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पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

अथ दिल्ली किल्ली कथा लिख्यते ।
(द्वितीय समय)
——————
मंगलाचरण ।
चंद की अपनी स्त्री के प्रति उक्ति कि विधना ने दिल्ली
सोमेसरनंद के बसने को निर्माण की है ॥
साटक ॥ राजं जा अजमेर केलि कलयं, वंदं व्रतं संभरी ।
जुद्धारा भर भीर मीर वचनो, दहनो दुरंगो अरी ॥
सो सोमेसरनंद दंड गछिला, वच्छिला वनं * वासनं ।
निम्मानं विधना सुजान कविना, दिल्हीपुरं वासनं ॥ छं० ॥ १ ॥ रू० ॥ १ ॥
चंद का अपनी स्त्री को कहना कि अनंगपाल की पुत्री को पुत्र
उत्पन्न होने से दिल्ली की पूर्व कथा का प्रसंग प्राप्त हुआ है ॥
कवित्त ॥ अनगपाल पुत्तीय सुरँग †, पुत्त इच्छा फल दिन्नौ ।
नारिकेर फल सुफल, संत आरंभन किन्नौ ॥
तब प्रसाद उप्पन्नौ, पुब्ब संडो कथ भारिय ।
बर बीसल वै बंस, कह्यौ वर द्रुग्ग विचारिय ॥
पृथिराज जोति बरनीह कवि, अस्तिमंत सामंत भर ।
चंदानि बदनि सुनि चंदमति, भयौ दानवी बंसवर ॥ छं०॥२॥ रू० ॥२॥
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१ पाठान्तर–बच्छिला । बासन । सुजांन । बासनं ॥
विदित रहे कि यहां कवि ने किसी देवता का मंगलाचरण न कर के पदार्थनिर्देशवत्
मंगलाचरण किया है ॥ * जहां दिल्ली बसी है उस बन का पुराना नाम है ।
२ पाठान्तर–†अधिक पाठ है । पुत्र । इच्छा । दीनौ । कीनौ । प्रशादं । रूपनौ । चारिय ।
वै । दुग्ग । विचारीय । प्रथीराज । अस्तमंत । दानव ॥

२५६ पृथ्वीराजरासो [ तीसरा समय २
बालकपन में पृथ्वीराज का दिल्ली प्राप्त करने का स्वप्न देखना ॥
दूहा ॥ बालपन प्रथिराज ने, दृढ सुपनन्तर चिन्ह ।
लै जुग्गिनि जुग्गिनि पुरह*, तिलेक अच्छ करि दिन्ह ॥ छं० ॥ ३ ॥ रू० ॥ ३ ॥
कछु सोवत कछु जागते, निसि सुपनंतर पाय ।
अद्ध रयन के अंतरै, सुष सुत्तच सुभदाय ॥ छं० ॥ ४ ॥ रू० ॥ ४ ॥
अभयदायिनी नाम तिहिं, जुग्गिनि जग आधार ।
सुपनंतर सुभदायिनी, आयै आप पधार ॥ छं० ॥ ५ ॥ रू० ॥ ५ ॥
कनक कंत्ति दुति चंग की, निरषि सु पातग जात ।
परमानन्दप्रदायिनी, पार करन जग मात ॥ छं० ॥ ६ ॥ रू० ॥ ६ ॥
नष सिष प्रभा प्रकास दुति, चंद सुष कमल सुफूल ।
बरन बरन नग जोति जग, जरकस कंत्ति दुकूल ॥ छं० ॥ ७ ॥ रू० ॥ ७ ॥
पृथ्वीराज की माता का उससे स्वप्न का वृत्तान्त पूछना ॥
दूहा ॥ सुंपन पुच्छि माता तबै, कहौ पुत्र सब भाय ।
जो दिष्यिय तुम अई निसि, सो कारन समझाय ॥ छं० ॥ ८ ॥ रू० ॥ ८ ॥
पृथ्वीराज का माता को उत्तर दे स्वप्न का वृत्तान्त कहना ॥
कवित्त ॥ करि जुग्गिनी रत भेस, सुरंग सिंगार अभासिय ।
चंद पंक्ति तारक्क, चरन परि बिंटि प्रहासिय ॥
अंबर दिय उच्चार, दिव्य बानी धुनि मंडिय ।
ध्यान में रहे कि यहां से सब कथा चंद और उसकी स्त्री के संवाद में है और उस
संवाद के अंतर्गत अन्य सब संवाद वर्णन किए गए हैं, अतएव छंदो का लगाना कुछ गूढ सा
हो गया है। निदान हमारे दिए शीर्षकों के बल से अर्थ सुगमता से लग सकता है ॥
३-७ पाठान्तर-बालपन । पृथ्वीराज । निसि । जुगिनि । जुगिनिपुरह । हथ ॥ ३ ॥
निशि । पाइ । अध । रयनिकै । सुभ सुत्तै सुभदाइ ॥ ४ ॥ अभैदायिनी । तिहि । जुगिन । सुभ-
दायिनी । आपै ॥ ५ ॥ अंगसह । पातक्र ॥ ६ ॥ सफूल । सुफूति । बरन बरन नंग । जर्कस ॥ ७ ॥
इनमें सं० १६४७ की लिखित पुस्तक के अनुसार दोहा ६ और ७ का पाठ है, परन्तु,
उसके इधर की लिखी नवीन पुस्तको में उनके पहिले पाद तो ऐसे ही हैं, किन्तु शेष तीन पाद
६ के ७ में और ७ के ६ में लिखे मिलते हैं ॥ * जुग्गिनिपुरह-दिल्ली का एक पुराना नाम है ॥
८ पाठान्तर-सुपिन । पुद्धि । कहौ । कहह्या । समभाय । सबभाडू । दिषियं । दिष्यवि ।
समुझाइ ॥

