राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
४६२ तृतीय तरंग
स मेघवननामानमग्रहारं विनिर्ममे ।
मयुष्टग्रामकृत्पुण्यज्येष्ठं मेघमठं तथा ॥ ८ ॥
८. मयुष्टग्राम निर्माता, उसने मेघवन नामक अग्रहार एवं पुण्य में अग्रणी मेघमठ१
का निर्माण किया (कराया)।
भोगाय देश्यभिक्षूणां वल्लभाऽस्याऽमृतप्रभा ।
विहारमुच्चैरमृतभवनाख्यमकारयत् ॥ ९ ॥
९. उसकी प्रियतमा अमृतप्रभा ने देशीय१ भिक्षुओं के भोग हेतु अमृत भवन२
नामक उच्च विहार बनवाया।
पाठभेद :
श्लोक संख्या ८ में 'मयुष्ट' का 'सयुष्ट' 'ज्येष्ठं
का 'ज्येष्ठो' और 'तथा' का पाठभेद 'तदा'
मिलता है।
पादटिप्पणियाँ :
८ (१) मयुष्ट, मेघवन, मेघमठ : इन
तीनों स्थानो का निश्चित पता नहीं चलता। उक्त
तीनों स्थानो का उल्लेख पुनः नहीं मिलता।
पाठभेद :
श्लोक संख्या ९ में 'देश्य' का पाठभेद 'चैत्य'
मिलता है।
पादटिप्पणियाँ :
९ (१) देशीय : राजतरंगिणी में कश्मीर
मण्डल के बाहर के रहने वालो के लिये देश्य,
दैशिक, दैशिका, शब्दों का व्यवहार किया गया है।
दैशिक : देशीय भिक्षु भी इसी अर्थ में प्रयुक्त
किया गया है। कश्मीरी भिक्षुओं के लिये देशीय
शब्द का प्रयोग नहीं किया गया है। यह गैर
कश्मीरी भिक्षुओं के लिये व्यवहृत किया गया है।
जोन राज ने श्रीकण्ठ चरित का ग्रंथ के भाष्य में
(१५:१०२) उल्लेख किया है।
(२) अमृत भवन : इसका पाली एवं
प्राकृत नाम अपभ्रंश होकर वर्तमान बिगड़ा नाम
अमित भवन था आमित भवन हो गया था। इसका
वर्तमान बिगडा अन्त भवन अन्त भवन अथवा
अन्तभवन है। यह श्रीनगर से तीन मील दूर उत्तर
दिशा में विचार नाग के समीप है।
श्री स्टीन ने इस स्थान की यात्रा जून सन्
१८९५ ई० में की थी। वहाँ पर उन्हें एक खुले
मैदान और लक्षम कुल (लक्ष्मी कुल्या) के मध्य
एक ध्वन्सावेषोप स्थान मिला था। यह अमृत
भवन विहार का अवशेष था। एक ठोस गोलाकार
टीला लगभग २० फिट ऊँचा था। उसकी बनावट
स्तूप से मिलती थी। एक आयताकार शिलाखण्ड
से टूटा घिरा स्थान भी वहाँ था। यहाँ से ३० गज
के अन्तर पर पूर्व तरफ सरोवर जैसा छिछला
कुण्ड प्राचीन शिलाबण्डीय प्राकार से घिरा है।
वहाँ के स्थानीय निवासी कहते हैं कि महाराज के
राज्य काल में मन्दिर तथा भवन बनवाने के लिये
यहाँ के शिलाखण्ड उठवा लिये गये थे। ग्राम के
अनेक मकानों में यहाँ के अलंकृत पत्थरो का उपयोग
किया गया है।
चीनी पर्यटक ओ कुग ने इस विहार का
वर्णन "ओमितियो वान" विहार नाम से किया है।
विचार नाग तथा श्रीनगर के मध्य मन्दिरो तथा
विहारों की श्रृंखला थी। उन्हें ज़ियारत तथा
इमारतों में परिणत कर लिया गया है।
राजतरंगिणी ४६३
देशैकदेशाल्लोर्नाम्नः प्राप्तस्तस्याः पितुर्गुरुः ।
स्तुन्पा तद्भाषया प्रोक्तो लोस्तोन्पास्तूपकार्यभूत् ॥ १० ॥
१०. देश के एकदेश ( भाग ) जिसका नाम लोह¹ था, उसके पितृ गुरु, जिन्हें
उनकी भाषा में स्तुन्पा² कहते थे, आये और स्तूप लोस्तोन्पा बनवाया ।
चक्रे नडवने राज्ञो यूकदेव्यभिधा वधूः ।
विहारमद्भुताकारं सपत्नोस्पर्धयोग्यता ॥ ११ ॥
११. राजा की यूक देवी नाम्नी वधू ने सपत्नी की स्पर्धा से नडवन¹ में अद्भुत
आकार वाला भवन निर्माण कराया ।
पाठभेद :
श्लोक संख्या १० में 'देशैक' का 'देशक';
'स्तुन्पा' का 'स्तुत्या' 'स्तुम्पा' 'स्तन्पा' का 'लोस्तोन्पा'
का 'लोस्तोन्था' 'लोस्तुन्व' और 'र्यंभूत्' का पाठभेद
'र्यकृत्' मिलता है ।
पादटिप्पणियाँ :
१० ( १ ) लोह : वर्त्तमान लेह अंचल है ।
महाभारत में उत्तर दिशा के विजय में अर्जुन ने
इसे जीता था ।
( २ ) स्तोन्पा : यह शब्द तिब्बती स्तोन-
पा है । इसका मूल संस्कृत शाष्टा किंवा उपदेश है ।
तिब्बत में इसका शाब्दिक अर्थ उपदेशक अथवा
शिक्षक होता है । यह शब्द बुद्ध के लिये प्रयुक्त
किया जाता है ।
लद्दाख में इसका उच्चारण तोन्पा किया जाता
है । तिब्बत के नगर लासा में लोम वा कहते हैं ।
दक्षिणी तिब्बत को अब भी लोह कहते हैं ।
अमृतप्रभा प्राग्ज्योतिष के राजा की कन्या थी ।
उसके गुरु अल्लोर थे । वह तिब्बत के थे । इससे
दो बातें प्रकट होती हैं । प्रथम तिब्बत तथा आसाम
का घनिष्ठ सम्बन्ध प्रकट होता है । दूसरी बात
यह प्रकट होती है कि बुद्ध धर्म का प्रचार उस
समय तक सामाम में हो गया था ।
रानी अमृतप्रभा का गुरु बौद्ध था । पिता
तथा कन्या दोनों का बुद्ध तथा बौद्ध धर्म की ओर
झुकाव होना स्वाभाविक था ।
राजा मेघवाहन पर रानी अमृतप्रभा के
कारण बौद्ध धर्म का प्रभाव पड़ा होगा । राजा की
प्रवृत्ति अहिंसक हो गयी ।
लोह, लोहर, लोह कोट, तीनों स्थान भिन्न-
भिन्न हैं। उनका यथा स्थान वर्णन किया गया है।
पाठभेद :
श्लोक संख्या ११ में 'यूक' का पाठभेद 'मूष'
दिया गया है ।
पादटिप्पणियाँ :
११ (१) नडवन : यह वर्त्तमान नरवोर स्थान
है। श्रीनगर के उत्तर-पश्चिम संगीन दरवाजा
तथा ईदगाह के बीच स्थित है। इसका एक पुरातन
नाम नाद्रवाट था । वाट शब्द महत्वपूर्ण है।
थाईलैंड, कम्बोडिया आदि स्थानों में वाट का
अर्थ बौद्ध विहार होता है। वाट का अर्थ बाग
भी होता है। वाटिका शब्द उपवन के लिये आज
भी प्रचलित है। वोर शब्द इसी वाट एवं वाटिका
का अपभ्रंश है। कश्मीर के स्थानीय नामों के अन्त में
'वोर' शब्द प्रायः मिलता है। भू ओर वाटिका, (रा.
