राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथम तरंग २१३
है, हुआ था। (म. श. ७५) इसका एक नाम
सोम है। एतदर्थ उत्तर दिशा का नाम सौम्य
पड़ा है।
वैश्रवण कुबेर के पिता विश्रवस पुलस्त्य एवं
हविर्भू का पुत्र कहा गया है। (भा० ४:१:३६-
३७) ब्रह्माण्ड पुराण में इसकी माता का नाम
इलविला दिया गया है। वह तृणविन्दु तथा
अलंबुषा की कन्या थी। (३:७:३९-४२) किन्तु
वायु पुराण में इसकी माता का नाम द्रविडा दिया
गया है। (८६:१६) इसको नव पत्नियां थीं।
(म. व. २५९:६०) इसकी एक पत्नी केशिनी से
रावण, कुम्भकर्ण, विभीषण तथा कन्या शूर्पणखा
हुई थी। महाभारत के अनुसार इसकी पुण्योत्कटा,
राका एवं मालिनी तीन पत्नियां राक्षसी थी। महा-
भारत वनपर्व (२५९:७-८) में मालिनी का विभी-
पण, पुण्योत्कटा का रावण और कुम्भकर्ण तथा
राका का पुत्र खर और कन्या शूर्पणखा कही गयी है।
१५६(१) गुह्यक : दश देवयोनियों में यक्षों
तुल्य एक योनि है। अमरकोश के अनुसार दस
निम्नलिखित देवयोनियां हैं :
विद्याधराप्सरो-यक्ष-रक्षो-गन्धर्व-किन्नराः ।
पिशाचो गुह्यकः सिद्धो भूतोऽमी देवयोनयः ॥
॥१:१:११॥
कुबेर को गुह्यकेश्वर तथा वैश्रवण भी कहा
गया है। गुह्यक उन लोगों के लिये प्रयुक्त किया
गया है, जो कुबेर के धनकोष की रक्षा करते थे।
उनके स्वामी को गुह्यकेश्वर कहा गया है।
कुबेरस्त्यम्बकसखो यक्षराड् गुह्यकेश्वरः ।
॥१:२:७१॥
मनुष्यधर्मा धनदो राजराजो .धनाधिपः ।
किन्नरेशो वैश्रवणः पौलस्त्यो नरवाहनः ॥
॥१:२:७२॥
भास्कर्य किंवा मूर्तिकला विकास में कुबेर
तथा यक्षों का प्रमुख स्थान है। कुबेर की अलका-
पुरी का सुन्दर वर्णन मेघदूत में कालिदास ने किया
है। यक्ष का स्वामी कुबेर है। बौद्ध मूर्तियों में
कुबेर तथा यक्ष भगवान् की पूजा करते दिखाये
गये हैं।
गुह्यक शब्द का एक जाति के रूप में प्रयोग
मिलता है। उन्हें देवयोनि के अन्तर्गत एक जाति
महाभारत ने माना है। (आदि पर्व १८६:७) इस
जाति के लोग द्रौपदी के स्वयंवर के समय उपस्थित
थे। गुह्यकेश्वर अर्थात् कुबेर की सभा में गुह्यकों
का रहना कहा गया है। (सभा पर्व १०.३)
गन्धमादन पर्वत पर उनका निवास स्थान था।
भीमसेन ने उन्हें वहीं अपनी गदा द्वारा हत किया
था। (शल्य पर्व ११:५५-५) गुह्यक को यक्ष भी
कहा गया है (१०.१५)।
पुराणों में कुबेर के अनुयायी तथा दानव
गुह्यक कहे गये हैं। (भागवत पुराण १.९.३,
१०:३४:२८, २:१०:३७, ४:४:३४) गुह्यक जाति
हिमालय में निवास करती थी। (भागवत ४:५:२६
४:१०:५) वे माया विद्या में निपुण थे। (भागवत
पुराण १०.५५.२३) गुह्यकों के देवता शिव थे।
वे शिव के अनुयायी थे। (भागवत पुराण ६३:१०)
गुह्यकों ने पुण्यात्माओं के सम्पर्क से स्वर्ग प्राप्ति
की थी। (भागवत पुराण ११:१२:३, १४.५, )
गुह्यकों को यक्षों तथा राक्षसों की श्रेणी में रखा
गया है। (ब्रह्माण्ड पुराण ३:७:१६७, ४:२:२६,
(मत्स्यपुराण १३:१७, १२१, २)। गुह्यकों
के आचरण तथा कर्त्तव्यों का विशद वर्णन मत्स्य
पुराण (१८०.९०, २४६:५३,) तथा वायु पुराण
(अध्याय ६९ तथा १०१) में मिलता है। गुह्यक
वर्ग को वायु पुराण (अध्याय ३०) में हिमालयवासी
गुह्यक कहा गया है-शंकर पार्वती के साथ
विराजमान थे। उस समय आदित्यगण, वसुगण,
अश्विनीकुमार, गुह्यकों को साथ लेकर वैश्रवण
कुबेर, सनत्कुमार, परमर्षि, अंगिरादि देवर्षि, विश्वा-
वसु गन्धर्व, नारद, कैलास निवासी यक्षराज, महा-