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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 305, कुल 984 में से

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पृष्ठ 305

२१८ राजतरंगिणी
स हि कारयितुं यक्षैर्यतते स्म स्वमण्डले ।
दीर्घानश्ममयान्सेतूंस्तोयविप्लवशान्तये ॥ १५६ ॥
१५६. उस राजा ने स्वमण्डल में जल¹ विप्लव शान्त करने के लिये यक्षों² की सहायता से
पाषाण मय दीर्घ सेतुओं के निर्माण का यत्न किया था।

ऊँचा होने पर उसे ऊँचे स्थान में पहुँचाया जा सकता
है। राजा दामोदर द्वारा बसाये नगर को आज भी
स्मृति स्थानीय लोगो में है।
१५८ (१) विघ्न : कल्हण ने कुटिल तथा तुच्छ
मनुष्यों द्वारा परोपकारी कार्यों में बाधा डालने की
मनोवृत्ति को धिक्कारा है। उस लोकोत्तर कार्य को
उन्नतआत्मायो का कार्य कहा है। और इस प्रकार के
कार्यों में अरुचि रखने तथा बाधा डालने वालो को
उनकी पूर्व जन्म की पुण्यशीलता का अभाव होना
उनमें माना है। वह यहाँ पर कर्मसिद्धान्त का
प्रतिपादन करता है। वह महात्मा गान्धी के समान
मनुष्य को बुरा नही कहता परन्तु उनके कर्म को बुरा
कहता है। कर्म द्वारा मनुष्य पुण्यात्मा एवं दुरात्मा
दोनो होता है। अतएव सुकर्म करने वाले श्लाघ्य हैं।
दुष्कृति करनेवाले धिक्कार के पात्र हैं।
१५९ (१) जल प्लावन : कश्मीर को प्रकृति
ने हराभरा नन्दन उद्यान तुल्य अतिरम्य बनाया
है तथापि कश्मीर मण्डल पर प्रकृति की ही वक्र दृष्टि
रहती है। जल एवं अग्नि कश्मीर, मुख्यतया श्रीनगर,
के शत्रु रहे हैं। जल विप्लव, जलप्लावन वर्षा के द्वारा
पहाड़ों का गिरना आदि साधारण बातें हैं। घनघोर
वर्षा यदि लगातार तीन दिन तक कश्मीर में हो जाय
तो जल विप्लव सदृश दृश्य दिखायी पड़ता है। इनसे
कश्मीर की रक्षा करने का स्तुत्य प्रयास प्रायः सभी
राजाओं ने किया है। राजा ने भी यक्षों की सहायता
लम्बे बाँध बँधाने के लिये ली थी। यक्ष शब्द
के प्रयोग से यही प्रकट होता है। राजा का सेतु
निर्माण कार्य असाधारण था। साधारण पुरुषार्थ मात्र
से सम्भव नहीं था। अतः कल कश्मीरी मुसलमान
कश्मीर के बने पुराने मन्दिरों तथा अन्य निर्माण में लगे
विशाल शिलाखण्ड को देखकर उन्हे जिन तथा परियो
का काम कहते हैं। इसका कारण यह है कि मुसलिम
काल में किसी बड़ी पत्थरो की इमारत की रचना
नही हुई। पुराने पत्थरो को तोड कर निःसंकोच
उनका प्रयोग नवीन निर्माण मे किया जाता रहा है।
१५९ (२) यक्ष : कल्हण कश्मीर में प्रचलित
किंवदन्ती की ओर संकेत करता है। प्राचीन विशाल
इमारतों का निर्माण, जिनमें विशाल शिलाखण्ड लगे
हैं, उन्हें यक्षों का निर्माण, मानवीय शक्ति के परे
होने के कारण मानता है। कल्हण ने जिन भव्य
भवनों तथा निर्माणों का वर्णन किया है उनमें बहुतों
के ध्वंसावशेष वर्तमान हैं। कश्मीरी मुसलमान
उन्हे जिन तथा परियों का बनाया मानते हैं। कारण
स्पष्ट है। आज भी उन शिलाखण्डों को देखकर
आश्चर्य होता है। ये किस प्रकार मानवों की स्वल्प
शक्ति से उठाये और भवनों में लगाये गये होंगे।
यक्ष शब्द ऋग् तथा अथर्व वेद में अनेक स्थलों
पर आया है। (ऋग्वेद १:१९०:४, ४:४:१३,
५:१०:४, ७:५३:१६, १०:८८:१३, ७:६१:५;
अथर्व वेद ८:६:२५, १०:२.३२, १०:७:३८,
१०:८.४३, ११:२:४)
वायु, मत्स्य, ब्रह्माण्ड पुराणों में यक्ष शब्द प्रायः
गन्धर्व तथा किन्नर के साथ आता है। ये हिमालय
प्रदेश निवासी जातियाँ थी। अलवेरूनी ने गन्धर्वों को
गायक जाति में गिना है। गन्धर्वों का संगीत तथा
नृत्य पेशा था और आज भी है।
गन्धर्वान् किन्नरान् यक्षान् रक्षोविद्याधरांस्तथा ।
क्लापग्रामकांश्चैव तथा किं पुरुषाद् रम्यान् ॥
अग्नि पुराण (१९:१८) में 'कश्यपपत्नीखशा-
जाता.' अर्थात् कश्यप की पत्नी खशा से यक्षों की
उत्पत्ति का उल्लेख किया गया है।