राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
पृष्ठ 315, कुल 984 में से
संदर्भ में पढ़ेंयहाँ पृष्ठ की सामग्री का पूर्ण लिप्यंतरण दिया गया है:
३२८ | राजतरंगिणी
पात उगे थे । उनसे मेरा पैर बुरी तरह छिला गया ।
किसी प्रकार अन्दर पहुँचा ।
स्तूप का अधिष्ठान मात्र शेष रह गया है । स्तूप
की चारों दिशाओं में सीढ़ियाँ बनी हैं। दो सीढ़ियों के
बीच तीन त्रिकोणीय अधिष्ठान के अंश जिस कमल
की मुकुलित एक-एक पंखड़ी हैं। इस समय यहाँ
यत्र-तत्र पड़े कुछ अलंकृत शिलाराण्डों के अतिरिक्त
और कोई दर्शनीय वस्तु शेष नहीं रह गयी है। स्तूप
के पृष्ठ भाग में एक तरफ पहाड़ो है । दूसरी तरफ
बारहमुला शहर वितस्ता के वाम तट पर है । बारह-
मूला इस समय समृद्धिशाली नगर हो गया है ।
भारतीय सेना की छावनी के कारण खूब चहल-
पहल रहती है ।
हुष्कौर में एकाकी एक स्तूप और उसके परि-
वेष्ठित दिवाल का अंश शेष रह गया है । खनन कार्य
में यहाँ से प्राप्त खिलौने प्रतापसिंह संग्रहालय
श्रीनगर कश्मीर में संगृहीत हैं । ये दिवाल के
उत्तरीय दिशा में एकाध फीट की दूरी पर गड़े मिले
थे । कश्मीर में मूर्तिभंग की शैली भारत जैसी ही
थी । मन्दिर तथा मूर्तियों को खण्डित करने की
एक शैली प्रचलित हो गयी थी । मूर्तियों के नाक
तथा हाथ अवश्य खण्डित कर दिये जाते थे । खण्डित
मूर्तियों को या तो किसी मसजिद की सीढ़ियों में
लगा दिया जाता था कि लोगों के पैरों तले पड़ती
अपनी असमर्थता, दयनीय दशा, शक्तिहीनता प्रकट
करती रही अथवा तोड़कर कही मुर्दों की तरह
दफना दी जाती थी ।
हुष्कौर से प्राप्त खण्डित मूर्तियों पर गन्धार
शैली की छाप है। मूर्तियां कश्मीर के पुराकालीन
मूर्तिकला तथा उनके स्थापत्य शैली पर प्रकाश
डालती हैं ।
प्रताप सिंह संग्रहालय की भगवान् बुद्ध की
(बी. सी. १.) मूर्ति ध्यान मुद्रा प्रदर्शित
करती है। भगवान् पद्मासन लगाकर बैठे हैं।
त्रिचीवर धारण किये हैं ।
मूर्ति बी. सी. २ गान्धार परवर्ती काल की
मूर्ति कला पर प्रकाश डालती है । यह एक
मस्तक मात्र है । अधोभाग का पता नही चला है ।
मूर्ति भग्न है । मूर्धा पर उर्म है ।
मूर्ति बी. सी. ३ भग्न मस्तक है । नाक तोड़
दिया गया है । मस्तक के उर्म ग्रन्थिल हैं। मुख
अण्डाकार है ।
मूर्ति बी. सी. ४ एक ब्राह्मण का मस्तक है ।
तत्कालीन लोगों की वेशभूषा पर प्रकाश डालती
है । मूर्ति कला सजीव है। दाढ़ी-मूंछ हैं। केश
पीछे बँधे हैं। बाल कंघी से संवारे गये हैं।
मूर्ति बी. सी. १० केश विन्यास का उत्कृष्ट
नमूना है । घुंघराले केशों से कान ढका है ।
मूर्धा पर से केश चारों तरफ फैले हैं। उन्हें
सर पर मुक्ताग्रोथित सूक्ष्म वस्त्र से बाँधा गया है।
आजकल केशों को संयत रखने के लिये रुमाल
या पट्टी से प्राय बाल बाँध लिये जाते हैं। कश्मीर
के खेतों पर काम करने वाली नारियों के सर पर
इसी प्रकार के वस्त्रों से बाल बाँधा मुझे दिखाई
पड़ा । यद्यपि पाश्चात्य सभ्यता के प्रभाव के
कारण कश्मीर की नारियों के साज-शृंगार तथा
वेशभूषा में आमूल परिवर्तन होने लगा है। मूर्ति
की मुखाकृति कोमल है । यह भग्न मस्तक बोधि
सत्त्व का है ।
मूर्ति बी. सी. ११ बोधिसत्त्व का भग्न
मस्तक है । उस मस्तक पर अलंकृत मुकुट है ।
यह मुकुट ब्रिटिश राजाओ के मुकुट से कुछ
मिलता है ।
मस्तक बी. सी. १५ : एक युवक का है ।
उस मस्तक का, दाढ़ी-मूंछ, सब कुछ मुड़ा है । अधरों
पर आध्यात्मिक मुस्कान है । आकृति भव्य तथा
प्रभावोत्पादक है। कलाकार ने जैसे अन्तर की मनो-
वृत्तियों को मुखाकृति में उरेह दिया है ।
मूर्ति बी. सी. १८ : अत्यन्त उत्कृष्ट कलाकृति
यह एक उपासिका का खण्डित मस्तक है।