लिये गृह युद्ध होता रहता था।
कल्हण यहाँ ब्राह्मणों के बल का
वर्णन करता है। उग्रते... का कोप-

प्रथम तरंग २२३
यियासुना वितस्तान्तर्यदा तेनावधीरिमत् ।
तदा प्रभावात्ते तस्य तां धुनीमग्रतो व्यधुः ॥ १६३ ॥
१६३. वितस्ता गमनातुर राजा ने जब उनका तिरस्कार किया तो ब्राह्मणों ने अपने
प्रभाव से वितस्ता¹ को राजा के सम्मुख उपस्थित कर दिया ।
सेयं वितस्ता दृष्ट्वैनां भोजयास्मान्स तैरिति ।
उक्तोऽपि मायाविहितामज्ञासीत्सरिदाहृतिम् ॥ १६४ ॥
१६४. ब्राह्मणों ने कहा -' यह वही वितस्ता है। इसे देखकर अब हमें भोजन कराओ ।
उनके इस प्रकार कहने पर भी राजा ने नदी का लाया जाना माया¹ ही समझा ।
भोज्यं ददामिनाऽस्नातो विप्राः सर्पंत सांप्रतम् ।
तेनेत्युक्तास्तमशपंस्ततः सर्पो भवेति ते ॥ १६५ ॥
१६५. 'विप्रो ! बिना स्नान किये मैं भोजन नहीं दूंगा। आप लोग इस समय
सर्पंत¹ होइये ।' राजा के इस प्रकार कहने पर ब्राह्मणों ने शाप दिया --' तुम सर्प हो जाओ।'

भाजन राजा कभी सम्भल नहीं सकता। यद्यपि
सम्बन्धियों तथा अन्य कारणों से नष्ट राजाओं का
पुनरुत्थान देखा गया है।
१६३ (१) वितस्ता : कल्हण ब्राह्मणों के
प्रभाव, चमत्कार तथा अलौकिक शक्ति का यहाँ
उल्लेख करता है। प्रतीत होता है। राजा किंचित्
हठी था। वह ब्राह्मणों की शक्ति पर विशेष विश्वास
नहीं करता था । अतएव उसने उपेक्षा भाव यहाँ
प्रकट किया है।
१६४ (१) माया : अलबेरूनी ने कश्मीर के
ब्राह्मणों के चमत्कार का वर्णन किया है। वह कहता
है कि कश्मीरी जड़ खिलौनों तथा प्रतिमानों को
सजीव प्राणी की तरह चला देते थे। मैंने इसका यथा
स्थान विस्तृत वर्णन किया है ।
निस्सन्देह योग तथा सिद्धियों द्वारा बहुत कुछ
अनहोनी बातें प्रत्यक्ष दिखाई पड़ती हैं। ब्राह्मणों
के इस चमत्कार को देखकर भी राजा ने विशेष
महत्त्व नहीं दिया। क्योंकि वह ब्राह्मणों की माया
का उसे खेल समझता था ।
विप्रों तथा राजा के संवादों से प्रकट होता है
कि ब्राह्मण भोजन पाने के लिए जिद कर रहे थे ।
और राजा भी स्नान के पश्चात् ही भोजन देने का
हठकर बैठा था। यह ध्यान देने की बात है कि
राजा ने भोजन देना अस्वीकार नहीं किया था।
वह श्राद्ध निमित्त स्नान के पश्चात् देने पर हठ किया
था। कल्हण स्वयं ब्राह्मण था । अतएव उसने
यहाँ ब्राह्मणों की प्रतिभा दिखाने का स्वाभाविक
प्रयास किया है।
१६५ (१) सर्पंत : कल्हण ने यहाँ अपनी
कविप्रतिभा का परिचय दिया है। पूर्व पद में
'सर्पंत सांप्रतम्' तथा उत्तर पद में 'सर्प' शब्द का
प्रयोग कर अनुप्रास बैठाया। राजा ने उन्हें जैसे रेंगते
हुए चले जाने के लिये कहा । उनका तिरस्कार
किया। उस तिरस्कार से क्रुद्ध होकर राजा के ही
'सर्पंत' शब्द को पकड़ कर 'सर्प' हो जाने का शाप
दिया । मनुष्य को सर्प रूप परिणत कर देना यह
कोई नयी बात नहीं थी। इसके और भी प्रमाण
पुरा साहित्य में मिलते हैं ।
नहुष जब इन्द्र पद पर आसीन हुए थे तो उन्होंने
इन्द्राणी को प्राप्त करने का प्रयास किया। सप्तर्षियों
से पालकी उठवायी। इन्द्राणी मिलन की उतावली में
सत्वर गति से चलने के लिए 'सर्प-सर्प' कहने लगे ।

२२४ राजतरंगिणी
अशेषमेकेनैवाह्ना श्रुत्वा रामायणं तव ।
शापस्य शान्तिर्भवितेत्यूचिरे ते प्रसादिताः ॥ १६६॥
१६६. राजा द्वारा प्रसन्न हुए ब्राह्मणों ने कहा -- 'सम्पूर्ण रामायण एक दिन मे
सुनने पर शाप शान्त १ हो जायगा ।'
स दामोदरसूदान्तर्धावन्दूरमुदन्यया ।
शापोष्णश्वासधूमेन जनैरद्यापि लक्ष्यते ॥ १६७ ॥
१६७. आज भी लोग उस शाप ग्रस्त १ राजा को उसके उष्णश्वास के धूम से पहचानते हैं
जो जल निमित्त दामोदर सूद में इधर उधर प्यासा घूमता रहता है ।
अथाभवन्स्वनामाङ्कपुरत्रयविधायिनः ।
हुष्कजुष्ककनिष्काख्यास्त्रयस्तत्रैव पार्थिवाः ॥ १६८ ॥
१६८. तत्पश्चात् वहीं पर तीन राजा हुष्क १ जुष्क तथा कनिष्क नाम के हुए जिन्होने अपने
नाम पर तीन नगर (हुष्कपुर, जुष्कपुर, कनिष्कपुर) बसाये ।