त. १:३४२) राजन वाटिका (रा. त. ८: ७५६) तथा
रंग वाटिका (रा. त. ७:१६५३) प्रचलित शब्द थे ।
४६४ तृतीय तरंग
अर्धे यद्भिक्षवः शिष्टाचारारतस्तत्राऽर्पितास्तया ।
अर्धे गार्हस्थ्यगर्ह्याश्च सस्त्रीपुत्रपशुश्रियः ॥ १२ ॥
१२. वहाँ अर्ध भाग में शिष्टाचार¹ रत भिक्षुओं² तथा अर्ध (अपरार्ध) भाग में
स्त्री पुत्र पशु धन वाले गर्ह्य गृहस्थों के लिये व्यवस्था की ।
नरबोर के कब्रिस्तान तथा ज़ियाराते कश्मीर
के अन्य कब्रिस्तानों के और ज़ियारातों के समान
प्राचीन भवनों के ध्वंसावशेषों से पूर्ण है । भूमि
के अन्दर कितने अलंकृत शिला खण्ड एवं मूर्तियाँ
होंगी कौन जाने भूमि की सतह से प्राप्त शिलाओं
आदि के देखने से वास्तविक अनुमान लगाना
कठिन है ।
पाठभेद :
श्लोक संख्या १२ में 'यद्भिक्ष' का 'यद्विप्र' तथा
'श्रियः' का 'स्त्रियः' पाठभेद मिलता है ।
पादटिप्पणियाँ :
१२ (१) शिष्टाचार : बौद्ध धर्मावलम्बियों
में एक प्रव्रज्या लेने वाले चीवरधारी भिक्षु होते हैं।
दूसरे गृहस्थ उपासक होते हैं । भिक्षु गृह त्यागी
होता है । गृहस्थ सकुदुम्ब भगवान् का उपासक
मात्र होता है । वह घर त्यागता नहीं ।
कल्हण दोनों प्रकार के बुद्ध धर्मावलम्बियों
की व्यवस्था का उल्लेख करता है । गृहस्थ भी
कुछ समय के लिये भिक्षु होकर विहार में निवास
करते हैं । बौद्ध देशों में प्रत्येक व्यक्ति को
कम से कम तीन
नेपाल में विवाहित भिक्षु जन साधारण की
तरह कार्य करते हैं । व्यापार करते हैं । खेती
करते हैं । प्रायः बुद्ध धर्म के कठोर शासन का
व्यवहार नहीं करते ।
प्रतीत होता है । उस समय कश्मीर में इस
प्रकार के भिक्षुओं की परम्परा तथा वर्ग रहा होगा ।
अतएव रानी ने दोनों प्रकार के भिक्षुओं के लिये
व्यवस्था की थी ।
(२) भिक्षु : इस शब्द का शाब्दिक अर्थ भिक्षुक
भिखारी होता है । यह शब्द बौद्ध भिक्षुओं के
लिए रूढ हो गया है । अतएव इसका अर्थ बौद्ध
संन्यासी होता है । भिक्षु चर्या अर्थात् भिक्षा वृत्ति
ही भिक्षुओं को जीवन-यापन का एक मात्र साधन
हैं। भिक्षुओं के वस्त्र को संघाटी तथा चीवर कहते
हैं । विशेष द्रष्टव्य हैं रा. त. १:१८४, १८९ पृष्ठ
२५२-२५३,
प्रव्रज्या प्राप्त करने पर भिक्षु श्रामणेर कहा
जाता है । उसे एक उपाध्याय किंवा आचार्य के
निश्चय में रहना होता है । उसके शील में १०
विरतियाँ वर्जनीय हैं—प्राण घात, चोरी, अब्रह्मचर्य,
मिथ्याभाषण, मद एवं नशा विकाल भोजन, नृत्य-
गान-वाद्य, तमाशा माला-गंध-विलेपन-अलंकरण; ऊँची
बहुमूल्य शय्या सुवर्ण रजत ग्रहण ।
भिक्षुओं का चार निश्चय-पिण्डपात, चीवर,
शयनाशन, ग्लान प्रत्यय, भेषज हैं भिक्षु उपोसोष
के लिये प्रति पक्ष एकत्र होते थे । इस अवसर पर
प्रतिमोक्ष का पाठ किया जाता था । प्रतिमोक्ष के
आठ विभाग—पाराजिक, संघावशेष, अनियत,
नैसर्गिंक, पातयंतिक, प्रतिदेशनीय, शैक्ष एवं
अधिकरण दामय हैं । अपराधी भिक्षु अपने व्यतिक्रम
देते हैं । वर्मा
चीवर धारक
देखा है कि
भिक्षु बनकर
गार का निर्वाह
हर्तव्य को दृष्टि
कश्मीरिका
जोन रा० अन्त में
(१५:१०२, टिका, (रा.
(२) अर्द्ध: ७५६) तथा
प्रचलित शब्द थे।
प्राकृत नाम अपभ्र
तृतीय तरंग ४६५
अथेन्द्रदेवीभवनपेन्द्रदेव्यभिधा व्यधात् ।
विहारं सचतुःशालं स्तूपं भूपप्रियाऽपरा ॥ १३ ॥
१३. राजा की अपरा (दूसरी) इन्द्र देवी नाम्नी प्रिया ने इन्द्रदेवी भवन नामक
चतुःशाल युक्त विहार तथा एक स्तूप बनवाया ।
अन्याभिः खादनासम्माप्रमुखाभिर्निजाख्यया ।
देवीभिस्तस्य महिता विहारा बहवः कृताः ॥ १४ ॥
१४. उसकी अन्य खादना १, सम्मा आदि प्रमुख देवियों ने अपने अपने नामों से
अनेकों दिव्य विहारों को बनवाया ।
की आदेशना करते थे, और उन पर उचित प्राय-
श्चित्त एवं दण्ड की व्यवस्था की जाती थी । वर्षा
वास के नियम थे। उसके अनंतर प्रवारणा नामक
पर्व होता था । एकत्रित भिक्षु संघ में एकमत,
उद्ग्राहिका, शलाका ग्रहण, किंवा बहुमत से किसी
निश्चय पर पहुँचा जाता था ।
ईसाई रहते थे । उनके ग्रन्थों के पढ़ने से पता चलता
है कि दासी तथा बहु पत्नी रखने का उनमें आम
रिवाज् था । कुराम शरीफ के पढ़ने से उस समय
की सामाजिक स्थिति का जो ज्ञान प्राप्त होता है
उससे प्रकट होता है कि अनेक विवाह करना तथा
छोडना साधारण बातें थीं। दासी को पत्नीवत्
रखना फैशन था । इन व्याप्त कुरीति को दूर करने के
लिये पैगम्बर मुहम्मद साहब ने विवाहित स्त्री
रखने की सीमा चार कर दी थी । हिन्दुओं में
बहुपत्नी प्रथा वर्जित नहीं थी तथापि एक पत्नी से
अधिक रखना अच्छा नहीं समझा जाता था ।
पादटिप्पणियाँ :
१३ ( १ ) इन्द्रदेवी भवन विहार : इसका
उल्लेख कल्हण ने पुनः भिक्षाचर के संघर्ष के सम्बन्ध
में किया है। (रा. त. ८:११७२ ) यह स्थान
श्रीनगर में होना चाहिए । कयूत अर्थात् काठिला
जिसका उल्लेख कल्हण ने (राः तः ८:११६० ) में
किया है उसके समीप इसकी स्थिति प्रतीत होती है।
( २ ) बहुपत्नी प्रथा : अब तक कश्मीर के
राजा प्रतीत होता है एक पत्नी प्रथा का पालन
करते थे । मेघवाहन पहला राजा है जिसकी ५
पत्नियों का उल्लेख कल्हण करता है ।
मेघवाहन के पश्चात् होने वाले राजाओं की
बहुपत्नियों का उल्लेख मिलने लगता है। बहु पत्नी
प्रथा मैं समझता हूँ मेघवाहन के समय कश्मीर
में प्रचलित हुई और जड़ जमाती चली गयी ।
मैं समझता हूँ यह पश्चिम के शामी अर्थात्
सेमैटिक जाति का प्रभाव था । मेघवाहन गान्धार
तथा अफगानिस्तान में रहा था । अफगानिस्तान
से सीरिया अर्थात् भूमध्य सागर तक यहूदी और
५९
पाठभेद :
श्लोक संख्या १४ में 'सम्मा' का 'मम्मा',
'भस्मा' तथा 'महिता' का पाठभेद 'सहिता
मिलता है।
पादटिप्पणियाँ :
१४ ( १ ) खादना तथा सम्मा : इन दोनो
विहारों के निश्चित स्थान का पता नही मिलता ।
खादन पार स्थान बारहमूला के ४ मिल वितस्ता
के अधोभाग में दक्षिण तट पर इस स्थान की
सम्भावना की जाती है । वितस्ता माहात्म्य में इस
स्थान को 'खादना हार' कहा गया है।
किन्तु सम्मा विहार कहाँ था ? इस पर
गवेषण की आवश्यकता है ।
खादना तथा सम्मा शब्द अप्रचलित प्रतीत होते
४६६ राजतरंगिणी
अर्वाक्कालोद्भवस्यापि राज्यकालोऽस्य भूपतेः ।
न्यक्कतादिनृपोदन्तैर्वृत्तान्तैरद्भुतोऽभवत् ॥ १५ ॥
१५. अर्वाक् कालीन (परवर्ती) भी इस नृपति का राज्य काल आदि कालीन नृप
कथाओं को तिरस्कृत करने वाले वृत्तान्तों के कारण अद्भुत हो गया था ।
स बहिर्विहरञ्जातु भृशमुद्वीतैरुदीरितम् ।
चौरश्चौरोऽयमित्यारादशृणोत्क्रन्दितध्वनिम् ॥ १६ ॥
१६. कदाचित् बाहर विहार करते हुए उस राजा ने समीप में "यह चोर है, यह
चोर है" ऐसी भीतोक्त क्रन्दन ध्वनि सुनी।
