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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

१६६ राजतरंगिणी
इस स्थान पर कल्हण ने ज्येष्ठेश का स्थान
निश्चित नन्दिक्षेत्र बता दिया है। द्वितीय ज्येष्ठेश को
प्रथम ज्येष्ठेश से भिन्न मानने के लिये त्रिपुरेशाद्रिनिष्ट
संज्ञा दी है। त्रिपुरेश पर्वत के अधोभाग में उनका
निश्चित स्थान बताता है। तृतीय ज्येष्ठेश्वर रुद्र का
स्थान डल लेक के समीप था। यहाँ महाराज हरी
सिंह ने अपना राजभवन बना लिया है। वह भवन
अब होटल रूप से चलता है। श्रीनगर से गुप्तकर होते
हुए जो सड़क डल लेक के तट से होती चश्माशाही,
शालीमार बाग की तरफ जाती है; वही पर सड़क से
ऊपर राजभवन के स्थान पर यह स्थान था।
नन्दिक्षेत्र के ज्येष्ठेश वही हैं जिनका वर्णन भूते-
श्वर मन्दिर के सन्दर्भ में किया गया है। भूतेश्वर
मन्दिर के प्राकार में अनेक मन्दिर निर्माण किये
गये थे। यह प्रथा अत्यन्त प्राचीन थी। मेवाड़ में
एकलिंग जी के मन्दिर के प्राकार के अन्दर एकलिंग
के मुख्य मन्दिर के चारों ओर अनेक मन्दिरों का
निर्माण कालान्तर में राजाओं ने भूतेश्वर मन्दिर के
समान कराया था। भूतेश्वर मन्दिर के समीप जैसे
सोदर तीर्थ का अति लघु सरोवर है उसी प्रकार
एकलिंग मन्दिर में भी एक लघु सरोवर है।
नीलमत पुराण इसे और स्पष्ट कर देता है :
पूर्वोत्पन्नं च यज्ज्येष्ठाख्यं लिंगं मम द्विज ।
तत्रापि सन्निधानं मे नित्यं विज्ञातुमर्हसि ॥
1110:१३११
ऋषिकोटिसहस्राणि मम भक्त्या द्विजोत्तम ।
तत्र संस्नापयन्ति स्म ज्येष्ठेशं तं सदैव तु ॥
१३१२
यथाभ्यहं च ज्येष्ठेशे भूतैः सह तथामया ।
त्वम स्वमपि मद्भिन्न मद्भक्तो मत्परायणः ॥
1111:१३१७
भयदाम्ना च दैन्यानां सुराणामभयप्रदः ।
ज्येष्ठेश्वरसमीपे तु यस्मिण्डोऽपि महायशः ॥
1119.१३२३
स्नात्वा तु मोदरे पुण्ये दृष्ट्वा भूतेश्वरं हरम् ।
ज्येष्ठेश्वरं नन्दिरुद्रं च गाणपत्यमवाप्नुयात् ॥
1124:१३२८
ज्येष्ठेश के स्थान निर्णय में इस प्रकार कोई
विवाद नहीं रह जाता। नीलमत स्थान का निश्चय
स्पष्ट करता है। नन्दिक्षेत्र तथा वसिष्ठ आश्रम अर्थात्
वांगध के समीप ज्येष्ठेश का स्थान बताकर, वह भूते-
श्वर स्थित ज्येष्ठेश को ही कल्हण वर्णित ज्येष्ठेश
मानने के लिये बाध्य कर देता है।
शिव तथा नन्दी की कथा में एक प्राचीन लिंग
की बात आती है। उसे ज्येष्ठेश कहते थे। वह
निःसन्देह शिव भूतेश्वर के स्थान में था। प्राचीन
नन्दीक्षेत्र माहात्म्य में उल्लेख मिलता है कि ज्येष्ठेश्वर
किंवा ज्येष्ठनाथ की पूजा नन्दीश तथा भूतेश्वर के
अत्यन्त समीप होती थी। (श्लोक १४६)
कल्हण ने राजतरंगिणी के श्लोक १:१५१ में
ज्येष्ठ रुद्र का उल्लेख किया है। वहाँ पर ज्येष्ठ रुद्र
वास्तव में ज्येष्ठेश है। कल्हण पुनः ४:१९० में
उल्लेख करता है कि ज्येष्ठ रुद्र का एक मन्दिर भूते-
श्वर में निर्माण कराया गया था। कल्हण ने अन्तिम
बार इसका उल्लेख ८:२४३० में किया है। वसिष्ठा-
श्रम जो वूथेसर अर्थात् भूतेश्वर के समीप था वह
कह कर स्पष्ट कर देता है, कि नन्दिक्षेत्र में जो ज्येष्ठेश हैं,
वही यहाँ वर्णित ज्येष्ठेश है।
इस श्लोक से एक बात और स्पष्ट हो जाती है।
उक्त ज्येष्ठेश का लिंग स्वयंभू था। वह अनघट था।
इस प्रकार के अनगढ़ शिलाखण्ड की पूजा आज भी
सारिका पर्वत, श्रीनगर तथा सुरेश्वरी स्थान में
होती है।
ज्येष्ठेश का मन्दिर भूतेश्वर स्थित मन्दिरों के
दो समूहों में पश्चिमी मन्दिर समूह में था।
स्वयंभू लिंगों की पूजा भारतवर्ष के अनेक तीर्थों
में होती है। मैने राजस्थान में अनेक स्थानों पर चाहे

[Header]
प्रथम तरंग १६७

[Left Column]
वे नगर हों अथवा ग्राम अनगढ शिलाखण्ड की पूजा
भैरव, रुद्रादि नामकरण देकर किये जाते देखा हैं।
शिव लिंग के प्राप्त करने की एक पुरानी प्रथा
है। उन्हें गढ़ना अच्छा नही माना जाता । शिवलिंग
प्रायः नर्मदा नदी से प्राप्त किये जाते थे । उन्हें
नर्मदेश्वर कहा जाता था । ब्राह्मण किंवा पुरोहित
अथवा इस कार्य के लिये नियुक्त व्यक्ति स्नानादि
कर शुद्ध होकर नर्मदा की धारा में डुबकी लगाते
थे। नदी तल में जो लिंग मिल जाता था उसे लेकर
निकलते थे। उसी लिंग की स्थापना गढ़े अर्धों
में कर दी जाती थी । नर्मदा तल मे सभी पत्थर के
ढोके प्राय शिव लिंग आकार के गोले तथा लम्बे
आकार के होते हैं। आज कल इस प्रकार के शिव
लिंग मूर्तिकार गढ़ने लगे हैं। पालिश करते हैं।
तत्पश्चात् स्थापनार्थ बेचते हैं।
यहाँ ज्येष्ठेश शब्द की व्याख्या में विस्तार से
जाना अप्रासंगिक होगा । ज्येष्ठेश नाम क्यो दिया
गया ? किसी व्यक्ति के नाम पर, ऋषि के नाम पर
अथवा किसी पुरानी कथा के आधार पर यह नाम-
करण किया गया । इसका सम्बन्ध धार्मिक अनुसंधान
से है । ऐतिहासिक दृष्टि से इतना वर्णन अलम् प्रतीत
होता हैं ।
रुद्र वास्तव में वैदिक देवता है। वैदिक साहित्य
में नैसर्गिक एवं व्याधि जनित उत्पात निर्माण कारक
देवता की संज्ञा रुद्र नाम से दी गयी है ।
शिव की संज्ञा उसी देवता के शमनकारी
रूप को दी गई है। अतएव एक ही देवता के रौद्र
एवं शान्त रूप का नाम रुद्र एवं शिव है ।
पाश्चात्य दैव विज्ञान में सृष्टि संचालक एवं
संहारक एक ही देव को मानकर उसकी द्विविध रूप
में उपासना की जाती है। भारती दैव विज्ञान संचा-
लक एवं संहारक दो शक्तियों किंवा दैव को मानता
है । सचालक शक्ति को विष्णु तथा सृष्टि संहारक
शक्ति को रुद्र की संज्ञा दी गयी है ।
ऋग्वेद से गृह्यसूत्रों के काल तक रुद्र देवता
विषयक कल्पनाओं की उत्क्रान्ति पर दृष्टिपात किया

[Right Column]
जाय तो प्रतीत होता है। ऋग्वेद अथवा वैदिक
साहित्य में रुद्र निसर्ग प्रकोप का देव था ।
वही रुद्र उत्तर कालीन साहित्य में पशु, वन,
पर्वत, नदी, श्मशानादि समस्त सृष्टि व्यापक एक
महान् शक्ति सम्पन्न देवता के रूप में मान्यता प्राप्त
कर लिया है ।
ऋग्वेद में रुद्र के स्वरूप का वर्णन किया गया
है । उनका वर्ण भूरा है। सूर्य तुल्य जाज्वल्यमान एवं
सुवर्ण समान प्रदीप्त हैं। (ऋ० १:४३, २:३३ )
पूषन तुल्य जटाधारी है ।
संहिताओं में वैदिक रुद्र का रूप बदलता दिखाई
देता हैं। उन्हें सहस्राक्ष. नील वर्ण ग्रीवा, एवं केश
युक्त बताया गया है ( वा० सं०: १६; ७, अथर्ववेद.
२:२२ ) उनका उदर किंवा पेट कृष्ण एवं वर्ण रक्त
कहा गया है । ( अथर्व वेद १५: १ ) उन्हे चर्मधारी
भी कहा गया है। (वा० सं : १६-२-४,५१) काला-
न्तर में यह चर्मधारी रूप वाघाम्बर एवं मृग चर्म-
धारी रूप में परिणत हो गया ।
महाभारत एवं पुराणों में रुद्र के स्वरूप की
अनेक कल्पनाएँ की गयी हैं। पंचमुख की कल्पना
विशेष प्रचलित है । पूर्व, पश्चिम, उत्तर एवं ऊर्ध्व
दिशा वाला मुख सौम्य तथा दक्षिण दिशावर्ती मुख रौद्र
दिखाया गया है । दक्षिण दिशा काल की दिशा कही
गयी है । अतएव रौद्र रूप प्रदर्शित करना इसी काल
किंवा संहार का प्रतीक है । (म० अनु० १४०:४६)
ग्रीवा नील होने का महाभारत में ही दो वर्णन
मिलता हैं । महाभारत अनुशासन पर्व (१४१:८)
इन्द्र के प्रहार के कारण ग्रीवा नील होना कहता
हैं। महाभारत शान्ति पर्व (३४२:१३) दूसरा कारण
देता है । समुद्र मंथन से प्राप्त हलाहल विष पान
करने के कारण शिव की ग्रीवा नीली हो गयी थी ।
नाम नीलकंठ पड़ गया था । उन्हें वही पर श्रीकंठ
कहा भी गया है ।
पुराणो मे रुद्र को चतुर्मुख (विष्णु धर्म: ३:४४-
४८;५५:१ ) अर्धनारीश्वर, नटेश्वर (मत्स्य: २६०)
एवं त्रिनेत्र कहा गया है ।