तीसरा समय ३ ] पृथ्वीराजरासो । २५७
सुपर्नंतर चहुवान, जाय जुग्गिनिपुर मंडिय ॥
जाग्रंत सात दिप्यो सुपन, प्रकृत्ति न कोय तिन थान रद्दि ।
भय प्रात मात पुच्छिय प्रगट, सो सुपर्नंतर अरथ कहि ॥
छं० ॥ ९ ॥ रू० ॥ ९ ॥
पृथ्वीराज की माता का स्वप्न का वृत्तान्त सुन
अद्भुत रस में रंजित होना ॥
अरिल्ल ॥ सुनि सुनि बचन मात तब बुझिय, सुभ अद्भुत चित्तरस झुझिय ।
सुप दृप द्रिग्ग भरी जन आइय, मन भौ चास कहन फुनि आइय ॥
छं० ॥ १० ॥ रू० ॥ १० ॥
उसका ज्योतिषियों को बुला स्वप्न का सत्यफल पूछना ॥
दूहा ॥ तब बुलाय सब जोग्गी, कहो सुपनफल सत्य ।
दिवस पंच के अंतरे, होय सु दिल्लीपत्ति ॥ छं० ॥ ११ ॥ रू० ॥ ११ ॥
गाथा ॥ ढिल्ली वै स्वपनं तं, प्रातं कत्थिय* प्रगट विप्रायं ।
जोतिग गनिक गुनीसं, सुनियं ते। सत्ति रुत्तार्यं ॥ छं० ॥ १२ ॥ रू० ॥ १२ ॥
ज्योतिषियों का उत्तर दे कहना कि पृथ्वीराज
दिल्ली का राजा होगा ॥
दूहा ॥ न इह बात जोतिग घटै, मनसु धुच्च थिरताव ।
जोग नेर† जोतिग कहै, प्रभु सु होय प्रथुराव ॥ छं० ॥ १३ ॥ रू० ॥ १३ ॥
९ पाठान्तर-कवित्त षट्पद । जुगिनि । *सुरंग । शृङ्गार । अभ्यास्यि । तारक (कै)
अधिक पाठ है । भांन । महापीय । उच्चार । बानी । मंदीय । चहुवांन । चहुआन । जाइ ।
जोगिनपुर । कुंडिय । जाग्रन । मंत्र । दिब्यौ । सुपनः । प्रकृत । कोइ । पुंछि । सुपनंतर । अर्थ ॥
१० पाठान्तर-बचन । चित्त । झुलिय । द्विग् । भरि । भए ॥
११ पाठान्तर-बुलाय । बुजाइ । जेतषी । कहि । कहै । सति । कहै । होइ । दिल्ली ।
पति ॥
१२ पाठान्तर-ऊहीय । * यहां “गाथा” पाठ सं० १८५६ ली. पुस्तक में अधिक हैं।
विप्रायं । सति । मता ॥
१३ पाठान्तर-नह । बात । म॑निसु । धुच्च । जोगनयर । जोतिषि । होइ । एथुराज ॥
† दिल्ली का पुराना नाम ॥

२५८ पृथ्वीराजरासो । [ ताँवरो समय ४
ज्योतिषियों को विदा कर माता और पुत्र का
एक गृह में जा बैठना ॥
दूहा ॥ न इह कथ्थ दुजराज कथि, प्रनमि करी सु विदाय ।
मात पुत्त दो इक्क गृह, बरतति बैठे आय ॥ छं० ॥ १४ ॥ रु० ॥ १४ ॥
अनंगपाल की पुत्री का अपने पुत्र के आगे दिल्ली की पहली
किल्ली की पूर्वकथा का कहना और राजा कल्हन का वनक्रीडा
करते सुसा और स्वान के चरित्र से भूमि का वीरत्व देखना ॥
कवित्त ॥ तब अनगानी पुत्ति, कहै सुनि पुत्त सु वत्तह ।
पुब्ब कथां ज्यौं भई, सुनौ त्यौ कहूं अपुब्बह ॥
इम पितु पुरिषा पुब्ब, नृपति कल्हन* वन क्रीडत ।
सुसा छंडि ता पुट्ट, स्वान संचरिय सचीलत ॥
सिसु संमुख हुइ बैठी सु तहां, अग्गि स्वान भै भीत हुअ ।
सब सभ्य तथ्य आचिज्झ भय, करि पारस ठड्ढे सुभय ॥ छं० ॥ १५ ॥ रु० ॥ १५ ॥
उस वीरभूमि में व्यास का कीली गाड़ना ॥
दूहा ॥ व्यास † जोति जग जोति तहँ, सिद्ध महूरत ताव ।
दैव जोग सेसच्च सिरह, किल्ल किल्लित सु ग्राव ॥ छं० ॥ १६ ॥ रु० ॥ १६ ॥
१४ पाठान्तर—नह । कथ । विदाय । पुत । दोइ । इक । यह । बैठ । आइ ॥
१५ पाठान्तर—पुत्रि । कैह । पुत्रि । पुत्र । वतह । ज्यों । सुनौ । तूं । कहौं । पित्त । पुर्वि
किल्हन । स्वांन । सचीलति । सव्वीलत । समुष । होय । होइ । बैठौज । स्वांन । श्वान । भय ।
होइ । सभ । तथ । आजिज । ठट्ठे ॥ * कल्हन चन्द्र का वाचक होने से राजा चन्द्र । उपसं-
हरणी टिप्पण देखो ॥
१६ पाठान्तर—दैवयोग । सिरनि । कील । कलित ॥
† व्यास राजगुरु का वाचक है । तँवर राजपूतों के पांडववंशीय गिने जाने से उनके
राजगुरु व्यास कहाते थे । यह वह व्यास था जो कल्हन राजा के समय में राजगुरु था ॥