कः कोऽत्र बध्यतां चौर इत्युक्ते तेन सक्रुधा ।
शशामाक्रन्दितध्वानो न च चौरो व्यभाव्यत ॥ १७ ॥
१७. 'क कोऽत्र'-यहाँ कौन है ? चोर को बाँध लो' क्रोध पूर्वक राजा के कहने
पर, आक्रन्दित ध्वनि शान्त हो गयी । किन्तु कोई चोर दिखायी नहीं दिया ।
है। खादन शब्द संस्कृत अवश्य है जिसका अर्थ खाना,
भोजन करना, भोज्य पदार्थ तथा दाँत है। परन्तु यहाँ
सम्मा के साथ प्रयुक्त होने पर ऐसी ध्वनि निकलती
है जैसे दोनों शब्द मेघवाहन की अभारतीय रानियों
के लिये प्रयुक्त किये गये हैं। समा शब्द अरबी है।
उसका अर्थ आकाश होता है। सम्म अरबी शब्द है
उसका अर्थ विष है। शमा और समा शब्द के अर्थों
में भेद है। शमाका अर्थ मोमबत्ती । अरबी-फारसी
में शमा उसे भी कहते हैं जिसका मुखमण्डल
शमा के समान प्रकाशमान होता है। शम्मा अरबी
शब्द है। उसका अर्थ हलका सुगन्ध होता है। मेघ-
वाहन अफगानिस्तान के एक अंचल अर्थात् गन्धार
में बाल्यावस्था व्यतीत किया था। वहीं से काश्मीर
आया था। अतएव संभव है खादना तथा सम्मा
उसकी रानियां अफगानिस्तान अथवा उसके पड़ोस
ईरान, तुर्किस्तान या अफगानिस्तान में ही निवास
करने वाली किसी अरबी अथवा ईरानी जाति की
कन्या हों । अफगानिस्तान तथा तुर्किस्तान
में उस समय बौद्ध धर्म का प्राबल्य था। दोनों
रानियों का बौद्ध विहार बनवाना इस बात को
प्रमाणित करता है कि वे बौद्ध धर्मानुरक्त थीं। मैं
समझता हूँ कि दोनों रानियाँ तुर्किस्तान, अफगानि-
स्तान किंवा ईरानी रक्त की थीं।
१५ (१) राजतरंगिणी सूक्ति संग्रह का यह
५५ वा श्लोक है ।
पाठभेद :
श्लोक संख्या १७ में 'सक्रुधा' का पाठभेद
'भूभुजा' मिलता है ।
पादटिप्पणियाँ :
१७ (१) कः कोऽत्र : कोई है इस अर्थ में यह
शब्द उस समय भी व्यवहृत होता था। अंग्रेजी
में 'हू इज देय' इसी प्रकार का सम्बोधन है जो सेना
तथा सशस्त्र पुलिस द्वारा किसी को जानने के लिये
सम्बोधित किया जाता है।
तृतीय तरंग ४६७
पुनर्द्वित्रैर्दिनैस्तस्य निर्गतस्याग्रतस्ततः ।
अभवन्नभयार्थिन्यो द्वित्रा दिव्यप्रभाः स्त्रियः ॥ १८ ॥
१८. पुनः दो या तीन दिन पश्चात् जब वह ( राजा ) बाहर जा रहा था, सम्मुख
अभयार्थिनी एवं दिव्य प्रभामयी दो या तीन स्त्रियां उपस्थित हो गयीं ।
ताः संश्रुतेप्सितास्तेन रुद्धाश्वेन कृपालुना ।
अभ्यभाषन्त सीमन्तपुञ्जिताञ्जलयो वचः ॥ १९ ॥
१९. कृपालु उस ( राजा ) ने अश्व रोक कर, उन्हें अभय दान दिया । अभीप्सित को
सुनकर, वे शिर पर बद्धांजलि करके बोलीं—
देव दिव्यप्रभावेन भुवने भवता धृते ।
अपरस्माद्भयं जातु कस्य स्यात्करुणानिधे ॥ २० ॥
२०. “देव ! करुणानिधे ! ! आपके दिव्य प्रभाव से भुवन को धारण करते, दूसरो से
किसी को भय कैसे होगा ? ”
तदानीं तोयदा भूत्वाच्छादयन्तो नभस्तलम् ।
अकाण्डकरकापातशङ्किभिः कार्पकैर्मृषा ॥ २१ ॥
२१. “उस समय नाग¹ मेघ होकर, नभस्थल को आच्छादित कर लिया, तब कृषकों
को असमय में करकापात² की मिथ्या शंका हुई ।³
पाठभेद :
श्लोक संख्या २० मे 'वेन' का पाठभेद 'वेण'
मिलता है ।
श्लोक संख्या २१ मे 'भूत्वाच्छा' का 'भूत्वा छा'
तथा 'कार्पकै' का पाठभेद 'कृपकै', और 'कार्षिकै'
मिलता है ।
पादटिप्पणियाँ :
२१ ( १ ) नाग : पृष्ठ ४३ से ६३ तक द्रष्टव्य
है । वृष्टि के सम्बन्ध में नाग का एक अर्थ मेघ
होता है ।
नागों का नीलमत पुराण के अनुसार वर्षा पर
नियन्त्रण एवं अधिकार था । उनका तूफानों
तथा हिमपात पर भी अधिकार था । ( नी० 351,
985-986 ) पुरातन भारतीय साहित्य में जल पर
नागों का नियन्त्रण था इससे सम्बन्धित अनेक आख्यान
तथा प्रसंग मिलते हैं । 'सर्पबलि' पर्व वर्षा ऋतु
के प्रथम मास से आरम्भ होकर अन्तिम मास तक
चलता है। महा० आदि० २१: ६; भविष्यत्
पुराण: २२;
( २ ) करका : उपल किंवा ओला वृष्टि को
करकापात कहते हैं। तुहिन तथा करकापात में
अन्तर है । तुहिनपात बर्फ गिरने को कहते हैं ।
तुहिनपात अस्पष्ट शीत काल में होता है । करका-
पात किसी भी ऋतु में हो सकता है। यह भारत
के किसी भाग में वर्षा और अन्धड़ के साथ हो सकता
है। परन्तु तुहिनपात केवल शीत कटिबन्ध और
हिमालय में तापमान की न्यूनता जहाँ होती है वहीं
होता है ।
( ३ ) श्री स्टीन तथा श्री रनजीत सीताराम
पण्डित तथा प्रायः सभी अनुवादकर्ताओं ने चार
श्लोकों ( २१-२४ ) का अनुवाद एक साथ ही किया
है । कल्हण इन्हें कुलकम् में नही रखा है किन्तु कुछ
पाण्डुलिपि में इसके लिये 'चवरूलक' शब्द का प्रयोग
किया गया है। श्री स्टीन द्वारा वीना की राजकीय
४६८ राजतरंगिणी
पक्वशालिवनस्फीतिरक्षाक्षुभितमानसैः ।
नागास्त्वत्कोपसंरम्भभूमितां गमिताः प्रभो ॥ २२ ॥
२२. “पके शालियों से परिपूर्ण क्षेत्रों की रक्षा हेतु उनका मन क्षुभित था, अतएव
प्रभो ! ( वे ) नाग झूठे ही आपके क्रोधावेश के पात्र हो गये ।
तेऽस्माकं पतयश्चौरश्चौर इत्यार्तभाषितम् ।
श्रुत्वा देवेन बध्यन्तामित्यवादि यदा क्रुधा ॥ २३ ॥
२३. "उन लोगों ने मेरे पतियों को जब 'चोर चोर' ऐसा आर्तनाद किया, तब
( उसे ) सुनकर, आप क्रोध से-'बाँध लो-बोले ।
तदा त्वदाज्ञामात्रेण न्यपतन्पाशवेष्टिताः ।
प्रसादः क्रियतां तेषामस्मत्करुणयाऽधुना ॥ २४ ॥
२४. "उस समय आपकी आज्ञा मात्र से पाश वेष्टित कर ( वे ) लाये गये । अधुना,
हम लोगों पर करुणा कर, उन्हें प्रसन्न ( मुक्त ) करें ।"
तदाकर्ण्याऽवदद्राजा प्रसादविशदाननः ।
सर्वे ते बन्धनान्नागास्त्यज्यन्तामिति सस्मितः ॥ २५ ॥
२५. इसको सुनकर, सस्मित एवं प्रसादोञ्ज्वल आनन राजा बोले-“वे सब नाग
बन्धन मुक्त कर दिये जाँय,"
तथा तस्याज्ञया राज्ञो नागा विधुतबन्धनाः ।
प्रणम्य चरणौ तूर्णं प्रययुः सपरिग्रहाः ॥ २६ ॥
२६. राजा की आज्ञा से नाग बन्धन रहित हो गये । वे सपरिवार चरणों में प्रणाम
कर, शीघ्रता पूर्वक चले गये ।
अथ ग्राहयितुं भूपानाज्ञां हिंसानिवृत्तये ।
स दिग्विजयाय निर्व्याजधर्मचर्यो विनिर्ययौ ॥ २७ ॥
दिग्विजय
२७. निर्व्याज धर्माचारी वह ( नृप ) राजाओं को हिंसा निवृत्ति हेतु आज्ञा पालन
कराने के लिये दिग्विजय निमित्त निकल पड़ा।"
पुस्तकालय में रखी गयी प्रति में इसका उल्लेख मिलता पादटिप्पणियाँ :
है। मैंने सबको भिन्न भिन्न मानते हुए प्रत्येक श्लोकों २४ ( १ ) श्लोक में 'चतुर्भिः कुलकम् चक्कलं-
का अनुवाद अलग अलग किया है। निस्सन्देह अलग कम्' जोड़ने का सुझाव है।
अलग अनुवाद करने में कुछ कठिनाई का अनुभव पाठभेद :
अवश्य होता है। श्लोक संख्या २७ में 'धर्म' का पाठभेद 'धर्म्मा'
पाठभेद : मिलता है।
श्लोक संख्या २२ में 'स्फीति' का 'स्फाति' पादटिप्पणियाँ :
तथा 'भूमि ता' का पाठभेद 'भूमि ते' मिलता है। २७ ( १ ) दिग्विजय : पण्डित जवाहर ला..