१६८ गजतरंगिणी
रुद्र का निवास स्थान वैदिक साहित्य के अनुसार
पर्वतों और मुख्यतया मूंजवन् पर्वत है (वा० स०:
२५:२-४; ३.६१; ) महाभारत रुद्र का आद्य निवास
स्थान मेरु पर्वत मानता है । रुद्र का इसलिए एक
नाम मेरुधामा पड़ गया है । (म० अनु० १७:२,१)
आश्वमेधिक पर्व महाभारत (८:१) वायु पुराण
(४७.१९) एवं मौखिक पर्व (१७.२६) के अनुसार
रुद्र का निवासस्थान मुंजवान किंवा मूजवत पर्वत
है । यह पर्वत कैलास के उस पार था । महाभारत
भीष्म पर्व (७.३१) में इनका निवास स्थान कैलास
एवं हिमालय पर्वत बताया गया है ।
महाभारत अनुशासन पर्व (१६१:१७-१६)
के अनुसार रुद्र का निवास स्थान काशी की श्मशान
भूमि है । संवर्त को शव रूप शिव का दर्शन काशी में
हुआ था ।
सभी का समन्वय करने पर निष्कर्ष निकलता है
कि रुद्र का स्थान हिमालय के एकान्त में, तपस्या
योग्य वनश्री के मध्य होना चाहिये । भूतेश्वर का
स्थान इस दृष्टि से आदर्श है । यहाँ ज्येष्ठ रुद्र की
स्थापना की कल्पना सराहना योग्य है ।
दक्ष प्रजापति ने रुद्र को नन्दिकेश्वर नामक
वृषभ वाहन के लिये दिया था । उनकी ध्वजा पर
वृषभ का चिह्न था । अतएव नाम वृषभध्वज पड़
गया । भूतेश्वर स्थान नन्दिक्षेत्र के अन्तर्गत है ।
इनका आयुध, विद्युत दार है। वेद में इनका शस्त्र
धनुष बाण एवं वश कहा गया है । ऋ० २:३३:३;
१०,५४२:११; १०:१२६ ६)
यजुर्वेद के शतरुद्रीय अध्याय में रुद्र का स्वभाव
चित्रण अधिक विस्तार के साथ दिया गया है ।
(तै० सं० ४:५ १, वा० सं० १६) इन्हें 'रुद्रतनु'
अर्थात् रुद्ररूप और 'शिवतनु' अर्थात् शिव स्वरूप
कहा गया है ।
या ते रुद्र शिवा तनू शिवा विश्वस्य भेषजी ।
शिवा रुद्रस्य भेषजी तया नो मृड जीवसे ॥
अथर्ववेद में ग्यारह रुद्रों यथा (१) ईशान, (२) भव,
(३) शर्व (४) पशुपति (५) उग्र (६) रुद्र एवं (७)
महादेव का वर्णन है । पुराणों में अष्ट रुद्रों का
उल्लेख है । यथा-(१) रुद्र (२) भव (३) शर्व (शिव)
(४) पशुपति (५) भीम (६) ईशान (७) उग्र एवं
(८) महादेव । महाभारत में एकादश रुद्रों का उल्लेख
है । यथा (१) मृगव्याध (२) सर्व (३) निर्ऋति
(४) अजैकपाद (५) अहिर्बुध्न्य, (६) पिनाकिन् (७)
दहन (८) ईश्वर (६) कपालिन् (१०) स्थाणु एवं
(११) भव (म० आदि ५०:१०३)
स्कन्द पुराण में (१) भूतेश, (२) नील रुद्र
(३) वृषवाहन (४) त्र्यंबक (५) महाकाल (६)
भैरव (७) मृत्युंजय (८ गणेश एवं (९) योगेश
रुद्रों का नाम दिया गया है । (स्कन्द पु० १७:१:७७)
इस पुराण की मान्यता है । कृतयुग में अष्ट रुद्र थे,
कलियुग में ग्यारह रुद्रों का अवतार हुआ था
भागवत पुराण (२:१३:८-१०) में (१) मन्यु (२)
मनु-(३) महिनस् (सोम) (४) महत् (५) शिव
(६) ऋतध्वज (७) उपरेतस् (८) भव (९) काल
(१०) वामदेव (११) धृतध्वज का नाम दिया
गया है ।
स्कन्द पुराण में 'भूतेश' को एक रुद्र माना गया
है । भूतेश्वर स्थान 'भूतेश' का मन्दिर था । स्थान
का नाम भी भूतेश्वर था । अतएव यह निश्चित हो
जाता है कि स्थान रुद्र से सम्बन्धित था । ज्येष्ठ
रुद्र का नाम उत्तर मध्य तालिकाओं में शिवों में सर्वत्र
मिलता ।
ऋग्वेद एवं ब्राह्मण ग्रन्थों में जो रुद्र था वही
उपनिषदों में शिव का रूप ले लिया इस प्रकार रुद्र
को परम शुद्ध आध्यात्मिक रूप प्राप्त हो गया । उनकी
पूजा मद्य मांस से नहीं बल्कि फलपुष्पादि द्वारा होने
लगी । उनका रूप अथर्व वेद वर्णित मातर्व रुद्र उच्च-
लोक के अधिपति 'महादेव' तुल्य हो गया । इसीको
महाभारत अनुशासन पर्व (१६१:३) बड़ी उत्तमता से
प्रकट करता है ।

प्रथम तरंग १६९

द्वे तनू तस्य देवस्य वेदज्ञा ब्राह्मणा विदुः ।
घोरान्याँ शिवामन्यां ते तनू बहुधा पुनः ॥
[ शिव की घोर एवं शिवा नामकी दो मूर्तियाँ
हैं । उनमें घोरा अग्नि रूप हैं एवं शिवा परम गुह्य
अद्यारम स्वरूप महेश्वर हैं ]
रुद्र शिव की उपासना भारत मे अत्यन्त प्राचीन
हैं । उपासना का काल विभाग दो भागों में विभक्त
किया जा सकता है । प्रथम काल में शिव की प्रति-
कृति की उपासना की जाती थी । द्वितीय काल में
शिवलिङ्गोपासना आरम्भ हो गयी ।
भूतेश एवं ज्येष्ठ रुद्र इसी द्वितीय काल विभाग
में आते हैं । उनमें शिवलिंग की स्थापना की गयी
थी । ज्येष्ठ रुद्र का लिंग स्वयंभू था ।
ऋग्वेद (७.२१.५, १०।९९०३) में
शिश्नदेव की उपासना का उल्लेख अनार्य लोगों के
गन्दर्भ में किया गया हैं । प्राचीन वैदिक वाङ्मय
में नहीं मिलता । पतंजलि के महाभाष्य (३:९९)
में शिव, स्कंद, विशाख, की स्वर्णादि की मूल्यवान
प्रतिकृतियों की पूजा के स्पष्ट निर्देश है । वेम कद
फिसस की मुद्राओं पर शिव की त्रिशूलधारी एवं
शिव के प्रतीक स्वरूप शिवलिंग नहीं अपितु नन्दिन्
उत्कीर्ण किया गया है ।
श्वेताश्वतर उपनिषद् (४,११,५.२) में सर्व
प्रथम शिवलिङ्गोपासना का निर्देश मिलता है ।
'ईशान रुद्र' को समस्त योनियों का अधिपति कहा
गया है । किन्तु यहाँ भी शिवलिंग को शिव का
प्रतीक होने का स्पष्ट निर्देश नहीं है ।
महाभारत में उपमन्यु के आख्यान में सर्व प्रथम
शिवलिङ्गोपासना का स्पष्ट रूप से निर्देश प्राप्त
होता है ।
मोहे जो दडो एवं हड़प्पा के उत्खनन में शिव
रूप से मिलती मूर्तियाँ प्राप्त हुई है । उनका काल
ईशा के ३००० वर्ष पूर्व अर्थात् ४९६८ वर्ष है । यही
काल कल्हण तथा नीलमत पुराण के अनुसार महा-
भारत काल था । यहाँ के प्राप्त देवताओं की मूर्तियाँ
२२
महाभारत वर्णित 'त्रिशीर्ष' 'वियम्ब्र' 'ऊर्ध्वलिंग'
'योगाध्यक्ष' स्वरूप से मिलती है । ( म. अनु.: १४:
१६२, १६५, ३०८, १७.४६, ७७.९९ ) वहाँ से प्राप्त
मूर्तियों के वाम हस्त में व्याघ्र एवं हस्तो हैं । दक्षिण
हस्त में वृषभ एवं गण्डक हैं । वह चित्र भी महाभारत
अनुशासन पर्व ( १४:३१३, १७,४८,६१,८५,९१ )
वर्णित 'पशुपति' 'शार्दूल रूप' 'व्याल रूप' 'मृग वाण
रूप, 'नागवर्मोत्तरच्छद' 'व्याघ्राजिन' 'गहिग्घ्न'
'गजहा' एवं 'मण्डलिन्' से मिलता है ।
महाभारत में शिव को सर्वत्र वृषभवाहन कहा
गया है । हिटाइट लोगों के तेशव देवता से शिव का
साम्य मिलता है । बेबिलोन मे प्राप्त अनेक शिल्पो
एवं अवशेषों में तेशब की प्रतिमाएँ मिली है । उनमें
तेशव को वृषभवाहन एवं त्रिशूलधारी दिखाया
गया है । तेशब को पत्नी का नाम माँ था । शिव भी
अम्बिका जिन्हें पार्वती एवं दुर्गा कहा गया है उनके
पति हैं । तेशब की पत्नी सिंहारूढ है । दुर्गा भी सिंह-
वाहिनी है ।
सुगा में प्राप्त तेशब की पत्नी का चित्रण मधु-
मक्षिका के साथ किया गया है। यह मार्कण्डेय
पुराण वर्णित भ्रामरी देवी से साम्य रखता है ।
कल्हण ने भ्रामरी वासिनी देवी का वर्णन राजतरं-
गिणी में ( ३:३९४, ४२३ ) किया है ।
तेशव के समान रुद्र के हाथ में विद्युत, धनुष,
त्रिशूल, दण्ड, परशु, पट्टिश आदि शस्त्र दिखाये गये
हैं । ( ऋ. २: ३३; ३; म. अनु १४: २८८ २८९,
१७:४३, ४४:९९ )
'शत्रुजय सूक्त' शुक्लयजुर्वेद मे रुद्र को लक्ष्य कर
लिखा गया है । उसका विचार सुमेरियन देवता
'नेर्गल' से मिलता है । मत है कि भारतीय रुद्र शिव
का सम्बन्ध किंवा साम्य अनादोलिया, मोसोपेटा-
मिया, एवं सिन्धुघाटी की सभ्यता से अवश्य रखता
है । ( राय चौधरी: स्टडीज इन इण्डियन एण्टि-
क्विटीज पृष्ठ २००-२०४)
निःसन्देह रुद्र सर्व प्रथम वैदिक देवता थे ।
कालान्तर मे वे व्रात्य, निषाद, वन्यादि एवं अनार्य

१७० राजतरंगिणी
ग्रामे ग्रामे स्थितैरश्वैर्धावनं प्रतिषिद्धवान् ।
स्वेनावहत् सततं नागः कोऽपि सुहृत्तया ॥ ११४ ॥
११४. एक सदय हृदय नाग ग्राम ग्राम१ पड़ावों पर प रवर्तनाथं स्थित अश्वों की लम्बी
कष्टप्रद यात्रा२ से राजा को विरत कर स्वयं उन्हें ज्येष्ठेश से विजयेश्वर निरंतर पहुँचा दिया
करता था।
स रुद्धवसुधान्म्लेच्छान्निर्व्वास्याखर्वविक्रमः ।
जिगाय जैत्रयात्राभिर्महीमर्णवमेखलाम् ॥ ११५ ॥
११५. उस विक्रमशाली राजा ने म्लेच्छों१ से आक्रांत वसुधा का उद्धार कर अपनी विजय
यात्राओं द्वारा समुद्र मेखला धारिणी मही का जय किया।
लोगों के देवता बन गये । प्राचीन वैदिक आर्यों द्वारा
प्रस्थापित कल्पनाएँ लुप्त हो गयी । अन्तर पड़ता
गया । रुद्र भूतपति, किंवा भूतेश, सर्पधारी, स्मशान-
निवासी देव में परिणत हो गये । प्रतिकृति की पुरा-
तन उपासना की परंपरा नष्ट हो गयी । उसका स्थान
शिव लिंग की उपासना करने वाली नवीन परम्पराओं
ने ले लिया ।
ज्येष्ठेश किंवा ज्येष्ठ रुद्र नामकरण इसलिये
किया गया कि सप्त, अष्ट, एकादश रुद्रों में सबसे
ज्येष्ठ रुद्र की उपासना ग्राह्य की गयी । अतएव भूतेश
रुद्र के समान ज्येष्ठेश रुद्र नामकरण कर दिया गया ।
पाठभेदः
श्लोक संख्यानु ११४ में 'हसं', का 'हृ' पाठभेद
मिलता है ।
पादटिप्पणियाँ :
११४(१) ग्राम ग्राम : अश्व से यदि ज्येष्ठेश से
विजयेश तक की यात्रा की जाय तो चार दिन पड़ाव
डालकर पहुँचा जा सकता है । कल्हण यहाँ स्पष्ट
कहता है । मार्ग में पड़ने वाले ग्रामों में अश्व
नियुक्त रहते थे । एक ही अश्व द्वारा पूरी यात्रा नहीं
समाप्त हो सकती थी । कुछ दूरी पर नवीन अश्व
तैयार रहते थे । शिथिल अश्व को त्याग कर
नवीन अश्व से यात्रा की जाती थी ।
पड़ाव पर अश्व रखने और बदलने की प्रथा
बहुत पुरानी है । उन्नीसवी शताब्दी के प्रारम्भ तक
रेल तथा मोटर के आने के पूर्व यूरोप, एशिया तथा
सभ्य जगत् में यह प्रथा प्रचलित थी । राजकीय डाक
तथा संवाद ले जाने के लिये पड़ाव निश्चित रहते थे ।
वहीं अश्व रखे जाते थे । ठहरने किंवा विश्राम का
प्रबन्ध रहता था । कश्मीर में यह प्रथा आज से तेईस
सौ वर्ष पूर्व ही प्रचलित प्रतीत होती है ।
(२) यात्रा : श्री स्टीन ने इस श्लोक की
टिप्पणी में ठीक ही लिखा है । कल्हण ने यहाँ ज्येष्ठेश
से विजयेश्वर तक की लम्बी कष्टप्रद यात्रा का वर्णन
किया है । यह कम से कम अश्वों द्वारा चार दिन
का पड़ाव कर समाप्त की जा सकती थी । शीघ्र
पहुँचने की दृष्टि से और वह किस प्रकार एक ही दिन
में सम्भव हो सकता था, कल्हण ने नाग की कथा जोड़
दी है । प्रतिदिन यह कार्य राजा के लिए किस
प्रकार सम्भव था इसका स्पष्टीकरण नाग को राजा के
वाहन रूप में प्रस्तुत कर कल्हण करता है ।
ज्येष्ठेश से विजयेश की दूरी पक्षी उड़ान या नभ
से सीधे ४५ मिनट की होती है । यदि यह यात्रा अश्व
से की जाय तो सचमुच चार दिन लग जायगा । मार्ग
अत्यन्त लम्बा, पहाड़ियों का चक्कर काटता, ऊबड़-
खाबड़ और कष्टप्रद था। पहाड़ियों के कारण अश्व की
गति तेज भी नहीं हो सकती थी। भूतेश्वर से कनक-
वाहिनी नदी की घाटी पकड़कर चलने से सिन्धु
नदी पहुँचने तक मार्ग है । अतएव
नाग को यहाँ पर लाया गया है कि उसपर
सवारी कर राजा अविलम्ब नित्य पहुँच जाता