तीसरा समय ५ ] पृथ्वीराजरासो । २५६
वहां कल्हन का कल्हनपुर बसा कर राज करना और फिर
उसके कितनीक पीढ़ी पीछे अनंगपाल का होना ॥
दूहा ॥ कल्हनपुर * कल्हन नृपति, बामी नृप निज साज ।
कितक पाट अंतर नृपति, अनगपाल भय राज ॥ कूं० ॥ १७ ॥ रू० ॥ १७ ॥
इतनी कथा सुनकर राव ( पृथ्वीराज ) के मन में अचरज हुआ ॥
दूहा ॥ सुनत राव इह कथ्य फुनि, उपजयि अचरज अंग ।
निश्चल अंग धीरज रचित, भयो दुमति मति पंग ॥ कूं० ॥ १८ ॥ रू० ॥ १८ ॥
विपरीत समय का आना देखकर सकल सभा का शंकित होना ॥
दूहा ॥ सकल सभा संकित भई, व्यास वयन वर वेद ।
क्रमयं समय विपरीत भय, उपज्यो अंतर भेद ॥ कूं० १८ ॥ रू० ॥ १८ ॥
† दूसरी किल्ली की कथा ॥
अनंगपाल की पुत्री का अपने पुत्र (पृथ्वीराज) के आगे
अपने पिता के फिर से दिल्ली बसाने के लिये पाषाण
और किल्ली गाड़ने की कथा का कहना ॥
कवित्त ॥ अनगपाल पुत्तीय, फेरि बुल्ली सुत सम्मुख ।
एह बत्त आचिञ्ज, उपजि मो पित्त तु तव्वह ॥
पृच्छि व्यास ‡ जग जोति, राज मंचौ उक्वव घन § ।
१७ पाठान्तर-किल्हनपुर । किल्हन । अनंगपाल । भयो ॥

  • कल्हन राजा के दिल्ली बसाने के समय का दिल्ली का पुराना नाम कल्हनपुर है ॥
    १८ पाठान्तर-कथ । अचरिज ॥
    १९ पाठान्तर-बंचन । विपरति ॥
    † ध्यान में रहे कि कल्हन के पीछे कई पीढ़ी तक तँवर कल्हनपुर में सुख से राज करते
    रहे और रूपक-१८ और १९ कवि ने दूसरी किल्ली की कथा का प्रसंग मिलाने के लिये कहे हैं।
    क्योंकि जो कुछ विपरीत हुआ है वह दूसरी किल्ली के पीछे हुआ है ॥
    २० पाठान्तर-अनंगपाल । पुत्रीय । बोली । संमुख । बत । आचिज । पित । तवह ।
    पुद्धि । व्यास । उक्तव । नांम । कुशल । सह्नि । गढयो ॥ ‡ अनंगपाल के समय का राजगुरु ॥
    § इससे स्पष्ट है कि अनंगपाल ने दूसरी वार दिल्ली बसाने का प्रयत्न संतान की कामना
    से किया था । इसी लिये कवि ने-याम नाम आंपिये, कुसल जिन होय यह धन-कहा है ।
    और "धन" शब्द यहां सन्तान का वाचक है ॥

२६० पृथ्वीराजरासो। [तीसरा समय ६
ग्राम नाम अप्पियै, कुसल जिन होय ग्रेह धन ॥
चिंतयौ चित्त दुजराज तब, अगम निगम करि कढ्ढयौ ।
सुभ घरी मूरत संधि कैं, फिरि पाषान सु गढ्ढयौ* छंदं० ॥ २० ॥ रु० ॥ २०
व्यास का कहना कि पांच घड़ी तक पाषाण को हाथ न
लगाने से वह शेष के सिर पर दृढ हो जायगा परन्तु
राजा का इसे अनर्थ कर मानना ॥
कवित्त ॥ कहै व्यास जग जोति, सुनहि तूंवर नरिंद तुअ ।
एह सेस सिर गाव, अंचल निहचल सुरंग धुअ ॥
सोचि अरथ पल पह, केह अप्प नह राजन ।
पंच घरी इह मुक्कि, राज रचिये इन काजन ॥
इतनौ जु कह्यौ वर व्यास तहँ, इन अनत्थ का मानयौ ।
भवक्त्तिबत्त मिहै न को, क्त कर्म नह जानयो ॥ छंदं० ॥ २१ ॥ रु० ॥ २१
साठ अंगुल की कीली गाड़ना अर्थात् शंकुपात कर्म करना ॥
अरिल्ल ॥ सुनी बत्त इह तत्त प्रमानं, व्यास करी किल्ली पुर†थानं ।
साठि सु अंगुल लोहय किल्लिय, सुकर सेस नागन सिर मल्लिय ॥
छंदं० ॥ २२ ॥ रु० ॥ २२ ॥
सब के बरजने पर भी उस कीली को उखाड़ डालना ॥
अरिल्ल ॥ मुंध लोइ आचिज्ज सु मान्यौ, भावी गति सो व्यास न जान्यौ ।
बरजे सब परिगह परिमानं, उच्चारी कील्ली भू थानं ॥ छंदं ॥ २३ रु २३
पाषाण के उखाड़तेही रुधिर की धार चलना और आश्चर्य्य होना ॥
कवित्त ॥ अनंगपाल पृथ्वी, नरेस आचिज्ज सु मान्यौ ।
भवसि बत्त जो होय, सोय ब्रह्मान न जान्यौ ॥