तृतीय तरंग ४६९
अभूद्भीतजनतावेक्षणश्लाघ्यविक्रमः ।
स्पृहणीयो जिनस्यापि तदीयविजयोद्यमः ॥ २८ ॥
२८. उसका यह विजयोद्यम जिन१ ( बुद्ध ) के लिये भी स्पृहणीय था, क्योंकि उसने
अपने प्रशंसनीय विक्रम एवं निरीक्षण से जनता को निर्भय रखा ।
प्रभावविजितान्कृत्वा सोऽहिंसादीक्षितान्नृपान् ।
अर्णसां पत्युरभ्यर्णमगापावर्णवजितः ॥ २९ ॥
२९. निष्कलंक उस राजा ने अपने प्रभाव से विजित नृपों को अहिंसा व्रत में दीक्षित
कर, अर्णस्पति१ ( सागर ) के समीप पहुँचा ।
तत्र तालीवनच्छायासुखविश्रान्तसैनिकः ।
युक्तिं द्वीपान्तराक्रान्तौ क्षणमन्तर्व्यचिन्तयत् ॥ ३० ॥
३०. वहाँ पर उसके सैनिक ताल वन की छाया में सुखपूर्वक विश्राम कर रहे थे ।
द्वीपान्तर ( अन्य द्वीप पर ) आक्रमण करने के लिये क्षण भर ( उसने ) मनमें विचार किया ।
अथ वेलावनोपान्ताच्चेनार्ताक्रन्दितध्वनिः ।
मेघवाहनराज्येऽपि हतोऽद्यमिति शुश्रुवे ॥ ३१ ॥
३१. अनन्तर उसने तटवर्ती वन की छोर से आर्त क्रन्दित ध्वनि सुनी—"मेघवाहन
के राज्य में भी यह ( मैं ) मारा गया ।"
नेहरू मेघवाहन के इस महाप्रयास के सम्बन्ध
में धीरणजीत सीताराम पण्डित की भूमिका में
लिखते हैं : अहिंसा द्वारा विचित्र प्रयास—'हम पढ़ते
हैं—मेघवाहन का विजय द्वारा अहिंसा का विचित्र
प्रयास—।'
पाठभेद :
श्लोक संख्या २८ में 'अभूद' का 'अभून'; 'जिन-
स्यापि' का 'जनस्यापि' तथा 'तदीय' का पाठभेद
'स्वदीय' मिलता है ।
पादटिप्पणियाँ :
( १ ) जिन : अनेक लेखको ने जिन और जैन
शब्द को मिलाकर भ्रम उत्पन्न कर दिया है । इसका
शाब्दिक अर्थ जीतने वाला होता है । बुद्ध ने स्व
विजय किया था । अतएव उनका नाम जिन हो
गया था । जैन भी अपने तीर्थंकरो को विजेता
किंवा जीतने वाले कहते हैं । अल्बेरूनी ने १:२४३
में इसी मत का प्रतिपादन किया है ।
जिन शब्द का उल्लेख कल्हण ने रा० त०
१:१०२ ३:७,२८; ४:२००, २११, २६१; ८:
२२३४ में किया है । विशेष द्रष्टव्य पृष्ठ १३६ हैं ।
२९( १ ) अर्णस्पति का अर्थ यहाँ समुद्र
है । नदियो का स्वामी समुद्र संस्कृत काव्य में कहा
गया है । कल्हण उसी काव्य परम्परा का यहाँ
पालन किया है ।
पाठभेद :
श्लोक सख्या ३० में 'सैनिक:' का 'सैनिकै:'
तथा 'क्रान्तौ' का पाठभेद 'क्रान्त्यै' मिलता है ।
श्लोक संख्या ३१ में 'पान्तात्ते' 'पाग्ते ते' तथा
'हतोऽद्य' का पाठभेद 'हतोऽह' मिलता है ।
४६८ राजतरंगिणी
पक्वशालिवनस्फीतिरक्षाक्षुभितमानसैः ।
नागास्त्वत्कोपसंरम्भभूमितां गमिताः प्रभो ॥ २२ ॥
२२. "पके शालियों से परिपूर्ण क्षेत्रों की रक्षा हेतु उनका मन क्षुभित था, अतएव
प्रभो ! ( वे ) नाग झूठे ही आपके क्रोधावेश के पात्र हो गये ।
तैऽस्माकं पतयश्चौरश्चौर इत्यार्तभाषितम् ।
श्रुत्वा देवेन बध्यन्तामित्यवादि यदा क्रुधा ॥ २३ ॥
२३. "उन लोगों ने मेरे पतियों को जब 'चोर चोर' ऐसा आर्तनाद किया, तब
(उसे) सुनकर, आप क्रोध से -'बाँध लो-बोले ।
तदा त्वदाज्ञामात्रेण न्यपतन्पाशवेष्टिता ।
प्रसादः क्रियतां तेषामस्मत्करुणयाऽधुना ॥ २४ ॥
२४. "उस समय आपकी आज्ञा मात्र से पाश वेष्टित कर ( वे ) लाये गये । अधुना,
हम लोगों पर करुणा कर, उन्हें प्रसन्न ( मुक्त ) करें ।"
तदाकर्ण्याऽवदद्राजा प्रसादविशदाननः ।
सर्वे ते बन्धनान्नागास्त्यज्यन्तामिति सस्मितः ॥ २५ ॥
२५. इसको सुनकर, सस्मित एवं प्रसादोज्ज्वल आनन राजा बोले-"वे सब नाग
बन्धन मुक्त कर दिये जाँय ।"
तथा तस्याज्ञया राज्ञो नागा विधुतबन्धनाः ।
प्रणम्य चरणौ तूर्णं प्रययुः सपरिग्रहाः ॥ २६ ॥
२६. राजा की आज्ञा से नाग बन्धन रहित हो गये । वे सपरिवार चरणों में प्रणाम
कर, शीघ्रता पूर्वक चले गये ।
अथ ग्राहयितुं भूपानाज्ञां हिंसानिवृत्तये ।
स दिग्विजयाय निर्व्याजधर्मचर्यो विनिर्ययौ ॥ २७ ॥
दिग्विजय'
२७. निर्व्याज धर्माचारी वह (नृप) राजाओं की हिंसा निवृत्ति हेतु आज्ञा पालन
कराने के लिये दिग्विजय निमित्त निकल पड़ा।"
पुस्तकालय में रखी गयी प्रति में इसका उल्लेख मिलता पादटिप्पणियां :
है । मैने सबको भिन्न भिन्न मानते हुए प्रत्येक श्लोको २४ (१) श्लोक में 'चतुर्भिः कुलकम् चवक्त-
का अनुवाद अलग अलग किया है। निस्सन्देह अलग कम्' जोड़ने का सुझाव है।
अलग अनुवाद करने में कुछ कठिनाई का अनुभव पाठभेद :
अवश्य होता है। श्लोक संख्या २७ में 'धर्म' का पाठभेद 'धर्मा'
पाठभेद : मिलता है।
श्लोक संख्या २२ में 'स्फीति' का 'स्फाति' पादटिप्पणियां :
तथा 'भूमि ता' का पाठभेद 'भूमि तं' मिलता है। २७ (१) दिग्विजय : पण्डित जवाहर ला..