प्रथम तरंग
१७१


[बायाँ स्तम्भ]

था। अश्व की सवारी से किसी प्रकार एक दिन में
येशेश से विजयेश्वर नहीं पहुँचा जा सकता। इस
लए इस असंगति दोष को दूर करने के लिये कल्हण
नाग का कथानक वहाँ जोड़ा है। वसिष्ठाश्रम,
ारबल, चीरमोचन, तत्पश्चात् मयग्राम, दुग्धाश्रम,
हेरण्यपुरा, ध्रुवेश्वरी, ईशेश्वर, भोमा देवो, गोपाद्रि
होते हुए श्रीनगर आता है। यहाँ से पुराधिष्ठान,
जयवन, मिहपुर, समरस्वामी, पद्मपुर, ललितपुर,
गोपालपुर, अवन्तीपुर, कत्तिका, होते वितस्ता पार
कर यदि चला जाय तो गम्भीरा संगम होते चक्रधर
से विजयेश्वर पहुँचता है। यह मार्ग त्रिकोण बनाता
भूतेश्वर से विजयेश्वर तक बड़ा लम्बा बन जाता है।
श्रीनगर से विजयेश्वर २९ मिल पड़ता है।
प्राचीन मार्ग का अनुसरण किया जाता तो वह लगभग
भी मिल से उस समय के चक्करदार मार्ग के कारण
कम न होगा। आजकल सुगम राज पथ एवं सभी
स्थानों में पहुँचने के लिए सड़क बन जाने के
कारण मार्ग की दूरी कम हो गयी है और पथ भी
सरल हो गये हैं।
११५ (१) म्लेच्छ : यहाँ म्लेच्छ से तात्पर्य यूनानी
आक्रामकों से है। म्लेच्छ शब्द की विस्तृत व्याख्या
परिशिष्ट 'म्लेच्छ' में की गयी है द्रष्टव्य है।
कश्मीर के सीमान्त पर अर्थात् सिन्धु के पश्चिमी
तट अफगानिस्तान, तथा कश्मीर के उत्तर एवं पश्चिम
यूनानियों का शासन अलकसुन्दर अर्थात् सिकन्दर के
आक्रमण के पश्चात् हो गया था। सम्राट् अलकसुन्दर
की मृत्यु के पश्चात् यूनानी साम्राज्य अनेक क्षत्रपों में
विभाजित हो गया था। निसन्देह अशोक का प्रभाव
क्षेत्र किंवा राज्य मानसेहरा, तक्षशिला, शहबाजगढ़ी,
लम्पक, कन्दहार तक फैल चुका था। अन्यथा वहाँ
अशोक अपने स्तम्भों का निर्माण और धर्म प्रचार
कराने में समर्थ नहीं हो सकता था।
ईसा पूर्व २०६ ई० में यूनानी क्षत्रप, शासक
किंवा राजा अन्तियोकस तृतीय ने बल्ख पर आक्रमण
किया। जीत लिया। बिखरे राज्य को पुनः
संघटित करने का प्रयास किया। उसने इसी वर्ष


[दायाँ स्तम्भ]

भारत की सीमा का अतिक्रमण किया। वह काबुल
उपत्यका लांघता भारत भूमि पर सेना सहित आ
पहुँचा। उस समय पाटलीपुत्र में मौर्य राजा शालीशुक
था। उसे सुभगसेन भी कहा जाता है। अन्तियोकस
ने शालीशुक से मित्रता कर ली थी।
अलकसुन्दर के आक्रमण के समय तक्षशिला
एवं दर्भाभिसार के राजा आम्भी ने अपनी निष्ठा
अलकसुन्दर के प्रति प्रकट की थी। कश्मीर के राजा
ने भी अपने भाई के साथ चालीस हाथी अलकसुन्दर
के भेंट निमित्त भेजे थे।
अन्तियोकस के अभियान का उद्देश्य मालूम होता
है, अलकसुन्दर द्वारा विजित भूक्षेत्र पर पुनः अधिकार
किंवा प्रभाव स्थापित करना था। सम्भव है। इसी
दृष्टि से कश्मीर के राजा ने भी हाथो भेज कर अपनी
निष्ठा प्रकट की थी। कश्मीर में अशोक का पुत्र
जलोक शासन कर रहा था। कश्मीर भी अशोक के
राज्य का अंश था। एतदर्थ अन्तियोकस ने आक्रमण
किया होगा।
कल्हण स्पष्ट कहता है कि म्लेच्छों के संहार
निमित्त तपस्या कर अशोक ने जलौक पुत्ररत्न
भगवान् शंकर की कृपा से प्राप्त किया था। उसके
जन्म ग्रहण का प्रयोजन म्लेच्छों का संहार करना था।
कल्हण ने उसी बात को दृष्टि में रख कर म्लेच्छ
संहार की बात अपनी वर्णन संगति कायम रखने के
लिये की है।
अशोक का अवसान ईसा पूर्व २३२ वर्ष में हुआ
था। यह घटना अशोक की मृत्यु के २६ वर्ष पश्चात्
की है। भारतीय इतिहास की गणनानुसार इस समय
अशोक का प्रपौत्र शालीशुक पाटलीपुत्र का राजा था।
अशोक का पुत्र जलौक कश्मीर का राजा था।
मालूम होता है। जलौक न तो कभी पाटली-
पुत्र गया और न उसका कोई वंशधर पाटलीपुत्र
का राजा हुआ था। उसने अपने पिता के सिंहासन
पर बैठने का भी प्रयास नहीं किया। वह कश्मीर से
ही सन्तुष्ट था। जलौक का अशोक के पश्चात् २६ वर्ष
तक राज्य करते जीवित रहना कोई आश्चर्य की बात
नहीं मालूम पड़ती।

१७२ | राजतरंगिणी
ते यत्रोज्झटितास्तेन म्लेच्छाः छादितमण्डलाः ।
स्थानमुज्झटडिम्बं तज्जनैरद्यापि गद्यते ॥ ११६ ॥
११६. म्लेच्छाच्छादित मण्डल को जिस स्थान पर म्लेच्छों को उज्झटित कर राजा ने मुक्त किया था उसे लोग उज्झटडिम्ब¹ कहते थे और आज भी कहते हैं ।
जित्वोर्वी कान्यकुब्जाद्यां तत्रत्यं स न्यवेशयत् ।
चातुर्वर्ण्यं निजे देशे धर्म्यांश्च व्यवहारिणः ॥ ११७ ॥
११७. कान्यकुब्ज¹ तथा अन्य भूमि जीतकर राजा ने वहाँ के चातुर्वर्ण्य² निवासियों और धर्म तथा व्यवहार निपुणों को अपने देश में लाकर बसाया ।
कहा जाता है । ईसा पूर्व २०६ वर्ष में कश्मीर के समान जोडते हैं । उज्झटित अर्थात् जिस स्थान
तथा कलिंगादि राज्य स्वतन्त्र हो गये थे । कश्मीर पर पर म्लेच्छों को राजा जलौक ने परास्त किया था
अशोक के विजय की बात कही नहीं मिलती । किन्तु उसका इतना महत्त्व कश्मीरी इतिहास में हो गया
कश्मीर के स्वतन्त्र राज्य होने का प्रमाण अशोक के था कि उसके नामपर एक स्थान का नाम पड गया ।
पश्चात् मिलता है । कश्मीर अपनी स्वतंत्र स्थिति काश्मीरियों ने यूनानियों को पराजित किया था ।
कायम रखने के लिये पाटलीपुत्र का मुखापेक्षी नहीं यह उनके लिये गौरव तथा महत्त्व की बात थी ।
रहता था । अतएव म्लेच्छों के आतंक का सामना यह इस उल्लेख से और स्पष्ट होता है कि कल्हण के
कश्मीरी सेना ने किया । यूनानी अर्थात् म्लेच्छों से समय अर्थात् लगभग १३५४ वर्ष युद्ध के पश्चात्
कश्मीरी सेना ने लोहा लिया । म्लेच्छ पराजित हुए । तक उज्झटडिम्ब स्थान तथा नाम प्रचलित था ।
म्लेच्छाकीर्ण भूमि पुनः म्लेच्छविहीन हो गयी । दूसरी कल्हण ने वहीं से प्राप्त सामग्री एवं किसी कथानक
तरफ मौर्य साम्राज्य दुर्बल होता गया । अशोक जैसी के आधार पर म्लेच्छों के उच्छिन्न करने का वर्णन
क्षमता उसके उत्तराधिकारियों में नहीं रह गयी थी । लिया है ।
शालीशुक म्लेच्छ सेना का सामना करने में असमर्थ इस समय वह स्थान कहाँ पर है । पता नहीं
था । यूनानियों से सन्धि कर ली । चलता । परन्तु इसे काश्मीर के दक्षिण पश्चिम
कश्मीर के राजा जलौक ने म्लेच्छों का उच्छिन्न किंवा पश्चिम होना चाहिए ।
किया । राज्य का विस्तार किया । उसने विजय पाठभेद :
यात्रा किस ओर की थी । किन भूखण्डों पर श्लोकसंख्या ११७ में 'कान्यकुब्ज' का पाठभेद
विजय प्राप्त किया था । इस पर कल्हण कुछ प्रकाश 'कन्यकु' तथा 'सन्य' का 'संन्य' पाठभेद मिलता है ।
नहीं डालता । पादटिप्पणियाँ :
पाठभेद : ११७ (१) कान्यकुब्ज : यह स्थान वर्तमान
श्लोकसंख्या ११६ में 'ते' का 'स', 'यत्रो' का कन्नौज है । इत्र, गुलाबजल, सुगन्धित तेलके लिये
'तत्रो', 'ज्झटिता' का 'ज्जूटित', मुज्झट' का 'मुजुट' आजकल प्रसिद्ध है । उत्तर प्रदेश में फर्रुखाबाद
मुजूट', 'मुत्कुट' 'मुज्जूट' पाठभेद मिलता है । जिला में एक नगर है । गंगा के वामतट पर स्थित
पादटिप्पणियाँ : है । वाल्मीकि रामायण में कन्नौज के नामकरण
११६ (१) उज्झटडिम्ब - कश्मीर में डिम्ब का उल्लेख है ।
शब्द स्थानीय नामों के अन्त में 'मूर' अथवा 'योग'