  • “फिर पाषान सुगढ्ढयो” अर्थात वास्तुशास्त्रानुसार शिलान्यास कर्म किया ॥
    २१ पाठान्तर-तूंअर । शेष । फिर । निश्चल । धुय । दक । मुक्ति । सु । तहां । अनथ ।
    मांनयौ । कौं । मिट्टै । कृत । क्रम । जांनयौ ॥
    २२ पाठान्तर-बत्त । प्रमांनं । किल्लीपुर । किलीय । मिलिय ॥
    † अनंगपाल के समय का दिल्ली का नाम “किल्लीपुर” ॥
    २३ पाठान्तर-लोय । अचरिज । मान्यौ । जान्यौ । बर्जे । सब । उपारिय । किल्लीय ॥

तीसरा समय ० ] पृथ्वीराजरासो । ०६१
आराधन वर ग्यान, होइ संसार मुषादौ ।
दैवक्रम करि जोग, सोइ पाषान उपाट्यौ ॥
रुधि डंक त्रुटिट संमुह चलिय, अति अद्भुत सु दिप्पियौ ।
परिगह प्रवास मंची नृपति इन आचिज्ज सु लप्पियौ। छं० ॥ २४ रु० ॥ २४॥
पाषाण का उखाड़ लेना सुन व्यास का दुःखित हो
राजा के पास आना ॥
दूह्रा ॥ सुनि आयौ वर व्यास तँह, दुष पायौ मन मस्झ ।
का जंप्यौ सुप नृपति सौं, इह मति मूढ अबुझ्झ ॥ छं० ॥ २५ ॥ रु० ॥ २५ ॥
अनंगपाल का पश्चाताप करना और व्यास का आगम कहना ॥
कवित्त ॥ अनंगपाल चक्कवै, बुद्धि जो इसी उकिल्लिय ।
भयौ तुअर मति चीन, करी किल्लीय तैं ढिल्लिय ॥
कहै व्यास जग जोति, अगम आगम हौं जानों ।
तूंअर तैं चहुआन, अंत व्हैहै तुरकानों ॥
तूंअर सु अवनि मंडव घरह, इक्क राय वन्नि विक्कवै ।
नव सत्त अंत मेवात पति, इक्क छत्र मच्चि चक्कवै ॥ छं० ॥ २६ ॥ रु० ॥ २६॥
व्यास का अनंगपाल को खेद न करने का उपदेश करना ॥
पद्धरी ॥ उच्चरयौ व्यास जग जोति वीर । मृत सुग्गं लोक पाताल नीर ।
चयकान दरस दरसिय सु देव । व्यासद्द समान जोतिगिय तेव ॥ छं० ॥ २७
संसार सार अस्सार कीन । वर व्यास बुद्धि कोविद्द प्रवीन ॥
मंडयौ सु राज सौं क्रोध नूप । बरज्यौ सुकिष्ण व्यासद्द सरूप ॥ छं० ॥ २८ ॥
२४ पाठान्तर-अनंगपाल । प्रथवी । अचरिज । वत । होइ । सोइ । सांख्यौ । ग्यान ।
सोय । सोइ । चलोय । अदभूत । दिपियै । परिगृह । नृपति । आचिज । लिपियै ॥
२५ पाठान्तर-तहां । तह । संझ । नृपति । सों । मूढ मति अससंझ ॥
२६ पाठान्तरः- अनंगपाल । यती । उक्तिलिय । भय । तौंअर । तैं । ढिल्लीय । किल्लाय । हूं
जानै। तोअर । तैं । चहुवानं । हू हैं । होइ है । तुरक । इक । राइ । बिक्कवै । अंति । मनि । इक ।
छत्र०। चक्ववै ॥
२७ पाठान्तर-उच्चयो । मत । स्वर्ग । समांन । जोग्गी । असार । बुधि । सौ ॥
२८ जनमेज । मत । मांन । आंनी । थ्यान ॥

२६० पृथ्‍वीराजरासो । [तीसरा समय ६
ग्राम नाम थप्पियै, कुसल जिन होय गेह धन ॥
चिंतयौ चित्त दुजराज तब, अगम निगम करि कढ्ढयौ ।
सुभ घरी महूरत संधि कैं, फिरि पाषान सु गढ्ढयौ* ॥ छं० ॥ २० ॥ रू० ॥ २०
व्यास का कहना कि पांच घड़ी तक पाषाण को हाथ न
लगाने से वह शेष के सिर पर दृढ हो जायगा परन्तु
राजा का इसे अनर्थ कर मानना ॥
कवित्त ॥ कहै व्यास जग जोति, सुनहि तूंवर नरिंद तुअ ।
एह सेस सिर ग्राव, अचल निच्चल सुरंग धुअ ॥
ओचि अरथ पल एह, केह अप्प नह राजन ।
पंच घरी इह मुक्कि, राज रहियो इन काजन ॥
झूतनौ जु कह्यौ वर व्यास तहँ, दून अनथ्य का मानयौ ।
अवक्तितबत्त मिट्टै न को, कृत क्रम नह जानयौ ॥ छं० ॥ २१ ॥ रू० ॥ २१
साठ अंगुल की कीली गाड़ना अर्थात् शंकुपात कर्म्म करना ॥
अरिल्ल ॥ सुनी बत्त इह तत्त प्रमानं, व्यास करी किल्ली पुर†थानं ।
साठि सु अंगुल लोह्य किल्लिय, सुकर सेस नागन सिर मिल्लीय ॥
छं० ॥ २२ ॥ रू० ॥ २२ ॥
सब के बरजने पर भी उस कीली को उखाड़ डालना ॥
अरिल्ल ॥ मुंघ लोइ आचिज्ज सु मान्यौ, भावी गति सो व्यास न जान्यौ ।
बरजे सब परिगह पग्मानं, उष्वारी कील्ली भू थानं ॥ छं ॥ २३ रू २३
पाषाण के उखाड़तेही रुधिर की धार चलना और आश्चर्य होना ॥
कवित्त ॥ अनंगपाल पृथ्वी, नरेस आचिंञ्ज सु मान्यौ ।
भवसि बत्त जो होय, सोय ब्रह्मान न जांन्यौ ॥

