राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२२२ राजतरंगिणी
तपोविभूतयोऽचिन्त्या द्विजानामुग्रतेजसाम् ।
तादृशामपि ये कुर्युः प्रभावस्य विपर्ययम् ॥ १६० ॥
१६०. उग्र तेजस्वी द्विजों की तपो विभूतियाँ अचिन्त्य होती हैं क्योंकि उन जैसे राजाओं
का भी प्रभाव जिन्होंने नष्ट कर दिया है।
दायादादिबलैर्नष्टा दृष्टा भूयः समुत्थिता ।
श्रीर्विप्रावज्ञया शप्तान्नपुनःसंभवा पुनः ॥ १६१ ॥
१६१. दायाद¹ आदि के बल से नष्ट श्री का पुनरुत्थान देखा गया है किन्तु विप्रों की
अवज्ञा द्वारा नष्ट श्री का होना असंभव है।
श्राद्धार्थमुत्थितः स्नातुं द्विजैः कैश्चिद् बुभुक्षितैः ।
प्राक्स्नानाद्भोजनं राजा स कदाचिदयाच्यत ॥ १६२ ॥
१६२. किसी समय राजा श्राद्ध निमित्त स्नान करने के लिये उठा। उसी समय कुछ
बुभुक्षु ब्राह्मणों ने राजा से स्नान के पूर्व ही भोजन मांगा।
(७) मत परिवर्तन के कारण उन्हें शिव का गण बना
लिया गया था। (८) गुह्यक लोग यक्षों की एक
शाखा थे। (९) उनका सम्बन्ध भारत के उत्तर-
पश्चिम सीमा तथा पर्वतीय भागों में रहने के
कारण असुरों से होना स्वाभाविक था तथा उनका
आचार-विचार प्रारम्भ से असुरों से मिलता था।
(१०) यक्ष कश्मीर के सीमान्त मेरु के दक्षिण
तथा कैलास के पश्चिम अर्थात् कश्मीर की उत्तरी
पूर्वी तथा उत्तरे-पश्चिमी सीमा पर रहते थे।
मैंने गुह्यकों के संदर्भ में लिखते हुए यक्षों के
विषय में कुछ लिखा है। कल्हण ने यक्षों का विवेचन
यहाँ शिल्पी के रूप में किया है। वे सेतु निर्माण करने
में निपुण थे। पुराणों में यक्षों को वस्तुपूरक माना
है। कहीं-कहीं उन्हें इतर योनि भी माना गया है।
आँखों में पड़ने वालों के रूप में भी चित्रित किया
गया है। कल्हण ने इन सब कपोलकल्पनाओं को
छोड़ते हुए वास्तविकता का परिचय दिया है।
ने यक्षों को एक जाति के रूप में चित्रित किया
और उनका मुख्य काम शिल्प था। राज्य में
देवर्... दूर करने के लिये राजा ने यक्षों द्वारा
किया गया है। ये राजा दामोदर के समय
गुह्यकों के साथ कश्मीर में आबाद थे। गुह्यक
और यक्ष दोनों शिल्पों के रूप में चित्रित किये गये
हैं। किन्तु कल्हण ने गुह्यकों का विवरण केवल
सेतु के सम्बन्ध में दिया है। और यक्षों का सेतु
अर्थात् बाँध बनाने के सम्बन्ध में किया है।
अतएव गुह्यक यदि सेतु बनाने में प्रवीण थे तो
यक्ष जलाभाव दूर करने के लिये बाध बनाने में
चतुर दिखायी पड़ते हैं।
१६१ (१) दायाद : दायाद शब्द का अर्थ
उत्तराधिकारी—पुत्र, भाई, बन्धु होता है।
दाय भाग हिन्दू कानून इसी शब्द के आधार पर
बना है। कल्हण, राजा का बल किस प्रकार
नष्ट होता है, इस ओर संकेत करता है। कश्मीर
में राजा गण अपने उत्तराधिकारियों तथा सम्ब-
न्धियों से बहुत परेशान किये गये थे। उनके कारण
कश्मीर के राजा तथा कश्मीर राज्य दुर्बल होता
रहा है। दिल्ली में मुसलिम बादशाहों को सर्वदा
अपने सम्बन्धियों से भय बना रहता था। उत्तरा-
धिकार के लिये गृह युद्ध होता रहता था।
कल्हण यहाँ ब्राह्मणों के बल का
वर्णन करता है। उग्रते... का कोप-