प्रथम तरंग १७३
वाल्मीकीय रामायण में नगर के नामकरण
की एक कथा मिलती है । चन्द्रवंशी राजा
कुशनाभ ने महोदय नगर की स्थापना की थी।
राजा की एक सौ कन्याएँ वायु के शाप से कुब्जा
हो गयीं। उस समय इस नगर का नाम 'कन्य-
कुब्ज' पडा ।
प्रतीत होता है कि सबसे प्राचीन नाम महोदय
नगर था । तत्पश्चात् कान्यकुब्ज पड़ा । अनन्तर
गाधिपुर कुशस्थल कुशिक आदि नाम पडता गया।
कुसुमपुर भी इसका नाम पड गया । जन्हु के नाम
पर गंगा की धारा का नाम जाह्नवी पड़ा था ।
महाभारत के अनुसार वह राजा गाधि की राज-
धानी थी। कान्यकुब्ज राज्य एवं उसके जनपद
दोनों का नाम था। ( म० आदि : १७७:३, वन०
११५:२० ) विश्वामित्र ने कान्यकुब्ज में इन्द्र के
साथ सोमपान किया था। ( म० वन० ८७:१७ )
गाधिराज कुमारी सत्यवती को अपनी पत्नी बनाने
के लिये ऋची ऋषि ने अपना विचार प्रकट किया
था। ( म० उ० ११९:४)
स्कन्द पुराण में देशों की तालिका में कान्यकुब्ज
का स्थान छठवाँ है । इसमें ३६ लाख ग्राम थे।
कान्यकुब्ज को प्राचीनकाल में गाधिपुर, कुश-
स्थल तथा महोदय नगर कहते थे। भागवत पुराण
में अजामिल को वहीं का निवासी बताया गया है।
विश्वामित्र की वह जन्मभूमि थी ।
बुद्ध काल से गुप्त काल के अंत तक स्वतंत्र
जनपद के रूप में कान्यकुब्ज का नाम प्रायः नही
मिलता। कालान्तर में यह मौखरी राज्य का केन्द्र
हो गया। मौखरी राज्य का संस्थापक हरिवर्मा
था। मौखरी वंश के प्रसिद्ध राजा 'ईशानवर्मा' ने
महाराजाधिराज की उपाधि धारण की थी।
थानेश्वर के शासक हर्षवर्धन की बहन राज्यश्री
का विवाह मौखरी राजा गृहवर्मा से हुआ था।
मालवा के शासक देवगुप्त ने गृहवर्मा को मारकर
राज्यश्री को बन्दी बना लिया। कान्यकुब्ज के
मन्त्रियों ने राज्य-हर्षवर्धन को दे दिया।
महाराजा हर्षवर्धन के समय कान्यकुब्ज की
आशातीत उन्नति हुई । वह राज्य से साम्राज्य की
राजधानी बन गया। महाकवि बाण ने 'हर्ष चरित'
में कान्यकुब्ज का जीता जागता चित्रण किया है।
हुएनत्सांग ने कान्यकुब्ज की यात्रा की
थी। उसने यहाँ की भूरि भूरि प्रशंसा की है।
बौद्ध साहित्य में कान्यकुब्ज का 'कन्यकुब्ज' जो
संस्कृत कान्यकुब्ज का अपभ्रंश है, नाम मिलता
है। हुएनत्सांग ने स्पष्ट उल्लेख किया है। यहाँ पर
बौद्ध विहार थे। उसमें दस सहस्र भिक्षु विहार
करते थे। हुएनत्सांग के अनुसार कान्यकुब्ज का
विस्तार ४००० ली था। उसका कथन है । कान्य-
कुब्ज ने संस्कृति, सभ्यता, युद्ध एवं शान्ति कालीन
कला में अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त कर ली थी।
हर्ष के पश्चात् यशोवर्मा राजा हुआ। तत्पश्चात्
क्रमशः आयुध, प्रतीहार तथा गाहडवाल राजवंशों
का कान्यकुब्ज पर अधिकार हुआ। प्रतिहार वंश
में नागभट, मिहिरभोज, महेन्द्रपाल आदि प्रसिद्ध राजा
हुए है। गाहडवाल वंश मे गोविन्दचन्द्रादि के समय
कन्नौज की विशेष उन्नति हुई थी । निस्सन्देह छठवीं
शताब्दी से १२वीं शताब्दी तक साहित्य, कला,
धर्मादि का विशेष विकास कन्नौज में हुआ था ।
'कादम्बरी' तथा 'हर्षचरित' के लेखक बाणभट्ट
के अतिरिक्त यशोवर्मा के राजकवि वाक्पति एवं
भवभूति थे। प्रतीहार काल में राजशेखर, गाहड़वाल
काल में लक्ष्मीधर एवं श्रीहर्ष संस्कृत के उद्भट
साहित्यकार एवं कवि हुए थे। प्रतीहारों के समय
कन्नौज स्थापत्य एवं मूर्तिकला में प्रसिद्ध हो गया
था। छठवीं शताब्दी में श्वेत हूणों ने कन्नौज पर
आक्रमण किया था। तालिमी ने इसका नाम 'कनो
गिया' दिया है।
फिरदौसी ने शाहनामा में कन्नौज का प्रशंसनीय
भाषा मे उल्लेख किया है। उसका कथन है कि

१७६ राजतरंगिणी

कर उसके स्थानो पर महाफलदायक 'धर्म मंगल' को
बात चलायी गयी थी। अशोक की दृष्टि मे यह
आवश्यक सुधार था। धर्म प्रचार था। परन्तु यह
सुधार जनता हृदयंगम न कर सकी। पश्चिमोत्तर
सीमान्त पर उठते युद्ध के बादल, जलोक को दूसरे
ढंग पर विचार करने के लिये बाध्य कर दिये।
अशोक का अभिलेख इस सम्बन्ध में स्पष्ट था।
'इय क्यं (८) ये हि एत के मगले सासयिके
तं (९) सिय वो त भ्रठं निवटेयति सिय पुन ना
(१०) इदलोक च वी तं (११) इद पुन धम मंगलं
अकलिकं (१२) यदि पुन तं अथ न निवटे इध अथ
परत अनंतं पुजं प्रसवति (१३) हंचे पुन तं ठं
निवटेति ततो उभयेस लध भोति इध च सो अथो
परत च अनंतं पुजं प्रसवति तेन धमंमलेन।'
[ यह कहूँगा। क्योंकि इस प्रकार के मंगल
सन्दिग्ध फल वाले होते हैं। इनमे अभीष्ट फल की
प्राप्ति हो भी सकती है और नही भी। ये इहलौकिक
हैं। किन्तु धर्म मंगल समय से बाधित नही है।
हो सकता है कि इसमे इस लोक में वाञ्छित फल
की सिद्धि न हो। किन्तु परलोक मे इससे अनन्त
पुण्य होता है। परन्तु यदि इससे ( इस लोक मे
भी) सिद्धि होती है तब तो दोनों लाभ प्राप्त
होते हैं। अर्थात् इस लोक में इससे अर्थ की प्राप्ति
होती है। और परलोक मे इस धर्म मंगल से अनन्त
पुण्य उत्पन्न होता है]
"से अज देवन पियस प्रियदसिने रंजिने धम
चरणेन भेरिघोषे अहो धमधोषे विमन दर्शन हस्तिने
अगिकंधनि अजनि च दिवनि रूपनि दशेति जनस
(२) (मानसेहरा शिला चतुर्थ अभिलेख)
[... किन्तु आज देवानां प्रिय प्रियदर्शी राजा के
धर्माचरण से भेरीघोष (रणभेरी) धर्म घोष हो
गया। विमान दर्शन, हस्ति दर्शन, अग्नि स्कन्ध
तथा अन्य दिव्य प्रदर्शनों को जनता को दिखाकर...]
क्रिया की प्रतिक्रिया होना अनिवार्य है। अशोक
के धर्म प्रचार के उत्साह की प्रतिक्रिया पाटलीपुत्र तथा
कश्मीर दोनों स्थानों में हुई। कश्मीर में कल्हण
के मतानुसार बौद्ध प्रभाव प्रबल हो उठा था। उसने
जनता में विरक्ति की भावना भर दी। गृहत्याग
की भावना भर दी। प्रव्रज्या को श्रेष्ठ माना।
जीवन में उदासीनता को महत्त्व दिया। वह एक
प्रकार से गार्हस्थ्य एवं क्षत्रिय धर्म से निष्क्रियता की
ओर ले गया। राज्याश्रय प्राप्त कर पाटलीपुत्र
सैनिक शक्ति के केन्द्र के स्थानपर धर्म प्रचार का
केन्द्र बन गया।
जलोक ने विदेशी खतरे को देखा। उसका
सामना करने के लिये जनता के विचार में परिवर्तन
लाना चाहा। एतदर्थ कान्यकुब्ज से वर्णाश्रम धर्मा-
नुयायियों एवं विद्वानों को लाया। लुप्त होते वर्णाश्रम
धर्म का उद्धार किया। एक नवीन जीवन उल्लास
किया। नवीन प्रेरणा दी।
कश्मीर में बौद्धधर्म के विरुद्ध वह प्रतिक्रिया
अशोक की मृत्यु के ३० वर्ष के अन्दर ही हो गयी।
बौद्धधर्म 'संघ' शरण की बात करता है। उसके
अनुशासन को मानता है। यूरोप मे मध्ययुग में
संघ अर्थात् चर्च तथा राज्य में संघर्ष हुआ था।
चर्च राज्यपर अपना अंकुश रखना चाहता था।
मूर्त्तमान प्रश्न खड़ा हो गया था। चर्च और राज्य
दोनों में किसका आदेश किंवा अनुशासन मानना
श्रेयस्कर होगा। इस भावना के कारण यूरोप में
सुधारवादी, नव जागरण तथा धर्मनिरपेक्षता की
विचारधारा बलवती हुई। उसने भयंकर रक्त-
रंजित आन्दोलन का रूप पकड़ लिया।
कुछ इसी प्रकार की बात भारत में हुई। उसका
बीज जलोक ने कश्मीर में डाला। यह उसके समय
अंकुरित हुआ। और महा वृक्ष के रूप में पल्लवित,
पुष्पित होता गया। वर्णाश्रम धर्म में देश, जनपद,
नगर, ग्राम एवं गृह का स्थान था। उनके लिये उत्त-
रोत्तर त्याग करने की बात कही गयी है। देश किंवा
राष्ट्र को आदर्श माना गया है। जननी जन्म भूमि
को स्वर्ग से भी ऊँचा स्थान दिया गया है। जन्मभूमि

प्रथम तरंग १७७
यथावद् वृद्धिम्प्राप्तं व्यवहारधनादिभिः ।
सामान्यदेशवद्राज्यं तावदस्मिन्हि मण्डले ॥ ११८ ॥
११८. उस समय तक कश्मीर मण्डल में व्यवहार तथा धनादि का यथोचित विकास नहीं
हुआ था और वहाँ की शासन व्यवस्था अन्य सामान्य राज्यों तुल्य थी ।
को माता माना गया है। यह सिद्धान्त राष्ट्रीयता की
ओर ले जाता था ।
संघ का सिद्धान्त अन्तर्राष्ट्रीयता की ओर
उन्मुख करता था । जनता संघ के अनुशासन में
रहेगी अथवा राज्य—यह कठोर प्रश्न उपस्थित हो
गया था । संघ की शरण गया व्यक्ति संघ के अनु-
शासन को मानने के लिये बाध्य था न कि राज्य के ।
विचारों का संघर्ष उत्पन्न हो गया। शान्ति काल में संघ
अनुशासन चाहे कितना ही आदर्श क्यों न हो परन्तु
जब सीमा पर शत्रु सेना सज्जित खड़ी हो, राष्ट्र
के जीवन-मरण का प्रश्न उपस्थित हो, देश में भी
जनता की शक्ति संघ एवं देश में विभाजित हो गयी
हो, तो इस काल में सैनिक विहीन, युद्ध सिद्धान्त
विहीन, विरक्त समाज किंवा देश अपनी रक्षा करने
में समर्थ कैसे हो सकता था ? जलौक ने जनता से
प्रतिद्वन्द्वरहित किंवा ऐकान्तिक राजभक्ति की
अपेक्षा की । इसमें उसे सफलता मिली । म्लेच्छों अर्थात्
यूनानियों के आतंक से देश को मुक्त किया । उन्हें
पराजित किया और कान्यकुब्ज तक सैनिक अभियान
के साथ पहुँच गया । दूसरी ओर पाटलीपुत्र का
शासन यूनानियों का सामना करने में असमर्थ
सिद्ध हुआ ।
पाटलीपुत्र में राजा स्वयं बौद्ध था । अशोक
का पुत्र था । तत्पश्चात् पौत्र हुआ। अशोक ने अभि-
लेखों में स्पष्ट आदेश दिया था । उसके पुत्र, पौत्र,
तथा उत्तराधिकारी उसके धर्म घोष को जारी रखेंगे ।
'त मम पुता च पोता च परं च तेन य मे अपचं
आव संवटकपा अनुवति सरे तथा सो सुकतं फासति
(५) यो तु एतं देसं पि हापेसति सो दुकतं फासति
(६) सुकरं ही पापं ( गिरनार पंचम अभिलेख )
२३
यदि मेरे पुत्र, पौत्र, और उनके परे जो मेरे
अपत्य (संतान) कल्प के अन्त तक (इसका)
अनुसरण करेंगे तो वे सुकृत करेंगे। जो इसका एक
अंश भी नष्ट करेगा वह दुष्कृत करेगा । पाप सुकर
है ।''''कश्मीर में प्रतिक्रिया बौद्ध केन्द्र पाटलीपुत्र से
दूर होने के कारण शीघ्र हुई। किन्तु पाटलीपुत्र
बौद्धधर्म का केन्द्र था अतएव प्रतिक्रिया की गति मन्द
थी । विलम्ब से हुई ।
राज्याश्रय में भौतिक तथा आध्यात्मिक दोनों
शक्तियाँ वाध्र्यवश्य प्राप्त करती हैं। पाटलीपुत्र में
जिस प्रतिक्रिया रूपी विद्रोह का बीजारोपण हो रहा
थी उस विप्लव वृक्ष के बढ़ने एवं पल्लवित होने में
४८ वर्ष लग गये ।
अशोक की मृत्यु के ठीक ४८ वर्ष पश्चात् मौर्य
वंशीय अन्तिम राजा बृहद्रथ को मारकर पुष्यमित्र
(ईसा पूर्व १८४ वर्ष) ने शुंग वंश की स्थापना की
थी। उसने पुरातन सनातन किंवा वर्णाश्रम धर्म को
पुनः राज्याश्रय दिया ।
बौद्ध लेखक पुष्यमित्र को बौद्ध विरोधी चित्रित
करते हैं। बौद्धधर्म की अपेक्षा वर्णाश्रम धर्म की ओर
उसका झुकाव था । वह स्वयं एक ब्राह्मण का पुत्र
था । बृहद्रथ का सेनापति बन गया था। इस
प्रकार कश्मीर में जो धार्मिक क्रान्ति अशोक की मृत्यु
के ३० वर्षों के अन्दर हुई उसे भारतवर्ष अथवा
पाटलीपुत्र में सफल होने में ४८ वर्ष लग गये । इस
विलम्ब का कारण पाटलीपुत्र में बौद्धों का अत्यधिक
प्राबल्य होना था ।
अशोक के उत्तराधिकारी धर्म घोष करने में
असफल रहे। उन्होंने सनातन धर्म किंवा वर्णाश्रम धर्म
की पुनः प्रतिष्ठा निमित्त भी कोई प्रयास नहीं किया ।