तृतीय तरंग ४६९
अभूद्भीतजनतावेक्षणश्लाघ्यविक्रमः ।
स्पृहणीयो जिनस्यापि तदीयविजयोद्यमः ॥ २८ ॥
२८. उसका यह विजयोद्यम जिन' (बुद्ध) के लिये भी स्पृहणीय था, क्योंकि उसने
अपने प्रशंसनीय विक्रम एवं निरीक्षण से जनता को निर्भय रखा ।
प्रभावविजितान्कृत्वा सोऽहिंसादीक्षितान्नृपान् ।
अर्णसां पत्युरभ्यर्णमवापावर्णवर्जितः ॥ २९ ॥
२९. निष्कलंक उस राजा ने अपने प्रभाव से विजित नृपों को अहिंसा व्रत में दीक्षित
कर, अर्णस्पति' (सागर) के समीप पहुँचा ।
तत्र तालीवनच्छायासुखविश्रान्तसैनिकः ।
युक्तिं द्वीपान्तराक्रान्तौ क्षणमन्तर्व्यचिन्तयत् ॥ ३० ॥
३०. वहाँ पर उसके सैनिक ताल वन की छाया में सुखपूर्वक विश्राम कर रहे थे ।
द्वीपान्तर (अन्य द्वीप पर) आक्रमण करने के लिये क्षण भर (उसने) मनमें विचार किया ।
अथ वेलावनोपान्तात्तेनार्ताक्रन्दितध्वनिः ।
मेघवाहनराज्येऽपि हतोऽद्यमिति शुश्रुवे ॥ ३१ ॥
३१. अनन्तर उसने तटवर्ती वन की छोर से आर्त क्रन्दित ध्वनि सुनी—"मेघवाहन
के राज्य में भी यह (मैं) मारा गया ।"
नेहरू मेघवाहन के इस महाप्रयास के सम्बन्ध किवा जीतने वाले कहते हैं । अल्बेरुनी ने १:२४३
में श्रीरणजीत सीताराम पण्डित की भूमिका में में इसी मत का प्रतिपादन किया है ।
लिखते हैं : अहिंसा द्वारा विचित्र प्रयास—'हम पढ़ते जिन शब्द का उल्लेख कल्हण ने रा० त०
हैं—मेघवाहन का विजय द्वारा अहिंसा का विचित्र १:१०२ ३:७,२८; ४:२००, २११, २६१; ८:
प्रयास--।' २२३४ में किया है । विशेष द्रष्टव्य पृष्ट १३६ हैं ।
पाठभेद :
श्लोक संख्या २८ में 'अभूद' का 'अभूत'; 'जिन- २९ ( १ ) अर्णस्पति का अर्थ यहाँ समुद्र
स्यापि' का 'जनस्यापि' तथा 'तदीय' का पाठभेद है । नदियों का स्वामी समुद्र संस्कृत काव्य में कहा
'त्वदीय' मिलता है । गया है । कल्हण उसी काव्य परम्परा का यहाँ
पादटिप्पणियाँ : पालन किया है ।
( १ ) जिन : अनेक लेखकों ने जिन और जैन पाठभेद :
शब्द को मिलाकर भ्रम उत्पन्न कर दिया है । इसका श्लोक संख्या ३० में 'सैनिकः' का 'सैनिकैः'
शाब्दिक अर्थ जीतने वाला होता है । बुद्ध ने स्व तथा 'क्रान्तौ' का पाठभेद 'क्रान्त्यै' मिलता है ।
विजय किया था । अतएव उनका नाम जिन हो श्लोक संख्या ३१ में 'पान्तात्ते' 'पान्ते ते' तथा
गया था । जैन भी अपने तीर्थंकरों को विजेता 'हतोऽद्य' का पाठभेद 'हतोऽह' मिलता है ।
४७० राजतरंगिणी
तप्तायःशङ्कुनेयान्तर्व्रणितः स द्रुतं ततः ।
संचारिणाऽऽतपत्रेण सन्ना तां वसुधामगात् ॥ ३२ ॥
३२. तप्त लौह शंकु से अन्तर्विध सदृश (नृप) संचारो आतपत्र¹ (राज-छत्र) के
साथ शीघ्र ही उस भूमि पर गया।
अपश्यदथ केनापि चण्डिकायतनाग्रतः ।
नरं शबरसेनान्या हन्यमानमघोमुखम् ॥ ३३ ॥
३३. वहाँ देखा—चण्डिकायतन¹ के आगे कोई शबर² सेनानी अधोमुख नर को
मार रहा है।
श्लोक संख्या ३२ में 'तः' का 'तस्य'; 'द्रुतं'
का 'श्रुत', तथा 'सन्ना तां' का पाठभेद 'स तत्र';
'सन्नाता' 'सद्भाता' मिलता है।
पादटिप्पणियाँ :
३२ (१) आतपत्र = छत्र: यहाँ तात्पर्य
श्वेत वरुण छत्र से है। छत्र के सन्दर्भ में एक
पौराणिक कथा मिलती है। किस प्रकार छत्र की
उत्पत्ति हुई थी। देवी रेणुका महर्षि जमदग्नि की
धर्मपत्नी थी। सूर्य ताप से कदाचित् विकल हो
गयी। महर्षि अपनी पत्नी की व्याकुलता देखकर
क्रुद्ध हो गये। सूर्य के वध के हेतु धनुष बाण
उठाया। सूर्य भगवान् भयभीत हो गये। प्रकट
हुए। एक छत्र बनाकर महर्षि को दिया। सामान्य
छत्र तथा राजछत्र में भिन्नता होती है। छत्र,
चामर, मुकुट आदि राजा के चिन्ह माने जाते हैं।
सम्राट् के छत्र का चतुर्थांश युवराज का छत्र होता
है। सम्राट् के छत्र के अग्रभाग में भिन्नता प्रदर्शन
हेतु आठ अंगुल की एक पताका लगी रहती है।
इस छत्र को दिग्विजयी छत्र कहते हैं।
पाठभेद :
श्लोक संख्या ३३ में 'शबर' का पाठभेद 'शवर'
मिलता है।
पादटिप्पणियाँ
(१) आयतन. देवस्थान यज्ञ स्थान के अर्थ
में यहा इस शब्द का प्रयोग किया गया है। आध्या-
त्मिक दृष्टि से छः आयतन बाहर तथा छ. भीतर
होते हैं। चक्षु, श्रोत्र, घ्राण, जिह्वा, काय एवं मन
आन्तरिक आयतन हैं। बाह्यायतन रूप, शब्द, गंध,
रस, स्पर्श एवं धर्म हैं। प्राणियों की तृष्णाओं के
कारण उक्त बारह आयतन हैं। तृष्णाओं के परे हैं।
भवन, गृह, निवेशन, आलय, वेश्म, आयतन,
अट्टालक इन शब्दों का प्रयोग नीलमत पुराण में
किया गया है। उनमें क्या भेद या इन पर प्रकाश
नहीं डाला गया है। (नी० 187, 359, 362,
364, 369, 370, 400, 551, 558)
(२) शबर : पुराणों के अनुसार यह एक
विशेष म्लेच्छ जाति थी। ये दक्षिणापथ के
निवासी थे। वायु पुराण में इन्हें 'दक्षिणा-
पथवासिनः' कहा गया है। इनका उल्लेख,
आभीर, आटव्य, पुलिंद, वैदर्भ, दण्डक आदि
के साथ प्राप्त होता है। (वायुः ४५:१२६) ब्राह्मण
ग्रन्थो के अनुसार विश्वामित्र के ज्येष्ठ पचास पुत्र
उन्हीं के शाप से आन्ध्र, पुण्ड्र, शबर, पुलिंद आदि
हो गये थे (ऐ. ब्रा० ७: १८: २; सां. श्रौ: १५:
२६: ६) वह दक्षिण मे पेन्नार नदी के प्रदेश मे
रहते थे। रामायण में प्राप्त शबरी की कथा इस
ओर संकेत करती है। इनकी आबादी राजस्थान
तथा हिमाचल प्रदेश आदि में थी।
महाभारत के अनुसार शबर मूलतः क्षत्रिय थे
परन्तु आचार त्याग देने के कारण म्लेच्छ हो गये
थे। महाभारत में शबरों ने कौरवों के पक्ष से युद्ध
तृतीय तरंग ४७१
अनात्मज्ञ धिगेतत्त्वे कुकर्मेति महीभुजा ।
तर्जितः स भयादेवं शबरस्तं व्यजिज्ञपत् ॥ ३४ ॥
३४. 'ओ अनात्मज्ञ ! कुकर्मी !! तुम्हें धिक्कार है ।'—राजा के इस प्रकार
वर्जित करने पर, भय से उस शबर ने उन्हें बताया-
शिशुर्मुमूर्षुर्मे राजन्नयं रोगादितः सुतः ।
कर्मैतद्देवैरुक्तमस्य श्रेयोल्पावद्दम् ॥ ३५॥
३५. 'हे राजन् ! रोग पीड़ित मेरा पुत्र यह शिशु मरणासन्न है । देवों-द्वारा कहा
गया, यह कर्म ( बलि) इसके लिये श्रेयस्कर है ।
उपहारनिरोधेन सद्य एव विपद्यते ।
बन्धुवर्गमशेषं च विद्ध्येतज्जीवजीवितम् ॥ ३६ ॥
३६. 'इस उपहार के निरोध से यह सद्यः (तत्काल) मृत हो जायगा । समस्त
बन्धु वर्ग को इसी के जीवन से जीवित जानिये ।
अरण्यगहनाल्लब्धमनाथं देव रक्षसि ।
बहुलोकाश्रयं बालं कथमेतमुपेक्षसे ॥ ३७ ॥
३७. देव ! गहन वन में प्राप्त अनाथ को आप रक्षा करते हैं फिर अनेकों के आश्रय-
भूत उस बालक की क्यों उपेक्षा कर रहे हैं ।
अथाभ्यधान्महात्मा स वचोभिः शबरस्य तैः ।
वध्यस्य दृष्टिपातैश्च विप्लवैश्चैवशीकृतः ॥ ३८ ॥
३८. उस महात्मा ( नृप) ने शबर की बातों एवं वध्य के कातर दृष्टिपातों से विवश