  • “फिर पाषान सुगढ्ढयौ” अर्थात् वास्तुशास्त्रानुसार शिलान्यास कर्म्म किया ॥
    २१ पाठान्तर-तूँअर । शेष । फिरं । निश्चल । ध्रुय । इक । मुक्ति । सु । तहां । अनथ ।
    मांनयौ । कौं । मिट्टै । क्कृत । क्रम । जांन्यौ ॥
    २२ पाठान्तर-बत्त । प्रमानं । किल्लीपुर । किल्लीय । मिलिय ॥
    † अनंगपाल के समय का दिल्ली का नाम “किल्लीपुर” ॥
    २३ पाठान्तर-लोय । अचरिज । मान्यौ । जान्यौ । बर्जें । सब । उषारिय । किल्लीय ॥

आराधंत बर ग्यान, होइ संसार सुघात्यौ ।
दैवक्रत्त करि जोग, सोइ पाषान उघात्यौ ॥
रुधि रुंड छुट्ठि संमुह चलिय, चत्ति अद्भुत सु दिप्पियौ ।
परिगह पवास संची नृपति इन आहिज्ज सुलप्पियौ । कुं० ॥ २४ ॥ छ० ॥ २४ ॥
पाषाण का उखाड़ लेना सुन व्यास का दुखित हो
राजा के पास आना ॥
दूहा ॥ सुनि आयौ वर व्यास तँह, दुप पायौ मन मज्झ ।
का जंप्यौ मुप नृपति सैं, इह मति मूढ अभुज्झ ॥ कुं० ॥ २५ ॥ रु० ॥ २५ ॥
अनंगपाल का पश्चाताप करना और व्यास का आगम कहना ॥
कवित्त ॥ अनंगराय चक्कवै, बुद्धि जो इसी उकिल्लिय ।
भयौ तुम्हार मति हीन, करी किल्लिय तैं ढिल्लिय ॥
कहै व्यास जग जोति, अगम आगम हौं जानौं ।
तूंअर तैं चहुआन, अंत व्हैहै तुरकानों ॥
तूंअर सु अवहि संडव घरह, इक्क राइ वलि दिक्कवै ।
नव सत्त अंत मेवात पति, इक्क छत्र महि चक्कवै ॥ कुं० ॥ २६ ॥ छ० ॥ २६ ॥
व्यास का अनंगपाल को खेद न करने का उपदेश करना ॥
पद्धरी ॥ उच्चरयौ व्यास जग जोति वीर । मृत सुग्गं लोक पाताल नीर ।
चयकाच्च दरस दरसिय सु देव । व्यासहि समान जोतिगिय तेव ॥ कुं० ॥ २७
संसार सार अस्सार कीन । वर व्यास बुद्धि कोविद प्रवीन ॥
मंडयौ सु राज सैं क्रोध नूप । वरज्यौ सुकिष्ण व्यासह सरूप ॥ कुं० ॥ २८ ॥
२४ पाठान्तर-अनंगपाल । प्रथवी । अचरिज । वत । होइ । सोइ । जांन्यो । ग्यान ।
सोय । सोइ । चलोय । अद्भूत । दिपियै । परिग्रह । न्रपति । आदिज । लिपियै ॥
२५ पाठान्तर-तहां । तह । मंझ । न्रपति । सो । मूढ मति असमंझ ॥
२६ पाठान्तरः- अनंगपाल । यती । उफुल्लित । भय । तौंवर । तैं । ढिल्लीय । किल्ली । हूं
जांनां । तोअर । तैं । चहुवांन । ह्वैहैं । होइ है । तुरक । इक । राइ । बिकवै । अंति । मनि । इक ।
छत्र० । चक्रवै ॥
२७ पाठान्तर-उचयौ । मृत । स्वर्ग । समांन । जोत्तगी । असार । बुधि । सौ ॥
२८ जनमेज । मत । मांन । आंनी । ध्यांन ॥

२६२ पृथ्वीराजरासो । [तीसरा समय ८
जनमैज राज तस मत्त मान। आनो न चित्त तिन निमष ग्यान ॥
क्षिति राज सरिस रिष राइ बोलि। कीनीय बत्त तुम गत्त खोलि॥छं०॥२८
हूं गड्डि गयौ किल्ली सजीव। इछाय करी ढिल्ली सईव ॥
तुंअर अवहि संडव सुथान। भोगवै भूमि सुरतान पान ॥ छं० ॥ ३० ॥
सो मत्ति जानि तुंअर चिनेत्त । मति करै रोस राजन सुचेत ॥
जान्यौ सु कह्यौ बर व्यास रूप । झूटी सु बत्त बरजित्त भूप ॥ छं० ॥ ३१ ॥
हिन्दून् † जानि पंडव सु वंस । तिन भयौ अंस पारत्थ नंस ॥
तिहि वंस भीम अरु भ्रम्म सुत्त । तिहि वंस बली अनगेस तुत्त ॥ छं० ॥ ३२
मति करहु सोच सम संच मानि । हुअ राज काज वर चहुवान ॥
बर वंस सुमति अति मति प्रताप । दिन कितक तपै चहुवान आप ॥ छं० ॥ ३३ ॥
फिरि व्यास कहै सुनि अनग राइ । भवतव्य बात मेटी न जाय ॥
रघुनाथ हाथ त्रैलोक देव । ते कनक म्रग्ग आगे पछेव ॥ छं० ॥ ३४ ॥

