सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 316, कुल 984 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 316

यहाँ प्रस्तुत पृष्ठ का पंक्ति-दर-पंक्ति लिप्यंतरण है:

शीर्षक:
प्रथम तरंग २२९

बायाँ स्तम्भ (Left Column):
अधरों पर गम्भीर मुद्रा के साथ आध्यात्मिकता
मिश्रित मुसकान है । भरी पूरी मुखाकृति है । कंघी से
सँवारे केश में सीमंत मन में अनायास पवित्र भाव
उत्पन्न करते हैं । मिथुन, काम एवं भौतिक सौन्दर्य
दर्शक मुद्रा के यह विपरीत मुद्रा है तथा
कलाकृति है ।
मूर्ति बी. सी. १९: भग्न मस्तक है । नासिका,
भौं, अधरों पर की मुसकान देखते बनती है । मस्तक
पर बाल कढ़े हुए हैं । मध्य भाग से कानों के ऊपर
होते हुए कंघी किये हुए केश पीछे की ओर घूमे हैं ।
खण्डित पीन पयोधर की क्रम संख्या बी. सी.
३५ है । स्तन पर कुच बन्ध लगा है । कण्ठ में मुक्ता
माला के अतिरिक्त स्तनों पर दूसरी मुक्तामाला
सुशोभित है । कामिनी के शृंगार के रूप को प्रकट
करती है । तत्कालीन काश्मीर के लोग कितने शृंगार
तथा कला के प्रिय थे । उस पर प्रकाश डालती है ।
मस्तक खण्ड बी. सी. १६ : एक भिक्षु का
है । उसकी दाढ़ी-मूंछ तो मुंडी हैं परन्तु मस्तक पर
बाल कढ़े हैं । यह तत्कालीन काश्मीरी लोगों के बाल
रखने की एक शैली पर प्रकाश डालता है । इस
प्रकार के बाल काटने को बनारस की तरफ 'खत'
काटना, कहते थे । मेरे बचपन में पुराने लोग 'खत'
कटाते थे । मेरा भी बाल बचपन में इसी ढंग पर
काटा जाता था । इस समय पाश्चात्य शैली पर बाल
काटा जाने लगा है । पुरानी बातें लोग भूल रहे हैं ।
मूर्ति खण्ड बी. सी. ३४ : विचित्र मूर्ति है ।
उसका कटि तथा ऊरु मात्र शेष रह गया है । इस
मूर्ति का शिश्न तथा अण्डकोष खुला है । कन्धा से
आता कुर्ता कटि प्रदेश तक रह गया है । कुर्ता के
छोर पर मुक्ता पंक्ति गुथी है । यह किसी श्वेताम्बर
जैन सन्त की मूर्ति हो सकती है ।
इसके अतिरिक्त यहाँ से हाथ, कलाई, पद,
भुजाओं के खण्डित भाग मिले हैं । उन्हें देखने से
तत्कालीन वेशभूषा तथा विभिन्न प्रकार के प्रायोगिक
अलंकारों पर प्रकाश पड़ता है । कंकण, चूड़ियाँ,

दायाँ स्तम्भ (Right Column):
भुजबन्द पहनने की चाल थी । कलाई की उँगलियाँ
बहुत ही सुन्दर तथा लहर की तरह बनायी गयी हैं ।
(६) जुष्कपुर : श्रीनगर के उत्तर में एक बड़ा
ग्राम है । इसका वर्तमान नाम जुकुर है । हरि पर्वत
से ४ मील दूर है । यहाँ के प्राचीन ध्वंसावशेषों के
शिलाखण्ड, मजारों, कब्रिस्तानों तथा मसजिदों में
लगे मैने देखा है । बहुत पत्थर गढकर नवीन इमारतों
में लगाये गये हैं । अतएव उनका पूर्व रूप निश्चित
करना दिन पर दिन कठिन होता जायेगा । जनरल
श्री कनिंघम को सन् १८४७ में तथा श्री स्टीन को
वहाँ बहुत शिलाखण्ड मिले थे ।
जनरल कनिंघम ने सन् १८४७ ई० नवम्बर मास
में वहाँ की यात्रा की थी। उन्हें उस स्थान पर बहुत
अधिक संख्या में पत्थर के स्तम्भ मिले थे । कुछ
कश्मीरी पुरातन शैली से अलंकृत पत्थर थे । सबका
उपयोग तराश कर मसजिदों तथा जियारातो में किया
गया था । (एनिसिएण्ट ज्योग्राफी पृष्ठ ८५)
जनरल कनिंघम ने जिन स्तम्भों तथा पत्थरों को
देखा था वे निस्सन्देह जुष्कपुर में निर्मित विहारों के
अवशेष थे । अगले श्लोक से यह स्पष्ट प्रकट होता
है कि उसने जुष्कपुर में विहार का निर्माण किया
था । जुष्कपुर के उत्तर देवीपुर, पूर्व में तात्वल,
पश्चिम प्राचीन अमरेश्वर, ऊबरहर और धुर दक्षिण
डंगरपुर तथा दूर पर हरिपर्वत पड़ता है ।
(७) कनिष्कपुर : वर्तमान कानिशपुर है । यह
श्रीनगर-बारहमूला सड़क पर स्थित है । ग्राम के
पास एक पुराना टीला है । वहाँ से अलंकृत पत्थर
मिले थे । कहा जाता है कि राजा कनिष्क का
यहाँ निवासस्थान था । इस स्थान पर प्राचीन
ध्वंसावशेषों के शिलाखण्ड तथा मुद्राएँ मिलती हैं,
जनरल कनिंघम ने १८४७ में यहा की यात्रा की
थी । प्राचीन ध्वंसावशेषो के शिलाखण्डादि उन्हें
जियारातो तथा कब्रों में लगे मिले थे । बहुत अधिक
संख्या में इस प्रकार के ध्वंसावशेष बिखरे थे ।
श्री स्टीन लिखते हैं । पण्डित साहिबराम के
तीर्थ में इसका मूल नाम कनिष्कपुर दिया गया है ।