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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 612, कुल 984 में से

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पृष्ठ 612

राजतरंगिणी ४६३
देशैकदेशाल्लोर्नाम्नः प्राप्तस्तस्याः पितुर्गुरुः ।
स्तुन्पा तद्भाषया प्रोक्तो लोस्तोन्पास्तूपकार्यभूत् ॥ १० ॥
१०. देश के एकदेश ( भाग ) जिसका नाम लोह¹ था, उसके पितृ गुरु, जिन्हें
उनकी भाषा में स्तुन्पा² कहते थे, आये और स्तूप लोस्तोन्पा बनवाया ।
चक्रे नडवने राज्ञो यूकदेव्यभिधा वधूः ।
विहारमद्भुताकारं सपत्नोस्पर्धयोग्यता ॥ ११ ॥
११. राजा की यूक देवी नाम्नी वधू ने सपत्नी की स्पर्धा से नडवन¹ में अद्भुत
आकार वाला भवन निर्माण कराया ।
पाठभेद :
श्लोक संख्या १० में 'देशैक' का 'देशक';
'स्तुन्पा' का 'स्तुत्या' 'स्तुम्पा' 'स्तन्पा' का 'लोस्तोन्पा'
का 'लोस्तोन्था' 'लोस्तुन्व' और 'र्यंभूत्' का पाठभेद
'र्यकृत्' मिलता है ।
पादटिप्पणियाँ :
१० ( १ ) लोह : वर्त्तमान लेह अंचल है ।
महाभारत में उत्तर दिशा के विजय में अर्जुन ने
इसे जीता था ।
( २ ) स्तोन्पा : यह शब्द तिब्बती स्तोन-
पा है । इसका मूल संस्कृत शाष्टा किंवा उपदेश है ।
तिब्बत में इसका शाब्दिक अर्थ उपदेशक अथवा
शिक्षक होता है । यह शब्द बुद्ध के लिये प्रयुक्त
किया जाता है ।
लद्दाख में इसका उच्चारण तोन्पा किया जाता
है । तिब्बत के नगर लासा में लोम वा कहते हैं ।
दक्षिणी तिब्बत को अब भी लोह कहते हैं ।
अमृतप्रभा प्राग्ज्योतिष के राजा की कन्या थी ।
उसके गुरु अल्लोर थे । वह तिब्बत के थे । इससे
दो बातें प्रकट होती हैं । प्रथम तिब्बत तथा आसाम
का घनिष्ठ सम्बन्ध प्रकट होता है । दूसरी बात
यह प्रकट होती है कि बुद्ध धर्म का प्रचार उस
समय तक सामाम में हो गया था ।
रानी अमृतप्रभा का गुरु बौद्ध था । पिता
तथा कन्या दोनों का बुद्ध तथा बौद्ध धर्म की ओर
झुकाव होना स्वाभाविक था ।
राजा मेघवाहन पर रानी अमृतप्रभा के
कारण बौद्ध धर्म का प्रभाव पड़ा होगा । राजा की
प्रवृत्ति अहिंसक हो गयी ।
लोह, लोहर, लोह कोट, तीनों स्थान भिन्न-
भिन्न हैं। उनका यथा स्थान वर्णन किया गया है।
पाठभेद :
श्लोक संख्या ११ में 'यूक' का पाठभेद 'मूष'
दिया गया है ।
पादटिप्पणियाँ :
११ (१) नडवन : यह वर्त्तमान नरवोर स्थान
है। श्रीनगर के उत्तर-पश्चिम संगीन दरवाजा
तथा ईदगाह के बीच स्थित है। इसका एक पुरातन
नाम नाद्रवाट था । वाट शब्द महत्वपूर्ण है।
थाईलैंड, कम्बोडिया आदि स्थानों में वाट का
अर्थ बौद्ध विहार होता है। वाट का अर्थ बाग
भी होता है। वाटिका शब्द उपवन के लिये आज
भी प्रचलित है। वोर शब्द इसी वाट एवं वाटिका
का अपभ्रंश है। कश्मीर के स्थानीय नामों के अन्त में
'वोर' शब्द प्रायः मिलता है। भू ओर वाटिका, (रा.
त. १:३४२) राजन वाटिका (रा. त. ८: ७५६) तथा
रंग वाटिका (रा. त. ७:१६५३) प्रचलित शब्द थे ।