राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२१४ राजतरंगिणी
मुनि उसता, तथा अप्सराएँ उमा शंकर की उपा-
सना करने लगीं ।
हरिवंश पुराण मे कैलास शिखर पर गुह्यको
के साथ कुबेर के आगमन का वर्णन मिलता है।
(८५।१०) मैने इस विषय पर प्रकाश यक्षो से
सम्बन्धित परिशिष्ट में डाला है। यक्ष जाति की
गुह्यक जाति एक शाखा किंवा वर्ग थी। उनमे
तथा यक्षों मे भिन्नता मालूम होती है। गुह्यक
भर्गो का उत्तरदायित्व सम्पत्ति की रक्षा करना था।
उनका काम सैनिको का था। वे प्रतिहारी थे।
वे साधारणतया शस्त्रोपजीवी थे। पहरा, चौकी,
तथा रक्षादि करते थे। शस्त्रादि चलाते थे।
उन्होने महाभारत युद्ध मे भाग लिया था। यक्ष
जाति के होते हुए भी, उन्हें अलग गुह्यक संज्ञा
उसी प्रकार दी गयी थी, जैसे हिन्दु होने पर भी
क्षत्रियो की अलग जाति शस्त्रोपजीवी होने के
कारण हो गयी थी।
वायु पुराण (अध्याय १०१) से प्रकट होता
है कि गुह्यक लोग सत्य अर्थात् ब्रह्म लोक में देवतायो
के साथ रहते थे। सत्य लोक सातवां किंवा अन्तिम
लोक है। उसमे समस्त देवगण, गन्धर्वो, अप्सराओं,
यक्षो तथा गुह्यको के साथ स्वर्ग लोक मे निवास
करते हैं। वायु पुराण (अध्याय ६९) मे गन्धर्व,
गुह्यक, यक्ष तथा पिशाचो को असुरदेव की श्रेणी मे
रखा गया है। परन्तु यहाँ पर सर्प, भूत, पिशाच,
नाग एवं मनुष्यो को पृथ्वी लोक का निवासी बताया
गया है। इस गुह्यको का स्थान पिशाचो तथा मनुष्यो
से ऊपर रखा गया है।
गुह्यको की उत्पत्ति के विषय मे वायु पुराण
(अध्याय ९:३२,३०:४) में क्या आता है—'ब्रह्मा
मे रजस्तम प्रधान दूसरा शरीर धारण किया। उस
अन्धकार में क्षुधातुर होकर उन्होंने दूसरी प्रजा
उत्पन्न की। वह प्रजा जल को भक्षण करने के
लिये कटिवद्ध हो गयी। हम जल को रक्षा करते हैं।
कहने हुए जो उत्पन्न हुए वे क्रोधी निशाचर राक्षस
हुए। जिन लोगों ने कहा हम जल को खा जायेंगे।
नष्ट कर देंगे। अतएव उनका नाम राक्षस पड़ा। यक्ष
धातु पालनार्थक है। अतएव उनका यक्ष नाम पड़ा।
अ० ९।
भागवत (१:९:३) मे श्रीकृष्ण, अर्जुन, युधि-
ष्ठिर आदि के रथ पर जाने की शोभा के वर्णन में
उसकी तुलना गुह्यकों सहित कुबेर से की गयी है।
वहाँ पर गुह्यकों को कुबेर का साथी कहा गया हैं।
स्कन्द (२:१०:३७) मे भगवान् के स्थूल तथा
सूक्ष्म रूपों का वर्णन किया गया है। सिद्ध, चारण,
गन्धर्व, विद्याधर, असुर, गुह्यक, किन्नर, अप्सराएँ,
नाग, सर्प, किंपुरुष, उरग, मातृकाएँ, राक्षस,
पिशाच, प्रेत, भूत, विनायक, कूष्माण्ड, उन्माद,
वैताल, यातुधान के वर्ग में गुह्यकों को रखा गया
है। (स्कन्द ११:१२:३,१४:५)
दक्ष यज्ञ मे सती के प्राण विसर्जन काल में
गुह्यक तथा प्रमथ गणों का उपस्थित होना प्रकट होता
है। मालूम होता है शिव के पार्षद गुह्यक तथा
प्रमथ गण सती के साथ दक्ष यज्ञ मे गये थे। सती
के प्राण विसर्जन के साथ ही गुह्यको तथा प्रमथो ने
क्रुद्ध होकर, दक्ष यज्ञ मे विघ्न डाला था। अस्त्र-
शस्त्रो से आक्रमण किया था। उनके भयंकर आक्रमण
के वेग को देखकर भृगु ने यज्ञ द्वारा महर्षी ऋभु
नामक देशो को उत्पन्न किया। जलती लकड़ियों
द्वारा प्रथमगण तथा गुह्यकों पर वे आक्रमण कर,
उन्हे भगाने मे समर्थ हुए थे।
दक्ष यज्ञ के प्रसंग मे गुह्याकलय अर्थात् गुह्यको
के निवास स्थान का उल्लेख किया गया है।
सती की प्राणाहुती से क्रुद्ध होकर, वीरभद्र ने दक्ष
के मस्तक को यज्ञ की दक्षिणाग्नि में डाल दिया।
यज्ञ को विध्वंस कर गुह्याकालय लौट गये। यहाँ
पर गुह्याकालय हिमालय स्थित कैलाश के समीप
का स्थान होना चाहिए। वायु पुराण ने हिमालय का
यही अंचल गुह्यको का निवास स्थान बताया है।