सप्तर्षियो मे अगस्त्य ऋषि ने क्रोधित होकर शाप
दिया -- 'तू सर्प हो जाथ ! राजा नहुष सर्प होकर
पृथ्वी पर गिर पडे । अगस्त्य को उसकी दशा पर
दया आयी । उन्होने शाप शान्ति के लिये कहा-
युधिष्ठिर के राज्य काल में तुम्हें सर्प योनि से मुक्ति
प्राप्त होगी । (मै० उ०. ११ : १७' अनु० : १५६-
१५७' आ० ६ . १८ : २-३' : भा० ६ :
७-८' विष्णु० : १ : २४)
राजा नहुष तथा राजा दामोदर द्वितीय दोनो
ब्राह्मणों के कारण पतित होकर सर्प गति पाये थे ।
राजा नहुष तथा राजा दामोदर दोनो को ब्राह्मणों का
कोपभाजन बनना पड़ा था । उनके कारण राज्य
के साथ ही साथ मनुष्य योनि त्याग कर सर्प
होना पडा ।
१६६ (१) शाप : ऋषि, मुनि, देवी, देवता,
सक्षम ब्राह्मण क्रोधित होने पर शाप देते हैं । शाप
देने वाले की भी शक्ति क्षय होती है । शाप सर्वदा
क्रोध के कारण दिया जाता है । आन्तरिक क्रोध का
शाप बाहरी साकार रूप है । क्रोध स्वत. अवगुण
तथा दोष है । प्रायः देखा गया है कि शाप देने
वाला ही शाप शान्ति का उपाय भी बताता है ।
नहुष के शापित होने पर अगस्त्य ने शाप शमन का
उपाय बताया था । यहाँ पर भी शाप देने वाले
विप्रो ने ही उसके शान्ति का उपाय राजा को
बताया था ।
१६७ (१) शापग्रस्त : कल्हण के समय तक
यह कहावत प्रचलित थी । दामोदर ऊद्र में उसे
सर्प स्वरूप व्याकुल तृषित गर्म श्वास लेते हुए लोग
देखते हैं । इससे दो बातें प्रकट होती हैं । मालूम
होता है राजा शाप मुक्त नहीं हुआ था । कल्हण
उसकी मृत्यु, राज्य काल, उसके उत्तराधिकारियों के
विषय में कुछ नही लिखता । इस विषय पर
कही से और प्रकाश अभी तक नहीं पड़ सका है ।
स्थानीय वृद्ध ग्रामीण इस प्रकार की कथा कहते हैं ।
परन्तु नयी पीढी उन्हें भूल रही हैं । कल्हण
ब्राह्मणों के शाप के अद्भुत प्रभाव की धाक बैठाता
है । चेतावनी देता है । विप्र के विमुख होने पर
परिणाम भयंकर होता है । कहावत है-दुर्भाग्य
गर्म श्वास पैदा करती है । और सौभाग्य उसे
शीतल बना देता है ।
१६८ (१) आइने अकबरी में उन्हें झ्येश्क,
जेश्क, केनश्क तीन भाई कहा गया है । अबुल

'प्रथम तरंग २२५

फजल कहता है । तातार में एक कथा प्रचलित है ।
ओधुज तुरुष्क राजा ने बोखारा, बलख, इमोर,
काबुल तथा कश्मीर जीता था । उस समय
कश्मीर का राजा जगम् था । उसने कश्मीर में
जर्फेन नामक धर्म चलाया । यह घटना ई० पू०
२८०० वर्ष पहले घटी थी ।
हसन इनके सम्बन्ध में रत्नाकर पुराण
का सन्दर्भ देकर एक विचित्र बात कहता है—
'तुर्किस्तान के शहजादों में से ३ आदमी हुष्क, जुष्क,
कनिष्क राजा सन्दिमान के इस तख्त पर हमराह
थे । इस बिना पर अपनी पैदाश खसलत के
बमूजिब इन तीनों शाहजादो को मुल्क कश्मीर बतौर
जागीर बख्शा । इस मुल्क के बहुत से लोगो को
अपना गरवेदा बना लिया । एक हफ्ता तक कश्मीर
की सैर वह सपाहत अख्तियार कर वापसी अख्त-
यार किया ।'
रत्नागर किंवा रत्नाकर पुराण की गाथा को
मिथ्या करार देने के लिये यहाँ एक और प्रमाण
उपस्थित हो जाता है । हुष्क, जुष्क तथा कनिष्क
के कालों का निर्धारण हो चुका है । कनिष्क
(७८-१०१ ई०) ईसा के पश्चात् हुआ था । हजरत
सुलेमान का काल ईसा से ९७० वर्ष पूर्व है ।
हजरत सुलेमान का काल ९७० ईसा पूर्व से ९३३
वर्ष ईसा पूर्व निर्धारित हो चुका है । सन्धिमति,
सन्धिमान, सन्धिमदि एक ही व्यक्ति के नाम है ।
अभिमन्यु के काल तथा सन्धिमान के काल में
लगभग ११०० वर्षों का अन्तर है । सम्राट् कनिष्क
तथा हजरत सुलेमान के समय में १०४८ वर्षों का
अन्तर है । अभिमन्यु, हुष्क, जुष्क, कनिष्क,
सन्धिमत तथा हजरत सुलेमान जिन्हें एक ही समय
में रखने का प्रयास किया है । उनके ऐतिहासिक
कालों में शताब्दियों का अन्तर है । वे एक
समय नही हुए थे । उनका एक काल में होना
ऐतिहासिक तथ्यों के परे है । रत्नाकर पुराण की
कपोल कल्पना, उसके अनुवाद तथा उसके अस्तित्व
२९
में गम्भीर सन्देह प्रकट करने का अकाट्य प्रमाण
उपस्थित करती है ।
हुष्क, जुष्क तथा कनिष्क को सन्दिमान अर्थात्
हजरत सुलेमान ने काश्मीर का राज्य जागीर के रूप
में दिया । उन्हें तुर्किस्तान से साथ लाकर, गद्दी
पर बैठाया । इतिहास इसकी साक्षी देने में असमर्थता
प्रकट करता है । हुष्क, जुष्क, तथा कनिष्क तीनों को
काश्मीर राज की जागीर दी गयी और तीनों एक
साथ राज्य किस प्रकार कर लिये ऐतिहासिक तथ्यों
तथा घटनाओं के विरुद्ध होते हुए भी मानवीय प्रकृति
के तथा व्यावहारिक दृष्टि से सम्भव नहीं है । एक
साथ तीन राजा सिंहासन पर बैठें। राज्य करें, वह
भी जहाँ राज्य प्रणाली राजतंत्र पर आधारित हो
इतिहास इस प्रकार का उदाहरण भूत वर्तमान तथा
किसी काल में देने में असमर्थ है । गणतन्त्र शासन
प्रणाली में यह सम्भव हो सकता है । जैसे कि रोम
में दो काउन्सिलों की प्रथा थी ।
हुष्क, जुष्क तथा कनिष्क तीनों तीन विभिन्न
व्यक्ति थे । तीनों का राज्यकाल भिन्न था । अतएव
हसन तथा रत्नाकर पुराण की गाथा मनगढन्त कपोल
कल्पना के अतिरिक्त और कुछ नही है ।
हज़रत सुलेमान और कनिष्कादि : हसन
अपने इतिहास में लिखता है—यह तीनों राजे
हजरत सुलेमान की मदद से क० १७९८ संवत् में
हुकूमत कश्मीर पर मुन्तकिल हो गये । मखलूक खुदा
को अपने अदल व इन्साफ और सखावत से दिल
खुश किया । इन तीनों ने तीन गांव आबाद किये ।
चुनांचः हुष्क ने मौजा अशकूरा, कनिष्क ने परगना
बहो में कांपपुरा और जुष्क ने परगना काक मे मौजा
जकरो जंजी आबराजल करने मौजा जकरों की
आबादी के लिए, सन्दलार से पानी की एक नहर
जारी की । मजकूरह बाला तीनों राजाओ ने इकता-
लीस साल इन्तहाई, इत्तफाक व इतहाद से, हकूमत
की । और बहुत से लोगों को अपने मजहब का
गरवीदा बनाया । इसके पहले एक शख्स शख सहूम