चतुर्थ तरङ्ग: कर्कोट वंश (ललितादित्य मुक्तापीड व जयापीड)

१७८ राजतरंगिणी
धर्माध्यक्षो धनाध्यक्षः कोशाध्यक्षश्चमूपतिः ।
दूतः पुरोधा दैवज्ञः सप्त प्रकृतयोऽभवन् ॥ ११९ ॥
११९. राज्य में सप्तप्रकृति¹ अर्थात् धर्माध्यक्ष, धनाध्यक्ष, कोषाध्यक्ष, चमूपति, दूत
पुरोधा, एवं दैवज्ञ केवल सात ही राज्याधिकारी थे।
कर्मस्थानानि धर्म्याणि तेनाष्टादश कुर्वता ।
ततः प्रभृति भूपेन कृता यौधिष्ठिरीस्थितिः ॥ १२० ॥
१२०. राजाने अठारह कर्म स्थानों¹ को धर्मानुसार स्थापित किया। उसने महाराज
युधिष्ठिर के राज्य समान स्थिति उस समय से राज्य में प्रचलित की।
उनकी निष्क्रियता उनके नाश का राजनीतिक एवं धार्मिक दोनों दृष्टियों से कारण हुई।
पाठभेद :
श्लोक संख्या ११८ में 'मत्प्राप्तं' का 'मत्प्राप्ते' तथा 'राज्यं' वा 'राजा' पाठभेद मिलता है।
पादटिप्पणियाँ :
११९ (१) सप्त प्रकृति : महाभारत सभापर्व पंचम अध्याय : अडतीसवें श्लोक में राज्य की सात प्रकृतियों का उल्लेख मिलता है।
कच्चित् प्रकृतयः सप्त न लुप्ता भरतर्षभ ।
राजा के सात अंग किंवा प्रकृति स्वामी, मन्त्री, मित्र, कोष, राष्ट्र, दुर्ग, तथा सेना एवं पुरवासी हैं। राज्य की सप्त प्रकृतियों में दुर्गाध्यक्ष, बलाध्यक्ष, धर्माध्यक्ष, सेनापति, पुरोहित, वैद्य एवं ज्योतिषी की भी कहीं कही गणना की गयी है।
कामन्दक नीतिसार में पुरातन भारतीय राज्य की प्रकृति का उल्लेख मिलता है। उसके अनुसार राज्य की सात प्रकृतियां—स्वामी, अमात्य, जनपद, दुर्ग, कोष, दण्ड एवं मित्र थे।
स्वामी राज्य की प्रथम प्रकृति है। स्वामी शब्द के अन्तर्गत राजतंत्र का राजा तथा गणतंत्र का राष्ट्र-पति दोनों आ जाते हैं। स्वामी शब्द वर्तमान प्रच-लित शब्द सॉवरेन्टि किंवा सम्प्रभुत्व के अर्थ में प्राचीनकाल में प्रयुक्त किया जाता था। कौटिल्य राजा को स्वामी मानता है। वह राजतन्त्र में विश्वास करता था। स्वामी के चार गुण माने गये हैं—अभिगामिका, प्रज्ञा, उत्साह और आत्मसम्पद्।
अमात्य के लिये कौटिल्य दो बातें आवश्यक मानता है। प्रथम उसे जानपद अर्थात् देश का नाग-रिक तथा उसमें दृढ़भक्ति होनी चाहिए। दृढ़भक्ति का अर्थ है, राष्ट्र के प्रति एकमात्र निष्ठा। शब्द का भाव अंग्रेजी शब्द लायल्टी में आ जाता है। परन्तु भक्ति शब्द अधिक व्यापक एवं उदार है।
तृतीय प्रकृति जनपद है। इसका अर्थ राष्ट्र किंवा देश है। राष्ट्र में तीन गुणों का होना कौटिल्य ने आवश्यक माना है। शत्रु द्वेषो शक्यसम्पद् अर्थात् इतना शमित सम्पन्न होना चाहिए कि पड़ोसी राज्यों को नियन्त्रण में रख सके। तृतीय गुण उसे कर्म शील वर्षक अर्थात् कर्मशील तथा कृषी कार्य में निपुण होना आवश्यक है। उसका चौथा गुण भक्तिशील मनुष्यों से युक्त सेना है। जनपद को प्रजाभक्त, देश भक्त तथा शुद्ध होना चाहिए।
राज्य की चौथी प्रकृति है दुर्ग। दुर्ग के अन्तर्गत सैनिक शक्ति आती है। प्राचीन काल में वाष्प तथा अणु परिचालित शस्त्र शल्य नहीं थे। दुर्ग का विशेष महत्व था। कौटिल्य चार प्रकार के दुर्ग का वर्णन करता है। वे जल, गिरि, मरुस्थल तथा अटवी दुर्ग है। दुर्ग उस समय राजधानी किंवा पुर होते थे। दुर्ग के अन्दर नगर बस जाता था। मुस्लिम काल में शहर पनाह तथा खाई नगर के चारो ओर बनायी जाती थी। ऊपर मोर्चेबन्दी होती थी। कहीं कहीं खाई और खाई के पश्चात् शहर पनाह दोनों बनायी जाती थीं। मनु दुर्ग के स्थान पर पुर शब्द का व्यवहार करते हैं। (मनु-स्मृतिः ९:५.२१४-)

प्रथम तरंग १७९
कोश शब्द में धनादि आय-व्यय सभी वित्तीय प्रकार के थे यह राजनीति विज्ञान का विषय है।
वस्तुओं का समावेश हो जाता है। प्रचुर समृद्धि, प्रकृति के सम्बन्ध में इतना ही लिखना पर्याप्त होगा।
शस्य सम्पत्, पण्य बाहुल्य होना कोश का गुण माना १२० (१) कर्मस्थान : महाभारत में कर्मस्थानों
गया है। को तीर्थ कहा गया है। रामायण मे भी उत्तम
दण्ड शब्द के अन्तर्गत बल शब्द आता है। कोश अठारह कर्मस्थानो का उल्लेख मिलता है।
के समान बल का होना राज्य के लिये अत्यन्त कच्चिद्दष्टादशान्येषु स्वपक्षे दश पञ्च च।
आवश्यक है। बल पुराकालीन भारतीय राज्य प्रकृति त्रिभिस्त्रिभिरविज्ञातैर्वेत्सि तीर्थानि चारकैः ॥
का छठवाँ अंग माना गया है। कौटिल्य ने अर्थशास्त्र सभापर्व ५ : ३८.
में छह प्रकार के बलों का उल्लेख किया है यथा— अट्ठारह तीर्थ किंवा कर्म स्थान—मन्त्री,
मौल बल, भृतक बल, श्रेणी बल, मित्र बल, शत्रु पुरोहित, युवराज, सेनापति, द्वारपाल, अन्तर्वंशिक,
बल, तथा अटवी बल। कारागाराध्यक्ष, द्रव्यसंचय कर्ता (कोषाध्यक्ष),
राज्यकी अन्तिम तथा सातवी प्रकृति मित्र है। मन्त्रिपात्र, प्रदेष्टा, नगराध्यक्ष, कार्यनिर्माण कर्ता,
कौटिल्य मित्रों को दो श्रेणियों में विभक्त करता है। धर्माध्यक्ष, सभाध्यक्ष, दण्डपाल, दुर्गपाल, राष्ट्रसीमा-
प्रथम श्रेणी सहज मित्रो की होती है। द्वितीय श्रेणी पाल, तथा वनरक्षक। प्रथम तीन तीर्थों को शेष
में कृत्रिम मित्र आते हैं। सहज मित्रों की श्रेणी में करने पर पन्द्रह तीर्थ होते हैं। शत्रु के अट्ठारह तथा
आनुवंशिक तथा पड़ोसी राष्ट्र होते थे। कृत्रिम मित्र स्वपक्ष के पन्द्रहो तीर्थों का गुप्तचरों द्वारा देखभाल
सन्धि तथा प्रयोजन विशेष के लिये बना लिये करवाना राजा का कर्त्तव्य माना गया है।
जाते हैं। पञ्चतन्त्र (३:६७–७०) में कर्मस्थानो का

  • भारतीय राज्य की इस प्रकृति सिद्धान्त की वर्णन किया गया है।
    तुलना शंकराचार्य ने एक रथ से की है। जिसका कालिदास ने रघुवंश (१७.६८) में तथा
    प्रत्येक भाग एक दूसरे पर आश्रित रहता है। सब शिशुपालवध (१४.१६) में इन कर्मस्थानो किंवा
    मिलकर रथ बन जाता है। गति देता है। राज्य तीर्थों का उल्लेख किया है।
    की यह परिकल्पना शरीर सदृश की गयी है। रामायण तथा महाभारत मे राजा के साथ
    राज्य की प्रकृतियाँ शरीर के विभिन्न अवयव हैं। पुरोहितो का उल्लेख मिलता है। वामदेव प्रसिद्ध
    नीतिसार (४:५;७५) तथा मनुस्मृति (९:२९६, पुरोहित थे। ऋग्वेद में वशिष्ठ तथा विश्वामित्र को
    २९७) में इसी सिद्धान्त का प्रतिपादन किया गया पुरोहित कहा गया है। राष्ट्र की आध्यात्मिक शक्ति
    है। कौटिल्य एक चरमसीमा पर पहुँच जाता है। का प्रतीक पुरोहित माना गया है। यह शक्ति
    कहता है—राजा राज्यम् इति प्रकृतिसंक्षेपः। शास्त्र में निहित थी। शास्त्र के पण्डित ब्राह्मण थे।
    अर्थात् राजा ही राज्य है। किन्तु यह कथन फ्रान्स पुरोहित ब्राह्मण होते थे। पुरोहित राजा का सलाह-
    के सम्राट् लुई १४ के मत से सर्वथा भिन्न है। जहाँ कार तथा धर्मनियन्त्रक होता था। लौकिक शक्ति
    वह कहता है। वह स्वयं राज्य है। वह राष्ट्र से का प्रतीक राजा किंवा क्षत्री होता था। अनादि काल
    अपने को ऊपर रखता है। परन्तु कौटिल्य राजा को से आध्यात्मिक एवं लौकिक शक्ति के माध्यम से
    राष्ट्र किंवा देश का सेवक मानता है। वह राजा राज्य संचालन की कल्पना भारत में की गयी थी।
    के छह शत्रुओं अर्थात् काम क्रोध मोहादि पर अतएव पुरोहित का स्थान कर्म स्थान मन्त्री के
    नियन्त्रण रखने के लिये जोर देता है। राज्य कितने पश्चात् एवं युवराज किंवा उपराजा के पूर्व
    रखा गया है।