होकर कहा—
में भाग लिया था । सात्यकी ने इनका संहार एकादश पिशाचकाः ।"
किया था ।
पाठभेद :
३३ (२) आमटन : कल्हण का वर्णन श्लोक संख्या ३४ में 'अनात्मज्ञ' का 'धनात्मज्ञा'
पुराणों से मेल खाता है क्योकि यह स्थान दक्षिण और 'देवं' का 'देव' पाठभेद मिलता है ।
का समुद्र तट था जहाँ शबर से राजा को भेंट हुई
थी । शबर शिव भक्त थे। एकमत है कि वर्तमान श्लोक संख्या ३६ में 'एव' का पाठभेद 'एव'
भील जाति के शबर ही पूर्व पुरुष थे । मिलता है ।
एक मत शबर जाति को पिशाच के एकादश श्लोक संख्या ३८ में 'स वचोभिः' का पाठभेद
उपजातियो में एक मानता है । "शाबरं द्राविडं चैव 'सुवचोभिः' मिलता है ।
४७२ राजतरंगिणी
किरात कातरो मा भूः स्वयं संरक्ष्यते मया ।
बहुवन्धुस्तव सुतो वध्योऽप्ययमवान्धवः ॥ ३९ ॥
३६. “ओः किरात' ! कातर मत हो। मैं स्वयं तुम्हारे पुत्र की जिसके बहुत
बन्धु हैं; और बन्धु हीन उस वध्य की रक्षा करता हूँ।
श्लोक सङ्ख्या ३९ में 'वध्यो' का पाठभेद
'वाध्यो' मिलता है।
पादटिप्पणियाँ :
३९ (१) किरात : विन्ध्य तथा राजस्थान
में रहने वालो एक आदिम जाति है। किरात शब्द
अनार्यों के लिये बहुत प्रयुक्त किया गया है। राजस्थान
तथा विन्ध्य के निवासी भीलों को किरात की
संज्ञा हो जाती है। वंशानुक्रम तथा जाति के विचार
से किरात एव भील में अन्तर है।
इस जाति का इतिहास अत्यन्त प्राचीन है।
यह पहाड़ी जाति है। महाभारत सभा पर्व (अ. २६)
से प्रतीत होता है कि प्राग्ज्योतिष के समीप किरात
प्रदेश था। हिमालय के पूर्व लौहित्य नदी के आगे
किरात निवास करते थे। टालेमी ने किरात जाति
का प्रदेश वर्मा का अराकान प्रदेश बताया है।
पांचवी तथा छठी शताब्दियों के प्राप्त बर्मी तथा
कम्बुज शिलालेखों से पता चलता है कि वहाँ के
मूल निवासी किरात थे। इन प्रमाणो से माना
जा सकता है कि पूर्वी हिमालय अंचल, भूटान,
मणिपुर, वर्मा तथा कम्बुज (कम्ब्रोडिया) तक
किरात जाति फैली थी। प्राग्ज्योतिष के राजा
भगदत्त ने किरात तथा चीन का सेना के साथ
अर्जुन से युद्ध किया था।
महाकवि भारवि के किरातार्जुनोय महाकाव्य
में पता चलना है कि महाभारत काल में किरात
सैनिक तथा गुप्तचरों का कार्य करते थे। महादेव
ने किरात वेश में अर्जुन से युद्ध किया था। नेपाल
में प्राचीन किरात जाति आजकल किराती नाम से
प्रसिद्ध है। वे वल्ली, माझ तथा पल्ल किरात वर्गों
में विभक्त है। वल्ली किरान्त लिम्बू, पल्ल तथा
तथा रायछ श्रेणियों में विभक्त है। लिम्बू किरात
पत्नी खरीदते हैं। गरीब लिम्बू अपने ससुर के
घर नौकरी कर पत्नी प्राप्त करता है। नेपाल की
वंशावली से प्रतीत होता है कि महिर वंश के पश्चात्
किरात वंश के २९ राजाओं ने नेपाल में शासन
किया था। नेपाल के किरात बौद्ध तथा हिन्दू दोनों
हैं। सिक्किम के पश्चिम मोरंग में आज भी किरात
जाति रहती है।
वराहमिहिर को बृहत् संहिता में भारत के
दक्षिण पश्चिम किरात जनपद होने का उल्लेख
किया गया है। शक्ति संगम तंत्र में 'तप्त कुण्ड' से
'राम क्षेत्राग्त' पर्यन्त किरात देश कहा गया है।
यह विन्ध्य प्रदेश में स्थित है।
किरात एक शिवावतार भी हुआ है। मूक
नामक दानव का इसने सूकर रूप में वध किया है।
ऋग्वेद में किरात तथा आकुलो दो असुरों का
का उल्लेख मिलता है (ऋ० १०:५७:१; १०:६०:१;
बृहद् देवता ७.११:१६; पं०ब्रा० १३:१२:५, श०
ब्रा० २:१.४ १४, जै. ब्रा. ३:१६० ।
यह जाति सम्भवतः अनार्य थी। प्राचीन ग्रन्थो
में प्रायः उनका सम्बन्ध पर्वतों तथा गुफाओं से जोड़ा
गया है। उनकी मुख्य जीविका आखेट बतायो गयी
है। अथर्ववेद (१०४ १४) में किरात का उल्लेख
मिलता है। वाजसनेयी संहिता (३०.१६) तथा
तैत्तिरीय ब्राह्मण में किराता का सम्बन्ध गुहा से
बताया गया है। अभिप्राय यह मालूम होता है कि
वे गुहावासी थे।
तृतीय तरंग ४७३
उपहारीकरोम्येष चण्डिकायै स्वविग्रहम् ।
मयि प्रहर निश्शङ्कं जीवत्वेतज्जनद्वयम् ॥ ४० ॥
४०. "मैं अपने शरीर को चण्डिका के लिये उपहार¹ में दे रहा हूँ। तुम मुझ पर
निःशंक होकर प्रहार करो। वे दोनों जन जीवित होवें।"
तदद्भुतमहासत्त्वचित्तेरुदात्यविस्मितः ।
उन्मिषद्रोमहर्षस्तं ततः स शबरोऽभ्यधात् ॥ ४१ ॥
४१. तदनन्तर यह शबर उस महासत्त्व के चित्त की उदात्तता से विस्मित एवं
रोमांचित हो गया और उनसे बोला—
अतिकारुण्यनिपतस्तवायं पृथिवीपते ।
कश्चिन्मतिविपर्यांसप्रकारो हृदि रोहति ॥ ४२ ॥
४२. पृथिवीपते ! आपके हृदय में अति कारुण्य के कारण किसी प्रकार का मति
विपर्यय (बुद्धि भ्रम) उत्पन्न हो गया है।
वाल्मीकि रामायण में किरातों की नारियों के
जूड़ा का वर्णन है। उनके वर्ण की सुवर्ण से उपमा
दी गयी है। (किष्किन्धा काण्ड : ४०;२७)
महाभारत कर्ण पर्व (७३:१९-२०) में उन्हें
बर्बर अनार्य जाति तुषार, यवन, खस, आंध्रक,
पुलिन्द, म्लेच्छों के साथ रखा गया है। उन्हें पर्वतीय
जाति कहा गया है। द्रोण पर्व (४.७) में उन्हें
हिमालय पर्वत में निभृत कहा गया है। सभा पर्व
(५२:१-१२) में किरात लोग युधिष्ठिर को
भेंट लेकर आते हुए देखे जाते हैं। उन्हें क्रूरकर्मी
कहा गया है। फल-मूलभोजी, चर्मवस्त्रधारी तथा
भयंकर शस्त्र चलाने वाला कहा गया है। कालान्तर
में किरात लोग समस्त भारत में फैल गये थे।
खारवेल के अभिलेख में चीन तथा किरात
दोनों का एक साथ उल्लेख किया गया है। सांची
के एक स्तूप पर एक किरात भिक्षु के दान का
उल्लेख अंकित है। नागार्जुनोय कोंड के एक अभिलेख
में किरातों का उल्लेख है।
६०
महाभारत के उपायन पर्व में किरात के चन्दन
लेकर भेंट में आने का उल्लेख है। अतएव किरात
दक्षिण में थे। ललितादित्य का उनसे समुद्रतट
पर भेंट होना वास्तविकता की ओर संकेत करता है।
मनु ने किरातों की गणना व्रात्य क्षत्रियों में की
है। (मनु० १०:४३-४४)
पाठभेद :
श्लोक संख्या ४० में 'स्ववि' का पाठभेद
'सुवि' मिलता है।
पादटिप्पणियाँ :
४० (१) उपहार : कल्हण ने उपहार शब्द
का प्रयोग यहाँ किया है। बलि तथा उपहार में स्पष्ट
अन्तर कल्हण ने किया है। बलि किसी भी व्यक्ति
अथवा पशु की उसकी इच्छा अथवा अनिच्छा होने
पर भी जबर्दस्ती बलिकर्त्ता अपने प्रतिनिधि रूप में
कर देता था। परन्तु उपहार से यह ध्वनि नहीं
निकलती। अपना उपहार नैवेद्य अथवा भोग लगाने
की तरह देवता को चढ़ाया जाता है।
४७४ राजतरंगिणी
त्रैलोक्यजीवितेनापि यो रक्ष्यो हेलयैव तम् ।
पृथिवीभोगसुभगं कथं कायमुपेक्षसे ॥ ४३ ॥
४३. "त्रैलोक्य के प्राण से भी जो रक्षणीय है; पृथ्वी के उपभोग करने योग्य उस
काया की आप योंही क्यों उपेक्षा कर रहे हैं ?