२२६ राजतरंगिणी

नामी ने डेढ़ सौ साल से लेकर इनके वक्त तक खिता
कश्मीर में बुद्धमत का प्रचार किया था और बहुत
से लोगों को इस मजहब में दाखिल कर लिया था।
उसके पैरोकारों में एक शख्स नागसेन ने मौजा
हारून में बुद्धमत के प्रचार में बदिल बजान
कोशिश की थी। उन्हीं दिनों बरहमनों और जैनियों
के मा बैन मजहबी मुआमलात पर सख्त झगड़ा बरपा
हुए जिससे जनबैन में सख्त खून रेंज़ी हुई। हुष्क
और कनिष्क के पास इन झगड़ों को दबाने के लिए
काफी फौज न थी। इसलिए यह इस मुआमला
(हुकूमत) के चलाने से आजिज् रहे। इसलिए
तमाम बरहमनों के इत्तफाक् राय से अभिमन्यु जो
राजा वीरमचन्द की औलाद से था और परगना
दाच्छेन वारह में जागीर रखता था। तख्त सल्तनत
पर बैठा। हुष्क, कनिष्क और जुष्क हुकूमत से अलग
कर दिये गये। (पृष्ठ ४२-४३)
उक्त बातें मनगढंत हैं। हज़रत सुलेमान ने
अगर इन लोगों को गद्दी पर बैठाया तो उनको भग-
वान् बुद्ध के समय या उनके पश्चात् होना चाहिए।
परन्तु भगवान् बुद्ध हज़रत सुलेमान के ४१६ वर्ष
पश्चात् हुए थे। उनके जीवन में शताब्दियों का अन्तर
है। बाइबिल के हज़रत सोलेमन और कुरान शरीफ़
के हज़रत सुलेमान एक ही व्यक्ति हैं। कनिष्क का
काल सन् ईसवी की पहली शताब्दी है। कनिष्क और
भगवान् बुद्ध के समयों में चार शताब्दियों का अन्तर
है। कनिष्क के समय में तृतीय बुद्ध परिषद कश्मीर
में हुई थी। अतएव कनिष्क को हज़रत सुलेमान से
जोड़ना इतिहास की सत्यता, तथा सिद्ध घटनाओं,
तथ्यों और काल निर्णय से परे जाना होगा।
छिन्नश्रृंखलाः
कल्हण की इतिहास श्रृंखला वहीं टूट जाती है।
जलोक के पश्चात् दामोदर द्वितीय तत्पश्चात् वह
हुष्क, जुष्क, कनिष्क का उल्लेख करता है। दामोदर
द्वितीय से उक्त राजाओं के कालों में शताब्दियों का
अन्तर पड़ता है। कल्हण ने इन तीनों राजाओं का
वर्णन छविल्लाकर के आधार पर किया है। (रा०
त० १:२०)
कल्हण यहाँ मौन हो जाता है। इस लम्बे काल
में कश्मीर में कितने राजा हुए। कश्मीर मण्डल
की क्या अवस्था थी ? कोई प्रकाश नहीं पड़ता।
अशोक के पश्चात् लगभग अड़तालीस वर्षों तक
मौर्य वंश का राज्य ईसा पूर्व १८४ वर्ष तक था।
मौर्य वंश के पश्चात् ईसा पूर्व १८४ वर्ष में शुंग वंश
का राज्य पाटलीपुत्र में हुआ। कनिष्क का काल
ईसा पूर्व प्रथम शताब्दी का उत्तरार्ध है।
जलोक तथा दामोदर का राज्य काल कल्हण ने
नहीं दिया है। यदि उन दोनों का सम्मिलित राज्य
काल पचास से साठ वर्ष भी मान लें तो दामोदर
और कनिष्क के बीच कम से कम एक शताब्दी का
अन्तर पड़ जाता है।
कल्हण स्पष्ट कहता है। जलोक के पश्चात्
दामोदर द्वितीय राजा हुआ। परन्तु दामोदर द्वितीय
के पश्चात् कश्मीर मण्डल में कौन राजा हुआ
उसपर कुछ प्रकाश नहीं डालता। इस शताब्दी का
इतिहास अभी तक अन्धकार की गोद में है। जलोक
की वंश परम्परा लुप्त हुई। दामोदर राजा हुआ।
प्रतीत होता है कि दामोदर का वंश भी लुप्त हो
गया था। दामोदर के शाप ग्रस्त होने पर क्या
घटनाएँ घटी कुछ पता नहीं चलता। दामोदर ने
रामायण सुनकर प्रायश्चित्त किया या नहीं यह भी
सन्दिग्ध है। वह सर्प हो गया। सर्प तुल्य गर्म श्वास
लेता था। इससे यही प्रकट होता है। उसने
प्रायश्चित्त शायद नहीं किया। उसके वंश में कोई था
या नहीं। उसके सर्प होने पर कश्मीर की क्या अवस्था
हुई सब कुछ लुप्त है। क्योंकि कल्हण ने ५२ लुप्त
राजाओं में से केवल पाँच राजा अर्थात् अशोक से
अभिमन्यु यथा जलोक, हुष्क, जुष्क, कनिष्क तथा
अभिमन्यु का वर्णन किया है। अतएव इनकी काल
गणना अमान्य है। इन दोनों राजाओं का क्रम भी

