राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथम तरंग २१५
उसम मृगया निमित्त हिमालय गया था।
वहाँ उसको हत्या कर दी गयी थी । ध्रुव अत्यन्त
क्रुद्ध होकर, रुद्रों के अनुचरों से सेवित उत्तर दिशा
में हिमालय के द्रोणी अर्थात् घाटी में गये । वहाँ
नगर गुह्यकों से जनाकीर्ण था । (भागवत ४.१०
:५) यहां पर भी यही निर्देश किया गया है।
गुह्यक लोग उत्तर दिशा में हिमालय की घाटी
किंवा द्रोणी में रहते थे ।
श्री कृष्ण द्वारा गुह्यक शंखचूड के वध की
कथा भागवत ( १०:३४:२८ ) में कही गयी है।
गोपियों को एक समय शंखचूड गुह्यक लेकर,
उत्तरदिशा की ओर भाग चला । श्री कृष्ण उस
समय गुह्यक के पास पहुँचे । गुह्यक गोपियों को
छोड़कर भागा । श्री कृष्ण ने उसका पीछा किया ।
उसका वध किया । मणि लेकर वापस लौट आये ।
इससे दो बातें स्पष्ट होती हैं। गुह्यक दस्यु
आदि का अनुचित कार्य करते थे। उनका निवास
स्थान उत्तर दिशा था । मथुरा से उत्तर दिशा
पंजाब, कश्मीर, हिमाचल पड़ता है । उत्तर दिशा
का अर्थ प्रायः हिमालय का उत्तरीय पर्वतीय
अंचल माना जाता है ।
प्रद्युम्न तथा शम्बरासुर वध के प्रसंग में
गुह्यकों का पुनः उल्लेख भागवत ( १०:५५ २३ )
में किया गया है। शम्बरासुर ने यक्ष, गन्धर्व,
पिशाच, नाग और राक्षसों की सैकड़ों माया का
प्रयोग किया । गुह्यक मायावी थे । युद्ध में माया
का प्रयोग करते थे । अन्य पुराणों में भी इस
प्रकार का उल्लेख किया गया है । शम्बर ने गुह्यकों
की माया का प्रयोग किया है। यहाँ गुह्यकों ने
युद्ध में भाग नहीं लिया । परन्तु उनको युद्ध नीति
का प्रयोग शम्बर ने प्रद्युम्न के विरुद्ध किया था।
भागवत (११:१२:३) में पुनः दैत्य, राक्षस,
गन्धर्व, अप्सरा, नाग, सिद्ध, चारण, गुह्यक को
एक ही वर्ग में रखा गया है। गुह्यकों के पूर्वज
ब्रह्मर्षि थे। देवयोनि वर्ग में थे । इसका उल्लेख
भागवत (११ १४.५) में किया गया है । इन
ब्रह्मर्षियों की संतान देवता, दानव, गुह्यक, मनुष्य,
सिद्ध, गन्धर्व, विद्याधर, चारण, किन्देव, नाग,
किन्नर, राक्षस, और किम्पुरुष आदि थे । अपना वंश
वृक्ष इन्ही ब्रह्मर्षियो से प्राप्त किया था ।
रामायण में कैलास के समीप गुह्यको के रहने
की बात कही गयी है । सुग्रीव ने उत्तर दिशा में
देवी सीता को खोजने के लिये, जिन देशो तथा
जातियों का नाम लिया है, उनमें गुह्यक हैं ।
वाल्मीकि रामायण किष्किन्धा काण्ड सर्ग ४३,
श्लोक ३ में उल्लेख आता है—वहाँ यक्षो के स्वामी
विश्रवाकुमार श्रीमान् राजा कुबेर जो समस्त विश्व
के लिये वन्दनीय हैं तथा धनदाता हैं, वह यक्ष
राजा गुह्यको के साथ निवास करते है ।'
कल्हण के गुह्यक शब्द के व्यवहार से
गुह्यक जाति की सत्यता तथा वास्तविकता पर
विशेष प्रकाश पडता है । पुराणों में गुह्यको को
यक्षों का एक वर्ग माना है। इसका उल्लेख कर
चुका हूँ । कल्हण के इस शब्द से कि राजा ने
गुह्यको से सहायता अर्थात् काम लिया, इससे
मालूम होता है, उस समय गुह्यक नामक जाति
कश्मीर में रहती थी । जाति परिश्रमी थी ।
निपुण थी ।
पुल बनाना आज भी शिल्पक कार्य समझा
जाता है । किसी कश्मीर कलाकार की सहायता नही
ली गयी । गुह्यकों की सहायता पुल बनाने के
लिये ली गयी, इसका अर्थ है। यह जाति इस
कला में निपुण थी । यक्ष नाम की भी जाति थी,
गुह्यक नाम की भी जाति थी । कश्मीर में रहती
थी । यक्षों गन्धर्वों को कालान्तर में मानव विशेष
समझ लिया गया । इसी प्रकार गुह्यकों को भी
मानव विशेष समझा गया ।
कल्हण के वर्णन से स्पष्ट हो जाता है। गुह्यक
एक जाति थी । इस जाति के लोग कश्मीर में
आवाद थे । घोर निर्माण कला में निपुण थे ।