राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
पृष्ठ 613, कुल 984 में से
संदर्भ में पढ़ें४६४ तृतीय तरंग
अर्धे यद्भिक्षवः शिष्टाचारारतस्तत्राऽर्पितास्तया ।
अर्धे गार्हस्थ्यगर्ह्याश्च सस्त्रीपुत्रपशुश्रियः ॥ १२ ॥
१२. वहाँ अर्ध भाग में शिष्टाचार¹ रत भिक्षुओं² तथा अर्ध (अपरार्ध) भाग में
स्त्री पुत्र पशु धन वाले गर्ह्य गृहस्थों के लिये व्यवस्था की ।
नरबोर के कब्रिस्तान तथा ज़ियाराते कश्मीर
के अन्य कब्रिस्तानों के और ज़ियारातों के समान
प्राचीन भवनों के ध्वंसावशेषों से पूर्ण है । भूमि
के अन्दर कितने अलंकृत शिला खण्ड एवं मूर्तियाँ
होंगी कौन जाने भूमि की सतह से प्राप्त शिलाओं
आदि के देखने से वास्तविक अनुमान लगाना
कठिन है ।
पाठभेद :
श्लोक संख्या १२ में 'यद्भिक्ष' का 'यद्विप्र' तथा
'श्रियः' का 'स्त्रियः' पाठभेद मिलता है ।
पादटिप्पणियाँ :
१२ (१) शिष्टाचार : बौद्ध धर्मावलम्बियों
में एक प्रव्रज्या लेने वाले चीवरधारी भिक्षु होते हैं।
दूसरे गृहस्थ उपासक होते हैं । भिक्षु गृह त्यागी
होता है । गृहस्थ सकुदुम्ब भगवान् का उपासक
मात्र होता है । वह घर त्यागता नहीं ।
कल्हण दोनों प्रकार के बुद्ध धर्मावलम्बियों
की व्यवस्था का उल्लेख करता है । गृहस्थ भी
कुछ समय के लिये भिक्षु होकर विहार में निवास
करते हैं । बौद्ध देशों में प्रत्येक व्यक्ति को
कम से कम तीन
नेपाल में विवाहित भिक्षु जन साधारण की
तरह कार्य करते हैं । व्यापार करते हैं । खेती
करते हैं । प्रायः बुद्ध धर्म के कठोर शासन का
व्यवहार नहीं करते ।
प्रतीत होता है । उस समय कश्मीर में इस
प्रकार के भिक्षुओं की परम्परा तथा वर्ग रहा होगा ।
अतएव रानी ने दोनों प्रकार के भिक्षुओं के लिये
व्यवस्था की थी ।
(२) भिक्षु : इस शब्द का शाब्दिक अर्थ भिक्षुक
भिखारी होता है । यह शब्द बौद्ध भिक्षुओं के
लिए रूढ हो गया है । अतएव इसका अर्थ बौद्ध
संन्यासी होता है । भिक्षु चर्या अर्थात् भिक्षा वृत्ति
ही भिक्षुओं को जीवन-यापन का एक मात्र साधन
हैं। भिक्षुओं के वस्त्र को संघाटी तथा चीवर कहते
हैं । विशेष द्रष्टव्य हैं रा. त. १:१८४, १८९ पृष्ठ
२५२-२५३,
प्रव्रज्या प्राप्त करने पर भिक्षु श्रामणेर कहा
जाता है । उसे एक उपाध्याय किंवा आचार्य के
निश्चय में रहना होता है । उसके शील में १०
विरतियाँ वर्जनीय हैं—प्राण घात, चोरी, अब्रह्मचर्य,
मिथ्याभाषण, मद एवं नशा विकाल भोजन, नृत्य-
गान-वाद्य, तमाशा माला-गंध-विलेपन-अलंकरण; ऊँची
बहुमूल्य शय्या सुवर्ण रजत ग्रहण ।
भिक्षुओं का चार निश्चय-पिण्डपात, चीवर,
शयनाशन, ग्लान प्रत्यय, भेषज हैं भिक्षु उपोसोष
के लिये प्रति पक्ष एकत्र होते थे । इस अवसर पर
प्रतिमोक्ष का पाठ किया जाता था । प्रतिमोक्ष के
आठ विभाग—पाराजिक, संघावशेष, अनियत,
नैसर्गिंक, पातयंतिक, प्रतिदेशनीय, शैक्ष एवं
अधिकरण दामय हैं । अपराधी भिक्षु अपने व्यतिक्रम
देते हैं । वर्मा
चीवर धारक
देखा है कि
भिक्षु बनकर
गार का निर्वाह
हर्तव्य को दृष्टि
कश्मीरिका
जोन रा० अन्त में
(१५:१०२, टिका, (रा.
(२) अर्द्ध: ७५६) तथा
प्रचलित शब्द थे।
प्राकृत नाम अपभ्र