[Header]
प्रथम तरंग २२७

[Left Column]
गलत दिया गया । इस पर प्रकाश परिशिष्ट 'कुशान
राजा' में डाला गया है ।
कुशान वंशी किस प्रकार काश्मीर के राजा
हुए कल्हण मौन है। वह दामोदर द्वितीय के
पश्चात् सहसा कुशान वंशीय राजाओं का उल्लेख
करता है । कोई कारण भी नही उपस्थित करता कि
वह लम्बी राजाओ की श्रृंखला का जो दामोदर
द्वितीय से कुशान वंशीय राजाओं तक हुए थे उल्लेख
क्यों नही करता। प्रतीत होता है कश्मीर में
लिखित, अलिखित कोई सामग्री प्राप्त नही थी जिसके
आधार पर वह एक शताब्दी के राजाओ तथा कश्मीर
की घटनाओ पर प्रकाश डालता ।
(२) हुष्क : मथुरा के लेख से हुष्क राजा
हुविष्क प्रमाणित हुआ है। परिशिष्ट 'कुशान वंश'
द्रष्टव्य है ।
(३) जुष्क : जुष्क राजा वास्तव में कुशान
राजा वशिष्क था । परिशिष्ट 'कुशान वंश'
द्रष्टव्य है।
(४) कनिष्क : परिशिष्ट 'कुशान वंश'
द्रष्टव्य है ।
(५) हुष्कपुर : वर्तमान उश्कुर गांव है। यह
ग्राम बारहमूला से २ मील दक्षिण-पूर्व वितस्ता के
वाम तट पर स्थित है। बारहमूला के डाक बंगला
से आध मील पर है। कल्हण ने इसे वाराह क्षेत्र
मे कहा है । (रा० त० ५:२५९, ६:१८६, ७:१३११,
८:३६०, ७१८, ८२२, ९४४)
यहाँ ललितादित्य ने विहार तथा मन्दिर
निर्माण कराया था (रा० त० ४:१८८) । कश्मीर
के पश्चिमी पत्थरों से बने द्वार से प्रवेश करने पर
यही हुएनसांग ठहरा था (हुएनसांग :१:२० )
अल्बेरूनी ने इसे बारहमूला के दूसरी तरफ लिखा
है। (इण्डिया पृष्ठ १:२०७) । अबूरिहान उष्कर
और बारहमूला को मिला दिया है। (फ्रेगमेंट्स
ऑफ़ अरब पृष्ठ : ११६ )

[Right Column]
बारहमूला के समीप उष्कर ग्राम वितस्ता के
वाम पार्श्व में है। यहाँ दो चीजें दर्शनीय है । एक
ऊँचा टीला उष्कर ग्राम के पास है। मैं जिस समय
पहुँचा था यहाँ भारतीय फौज की छावनी थी ।
छावनी के फाटक तथा ऊँचे डूहूा के मध्य से बारह-
मूला ऋषी बाबा की सड़क है। वह सड़क बारह-
मूला से बाबा ऋषो जाती है ।
डूहूा पर एक भीमकाय शिवलिंग है । लगभग
६ फीट ऊँचा है। मेरे पास फीता नही था। अतएव
ठीक नाप नही दे सकता । शिव लिंग में एक बाण
बना है । बाण की नोक मूर्धा से प्रत्यंचा नीचे की
तरफ होती भद्रपीठ तक चली गयी है । लिंग का
भद्रपीठ चौकोर है। लिंग में बाण तथा यज्ञोपवीत
तुल्य प्रत्यंचा बना मैने अब तक कहीं किसी लिंग में
नहीं देखा है । इस लिंग का नाम क्या था । कहना
कठिन है । बाण चिह्न अंकित होने के कारण
'बाणेश्वर' नाम रखा जा सकता है। इस समय
केवल लिंग अकेला गड़ा है। यहाँ न तो कोई मन्दिर
है न किसी प्रकार का ध्वंसावशेष । लिंग की पूजा
भी नही होतो । बाणेश्वर लिंग होना असम्भव नही
है । बाणेश्वर का मन्दिर रतलाम स्टेशन से ४४
मील पर स्थापित है । यह स्थान बाणासुर की
राजधानी थी। कथा है कि बाणासुर ने बाणेश्वर
लिंग की स्थापना की थी । संभव है। इस
डूहूा पर कभी मन्दिर था वह तोड़ दिया गया ।
अब उसका ध्वंसावशेष मात्र रह गया है। डूहूा
खोदने पर यहाँ के स्थान पर कुछ प्रकाश पड़ सकता
है। यहाँ की ईंट आबादी पास होने के कारण
गाँव वाले उठा ले गये हो । केवल मिट्टी का टीला
मात्र शेष रह गया है।
उष्कर ग्राम में, बारहमूला स्कूल के प्लेग्राउण्ड के
पीछे मुकुलित कमल शैली के स्तूप का भग्नावशेष
है । परिहासपुर तथा उष्कर दोनो स्तूपों की परि-
कल्पना एक जैसी है। इस समय यह स्थान तार से
घेर दिया गया है । बड़ी-बड़ी घास तथा जंगली खर-

यहाँ पृष्ठ की सामग्री का पूर्ण लिप्यंतरण दिया गया है:

३२८ | राजतरंगिणी
पात उगे थे । उनसे मेरा पैर बुरी तरह छिला गया ।
किसी प्रकार अन्दर पहुँचा ।
स्तूप का अधिष्ठान मात्र शेष रह गया है । स्तूप
की चारों दिशाओं में सीढ़ियाँ बनी हैं। दो सीढ़ियों के
बीच तीन त्रिकोणीय अधिष्ठान के अंश जिस कमल
की मुकुलित एक-एक पंखड़ी हैं। इस समय यहाँ
यत्र-तत्र पड़े कुछ अलंकृत शिलाराण्डों के अतिरिक्त
और कोई दर्शनीय वस्तु शेष नहीं रह गयी है। स्तूप
के पृष्ठ भाग में एक तरफ पहाड़ो है । दूसरी तरफ
बारहमुला शहर वितस्ता के वाम तट पर है । बारह-
मूला इस समय समृद्धिशाली नगर हो गया है ।
भारतीय सेना की छावनी के कारण खूब चहल-
पहल रहती है ।
हुष्कौर में एकाकी एक स्तूप और उसके परि-
वेष्ठित दिवाल का अंश शेष रह गया है । खनन कार्य
में यहाँ से प्राप्त खिलौने प्रतापसिंह संग्रहालय
श्रीनगर कश्मीर में संगृहीत हैं । ये दिवाल के
उत्तरीय दिशा में एकाध फीट की दूरी पर गड़े मिले
थे । कश्मीर में मूर्तिभंग की शैली भारत जैसी ही
थी । मन्दिर तथा मूर्तियों को खण्डित करने की
एक शैली प्रचलित हो गयी थी । मूर्तियों के नाक
तथा हाथ अवश्य खण्डित कर दिये जाते थे । खण्डित
मूर्तियों को या तो किसी मसजिद की सीढ़ियों में
लगा दिया जाता था कि लोगों के पैरों तले पड़ती
अपनी असमर्थता, दयनीय दशा, शक्तिहीनता प्रकट
करती रही अथवा तोड़कर कही मुर्दों की तरह
दफना दी जाती थी ।
हुष्कौर से प्राप्त खण्डित मूर्तियों पर गन्धार
शैली की छाप है। मूर्तियां कश्मीर के पुराकालीन
मूर्तिकला तथा उनके स्थापत्य शैली पर प्रकाश
डालती हैं ।
प्रताप सिंह संग्रहालय की भगवान् बुद्ध की
(बी. सी. १.) मूर्ति ध्यान मुद्रा प्रदर्शित
करती है। भगवान् पद्मासन लगाकर बैठे हैं।
त्रिचीवर धारण किये हैं ।

मूर्ति बी. सी. २ गान्धार परवर्ती काल की
मूर्ति कला पर प्रकाश डालती है । यह एक
मस्तक मात्र है । अधोभाग का पता नही चला है ।
मूर्ति भग्न है । मूर्धा पर उर्म है ।
मूर्ति बी. सी. ३ भग्न मस्तक है । नाक तोड़
दिया गया है । मस्तक के उर्म ग्रन्थिल हैं। मुख
अण्डाकार है ।
मूर्ति बी. सी. ४ एक ब्राह्मण का मस्तक है ।
तत्कालीन लोगों की वेशभूषा पर प्रकाश डालती
है । मूर्ति कला सजीव है। दाढ़ी-मूंछ हैं। केश
पीछे बँधे हैं। बाल कंघी से संवारे गये हैं।
मूर्ति बी. सी. १० केश विन्यास का उत्कृष्ट
नमूना है । घुंघराले केशों से कान ढका है ।
मूर्धा पर से केश चारों तरफ फैले हैं। उन्हें
सर पर मुक्ताग्रोथित सूक्ष्म वस्त्र से बाँधा गया है।
आजकल केशों को संयत रखने के लिये रुमाल
या पट्टी से प्राय बाल बाँध लिये जाते हैं। कश्मीर
के खेतों पर काम करने वाली नारियों के सर पर
इसी प्रकार के वस्त्रों से बाल बाँधा मुझे दिखाई
पड़ा । यद्यपि पाश्चात्य सभ्यता के प्रभाव के
कारण कश्मीर की नारियों के साज-शृंगार तथा
वेशभूषा में आमूल परिवर्तन होने लगा है। मूर्ति
की मुखाकृति कोमल है । यह भग्न मस्तक बोधि
सत्त्व का है ।
मूर्ति बी. सी. ११ बोधिसत्त्व का भग्न
मस्तक है । उस मस्तक पर अलंकृत मुकुट है ।
यह मुकुट ब्रिटिश राजाओ के मुकुट से कुछ
मिलता है ।
मस्तक बी. सी. १५ : एक युवक का है ।
उस मस्तक का, दाढ़ी-मूंछ, सब कुछ मुड़ा है । अधरों
पर आध्यात्मिक मुस्कान है । आकृति भव्य तथा
प्रभावोत्पादक है। कलाकार ने जैसे अन्तर की मनो-
वृत्तियों को मुखाकृति में उरेह दिया है ।
मूर्ति बी. सी. १८ : अत्यन्त उत्कृष्ट कलाकृति
यह एक उपासिका का खण्डित मस्तक है।

यहाँ प्रस्तुत पृष्ठ का पंक्ति-दर-पंक्ति लिप्यंतरण है:

शीर्षक:
प्रथम तरंग २२९

बायाँ स्तम्भ (Left Column):
अधरों पर गम्भीर मुद्रा के साथ आध्यात्मिकता
मिश्रित मुसकान है । भरी पूरी मुखाकृति है । कंघी से
सँवारे केश में सीमंत मन में अनायास पवित्र भाव
उत्पन्न करते हैं । मिथुन, काम एवं भौतिक सौन्दर्य
दर्शक मुद्रा के यह विपरीत मुद्रा है तथा
कलाकृति है ।
मूर्ति बी. सी. १९: भग्न मस्तक है । नासिका,
भौं, अधरों पर की मुसकान देखते बनती है । मस्तक
पर बाल कढ़े हुए हैं । मध्य भाग से कानों के ऊपर
होते हुए कंघी किये हुए केश पीछे की ओर घूमे हैं ।
खण्डित पीन पयोधर की क्रम संख्या बी. सी.
३५ है । स्तन पर कुच बन्ध लगा है । कण्ठ में मुक्ता
माला के अतिरिक्त स्तनों पर दूसरी मुक्तामाला
सुशोभित है । कामिनी के शृंगार के रूप को प्रकट
करती है । तत्कालीन काश्मीर के लोग कितने शृंगार
तथा कला के प्रिय थे । उस पर प्रकाश डालती है ।
मस्तक खण्ड बी. सी. १६ : एक भिक्षु का
है । उसकी दाढ़ी-मूंछ तो मुंडी हैं परन्तु मस्तक पर
बाल कढ़े हैं । यह तत्कालीन काश्मीरी लोगों के बाल
रखने की एक शैली पर प्रकाश डालता है । इस
प्रकार के बाल काटने को बनारस की तरफ 'खत'
काटना, कहते थे । मेरे बचपन में पुराने लोग 'खत'
कटाते थे । मेरा भी बाल बचपन में इसी ढंग पर
काटा जाता था । इस समय पाश्चात्य शैली पर बाल
काटा जाने लगा है । पुरानी बातें लोग भूल रहे हैं ।
मूर्ति खण्ड बी. सी. ३४ : विचित्र मूर्ति है ।
उसका कटि तथा ऊरु मात्र शेष रह गया है । इस
मूर्ति का शिश्न तथा अण्डकोष खुला है । कन्धा से
आता कुर्ता कटि प्रदेश तक रह गया है । कुर्ता के
छोर पर मुक्ता पंक्ति गुथी है । यह किसी श्वेताम्बर
जैन सन्त की मूर्ति हो सकती है ।
इसके अतिरिक्त यहाँ से हाथ, कलाई, पद,
भुजाओं के खण्डित भाग मिले हैं । उन्हें देखने से
तत्कालीन वेशभूषा तथा विभिन्न प्रकार के प्रायोगिक
अलंकारों पर प्रकाश पड़ता है । कंकण, चूड़ियाँ,