१८० राजतरंगिणी
स विक्रमप्रभावाभ्यां समुपार्जितया श्रिया ।
विदधे वारवालादीनग्रहारानुदग्रधीः ॥ १२१ ॥
१२१. अपने विक्रम एवं प्रभाव से उपार्जित धन द्वारा उस उग्र धीमान् राजा ने वार-
बाल' इत्यादि अग्रहारों की स्थापना की।
मनु कहते हैं। क्षत्रियों का उत्कर्ष ब्राह्मणों
के बिना सहयोग के नहीं हो सकता। इसी प्रकार
ब्राह्मण एवं क्षत्रियों के एक साथ मिलने पर लोक
तथा परलोक दोनों में वार्धक्य प्राप्त होता है।
(मनु० : ९:३२३)।
प्रारम्भ में पुरोहित का पद चाहे कुछ भी
रहा हो परन्तु कालान्तर में यह पद वंश परम्परा-
गत हो गया था। राजा का यह कर्त्तव्य माना जाता
था कि वह कुलपुरोहित के मतों का आदर करेगा।
पुरोहित धर्मशास्त्र एवं दण्डनीति दोनों में पारंगत
होता था।
राजतन्त्र एवं धर्म अर्थात् पौरोहित्य पद तथा
उसके कार्य एक दूसरे को शक्ति देते थे। पुरोहित
धर्म से राजा को विरत नहीं होने देता था। वह
राजा पर अंकुश रखता था। यदि पुरोहित अनुचित
कार्य करता तो राजा भी उसे दण्ड देनेके लिये धर्मा-
नुसार मुक्त था। नैपोलियन ने एक समय कहा
था—'ईसाइयत का सबसे आश्चर्य जनक कार्य यह
था कि उसने गरीबों को अमीरों से त्रासित करने से
रोका था और यदि पोप का अस्तित्व न होता तो
मुझे एक पोप का आविष्कार करना पड़ता।'
राजनीति एवं धर्म दोनों को मनु ने एक दूसरे
का पूरक माना है। अतएव राजा पर धर्म और धर्म
पर राजा राष्ट्रहित निमित्त अंकुश लगाया गया है।
कल्हण ने राजतरंगिणी में सब स्थानों पर
राजाओं के पुण्य कार्यों, उनके निर्माणों, यथा मन्दिरों,
अग्रहारों, शालाओं, छात्रावासों, विहारों, का वर्णन
करने में किंचित् मात्र संकोच नहीं किया है। उसकी
लेखनी में उनके वर्णन काल में स्फूर्ति आ जाती है।
यूरोप के सम्राटों, राजाओं एवं सामंतों ने मध्य काल
में धर्म निमित्त जिस प्रकार के कार्य किये थे उसी प्रकार
के कार्य कश्मीर के राजाओं ने इतिहास के आदिकाल
से चौदहवीं शताब्दी तक अर्थात् हिन्दू राज्य काल में
अनवरत किया हैं। इसमें कहीं भी शिथिलता का
अनुभव नहीं होने पाया।
पाठभेद :
श्लोक संख्या १२१ में 'नुदग्रधी' का पाठभेद
'नुदारधी' मिलता है।
पादटिप्पणियाँ :
१२१ (१) वारबाल : यह वर्तमान ग्राम
वारबुल है। सिन्धु तथा कंकणी नदी के संगम से
एक मिल ऊर्ध्व भाग में कंकणी नदी के दक्षिण
तटपर स्थित है। यह भूतेश्वर जाने वाले मार्ग में
पड़ता है। इस कारण इसका और महत्त्व प्राचीन
काल में था।
अगस्त सन् १८९१ में श्री स्टीन भूतेश्वर की
यात्रा काल में इस ग्राम में आये थे। उन्हें मार्ग
के समीप शिवलिंग का अलंकृत एक विशाल पाषाण-
खण्ड पर बना भद्रपीठ मिला था। वह बहुत बड़ा
था। उसे देख कर श्री स्टीन ने घोर अन्वेषण
किया। उन्हें एक और बड़ा अलंकृत पत्थर खेत में
मकानों के नीचे लगा दिखाई दिया था।
श्री स्टीन को वारवाल के वृद्ध मुकद्दम से
मालूम हुआ था। यह अग्रहार अथवा जागीर बहुत
दिनों तक श्रीनगर के एक पीरजादा कुल की
थी। राजा गुलाब सिंह के शासन काल पूर्व तक
यही व्यवस्था थी। वल्लर कल्लर स्थान सर्वे मान-
चित्र में दिया गया है। परन्तु श्री स्टीन को इस
नाम का कोई स्थान वहाँ पर नहीं मिला था।
वारबाल के दक्षिण पश्चिम सिन्धु तटपर
प्राचीन चीर मोचन, पूर्व दक्षिण कंकनपुर, तथा
पश्चिम दक्षिण भव ग्राम था। इसके उत्तर में उत्तुंग
पर्वत शिखर आरम्भ होता हरमुकुट तक चला जाता

प्रथम तरंग १८१
द्वारादिषु प्रदेशेषु प्रभावोग्राण्युदग्रया ।
ईशानदेव्या तत्पल्या मातृचक्राणि चक्रिरे ॥ १२२ ॥
१२२. राजा की पत्नी ईशान देवी ने द्वार देशों तथा प्रदेशों में अनेक प्रभावशाली मान
चक्रों की स्थापना की जो अपनी देवी शक्ति के कारण विशिष्टता रखते थे ।
है । यहाँ से भूतेश्वर का मार्ग पर्वतों के बीच से
होकर जाता है । कंकनी नदी के दोनों तटों पर ऊँची
पर्वतमाला मिलती है ।
ओ स्टीन का मत है कि कल्हण ने इस अग्रहार
का विशेष रूप से उल्लेख इस लिये किया है कि
वह भूतेश्वर के तीर्थ यात्रा मार्ग पर पड़ता था ।
कल्हण का पिता चम्पक भूतेश्वर को नियमित रूप
से यात्रा करता था । ( रा० ७.९५४ ) अतएव यह
सम्भव प्रतीत होता है कि कल्हण कई बार इस
स्थान से अपने पिता के साथ किंवा अकेले गया
होगा ।
पाठभेद :
श्लोक संख्या १२२ में 'द्वारादिषु' का पाठभेद
'स्तिशालादिषु' मिलता है ।
पादटिप्पणियाँ :
१२२ (१) मातृचक्र : मातृचक्र का शब्दिक
अर्थ होता है मातृकाओं का समूह । 'मातृ चक्र
विवेक' इस विषय पर विशेष प्रकाश डालता है ।
उसका अध्ययन अच्छा होगा । संक्षेप में इसके अर्थ के
सम्बन्ध में इतना ही लिखना अलम् होगा कि मूल
ज्योतियाँ सूर्य, चन्द्र, बिम्ब तथा चिदात्मा हैं।
उसकी रश्मियां देवता हैं। मातृका, वर्ण, शक्ति
प्रभृति संज्ञा उनकी दी गयी हैं । इस रश्मिमाला
किंवा मातृका चक्र के बहिर्विकास का नाम सृष्टि
तथा अन्त संकोच का नाम प्रलय रखा गया है।
वैदिक ग्रन्थों तथा गृह्यसूत्रों में मातृकाओं का
निर्देश प्राप्य नहीं है । ऋग्वेद में सप्तमाताओं का
उल्लेख मिलता है । मत है कि वहाँ सप्त नदियों
तथा स्वरों के अर्थ में उनका प्रयोग किया गया है ।
(ऋ० ९:१०२:४)
महाभारत में इनके स्वरूप का वर्णन मिलता
है । उन्हें दीर्धनखी, दीर्घतुण्डी, निर्मांसगात्री,
कृष्णमेषनिभ, दीर्घकेश, लंबकर्ण, लंबपयोधर,
तथा पिंगाक्ष लिखा गया है। वे कामरूपधर एवं
कामरूपचारी हैं । वायु समजव हैं । इनका
निवास स्थान वृक्ष, चत्वर, गुफा, श्मशान, शैल
एवं प्रस्त्रवण में कहा गया है । (म० भा० श०
४४:३०-४०) मत्स्य पुराण में मातृकाओं के जन्म
का वर्णन अन्धकासुर वध के प्रसंग में किया
गया है।
मातृकाओं की संख्याएं ग्रन्थों में समान नही
मिलतीं । उनकी संख्या कही सात, कहीं अट्ठारह
तथा कहीं बत्तीस बताई गयी हैं । महाभारत शल्य
पर्व में कार्तिकेय किंवा स्कन्द की अनुचरो मातृकाओ
की नामावली दी गयी है । उनकी संख्या बत्तीस
है। उनमें प्रभावती विशालाक्षी आदि के नाम हैं।
सप्त मातृका में, ब्राह्मी, माहेश्वरी, कौमारी,
वाराही, नारसिंही, वैष्णवी एवं ऐन्द्री है । (मार्क०
पु० : ८८:११-२०, ३८) अष्ट मातृका में ब्राह्मी,
माहेश्वरी, चण्डी, वाराही, वैष्णवी, कौमारी, चामुण्डा
एवं चर्चिका हैं। शिशुमातृका में काकी, हलिमा,
रुद्रा, वृहली, आर्या, पलाला एवं मित्रा हैं। (म०
व० २१७०६) चौदह मातृकाओं मे, गौरी, पद्मा,
शची, मेध्या, सावित्री, विजया, जया, देवसेना,
स्वधा, स्वाहा, धृति, पुष्टि, तुष्टि एवं कुलदेवी जो
प्रत्येक कुल के लिये भिन्न-भिन्न होती हैं ।
(गोभिल० स्मृति० १:११-१२) अष्टादश मातृका,
विनता, पूतना, कष्टा, पिशाची, अदिति किंवा
रेवती, मुखमण्डिका, दिति, सुरभि, शकुनी, सरमा,
कद्रू, विलीनगर्भा, करंजनोलया, धात्री, लोहिता-
यनी, आर्या है । महाभारत की इस नामावली में

१८४ राजतरंगिणी

दो मातृकाओं का नाम नहीं दिया गया है। (म०
भा० : २१६:२६-४१)
पहली शताब्दी से मातृका पूजन का स्पष्ट
उल्लेख मिलता है। वराहमिहिर के वृहत्संहिता में
इसका स्पष्ट उल्लेख है। (५८:५६) मृच्छकटिक
नाटक तथा स्कन्दगुप्त के बिहार के शिलालेख में
मातृका पूजन का निर्देश प्राप्त है। चालुक्य एवं
कदंब राजवंश मातृका के उपासक थे। मालवा
के विश्वकर्मन राजा के अमात्य मयूराक्ष ने सन्
४२३ ई० में मातृकाओं का एक मन्दिर निर्माण
कराया था। पश्चिमी एशिया के 'ट्रो' संस्कृति में
प्राचीन काल से मातृका पूजा प्रचलित थी। मोहं-
जोदड़ो तथा हड़प्पा स्थित सिन्धु संस्कृति में मातृका
पूजा प्रचलित थी। इन संस्कृतियों की जो मुद्राएं
प्राप्त हुई हैं उनमें मूर्ति के सम्मुख नर किंवा पशुबलि
के चित्र अंकित हैं।
मातृकाओं की प्रतिमाओ की पूजा समस्त भारत
में प्रचलित थी। इनका स्वरूप, अर्धनग्न, एवं
शिरोभूषण, कण्ठहार, तथा मेखला युक्त प्रदर्शित
किया गया है।
उदयपुर संग्रहालय में मातृकाओं की अनेक
मूर्तियां हैं। उनकी विशेषता यह है कि प्रत्येक
मातृका मूर्ति के साथ एक नवजात शिशु बना रहता
है। यही कारण है कि शिशु के जन्म के प्रथम दिनों
तक मातृ पूजा का विधान मिलता है।
कल्हण ने मातृचक्र का उल्लेख राजतरंगिणी
३३५; ३४८ में दिया है। रा० त० १:३३३ में
देवी चक्र का उल्लेख कल्हण करता है। उसने पुनः
रा० त० १:६६ तथा ५:५५ में मन्दिर के सन्दर्भ
में मातृ चक्र का उल्लेख किया है।
मातृचक्र शिला पर श्रीचक्र तथा रज नौचक्र
तुल्य खोदा जाता है। कश्मीर में अब तक उनकी
पूजा गृहों तथा मन्दिरों में की जाती है। यह
तान्त्रिक पूजा है। शारिका स्थान अर्थात् हरिपर्वत
श्रीनगर में श्रीचक्र की पूजा होती है।

इसी प्रकार ज्वालामुखी चक्रपूजा उपेन अर्थात्
धोवन की चट्टानी पहाड़ी पर होती है। यह स्थान
वीही परगना में है। इस स्थान का विशेष महत्त्व
है। यहाँ लोग बड़ी श्रद्धा भक्ति के साथ पूजा करने
आते हैं।
कश्मीर में तन्त्र आधारित मातृ पूजा के प्रतीक
स्वरूप अत्यन्त प्राचीन काल से प्रचलित हैं। तन्त्र
के अनुसार सप्त मातृका देवी, जीवन एवं मृत्यु के
अनेक रूपों को प्रकट करतो हैं। श्रीनगर के
संग्रहालय में दुर्गा का एक स्वरूप वाराही रूप में
दिया गया है। यह एक युवती की आदम कद
मूर्ति है। परन्तु मुख शुकरी अर्थात् वाराही का
बनाया गया है। अलबरूनी ने सप्त मातृ देवियों के
साथ वाराही का भी उल्लेख किया है।
कश्मीर उपत्यका में आनेवालो दरों को द्वार
कहा गया है। कालान्तर में इसे द्रंग कहने लगे थे।
द्वारो की रक्षा पर कश्मीर के राजा विशेष जोर
देते थे। द्वारदेश के सैनिक अधिकारी को द्वारपति
कहते थे। कश्मीर की स्वतंत्रता की रक्षा इन द्वारों
की सुरक्षा पर आधारित थी।
भारत ने खैबर दर्रे की सुरक्षा का व्यापक
और मजबूत प्रबन्ध नहीं किया था अतएव पश्चि-
मोत्तर सीमान्त से सर्वदा भारत पर आक्रमण होता
रहा। यूनानी, हूण, शक, मुसलमान आदि खैबर
द्वार से भारत मे प्रवेश करते थे। खैबर की सुरक्षा
शिथिल होने के कारण भारत पराधीनता की बेड़ी में
जकड़ गया। अंग्रेजों ने इस बात को प्रारम्भ से ही
समझा था। अतएव लगभग दो तिहाई सेना सीमान्त
पश्चिमोत्तर प्रदेश में लगी रहती थी। खैबर की
मोर्चे बन्दी आधुनिक शैली से किया था।
कश्मीर के राजा अत्यन्त प्राचीन काल से द्रंग
इस महत्त्व को समझते हैं। द्वारो की सुरक्षा का
विशेष ध्यान रखा जाना था। द्वारपति का स्थान
सेनापति तुल्य होता था। उन्हें द्वाराधिपति, द्वारेश
तथा द्वाराधिकारी कहा जाता था। यह पद अत्यन्त

प्रथमं तरंग १८३
श्रुतनन्दिपुराणः स व्यासान्तेवासिनो नृपः ।
सेवनं सोदरादीनां नन्दीशस्पर्धया व्यधात् ॥ १२३ ॥
१२३. वह नृप व्यास¹ के एक अन्तेवासी² से नन्दी पुराण³ सुनकर सोदर⁴ तथा अन्य
स्थानों की तीर्थयात्रा करने लगा जैसे नन्दीश⁵ से स्पर्धा करता था ।