न मानं न यशो नार्थान्न दारान्न च बान्धवान् ।
न धर्मं न सुतान्नृपा रक्षन्ति प्राणतृष्णया¹ ॥ ४४ ॥
४४. "नृप गण प्राण रक्षा हेतु मान, यश, अर्थ, दारा, बन्धु, धर्म एवं पुत्र की भी
रक्षा नहीं करते ।
तत्प्रसीद प्रजानाथ मा वध्येऽस्मिन्कृपां कृथाः ।
शिशुश्चैष प्रजाश्चैता जीवन्तु त्वयि जीवति ॥ ४५ ॥
४५. "प्रजानाथ ! प्रसन्न हों । उस वध्य पर कृपा न कीजिये । आपके जीवित रहने
पर शिशु और प्रजा जीवित रहेगी ।"
उपाजिहीर्षुरात्मानं दन्तद्योतार्घडम्बरैः ।
अर्चयन्निव चामुण्डामथोवाच स पार्थिवः ॥ ४६ ॥
४६. "स्वयं उपहार बनने के लिये उत्सुक नृप ने दन्त प्रभा रूपी अर्घ पुञ्ज से मानो
चामुण्डा¹ की अर्चना करते हुए कहा-
पाठभेद :
श्लोक संख्या ४३ में 'काय, का पाठभेद 'कार'
मिलता है ।
पादटिप्पणियाँ :
४४ (१) राजतरंगिणी मुक्ति संग्रह का ५६वाँ
श्लोक है ।
४६ (१) चामुण्डा : स्कन्द पुराण (५:१:३८)
में उल्लेख मिलता है । शुंभ तथा निशुंभ ने देवी
का वध करने के लिये चण्ड एवं मुण्ड नामक दो
राक्षसों को भेजा था । देवी ने उनका वध किया ।
चण्ड एव मुण्ड के वध के पश्चात् देवी ने शुंभ एवं
निशुंभ का वध किया । अतएव देवी का नाम
चामुण्डा पड़ा ।
रक्तबीज एक असुर था । वह शुम्भ निशुम्भ
के पक्ष का योद्धा था । रुद्र के वर प्रभाव से
उसका एक बूंद रक्त पृथ्वी पर पड़ते रक्त बूंद के
बीज स्वरूप एक असुर उत्पन्न हो जाता था ।
चामुण्डा बूंदों के गिरते ही रक्त चाट जाती थी ।
असुर उत्पन्न होने की नौबत ही नहीं आती थी ।
चामुण्डा ने रक्तबीज का नाश किया । (दे० भा०
५:२७-२९, मार्क० ८५, शिव० उमा ४७ )
चामुण्डा के सम्मुख नर बलि का वर्णन भवभूति
ने 'मालती माधव' नाटक में किया है । नाटक के
पंचम अंक में नायक ने नायिका की रक्षा करते
समय अघोर घंट पुरोहित का वध किया था ।-
तृतीय तरंग ४३५
सदाचारसुधास्वादे के भवन्तो वनौकसः ।
जाह्नवीमज्जनप्रीतिं न जानन्ति मरुस्थिताः ॥ ४७ ॥
४७. 'सदाचार रूपी सुधा का स्वाद आप वनवासी कैसे जान सकते हैं ? मरुस्थल
निवासी गंगा स्नान ( मज्जन ) के आनन्द को नहीं जानते ।
ध्रुवापायेन कायेन क्रीणतः कीर्तिमव्ययाम् ।
ममाभीष्टं प्रमाष्टुं ते मूढ रूढोऽयमाग्रहः ॥ ४८ ॥
४८. 'हे मूढ ! अवश्यमेव नश्वर इस शरीर से अविनाश्वर कीर्ति का क्रय करते,
मेरे अभीष्ट के नाश हेतु, तुम्हारा यह दुराग्रह ( क्यों ? ) बढ़ गया है ।
मा वोचः किंचिदपरं प्रहर्तुं चेद्घृणा तव ।
न किं निजः कृपाणो मे शक्तः प्रक्रान्तसिद्धये ॥ ४६ ॥
४९. 'और कुछ मत कहो। यदि प्रहार करने में तुम्हें दया ( आती ) है, तो क्या
मेरा कृपाण प्रस्तुत कार्य सिद्धि में समर्थ नहीं है ?'
इत्युक्त्वा स स्वयं देहमुपहर्तुं समुद्यतः ।
खण्डनाय स्वमुण्डस्य विकोशं शस्त्रमादधे ॥ ५० ॥
५०. ऐसा कहकर, देह को उपहार करने के लिये उद्यत वह स्वयं अपने मुण्ड के
खण्डन हेतु कोश से शस्त्र निकालकूर, धारण कर लिया ।
ततः प्रहर्तुकामस्य तस्य द्युकुसुमैः शिरः ।
करश्च दिव्यवपुषा रुद्धः केनाप्यजायत ॥ ५१ ॥
५१. प्रहारोत्सुक उनका शिर आकाश से गिरे पुष्पों से आच्छादित हो गया, और
किसी दिव्य शरीरी ने हाथ को रुद्ध कर दिया ।१
अथापश्यत्तथाभूतः कश्चिद्दिव्याकृतिं पुरः ।
न चण्डिकां न तं वध्यं न किरातं न दारकम् ॥ ५२ ॥
५२. तथाभूत उसने सम्मुख कोई दिव्याकृति देखी । ( किन्तु ) चण्डिका, किरात,
दारक ( शिशु ) एवं वह वध्य दिखायी नहीं दिया ।
पादटिप्पणियाँ :
४०(१) राजतरंगिणी मृत्तिका ४७वाँ श्लोक है।
पाठभेद :
श्लोक संख्या ४८ में 'भीष्टं' का 'भीष्टा' तथा 'रूढो' का पाठभेद 'मूढो' मिलता है ।
श्लोक संख्या ५० में 'दधे' का पाठभेद 'ददे' मिलता है।
पादटिप्पणियाँ :
५१ ( १ ) हाथ रुद्ध करना : बाइबिल में वर्णन आता है कि अब्राहम अपने पुत्र को बलि भगवान् पर चढ़ा रहा था। उसने प्रहार के लिये हाथ उठाया था कि ईश्वरीय शक्ति ने उसका हाथ रोक लिया । इस प्रकार के चमत्कारों से विश्व का पूरा साहित्य भरा पड़ा है ।
पाठभेद :
श्लोक संख्या ५२ में 'पुरः' का पाठभेद 'पुनः' मिलता है ।
४७४ राजतरंगिणी
त्रैलोक्यजीवितेनापि यो रक्ष्यौ हेलयैव तम्।
पृथिवीभोगसुभगं कथं कायमुपेक्षसे ॥ ४३ ॥
४३. "त्रैलोक्य के प्राण से भी जो रक्षणीय है; पृथ्वी के उपभोग करने योग्य उस
काया को आप योंही क्यों उपेक्षा कर रहे हैं ?
न मानं न यशो नार्थान्न दारान्न च बान्धवान् ।
न धर्मं न सुतान्नृपा रक्षन्ति प्राणतृष्णया१ ॥ ४४ ॥
४४. "नृप गण प्राण रक्षा हेतु मान, यश, अर्थ, दारा, बन्धु, धर्म एवं पुत्र की भी
रक्षा नहीं करते।
तत्प्रसीद प्रजानाथ मा वध्येऽस्मिन्कृपां कृथाः ।
शिशुश्चैष प्रजाश्चैता जीवन्तु त्वयि जीवति ॥ ४५ ॥
४५. "प्रजानाथ ! प्रसन्न हों । उस वध्य पर कृपा न कीजिये । आपके जीवित रहने
पर शिशु और प्रजा जीवित रहेगी।"
उपाजिहीर्षुरात्मानं दन्तद्योतार्घडम्बरैः ।
अर्चयन्निव चामुण्डामथोवाच स पार्थिवः ॥ ४६ ॥
४६. "स्वयं उपहार बनने के लिये उत्सुक नृप ने दन्त प्रभा रूपी अर्घ पुञ्ज से मानो
चामुण्डा१ की अर्चना करते हुए कहा-
पाठभेद :
श्लोक संख्या ४३ में 'काय, का पाठभेद 'कार'
मिलता है।
पादटिप्पणियाँ :
४४ (१) राजतरंगिणी सूक्ति संग्रह का ५६वां
श्लोक है।
४६ (१) चामुण्डा: स्कन्द पुराण (५:१:३८)
में उल्लेख मिलता है। शुंभ तथा निशुंभ ने देवी
का वध करने के लिये चण्ड एवं मुण्ड नामक दो
राक्षसों को भेजा था। देवी ने उनका वध किया।
चण्ड एवं मुण्ड के वध के पश्चात् देवी ने शुंभ एवं
निशुंभ का वध किया। अतएव देवी का नाम
चामुण्डा पड़ा।
रक्तबीज एक असुर था। वह शुम्भ निशुम्भ के पक्ष का योद्धा था। रुद्र के वर प्रभाव से उसका एक बूंद रक्त पृथ्वी पर पडते रक्त बूंद के बीज स्वरूप एक असुर उत्पन्न हो जाता था। चामुण्डा बूंदों के गिरते ही रक्त चाट जाती थी। असुर उत्पन्न होने की नौबत ही नहीं आती थी। चामुण्डा ने रक्तबीज का नाश किया। (दे० भा० ५:२७-२९; मार्क० ८५, शिव० उमा ४७)
चामुण्डा के सम्मुख नर बलि का वर्णन भवभूति ने 'मालती माधव' नाटक में किया है। नाटक के पंचम अंक में नायक ने नायिका की रक्षा करते समय अघोर घंट पुरोहित का वध किया था।-
तृतीय तरंग ४७५
सदाचारसुधास्वादे के भवन्तो वनौकसः ।
जाह्नवीमज्जनप्रीतिं न जानन्ति मरुस्थिताः ॥ ४७ ॥
४७. 'सदाचार रूपी सुधा का स्वाद आप वनवासी कैसे जान सकते हैं ? मरुस्थल
निवासी गंगा स्नान (मज्जन) के आनन्द को नहीं जानते ।
ध्रुवापायेन कायेन क्रीणतः कीर्तिमव्ययाम् ।
ममाभीष्टं प्रमाष्टुं ते मूढ रूढोऽयमाग्रहः ॥ ४८ ॥
४८. 'हे मूढ ! अवश्यमेव नश्वर इस शरीर से अविनाश्वर कीर्ति का क्रय करते,
मेरे अभीष्ट के नाश हेतु, तुम्हारा यह दुराग्रह (क्यों ?) बढ़ गया है ।
मा वोचः किंचिदपरं प्रहर्तुं चेद्घृणा तव ।
न किं निजः कृपाणो मे शक्तः प्रक्रान्तसिद्धये ॥ ४९ ॥
४९. 'और कुछ मत कहो । यदि प्रहार करने में तुम्हें दया (आती) है, तो क्या
मेरा कृपाण प्रस्तुत कार्य सिद्धि में समर्थ नहीं है ?'