दायाँ स्तम्भ (Right Column):
भुजबन्द पहनने की चाल थी । कलाई की उँगलियाँ
बहुत ही सुन्दर तथा लहर की तरह बनायी गयी हैं ।
(६) जुष्कपुर : श्रीनगर के उत्तर में एक बड़ा
ग्राम है । इसका वर्तमान नाम जुकुर है । हरि पर्वत
से ४ मील दूर है । यहाँ के प्राचीन ध्वंसावशेषों के
शिलाखण्ड, मजारों, कब्रिस्तानों तथा मसजिदों में
लगे मैने देखा है । बहुत पत्थर गढकर नवीन इमारतों
में लगाये गये हैं । अतएव उनका पूर्व रूप निश्चित
करना दिन पर दिन कठिन होता जायेगा । जनरल
श्री कनिंघम को सन् १८४७ में तथा श्री स्टीन को
वहाँ बहुत शिलाखण्ड मिले थे ।
जनरल कनिंघम ने सन् १८४७ ई० नवम्बर मास
में वहाँ की यात्रा की थी। उन्हें उस स्थान पर बहुत
अधिक संख्या में पत्थर के स्तम्भ मिले थे । कुछ
कश्मीरी पुरातन शैली से अलंकृत पत्थर थे । सबका
उपयोग तराश कर मसजिदों तथा जियारातो में किया
गया था । (एनिसिएण्ट ज्योग्राफी पृष्ठ ८५)
जनरल कनिंघम ने जिन स्तम्भों तथा पत्थरों को
देखा था वे निस्सन्देह जुष्कपुर में निर्मित विहारों के
अवशेष थे । अगले श्लोक से यह स्पष्ट प्रकट होता
है कि उसने जुष्कपुर में विहार का निर्माण किया
था । जुष्कपुर के उत्तर देवीपुर, पूर्व में तात्वल,
पश्चिम प्राचीन अमरेश्वर, ऊबरहर और धुर दक्षिण
डंगरपुर तथा दूर पर हरिपर्वत पड़ता है ।
(७) कनिष्कपुर : वर्तमान कानिशपुर है । यह
श्रीनगर-बारहमूला सड़क पर स्थित है । ग्राम के
पास एक पुराना टीला है । वहाँ से अलंकृत पत्थर
मिले थे । कहा जाता है कि राजा कनिष्क का
यहाँ निवासस्थान था । इस स्थान पर प्राचीन
ध्वंसावशेषों के शिलाखण्ड तथा मुद्राएँ मिलती हैं,
जनरल कनिंघम ने १८४७ में यहा की यात्रा की
थी । प्राचीन ध्वंसावशेषो के शिलाखण्डादि उन्हें
जियारातो तथा कब्रों में लगे मिले थे । बहुत अधिक
संख्या में इस प्रकार के ध्वंसावशेष बिखरे थे ।
श्री स्टीन लिखते हैं । पण्डित साहिबराम के
तीर्थ में इसका मूल नाम कनिष्कपुर दिया गया है ।

२३० राजतरंगिणी
सविहारस्य निर्माता जुष्को जुष्कपुरस्य यः ।
जयस्वामिपुरस्यापि शुद्धधीः संविधायकः ॥ १६६ ॥
१६९. उस शुद्धधी जुष्क राजा ने जुष्कपुर के विहार का निर्माण कराया। वह जय
स्वामीपुर¹ का भी निर्माता था।
ते तुरुष्कान्वयोद्भूता अपि पुण्याश्रया नृपाः ।
शुष्कलेत्रादिदेशेषु मठचैत्यादि चक्रिरे ॥ १७० ॥
१७०. तुरुष्क¹ वंश में उद्भूत होते हुए भी इन पुण्यात्मा नृपों ने शुष्कलेत्रादि² स्थलों में
मठ, चैत्यादि बनवाया।