  • ये दोनो पाद सं० १५४७ की लिखित पुस्तक में नहीं है और उसके इधर की संवत् १८५६
    की में हैं ॥ २८ ॥ हुं । क्रिलि । किली । गड़ि । हलाप । ढिली । इव । तुंअर । अवंटि । सुथांन ।
    सुरतानं । पांन ॥ ३० ॥ मति । जांनि । तोंअर । जांन्यौ । झूठी । स । वरदत्ति ॥ ३१ ॥ जांनि ।
    पारथ । धूम्म सुत । वमं । वली । तुत ॥
    ३२ पाठान्तर-मांनि । हुय । चाहुआनं । चाहुवांन ॥ ३३ ॥ राय । मृग । लगे ॥ ३४ ॥
    † इस महाकाव्य में “हिन्दू” शब्द यहां पर आया है । उसकी व्युत्पत्ति वाचस्पत्य
    बृहतसंस्कृताभिधानकर्त्ता और शब्दकल्पद्रुमवाले ने पुंल्लिङ्ग में यह की है-
    “हीनं दूषयतीति । दुष+डुः पृषोदरादित्वात् साधुः । जातिभेदे । जातिविशेषः ॥”
    और उसका प्रयोग मेरुतंत्र में यह दिखाया है-
    पश्चिमाम्नायमंत्रास्तु प्रोक्ताःपारस्यभाषया । अष्टोत्तरशताशीतिर्येषां संसाधनात् कलौ ॥
    पंच खानाः सप्तमीरा नव शाहा महाबलाः । हिन्दुधर्म्मप्रलोप्तारो जायन्ते चक्रवर्त्तिनः ॥
    हीनं च दूषयत्येन हिन्दुरित्युच्यते प्रिये ! मेरुतन्द्रे २३ प्र० ॥
    और भविष्यपुराण के प्रतिसर्गपर्व्व के तृतीय खंड के दूसरे अध्याय में लिखा है कि विक्र-
    मादित्य के पौत्र शालिवाहन ने पितृराज्य पाने पर शकादि को जीत कर आर्य्यदेश और म्लेच्छ-
    देश की सीमा इस प्रकार से स्थापित कीं-
    एतस्मिन्नन्तरे तत्र शालिवाहन भूपतिः ॥ १७ ॥
    विक्रमादित्यपौत्रश्च पिताराज्यं गृहीतवान् ॥
    जित्वा शकांन्दूराधर्षींश्चीनतैत्तिरिदेशजान् ॥ १८ ॥
    बाल्हीकान्कामरूपांश्च रोमजान्खुरजांछठान् ॥
    तेषां कोषां गृहीत्वा च दंडयोग्यानकारयत् ॥ १६ ॥
    स्थापिता तेन मर्यांदा म्लेच्छार्य्याणां पृथक् पृथक् ॥

तीसरा समय ६] पृथ्थीराजरासो । २६३
मारीच अप्य आवै छरन्न । दुइ दोन चार सीता हरन्न ॥
पंडवन जाग आरंभ कीन । वरज्यो सु व्यास पंडित प्रवीन ॥ छं० ॥ ३५ ॥
दुरवास दारिका दिषन आइ । जदवन बान्न संह्यौ उपाइ ॥
करि पुरुष नारि रचि गर्भ घास । कछ देव याचि उपजै सु आस ॥
धिजि कछी विप्र तस उदर जोइ । जदवन वंस नष्यै सु षोइ ॥
वरजे सुअम्भ सुत रमन जूप । देषंत अंध ते परे कूप ॥ ३७ ॥
केतेक कद्यौ सुनि अनंग राइ । जानति जान कीनौ उपाय ॥
भवतव्य बात उतपात मोटि । मिटै न बुद्धि कोइ करौ कोटि.॥ ३८ ॥
जिन करौ भेद उपदेस मोहि । धौं जानि ग्यान इछ कद्यौ तोहि ॥
करि घरा भ्रम्म उद्धारि देह । संसार अनित्त छंडौ सनेह ॥ ३९ ॥
द्वैलोक जीत्ति जिन जेरं कीन । ते गये अंत हुइ आपु छीन ॥
फूक गल्ह अमर संसार सार । रप्पै न पहुमि ते बड़ गमार ॥
छं० ॥ ४० ॥ रू० ॥ २७ ॥
सिंधुस्थानमितिज्ञेयं राष्ट्रमार्यस्य चोत्तमम् ॥ २० ॥
म्लेच्छस्थानं परंसिंधोः कृतं तेन महात्मना ॥ २१ ॥
यदि यह माननीय है तो स्पष्ट है कि "हिंदु" शब्द तो "सिंधु" का और "हिन्दुस्थान"
शब्द "सिंधुस्थान" का अपभ्रष्ट है अर्थात् वह यावनी नहीं है। यदि उनको यावनी भी मानें तो
भी तो आजकल हमारे देश में बड़ी ही प्रबलता से यह माना जाता है कि संसार भर की सब
भाषा हमारी संस्कृत से ही निकली हैं। अत एव फिर हम को बतलाना पड़ेगा कि यावनी "हिंदु"
शब्द किस संस्कृत शब्द का अपभ्रष्ट है? और जब वह संस्कृत का अपभ्रष्ट है तो फिर उससे
घृणा क्यों करनी चाहिये ?
तथा हमारे दिये इस प्रमाण से पुरातत्ववेत्ता विद्वानों के विचारार्थ एक यह प्रश्न भी
उपस्थित होता रहे कि इससे तो शालिवाहन का विक्रम का पोता होना विदित होता है और
अन्य शोधों के अनुसार प्रचलित शालवाहन शककर्त्ता कनिष्क नामक सिदियन राजा माना
जाता है। हमारी देशीसाक्षी से विक्रम और उसके पोते शालवाहन का १३५ वर्ष का अंतर
असंभव होना प्रतीत नहीं होता है। इस के अतिरिक्त शालवाहन का बौद्ध हो जाना भी कहा
जाता है और शक भी बौद्ध धर्म्मावलंबी माने जाते हैं। क्या आश्चर्य है कि यह शालवाहन ही
शक धर्मावलंबी हो कर कनिष्क नामक राजा हो गया हो और हमारे यहां उसके पहिले नाम
से ही शक प्रख्यात चला आया हो ?
पाठान्तर-अप । होइ । होय होनहार । जाय ॥ ३५ ॥ द्विषिन । आय । जदखन । उपाय ।
कद्यौ ॥ ३६ ॥ जदखन । नंषिय । अंत ॥ ३७ ॥ कह्यों । अनंगराइ । जानंत । जांनि । जान । कीनसु ।
मौट । मिटै । बुधि । को । कोट ॥ ३८ ॥ उपदेश । हूं । झांनि । धर्म्म । उद्धारि । छंदो ॥ ३९ ॥
जोर । तेउ । गए । होइ । रखै । पहमि । गवार ॥ ४० ॥
२