महत्त्वपूर्ण सामरिक पद कश्मीर में माना जाता
था । इन द्वारो पर सैनिक चौकियां होती थी । बारह-
मूला के अधोभाग अर्थात् वितस्ता के संकीर्ण गह्वरो
में इस प्रकार के द्वार थे । अलबेरूनी ने उनके
वर्णन के प्रसंग में उनको संज्ञा द्वार से ही दी है । हुएन
त्सांग और ओ कुंग चीनी पर्यटकों ने भी उनका
उल्लेख किया है । उन्हे कालान्तर में द्रंग के साथ-साथ
द्वक भी कहा जाने लगा था । ईशान देवी ने द्वारो
पर मातृचक्र की स्थापना कर उसे दैवी शक्ति से
भी समन्वित किया । उसे एक धार्मिक रूप दिया ।
द्वार पर नियुक्त सेना तथा अधिकारियों में विश्वास
उत्पन्न किया कि दैवी शक्ति द्वार की सुरक्षा करने मे
उनके अनुकूल तथा सहायक है ।

कश्मीर के प्रदेशो में भी मातृचक्रो की स्थापना
दानो ईशान देवी ने इसी दृष्टि से करायी । प्रदेश
राज्य के अवयव है । उनमे विद्रोह न हो, आततायी
शान्त रहें एतदर्थ यहाँ मातृचक्र की शक्ति स्थानीय
राज अधिकारियों को बल देते रहे यही मन्तव्य
मालूम होता है । महाराष्ट्र तथा मेवाड़ में मैंने
सैनिक महत्त्व के स्थानों पर हनुमान एवं दुर्गा की
की मूर्तियाँ प्रायः स्थापित देखी हैं ।

द्वार शब्द कश्मीर मे दरों के लिये प्रयुक्त होता
रहा है । यद्यपि दरों के लिए संस्कृत में संकट शब्द
भी आता है । प्रदेश शब्द भी महत्वपूर्ण है । आजादी
के पश्चात् सूबो अर्थात् प्रान्तो के लिए प्रदेश शब्द
का व्यवहार भारत में किया जाने लगा था । परन्तु
प्रदेश शब्द बदलकर उसके स्थान पर अमेरिका की
संघ शासन प्रणाली के आधार पर उन्हें 'राज'
कहा जाने लगा है । प्राचीन काल में 'राज केवल
एक होता था । उसके अंगो को प्रदेश कहते थे ।

१२३ (१) व्यास : इस शब्द का अर्थ विस्तार,
विश्लेषण, कथावाचक तथा पुराणों की कथा कहने
वाला होता है । कल्हण यहाँ किसी का नाम नही
देता । महाभारतकार वेदव्यास का भी नाम नहीं
देता । जो पराशर के औरस तथा सत्यवती के गर्भ
से उत्पन्न हुए थे । वह वैदिक संहिताओं के पृथक्करण
कर्ता, वैदिकशास्त्र प्रर्वतकों के आद्य आचार्य, ब्रह्म-
सूत्रो के प्रणेयता महाभारत पुराणादि ग्रन्थो के रचना-
कार थे । वे वैदिक संस्कृति के पुनरुज्जीवक तत्त्वज्ञ,
सर्वज्ञ, सत्यवादी सांख्य, योगधर्मादि शास्त्रों के
ज्ञाता एवं दिव्यदृष्टिशालो थे ।

उनमे असामान्य प्रतिभा, क्रांतदर्शी द्रष्टापन,
जीवन सम्बन्धी विरागी दृष्टिकोण, अगाध विद्वत्ता, एवं
अप्रतिम संगठन कौशल्य, इन समस्त गुणोयुक्त व्यास
तुल्य मूर्तिमंत संस्कार प्रतिमा प्राचीन भारतीय साहित्य
जगत् मे क्वचित् ही मिल सकेगी । उन्हे बुद्ध साहित्य
मे केवल ऋषि ही नही देवता स्वरूप माना गया है ।
वायु, (१ : ४२-४३) कूर्म (१. ३० : ६६) गरुड़
(१ : ८७ : ५०), पुराणों मे व्यास को विष्णु का
अवतार माना गया है । इनको शिव का अवतार कूर्म
(२.११:१३६) तथा ब्रह्मा का अवतार वायु (७७,७४
-७५) ब्रह्माण्ड (३:१३:८६) पुराणो में माना गया
है । लिंग पुराण (२:४९:१७) में ब्रह्मा के पुत्र का
अवतार व्यास को माना गया है । धर्मराज युधिष्ठिर
ने महाभारत में ( आश्रः ८७ ) मे व्यास को भगवान्
की उपाधि दी है ।

वैदिक संहिता साहित्य मे व्यास का निर्देश नहीं
मिलता । सामविधान । ब्राह्मण ( १:४:३७७ )
में इनका पैतृक नाम 'पारशर्य' दिया गया है । बौद्ध
साहित्य में भगवान् बुद्ध के पूर्व जन्मो में एक जन्म
'कण्हदीपायन' अर्थात् कृष्ण द्वैपायन् दिया गया है ।

१८४ राजतरंगिणी
आज से २५०० वर्ष पूर्व स्पष्ट प्रतीत होता है कि कृष्ण
द्वैपायन नाम प्रसिद्ध हो चुका था। कृष्ण द्वैपायन नाम
पड़ने का कारण था। यह यमुना द्वीप में जन्म ग्रहण
किये थे अतएव द्वैपायन नाम इनका पड़ा था। (म.
आ० ५४:२) इनकी माता कैवर्तराज की कन्या
सत्यवती थी। उसका नाम काली था। इसलिये इन्हें
कृष्ण कहा गया है। एकमत है कि इनका वर्ण कृष्ण
अर्थात् काला था। अतएव कृष्ण द्वैपायन नाम
पड़ गया था। यमुना द्वीप कोई देश विशेष नहीं
मानना चाहिए। नदियों में द्वीप बन जाते हैं। दो
धारायें बनकर बहने लगती है। द्वीप पर आबादी हो
जाती है। दिल्ली में जमुना की दो धारायें वर्षा में
स्पष्ट दिखाई पड़ती हैं। मध्य में द्वीप बना रहता है।
उस पर कैवर्त अर्थात् धीवर या माझी किंवा कृषक
झोपड़ी अथवा कच्चा मकान बनाकर रहने लगते हैं।
व्यास का जन्म वैशाख पूर्णिमा को हुआ था।
इनके पुत्र शुकदेव जी थे। शुकदेव को इन्होंने सृष्टि
क्रम, युगधर्म, ब्राह्म प्रलय, महाप्रलय, मोक्षधर्म एवं
क्रिया फलादि का उपदेश दिया था। व्यास की वंश
परम्परा इनके पुत्र शुकदेव जी के कारण चली थी।
शुक का विवाह पीवरी से हुआ था। उन्हें भूरिश्रवस,
प्रभु, शम्भु, कृष्ण एवं गौर नाम के पाँच पुत्र तथा
कीर्तिमती नामक एक कन्या हुई थी। विष्णु पुराण
में २८ व्यासों का उल्लेख मिलता है।
व्यास की वैदिक शिष्य परम्परा है। प्रत्येक वेद
तथा उसकी शाखाओं की शिष्य परम्परा है। इसी
प्रकार व्यास की पुराण शिष्य परम्परा है। प्रतीत होता
है कि व्यास की इस शिष्य परम्परा में कोई
अन्तेवासी था।
व्यास शब्द कालान्तर में प्रायः सभी कथा-
वाचकों के लिये प्रयुक्त होने लगा। आज व्यास शब्द
से इन्हीं का बोध होता है। व्यास की वंश परम्परा
किंवा शिष्य परम्परा में जो लोग रहे होंगे उन्हें व्यास
कहा जाता रहा होगा। कल्हण यहाँ 'व्यास' पद रूप
में व्यवहृत किया है। वह आद्य व्यास नहीं बल्कि
उनकी वंश किंवा पुराण शिष्य परम्परा में कोई
व्यक्ति रहा होगा। पुराण का पारंगत तत्कालीन
व्यास के किसी अन्तेवासी अथवा शिष्य से राजा ने
नन्दिपुराण सुना होगा। व्यास की कोई गद्दी अथवा
पीठ कश्मीर में उस समय रही होगी। वहाँ अन्तेवासी
किंवा शिष्य रहकर पुराण का अध्ययन तथा अध्यापन
करते रहे होंगे। उन्हीं में से किसी एक प्रमुख से
राजा ने नन्दीपुराण सुना था।
(२) अन्तेवासी : अन्तेवासी का अर्थ समीप
रहने वाला शिष्य होता है। यह शब्द उस शिष्य
के लिये व्यवहार किया जाता है जो शिक्षक किंवा
व्यास के समीप निवास कर अथवा उसके आश्रम,
पीठ एवं शाला में रहकर विद्याध्ययन करता है।
(३) नन्दी पुराण . महापुराण किंवा पुराण,
उपपुराण और उपोपपुराण तीन वर्गों में पुराण
साहित्य का वर्गीकरण किया गया है। मत्स्य पुराण
में पुराणों को गुण के अनुसार सात्विक, राजसिक एवं
तामसिक पुनः तीन वर्गों में वर्गीकृत किया गया
है। विष्णु ब्रह्मा एवं अग्नि-शिव की उपासना
प्रतिपादित करने वाले पुराणों को क्रम से सात्विक,
राजसिक एवं तामसिक कहा गया है। सरस्वती
एवं पितरों का माहात्म्य कथन करने वाले पुराणों
को संकीर्ण कहा गया है। (मत्स्य ५३:६८-६९)
पद्म एवं भविष्य पुराणों में भी सात्विक, राजसिक,
तामसिकादि के प्रकार दिये गये हैं। किन्तु यहाँ
उनका वर्गीकरण और प्रकार से किया गया है।
(पद्मः उ० २६३:८१-८५ भविष्य : ३:२८:१०-१५)
पुराणों की श्लोक संख्या में एकवाक्यता नही
है। प्रत्येक पुराण के वक्ता, देवता, गुण तथा
प्रसंग एवं स्थल भिन्न-भिन्न हैं। लगभग ११ पुराणों
का प्रसंग एवं स्थल नैमिषारण्य है। नृसिंह, भागवत
के विष्णु एवं देवी, वायु तथा शिव पुराणों को
महापुराण मानने में एकवाक्यता नहीं है।
उपपुराणों की संख्या भी १८ कही जाती है।
किन्तु उनकी नामावली में मतैक्य नही है। शिव

प्रथम तरंग १८५
उपासना के पुराण (१) कूर्म, (२) ब्रह्माण्ड,
(३) भविष्य, (४) मत्स्य, (५) मार्कण्डेय, (६) लिंग,
(७) वराह, (८) वामन, (९) शिव तथा (१०)
स्कन्द है। विष्णु उपासना के पुराण (१) गरुड,
(२) नारद, (३) भागवत, (४) विष्णु है। ब्रह्मा की
उपासना के पुराण (१) पद्म तथा (२) ब्रह्म है।
अग्नि उपासना का पुराण एक मात्र अग्नि पुराण है।
सवितृ उपासना का पुराण ब्रह्मवैवर्त है।
पुराणों के उपपुराण होते हैं। नन्दिपुराण
उपपुराण है। यह शिव उपासना का पुराण है।
नन्दिक्षेत्र कश्मीर का पवित्र स्थान है। वही
भूतेश्वरादि का स्थान है। हरमुकुट पर्वत है।
अतएव राजा जलोक ने नन्दिपुराण व्यास के
अन्तेवासी से सुना था। उससे प्रभावित होने के
कारण वह शैव मत की ओर झुक गया था।
(४) सोदर : नीलमत पुराण सोदर तीर्थ का
वर्णन करता है।
सोदरस्य च नागस्य स्नानं कृत्वा विधानतः।
गत्वा च शीघ्रं सद्भि तथैवोत्तरमानसम् ॥
१३१४
तत्रापि विधिवत् स्नानं विधाय दृढनिश्चयात् ।
सुखं प्राप्तो महाभाग तत्र रंस्यसि पुत्रक ॥
१३१५
तस्माद्देशात्तथा याति दक्षिणेन महानदी ।
हिरण्याभाम्वसा पूर्णा नाम्ना कनकवाहिनी ॥
१३१३
सोदर तीर्थ को इस समय नारननाग कहते
हैं। यह भूतेश्वर के ध्वंसावशेष के समीप पर्वत
मूल में है। कश्मीर का यह महत्त्वपूर्ण तीर्थ स्थान
है। यह एक जलस्रोत है। छोटे आयताकार कुण्ड
किंवा सरोवर में यह जल एकत्रित होकर बहता
रहता है। इसके समीप भूतेश्वर टिप्पणी में वर्णित
दो मन्दिर समूह है। श्री स्टीन ने यहाँ की यात्रा
की थी। उनके यात्रा काल में सभी मन्दिर अत्यन्त
२४
भग्न एवं उपेक्षित थे। किसी में न तो स्टीन
के समय शिवलिंग अथवा प्रतिमाएँ थीं और जब
मैं वहाँ गया था उस समय भी। और न आज है।
मन्दिरों का निर्माण काल भिन्न-भिन्न रहा है। मन्दिर
विमान शैली के हैं। यहाँ के एक मन्दिर में केवल
दो द्वार है। यह मन्दिर २५ वर्ग फिट में है। निर्माण
में चूने का प्रयोग किया गया है। श्री स्टीन का
मत है कि बड़ा मन्दिर ही ज्येष्ठेश का मन्दिर है।
सोदर तीर्थ का वर्णन नन्दिक्षेत्र माहात्म्य में
मिलता है। भूतेश्वर, ज्येष्ठेश्वर तथा नन्दिक्षेत्र की
तीर्थ यात्रा करने वालों के लिये यहाँ पिण्ड दान देने
का विधान है। कनकवाहिनी के संगम के प्रसग में
कल्हण ने पुनः वर्णन किया है। (रा० त० २:१६९)
नन्दि क्षेत्र एवं नन्दीश क्षेत्र के अन्तर्गत नन्दिक्षेत्र
माहात्म्य वर्णित सभी स्थान आ जाते है। वे हरमुकुट
सरोवर से भूतेश्वर के मध्य तक स्थित है।
राजा जशोक नगर में ज्येष्ठरुद्र की स्थापना
की थी। आदि ज्येष्ठरुद्र के स्थान के समीप नारन
नाग का जलस्रोत है। नारन नाग किंवा सोदर तीर्थ
का अवतरण श्रीनगर में राजा की सुविधा के लिये
हुआ था। अतएव नवीन सोदर तीर्थ श्रीनगर के
समीप होना चाहिए।
यह सोदर तीर्थ श्रीनगर समीपस्थ स्थित सुदर
है। डल लेक का एक भाग सुदर खुन कहा जाता
है। इसके समीप सुदरबल ग्राम है। खुन शब्द
संस्कृत शब्द कोण का अपभ्रंश है। सुदर खुन एक
संकीर्ण जल निकलने का स्थान है। डल के पश्चिम
तरफ है। यह आदमपुर तथा सुदरबल ग्रामों के
मध्य स्थित है। यह डल लेक का सबसे गहरा
स्थान है।
श्री स्टीन सन् १८८५ ई० में इस स्थान पर
आये थे। उन्हें सुदर खुन ग्राम के छोरपर गाँव की
मसजिद के समीप २ कुण्ड मिले थे। वे डल लेक
के जल से भरे थे। ग्रामीणों ने उन्हें बताया था।
उन कुण्डो में निरन्तर बहने वाले जलस्रोत थे।