इत्युक्त्वा स स्वयं देहमुपहर्तुं समुद्यतः ।
खण्डनाय स्वमुण्डस्य विकोशं शस्त्रमादधे ॥ ५० ॥
५०. ऐसा कहकर, देह को उपहार करने के लिये उद्यत वह स्वयं अपने मुण्ड के
खण्डन हेतु कोश से शस्त्र निकालकर, धारण कर लिया ।
ततः प्रहर्तुकामस्य तस्य द्युकुसुमैः शिरः ।
करश्च दिव्यवपुषा रुद्धः केनाप्यजायत ॥ ५१ ॥
५१. प्रहारोत्सुक उनका शिर आकाश से गिरे पुष्पों से आच्छादित हो गया, और
किसी दिव्य शरीरी ने हाथ को रुद्ध कर दिया ।१
अथापश्यत्तथाभूतः कञ्चिद्दिव्याकृतिं पुरः ।
न चण्डिकां न तं वध्यं न किरातं न दारकम् ॥ ५२ ॥
५२. तथाभूत उसने सम्मुख कोई दिव्याकृति देखी । (किन्तु) चण्डिका, किरात,
दारक (शिशु) एवं वह वध्य दिखायी नहीं दिया ।
पादटिप्पणियाँ :
४७(१) राजतरंगिणी सूक्तिका ५७वां श्लोक है ।
पाठभेद :
श्लोक संख्या ४८ में 'भीष्टं' का 'भीष्टा' तथा 'रूढ़ो' का पाठभेद 'मूढ़ो' मिलता है ।
श्लोक संख्या ५० में 'दधे' का पाठभेद 'ददे' मिलता है ।
पादटिप्पणियाँ :
५१ (१) हाथ रुद्ध करना : बाइबिल में वर्णन आता है कि अब्राहम अपने पुत्र को बलि भगवान् पर चढ़ा रहा था । उसने प्रहार के लिये हाथ उठाया था कि ईश्वरीय शक्ति ने उसका हाथ रोक लिया । इस प्रकार के चमत्कारों से विश्व का पूरा साहित्य भरा पड़ा है ।
पाठभेद :
श्लोक संख्या ५२ में 'पुरः' का पाठभेद 'पुनः' मिलता है ।
राजतरंगिणी
४६७
स तं दिव्यस्तदाऽवादीन्मां त्वं सत्त्ववशीकृतम् ।
विद्धि मध्यमलोकेन्दो वरुणं करुणानिधे ॥ ५३ ॥
५३. उस समय उस दिव्य (व्यक्ति) ने उससे कहा—'हे मध्यमलोकेन्दु !
करुणानिधे ! ! तुम मुझे सत्त्व वशीकृत वरुण' जानो।
यदेतत्त्वामुपास्तेऽद्य छत्रं तन्मत्पुरात्पुरा ।
महाबलोऽहरद्भौमः पुराणश्वशुरस्तव ॥ ५४ ॥
५४. 'आज यह जो छत्र तुम्हारी सेवा में है, उसे पहले मेरे नगर से तुम्हारे पुराण
श्वशुर महाबली भीम' ने अपहृत कर लिया था।
रसातलेकतिलकं माहात्म्यवदिदं विना ।
उपद्रवाः प्राणहराः पौराणां नः पदे पदे ॥ ५५ ॥
५५. 'रसातल' का एक मात्र तिलक माहात्म्यशाली इस (छत्र) के विना मेरे
पुरवासियों के पद-पद पर प्राणहारी उपद्रव होते हैं।
श्लोक संख्या ५३ में 'त्वं' का पाठभेद 'स्वा'
मिलता है।
पादटिप्पणियाँ :
५३ ( १ ) वरुण : पाद टिप्पणी 'वरुण'
रा० त० २।५८ द्रष्टव्य है। वरुण सूर्य के नव
ग्रहों में एक ग्रह भी है। यह बहुत बड़ा पिण्ड है।
अत्यन्त दूरस्थ होने के कारण दूरदर्शी के बिना
नहीं देखा जा सकता था। सन् १८४६ में प्रथम
बार दूरदर्शी द्वारा इसकी वास्तविक स्थिति ज्ञात
हुई थी। किन्तु अविष्कार बहुत पूर्व ही विना दूर-
दर्शी के हो चुका था। भारतीयों को इसका ज्ञान
सुदूर पूर्व काल से था। वरुण का व्यास लगभग
३३,००० मील है। सूर्य से २७९ करोड़ मील पर
स्थित है। यह साड़े तीन मील प्रति सेकण्ड घसकर
१६५ वर्षों में सूर्य की परिक्रमा करता है।
नेपचून शब्द के लिये वरुण शब्द का प्रयोग किया
गया है।
शतपथ ब्राह्मण में कूर्म को वरुण का सहायक
माना गया है। (७.५.१.९) नीलमत पुराण में
वरुण को मरुत ( 619, ), आदित्य (607) तथा,
जलदेवता ( 384 ) के रूप में चित्रित किया गया
है। उसका सम्बन्ध नरक से भी जोड़ा गया है।
( 1381 ) "जलाधिपेन शातस्य नरके पतनं कृत."
इसी पुराण के अनुसार वरुण तीर्थ की बलि तथा
प्रतिमा की स्थापना पुलहस्त्य ने की थी। ( 1004
—1006 ) कार्तिक पूर्णिमा को वरुण पूजा का भी
उल्लेख नीलमत पुराण में मिलता है। ( 435—
437 ) वरुण पंचमी की विशेष रूप से पूजा कश्मीर
में होती थी। ( 755 ) वरुण यात्रा उत्सव का
विधान भी नीलमत पुराण में अन्य यात्रोत्सव के
साथ रखा गया है। ( 804-865 ) नीलमत
वरुणलोक का भी उल्लेख करता है।
५४ ( १ ) भौम : इस दैत्य का दूसरा नाम
'नरक' है। उसे 'नरकासुर' भी कहते हैं।
५५ ( १ ) रसातल : सप्त अधोलोकों में से
एक लोक है। पाताल के पाँच लोक यथा-अधोभुवन
पाताल, बलि सद्मन, रसातल तथा नागलोक हैं।
तृतीय तरंग ४७९
तदिदं प्राप्तुकामेन त्वदौदार्यं परीक्षितुम् ।
कारुण्यमय मायेयं निर्मायि मयेदृशी ॥ ५६ ॥
५६. 'हे करुणामय ! ! इसे (छत्र) प्राप्त करने की इच्छा से तुम्हारे औदार्य की
परीक्षा हेतु, इस प्रकार की यह माया निर्मित की।
त्वदादिर्यो व्यधाज्जन्तून्व्यसून्वसुकुलात्मजः ।
प्रायश्चित्तममारेण चरसीव तदेनसः ॥ ५७ ॥
५७. 'तुम्हारे पूर्ववर्ती वसुकुलात्मज' जिसने प्राणियों का वध किया था, उसके
पाप का इस अहिंसा द्वारा (अब) प्रायश्चित्त कर रहे हैं।
भयस्पृहाजनकयोर्धरणीधारणोचिते ।
शेषदेहे विषोद्गारफणारत्नौघयोरिव ॥ ५८ ॥
५८. 'धरणी धारण हेतु शेष शरीर में जैसे क्रमशः भय एवं अभिलाष (स्पृहा)
उत्पन्न कारक विषोद्गार तथा फणरत्न समूह रहते हैं।
सुभाषित रत्नाकर में इसका अर्थ पृथ्वी किया
गया है। रसातल शब्द साधारणतया नरक के लिये
प्रयुक्त होता है। प्राग्ज्योतिष तथा वरुण लोक
रसातल नहीं है।
पाठभेद :
श्लोक संख्या ५६ में 'कारुण्यमय' का पाठभेद
'करुणामय' मिलता है।
पादटिप्पणियाँ :
५७ (१) वसुकुलात्मज : कल्हण मेघ-
वाहन को मिहिरकुल का वंशज यहाँ बताता है।
द्रष्टव्य है रा. त. १:२८८-३२५ पृष्ठ २१२-३३३ ।
दक्ष कन्या एवं धर्म की पत्नी का नाम वसु
था। उससे आठ वसु हैं। उन्हें अष्ट वसु कहा
जाता है। हरिवंश, स्कन्द एवं विष्णु पुराणों में
इनका नाम—धर, ध्रुव, सोम, अप, अनल, अनिल
प्रत्यूष तथा प्रभास हैं। नीलमत पुराण भी आठ
वसुओं की तालिका देता है। उससे यह तालिका
मिलती है । (603) नीलमत नव संवत्सर
अर्थात् चैत्र शुक्ल एक को वसुपूजा का माहात्म्य
उपस्थित करता है।
भागवत में उनका नाम—द्रोण, प्राण, ध्रुव,
अर्क, अग्नि, दोष, वसु तथा विभावसु दिया गया
है। महाभारत में 'अप्' के स्थान में 'अहः' तथा
शिव पुराण में 'अयज' नाम दिया गया है। अष्ट
वसुओं के नायक अग्नि हैं।
ऋग्वेद में वसु गण पृथ्वी निवासी देवता है।
वसु नाम के अनेक वैदिक एवं पौराणिक देवताओं
का उल्लेख मिलता है।
पाठभेद :
श्लोक संख्या ५८ में 'पारणांचिते' का पाठ
भेद 'धरणोचिते' मिलता है।
पादटिप्पणियाँ :
५८ (१) चकलम् : कतिपय अनुवादकों ने
श्लोक संख्या ५८-६१ श्लोकों का अनुवाद एक साथ
चार श्लोकों को 'चवस्कलम्' चारपद का मान कर
किया है। यहाँ अनुवाद प्रत्येक श्लोक का अलग-अलग
दिया गया है। निस्सन्देह कुछ प्रति में चवक्कलम होने
का निर्देश किया गया है।