श्री पण्डित काशीराम से थो स्तीन ने सन् १८६१ ई०
में जाँच कराया था। वहाँ के स्थानीय ब्राह्मणों की
एक प्रचलित परम्परा से ज्ञात हुआ था। यहाँ
कनिष्ठराज का राज्य था।
यह स्थान पीर पंचाल जाने वाले दर्रा मार्ग
पर श्रीनगर से १० मील दक्षिण स्थित है। यहाँ
पर एक छोटी सराय है उसे कामपुर सराय कहते हैं।
यह स्थान वितस्ता नदी से लगभग ९ मील
पूर्व है। इसके दक्षिण वितस्ता पर बारहमूला पड़ता
है इसके उत्तर पूर्व रावतपुर तथा पूर्व दक्षिण सैय्यद
भोक्स की जियारत है।
१६९ (१) जयस्वामीपुर : जयस्वामीपुर का
पता अभी नहीं चल सका है। इस पर अनुसन्धान
की आवश्यकता है। जयस्वामी विष्णु का नाम
है। प्रतीत होता है । जुविष्क का झुकाव
वैष्णव धर्म की ओर हो गया था। अन्यथा वह
जयस्वामी शब्द का प्रयोग नहीं कर सकता।
उसने जुष्कपुर मे विहारों का भी निर्माण कराया
था। इससे प्रतीत होता है। राजा सहिष्णु था।
वह बौद्ध तथा वैष्णव दोनों धर्मों का आदर
करता था।
१७० (१) तुरुष्क : कनिष्क तथा उसके उत्तरा-
धिकारी तुर्कवंशीय थे। यह मान्यता प्राचीन काल
में प्रचलित रही है। अल्बेरूनी ने भी यही कहा है
(२.१०) । तुरुष शब्द ऋग्वेद (२:४६:३२) में दान
शब्द के साथ आया है। आर्यतर जाति बिना दान
हुए आर्य के लिये सम्भवतः प्रयोग होता रहा है।
पुराणों में तुषार शब्द तुरुष्क के लिये भी आया है।
भागवत के पाठ में तुरुष्क शब्द का प्रयोग किया गया
है। इनका उल्लेख यवनादि राजाओं के साथ किया
गया है। (वायुपुराण ६९:३६०:६२, मत्स्य पुराण
२७२:१९:२१ ब्रह्माण्ड पुराण ३:७४:१७२—१७६,
भागवत पुराण १२:१:३० ।)
पुराणों मे उल्लेख आया है :
काम्बोजा दरदाश्चैव बर्बरा अंग लौकिकाः ।
चीनाश्चैव तुषाराश्च बहुला बाह्यतो नराः ॥
मार्कण्डेय पुराण ५७:३९
'बाह्यतो नराः' शब्द महत्त्व रखता है।
इस ओर संकेत करता है कि ये भारत के बाहर
से आने वाले लोग थे।
मार्कण्डेय, वायु, ब्रह्माण्ड तथा वामन पुराणों
के अनुसार कम्बोज, कश्मीर के राजौरी (राजपुरो)
उपत्यका से हिन्दूकुश पर्वतमाला तक रहने वालों
के लिये प्रयुक्त किया गया है । कुछ विद्वान्
कम्बोज क्षेत्र को बदखशां के समीप हिन्दूकुश के
पार तक ले जाते हैं। दरद-कृष्णगंगा के अर्ध्य भाग
वाली उपत्यका अर्थात् उत्तरी कश्मीर में रहते हैं
उसे वर्तमान काल में दर्दस्तान कहते हैं।
कम्बोज और दरद नाम के साथ-साथ आने
से यह प्रतीत होता है कि दोनों क्षेत्र परस्पर
मिले थे। (मत्स्य पुराण २७३; वायु पुराण २.१०;
ब्रह्माण्ड पुराण ३:७४)

'चीनांश्चैव तुषारांश्च' के प्रयोग से मालूम
होता है कि कम्बोज तथा दरद की तरह चीन
तथा तुषार देश परस्पर मिले थे । दोनों की
सीमाएँ एक साथ मिलती थी अन्यथा युगल प्रयोग
न किया गया होता ।
मार्कण्डेय, ब्रह्माण्ड तथा वायु पुराणों में
'चीनांश्चैव तुषारांश्च' एक साथ उल्लेख किया
गया है । वायु पुराण में 'चीनांश्चैव तुषारांश्च' का
उल्लेख है । मार्कण्डेय पुराण में 'चीनांश्चैव
तुषारांश्च' का उल्लेख है । वामन पुराण में 'वेरणा-
श्चैव तुषारांश्च' शब्द का उल्लेख किया गया है ।
धरवो ने तुखारिस्तान का वर्णन किया है । उसमे
बलख सम्मिलित हो जाता है । वक्षु अर्थात् आमू
दरया के मध्यवर्ती दोनों तटवर्ती अंचलों को
लेता चला जाता है । यद्यपि आमू दरया के
दक्षिण का अंचल तुषार देश में आता है ।
वर्तमान तुर्किस्तान तुषार अर्थात् तुर्कों का अंचल
कहा जा सकता है ।
पुराणों में उल्लेख मिलता है :
सान्ध्रांस्तुपारान् लम्पाकान् पह्लवान् पारदान् शकान् ।
एतान् जनपदांश्चक्षु : प्लावयन्ति गतोदधिम् ॥
वायु पुराण में 'सान्ध्रांस्तुपारांस्तम्पाकान्
तथा 'सान्ध्रांस्तुपारास्तम्बवान्' आया है । मार्कण्डेय
पुराण में 'तुपारान् वर्वराकारान्' तथा 'तुषारान्
वर्वराकारान्' का प्रयोग किया गया है। ब्रह्माण्ड पुराण
में 'सान्ध्रांस्तुपारान् लम्पाकान्' का उल्लेख
मिलता है ।
तुखार तथा तुषार शब्द एक ही है । जाति के
लिए तोखरी अथवा तोखरो शब्द का प्रयोग किया
गया है। विष्णु पुराण ( ४:२४:५३ ) में तुरुष्क
शब्द का उल्लेख करते हुए 'तुरुष्कारा मुण्डारश्च'
कहा गया है। इस प्रकार तुखार, तुषार, तोखरी,
तुरुष्क, तुर्क सब एक ही जाति के नाम हैं। केवल
उच्चारण के भेद प्रकट करते हैं । महाभारत में
तुषार क्या तुखार दोनों ही शब्दों का प्रयोग किया
गया है । तुषारवासियों को म्लेच्छ भी कहा गया है ।
(सभा पर्व ५०:१८५०)
युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में वहाँ के निवासी
आये थे तथा रसोई परोसने का कार्य करते दिखाई
देते हैं । वन पर्व ( ५१:२५-२६, ५१:१९९१,
१७७:२१. ) में उल्लेख मिलता है । पाण्डव लोग
गन्धमादन से द्वैत वन की ओर लौटते समय तुषार
देश को पार कर राजा सुबाहु के नगर में पहुँचे थे ।
भीष्म पर्व ( ७५.२१ ) में तुषारों के युद्ध में भाग
लेने का वर्णन मिलता है । तुषार जनपद के घोर
गण भीष्म द्वारा निर्मित क्रौंच व्यूह के दक्षिण पार्श्व
स्थान में व्यूह की रक्षा कर रहे थे । शान्ति पर्व
( ६५.२४२९ ) तुषारवासियों के निवास के विषय
में कहा गया है । तुषारवासी म्लेच्छ मान्धाता के
राज्य में निवास करते थे ।
मान्धाता के विषय में पुराणों में कहा गया है
कि इक्ष्वाकुवंश की १८वीं पीढ़ी में हुए थे। वे
अपने पिता युवनाश्व की कुक्षि से उत्पन्न हुए थे ।
पुरुकुत्स, अम्बरीष तथा मुचुकुन्द उनके पुत्र थे ।
मान्धाता चक्रवर्ती राजा थे । सात द्वीपों में उनका
राज्य था । उनके राज्य विस्तार के विषय में कहा
गया है ।
यावत् सूर्य उदेति स्म यावच्च प्रतितिष्ठति ।
सर्वं तद् यौवनाश्वस्य मान्धातुः क्षेत्रमुच्यते ॥
( ब्रह्माण्ड पुराण ३.६३:६८-७२ )
हरिवंश पुराण उनका शक, पह्लव, दरद, अन्य
म्लेच्छ तथा दस्यु जातियों के साथ उल्लेख
करता है ।
स्ट्रेबो ( ९:५१५ ) कहता है कि ग्रीक अर्थात्
यूनानियों के बलख से निकालने का श्रेय तोपरो
जाति को भी है । यह स्थान तुर्किस्तान प्रतीत होता
है । तोखरी जाति का स्थान हिन्दूकुश पर्वत के
उत्तर बताया गया है। वह तोखरो जाति का उल्लेख
करता है जो वास्तव में तुषार अर्थात् तुर्किस्तान के
तुर्क हैं। मार्कण्डेय पुराण ( ५७:३९ ) में तुपारो