१८४ राजतरंगिणी

आज से २५०० वर्ष पूर्व स्पष्ट प्रतीत होता है कि कृष्ण
द्वैपायन नाम प्रसिद्ध हो चुका था । कृष्ण द्वैपायन नाम
पड़ने का कारण था। यह यमुना द्वीप में जन्म ग्रहण
किये थे अतएव द्वैपायन नाम इनका पड़ा था । ( म.
आ० ५४:२) इनकी माता कैवर्तराज की कन्या
सत्यवती थी । उसका नाम काली था । इसलिये इन्हें
कृष्ण कहा गया है । एकमत है कि इनका वर्ण कृष्ण
अर्थात् काला था । अतएव कृष्ण द्वैपायन नाम
पड़ गया था । यमुना द्वीप कोई देश विशेष नही
मानना चाहिए। नदियो मे द्वीप बन जाते है । दो
धारायें बनकर बहने लगती है । द्वीप पर आबादी हो
जाती है । दिल्ली में जमुना की दो धारायें वर्षा में
स्पष्ट दिखाई पड़ती हैं । मध्य में द्वीप बना रहता है ।
उस पर कैवर्त अर्थात् धीवर या माझी किंवा कृषक
झोपड़ी अथवा कच्चा मकान बनाकर रहने लगते है ।

व्यास का जन्म वैशाख पूर्णिमा को हुआ था ।
इनके पुत्र शुकदेव जी थे । शुकदेव को इन्होने सृष्टि
क्रम, युगधर्म, ब्राह्य प्रलय, महाप्रलय, मोक्षधर्म एवं
क्रिया फलादि का उपदेश दिया था । व्यास की वंश
परम्परा इनके पुत्र शुकदेव जी के कारण चली थी ।
शुक का विवाह पीवरी से हुआ था । उन्हें भूरिश्रवस,
प्रभु, शम्भु, कृष्ण एवं गौर नाम के पांच पुत्र तथा
कीर्तिमती नामक एक कन्या हुई थी । विष्णु पुराण
में २८ व्यासों का उल्लेख मिलता है ।

व्यास की वैदिक शिष्य परम्परा है । प्रत्येक वेद
तथा उसकी शाखाओ की शिष्य परम्परा है । इसी
प्रकार व्यास की पुराण शिष्य परम्परा है । प्रतीत होता
है कि व्यास को इस शिष्य परम्परा में कोई
अन्तेवासी था ।

व्यास शब्द कालान्तर में प्रायः सभी कथा-
वाचकों के लिये प्रयुक्त होने लगा । आज व्यास शब्द
से इन्हीं का बोध होता है । व्यास की वंश परम्परा
किंवा शिष्य परम्परा में जो लोग रहे होगे उन्हें व्यास
कहा जाता रहा होगा । कल्हण यहाँ 'व्यास' पद रूप
में व्यवहृत किया है । वह आद्य व्यास नहीं बल्कि
उनकी वंश किंवा पुराण शिष्य परम्परा में कोई
व्यक्ति रहा होगा । पुराण का पारंगत तत्कालीन
व्यास के किसी अन्तेवासी अथवा शिष्य से राजा ने
नन्दिपुराण सुना होगा । व्यास की कोई गद्दी अथवा
पीठ कश्मीर में उस समय रही होगी । वहाँ अन्तेवासी
किंवा शिष्य रहकर पुराण का अध्ययन तथा अध्यापन
करते रहे होंगे । उन्ही में से किसी एक प्रमुख से
राजा ने नन्दीपुराण सुना था ।

(२) अन्तेवासी : अन्तेवासी का अर्थ समीप
रहने वाला शिष्य होता है । यह शब्द उस शिष्य
के लिये व्यवहार किया जाता है जो शिक्षक किंवा
व्यास के समीप निवास कर अथवा उसके आश्रम,
पीठ एवं शाला में रहकर विद्याध्ययन करता है ।

(३) नन्दी पुराण : महापुराण किंवा पुराण,
उपपुराण और उपोपपुराण तीन वर्गों में पुराण
साहित्य का वर्गीकरण किया गया है । मत्स्य पुराण
में पुराणो को गुण के अनुसार सात्त्विक, राजसिक एवं
तामसिक पुनः तीन वर्गों में वर्गीकृत किया गया
है । विष्णु ब्रह्मा एवं अग्नि-शिव की उपासना
प्रतिपादित करने वाले पुराणों को क्रम से सात्त्विक,
राजसिक एवं तामसिक कहा गया है । सरस्वती
एवं पितरो का माहात्म्य कथन करने वाले पुराणों
को संकीर्ण कहा गया है । ( मत्स्य ५३:६८-६९ )
पद्म एवं भविष्य पुराणो में भी सात्त्विक, राजसिक
तामसिकादि के प्रकार दिये गये है । किन्तु यहाँ
उनका वर्गीकरण और प्रकार से किया गया है ।
(पद्म : उ० २६३:८१-८५ भविष्य : ३:२८:१०-१५)

पुराणो की श्लोक संख्या में एकवाक्यता नही
है । प्रत्येक पुराण के वक्ता, देवता, गुण तथा
प्रसंग एवं स्थल भिन्न-भिन्न है । लगभग ११ पुराणो
का प्रसंग एवं स्थल नैमिषारण्य है । नृसिंह, भागवत
के विष्णु एवं देवी, वायु तथा शिव पुराणों को
महापुराण मानने मे एकवाक्यता नहीं है ।

उपपुराणो की संख्या भी १८ कही जाती है ।
किन्तु उनकी नामावली में मतैक्य नहीं है । शिव

प्रथम तरंग
१८५


उपासना के पुराण (१) कूर्म, (२) ब्रह्माण्ड,
(३) भविष्य, (४) मत्स्य, (५) मार्कण्डेय, (६) लिङ्ग,
(७) वराह, (८) वामन, (९) शिव तथा (१०)
स्कन्द हैं । विष्णु उपासना के पुराण (१) गरुड़,
(२) नारद, (३) भागवत, (४) विष्णु हैं । ब्रह्मा की
उपासना के पुराण (१) पद्म तथा (२) ब्रह्म हैं ।
अग्नि उपासना का पुराण एक मात्र अग्नि पुराण है ।
सवितृ उपासना का पुराण ब्रह्मवैवर्त है ।
पुराणों के उपपुराण होते हैं । नन्दिपुराण
उपपुराण है । यह शिव उपासना का पुराण हैं ।
नन्दिक्षेत्र कश्मीर का पवित्र स्थान है। वहो
भूतेश्वरादि का स्थान है । हरमुकुट पर्वत है ।
अतएव राजा जलोक ने नन्दिपुराण व्यास के
अन्तेवासी से सुना था । उससे प्रभावित होने के
कारण वह शैव मत की ओर झुक गया था ।
(४) सोदर : नीलमत पुराण सोदर तीर्थ का
वर्णन करता है ।
सोदरस्य च नागस्य स्नानं कृत्वा विधानतः ।
गत्वा च शीघ्रं सङ्गम तथैवोत्तरमानसम् ॥
१३१४
तत्रापि विधिवत् स्नानं विधाय दृढ़निश्चयान् ।
सुरतं प्राप्सो महाभाग तत्र रंस्यसि पुत्रक ॥
१३१५
तस्माद्देशात्तथा याति दक्षिणेन महानदी ।
हिरण्याभाम्भसा पूर्णा नाम्ना कनकवाहिनी ॥
१३१३
सोदर तीर्थ को इस समय नारननाग कहते
हैं। यह भूतेश्वर के ध्वंसावशेष के समीप पर्वत
मूल में है । कश्मीर का यह महत्वपूर्ण तीर्थ स्थान
है । यह एक जलस्रोत है। छोटे आयताकार कुण्ड
किंवा सरोवर में यह जल एकत्रित होकर बहता
रहता है । इसके समीप भूतेश्वर टिप्पणी में वर्णित
दो मन्दिर समूह हैं। श्री स्टीन ने यहाँ की यात्रा
की थी। उनके यात्रा काल में सभी मन्दिर अत्यन्त
२४


भग्न एवं उपेक्षित थे । किसो में न तो स्टीन
के समय शिवलिंग अथवा प्रतिमाएं थी और जब
मैं वहाँ गया था उस समय भी । ओर न आज हैं ।
मन्दिरों का निर्माण काल भिन्न-भिन्न रहा है । मन्दिर
विमान शैली के है। यहाँ के एक मन्दिर में केवल
दो द्वार है । यह मन्दिर २५ वर्ग फिट में है। निर्माण
में चूने का प्रयोग किया गया है । श्री स्टीन का
मत है कि बड़ा मन्दिर ही ज्येष्ठेश का मन्दिर है ।
सोदर तीर्थ का वर्णन नन्दिक्षेत्र माहात्म्य में
मिलता है । भूतेश्वर, ज्येष्ठेश्वर तथा नन्दिक्षेत्र की
तीर्थ यात्रा करने वालों के लिये यहाँ पिण्ड दान देने
का विधान है। कनकवाहिनी के संगम के प्रसंग में
कल्हण ने पुनः वर्णन किया है । (रा० त० २:१६९)
नन्दि क्षेत्र एवं नन्दोश क्षेत्र के अन्तर्गत नन्दिक्षेत्र
माहात्म्य वर्णित सभी स्थान आ जाते हैं । वे हरमुकुट
सरोवर से भूतेश्वर के मध्य तक स्थित है ।
राजा जलोक नगर में ज्येष्ठरुद्र की स्थापना
की थी । आदि ज्येष्ठरुद्र के स्थान के समीप नारन
नाग का जलस्रोत है । नारन नाग किंवा सोदर तीर्थ
का अवतरण श्रीनगर में राजा की सुविधा के लिये
हुआ था। अतएव नवीन सोदर तीर्थ श्रीनगर के
समीप होना चाहिए ।
यह सोदर तीर्थ श्रीनगर समीपस्थ स्थित सुदर
है । डल लेक का एक भाग सुदर खुन कहा जाता
है। इसके समीप सुदरवल ग्राम है । खुन शब्द
संस्कृत शब्द कोण का अपभ्रंश है। सुदर खुन एक
संकीर्ण जल निकलने का स्थान है। डल के पश्चिम
तरफ है। यह आदमपुर तथा सुदरबल ग्रामो के
मध्य स्थित है । यह डल लेक का सबसे गहरा
स्थान है ।
श्री स्टीन सन् १८८५ ई० में इस स्थान पर
आये थे । उन्हें सुदर खुन ग्राम के छोरपर गाँव की
मसजिद के समीप २ कुण्ड मिले थे । वे डल लेक
के जल से भरे थे । ग्रामीणो ने उन्हें बताया था ।
उन कुण्डों में निरन्तर बहने वाले जलस्रोत थे ।