२६४ पृथ्वीराजरासो । [तीसरा समय १०
अनंगपाल के पीछे जो जो दिल्ली के राजा होंगे उनके
विषय में व्यास का भविष्य कथन करना ॥
तुँअरों का नाश और चौहानों का राज्य होगा ॥
कवित्त ॥ सुनि अनगेस नरेस, सोचि इह आगम बुझै ।
अंत राज चहुबान, सोचि इह बेगो सुझै ॥
सब तूंअर पग मग्ग, भिरिंग मंडव आहुहै ।
सार धार धर भूमि, सुगति पय बंधन कुहै ॥
इह दोस राज दिज्जै नहीं, मैं बहु बार बरज्जियौ ।
भवतव्य बात मिहैं न को, होइ सु ब्रह्म सिरज्जियौ ॥ छं० ॥ ४१ ॥ रु० ॥ २८ ॥
चौहानों के पीछे मुसलमान और उनके पीछे फिर
हिन्दुओं का राज्य होगा ॥
कवित्त ॥ ता पच्छै सुनि राज, राज सज्जै चहुआनिय ।
बहुत काल अन्तरै, तपै पुहमी तुरकानिय ॥
मेच्छ अवनि तप छुटि, प्रलै हुइ है तिन बंसह ।
बहुरि जोर हिन्दून्, राज छुइ है इक अंसह ॥
संघारि सकल दानव कुलह, धर्म्म राज सह विस्तरै ।
जितै जगत तप प्रबल करि, आनि दिसा बिदिसा फिरै ॥
छं० ॥ ४२ ॥ रु० ॥ २९ ॥
फिर मेवालपति सं० १६७१ में दिल्ली जीत लेंगे* ॥
कवित्त ॥ नव सत्तै वर अंत, बहुरि ढिल्ली पति होई ।
पग्ग पोद घुरसान, पहुमि चक्कवै सु जोई ॥
२८ पाठान्तर—चहुआंन । बेघो । सूझै । तोअंर मग । मैं । वरजयौ । मेटै । होय । सिरजया ॥
२९ पाठान्तर—पछै । चहुआंनिय । चहुआंनीय । तुरकानीय । मेछ । मेछि । हूै हैं । हिन्दून् । हूँ । दानव । आनं । दिशा । फिर ॥

  • यह ३० और ३१ दोनों रूपक पुरानी पुस्तक सं० १६४७ की लिखी में वास्तव में तो
    नहीं हैं । परंतु उसके पत्रे के किनारे पर किसी अन्य ने पीछे से इन दोनों को लिख दिया है ।
    और उस के पीछे की नवीन पुस्तकों में इन दोनों के पाठ हैं । संवत् १८३८ की में तो “मेवातपति”