२३२ राजतरंगिणी

का वर्णन है । उनका उल्लेख काम्बोज, दरद, वर्वर
तथा चीनों के साथ आया है ।
१५वीं शताब्दी तक संस्कृत लेखों में तुर्कों के
लिए तुरुष्क शब्द का प्रयोग किया गया है । मेवाड़
के राजा मोकल का विक्रम संवत् १४८५ के
चितोड गढ के लेख में उल्लेख है कि राजा ने
अंग, कामरूप, वंग, निषाद, चीन तथा तुरुष्को पर
विजय प्राप्त किया था । यह कवि का गौरव वर्णन
है । ऐतिहासिक तथ्य नही है । इसका महत्व केवल
इसलिए है कि उस समय भारत में रहने वाले
मुसलमानो के लिए तुरुष्क शब्द का प्रयोग होता था ।
अपनी बाल्यावस्था की बातें मुझे याद है कि
तुर्क शब्द का प्रयोग मुसलमानों के लिए गाँवों में
होता था । तुर्की नाई, तुर्की कहार आदि लोग हिन्दू
से मुसलमान हो गये थे । हिन्दू नाई तथा मुसलमान
नाई में भेद जानने के लिए तुर्क शब्द लगा दिया
जाता था ।
(२) शुष्कलेत्र : कल्हण उक्त तीनो तुरुष्क
राजाओं में किसी विशेष को शुष्कलेत्रादि क्षेत्रों में
मठ, चैत्य, तथा उसी के सदृश अन्य निर्माण बनाने
का उल्लेख करता है । अपितु उनका नाम सम्मिलित
लेता है कि उन राजाओं ने निर्माण कराया ।
वह ग्राम दुत्त परगना मे हुकालेतर अथवा
हुकालेतरी है । श्री स्तीन के निर्देश पर सन् १८९१ में
पं० काशीराम ने यहाँ की यात्रा की थी । परन्तु
उन्हें यहाँ कोई प्राचीन ध्वंसावशेष नही मिला ।
यह स्थान श्रीनगर से लगभग १४ मिल
दक्षिण पश्चिम है । दामोदर उद्र क्षेत्र के पश्चिम
ओर किंचित् दक्षिण दिशा की ओर झुकता है ।
शुष्कलेत्र क्षेत्र के उत्तर में नागम, पूर्व में गुन्द, दक्षिण
में पेत कूट, पश्चिम में सुन्दरा तथा लरबल है ।
स्थान के समीप छोटे छोटे नाले है ।
चैत्य : चैत्य अमरकोश कार के अनुसार यज्ञशाला
तथा आयतन होता है । परन्तु पालि में यह भिन्न
अर्थों में प्रयुक्त होता रहा है । इसका पालिरूप
चेतोय है । 'चितायां भवः चैत्यः' अर्थ किया जाता
है । चिता से इसे सम्बन्धित कर दिया गया है ।
ब्राह्मण, बौद्ध तथा जैन परम्परा के अनुसार
दिवंगत के पवित्र भस्म वा चिता स्थान के ऊपर
स्मृति भवन, समाधि, तथा वृक्षों को लगाया
जाता था । यह प्रथा आज भी प्रचलित है ।
महात्मा गाँधी, जवाहर लाल नेहरू तथा लाल-
बहादुर शास्त्री के भस्मस्थान पर उद्यान बना
दिये गये हैं । महात्मा गान्धी की समाधि तथा
जवाहरलाल जी के चितास्थान में शान्ति वन
दिल्ली में बन गया है । राजाओं के दिवंगत होने
पर उनके राज्यों में छतरियाँ बना दी जाती है ।
रामायण, महाभारत एवं भगवद्गीता में
यह शब्द पावन वेदी, देवस्थान, प्रासाद
एवं धार्मिक वृक्ष आदि के लिये प्रयुक्त हुआ है ।
'देवस्थानेषु चैत्येषु' (महा ३:१९०:६७) 'प्रासाद-
गोपुरसभाश्चैत्य' (भाग ११।२७) 'कच्चि-
च्चैत्यशतैर्जुष्टः' (महा० वन० : १२२९) चैत्य
शब्द प्राचीन शब्द है । भगवान् बुद्ध के समय
में भी चैत्य के चापाल चैत्यादि पर्याय थे ।
बौद्ध काल में अस्थि एवं चिता भस्मो पर
चैत्य बनाने की परम्परा चल पड़ी थी ।
कालान्तर में चैत्य विशालकाय होकर स्तूपों का
रूप ग्रहण कर लिये । श्रीलंका में इन्हें दागव
जो सस्कृत शब्द धातुगर्भका अपभ्रंश है कहा
जाता है । तिब्बती भाषा में डुंगनेन कहते हैं ।
बौद्ध स्थापत्य में चैत्य निर्माण की एक विशेष
कला विकसित हुई थी । गिर्जाघर एवं चर्चों ने
चैत्य शैली के उपासना गृहों की नकल की है ।
अजन्ता एलोरा एवं ईसा से पूर्व बने चैत्यों के
वर्णन से यह स्पष्ट हो जाता है । उपासना भवन
में जहाँ चर्च की वेदी तथा ईसा मसीह की
मूर्ति एवं क्रास होता है वही पर बौद्ध उपासना
स्थल में चैत्य तथा वेदी होती है । प्रारम्भ में
चैत्य रामायण, बौद्ध तथा जैन ग्रन्थों के अनुसार