तीसरा समय ११] पृथ्वोराजरासो । २६५
मदि मेवात महीप, दीप दीपनि दल मंडै ।
क्किक्क रहें पय आप, इक्क पल पिंड निपंडै ॥
मंडै सु पहुमि प्रथिराज जिम, सत्त वात जोनिक जपिय ।
मानी सु सत्ति करि सबनि हूर, व्यास वचन व्यासच्च थपिय ॥
छं० ॥ ४३ ॥ रू० ॥ ३० ॥
दूहा ॥ सोरै सै सत्थोत्तरै, विक्रम साक बदंति ।
ढिल्ली धर मेवातपति, लैंहि पग्ग बल जीत ॥ छं० ॥ ४४ ॥ रू० ॥ ३१ ॥
व्यास का कहा हुआ भविष्य नहीं टरेगा ॥
कवित्त ॥ तिद्धि जथ वत्त प्रमान, सुनहि दिढ तुच्छ सुचंतं ।
वर म्लेच्छनि सत घटइ, धर्म्म पारस रस रतंतं ॥
हुइ नव सत्त प्रमान, ध्रुअ टरइ रवि टरइ ।
टरै न व्यास बचन्न, मान जस तें अजु टरई ॥
ए सब अजान सुता जु धी; परी इक्क मक्की मुची ।
परि पै प्रसन्न परतीत करि, तब काढत ग्राबह जुची ॥ छं०॥४५॥रु०॥३२॥
माता का दान और होम करना ॥
भुजिङ्गि ॥ सुनि श्रोतान भए चहुआनं, कही मान मति तत्त सुजानं ।
बहुरि पुच्छि दुजराजन आनं, कियौ होम दै दान प्रमानं ॥ छं० ४६॥ रु०३३॥
पाठ है और सं० १६४७ की प्रति में "मेवारपति" पाठ है । वैसे ही पहिली में १५७७ और दूसरी
के में १०७७ पाठ हैं । निदान ये दोनों तो स्पष्टरूप से क्षेपक हैं । तथा हमारे पाठकों के ध्यान
में रहे कि उदयपुर वाले स्वर्गवासी कविराज श्यामलदासजी ने जो इस महाकाव्य का आद्योपान्त
जाली बनना संवत् १६४० से लेकर १६७० तक के भीतर माना है उसका आधार इन क्षेपक
रूपकों में से रूपक ३१ पर रक्खा है । उसके जाली बनने के समय के विषय में हमने आदि पर्व की
"उपसंहारणी टिप्पणी" पृ० १७५-१७८ तक वाक्य ३ और "पृथ्वीराजरासो की प्रथम संरक्षा" के
पृष्ठ ३४ से ३७ तक वाक्य १७ में सविस्तर कथन किया है अतएव यहां अधिक नहीं कहते हैं ॥
३० पाठात्तर-सत्तै । ढिली । पग । पोढि । चकवि । मेबाद । ढिक आहू रहि पाइ ।
सति । जपिय । थपीय ॥
३१ पाठान्तर-सोरैं । सतरिसे । सित्योतरि । विक्रम। शाक । ढिल्ली । मेवारपति । लइ । पग ॥
३२ पाठान्तर-अथ । बत । प्रमांन । तुक्क । म्लेकनि । होय । सत । प्रमान । मांन अजांन
हक । मकी । घरी इक मकी मही । पस्र्यै । प्रसन ॥
३३ पाठात्तर-छंद वाघा । चहुआनं । सुजानं । पुंछि । दुजराजनि ॥

२६६ पृथ्वीराजरासो । [ तीसरा समय १२
मातुल का अपने मन में मोह करना ॥
दूहा ॥ सुनत सुपन सोमेस सुअ, बज्जाए बर बाज ।
गिन्यौ सु मातुल सोच मन, औ अवनिंय काज ॥ छं० ॥ ४७ ॥ रु० ॥३४ ॥
पृथ्वीराज का स्वप्नफल सुन आनन्द में फूला न समाना ॥
पद्धरी ॥ सुनि सुंपन मात फल कहै राइ । दरिया तरंग मनं मोज पाइ ॥
ज्यों सोए सेह आगम अनंद । राका चकोर ज्यों मुझ चंद ॥ ४८ ॥
चंदनह बन्न ज्यौं पाय चिन्ह । तिह नाह पिष्ष ज्यौ सुभग सिंघ ॥
संग्राम भूमि ज्यौं सुभट पिष्ष । गुरु विह्यावंत ज्यौं पाय सिष्प ॥ ४९ ॥
घत्तार घत्त ज्यौं दृष्ष चोट । दातार पाइ जाचिक्क टोट ॥
पंडिप्त पाइ ज्यौं गुनियगाह । व्यांपार पाइ ज्यौं साह चाह ॥ ५० ॥
परि वित्त पेपि ज्यौं खेल ज्वारि । कुछ कैल पाइ लंपह नारि ॥
ध्यानंद सु यौं प्रथिराज पाइ । फुल्ल्यौ सु अंग अंगह न साइ ॥ ५१ ॥
बज्जे अनंत वज्जांच्च अनंद । दिय दान विदुष दुज भह वृंद ॥
दिन दिन नरिंदं तन दसा बढ्ढि । चढढंत दीह जो दसा चढ़ि ॥ ५२रु०३५
स्वप्नफल सुन कर पृथ्वीराज की सर्वस्व वृद्धि कैसे होने लगी ॥
कवित्त ॥ चढत नही जिम सेह, नेह नवला जुबनागम ।
सिद्धदाह दिन चढत, सु गुरु सिष्यक विद्या क्रम ॥
सस्त्र ओप ज्यौं अरनि, लच्छि व्यापारह बढ़त ।
बढ़त भह गज बंस, बेलि द्रुम सीसच चढ्ढत ॥
जिम सरह रयनि सुद पष तिथि, बढ़त कला ससि तम गमत ।
चहुआन सूर सोमेस सुअ, रूम सुदसा दिन दिन जमत ॥ छं० ॥५३॥ रु०॥३६॥
कवित्त ॥ बढ़त पटन उमराव, बढ़त साधन तुरियन दल ।
बढ़त भंडारन दाम, बढ़त कोठार अन्नबल ॥
३४ पाठान्तर-अधनिय ॥
३५ पाठान्तर-राय । दरीयाव । पाय । मुख । पाइ । चिन्ह । पखि । सील । पिखि । विद्या-
बंत । सिखि । दृष्टि । जाचिग । पंडित । गुनयग्राह । लंपट । पाय । माय। दानं । चढंत । दशा । चढ़ि ॥
३६ पाठान्तर-लक्ष । वढत । चहुआन ॥

तीसरा समय १३] पृथ्वीराजरासो । =६७
जमद्दर पानान यस्त, वढत दानन दिन ही दिनं ।
छह संस तरवारि, वढत सस्त्रन्न पिन छि पिन ॥
वढंत कित्ति दिन दिन अमन्द, प्रथीराज सोमेस सुत्र ।
दस दिसा जोति दिन दिन वढत, महा निसा पछ जानि धुअ ॥
छं० ॥ ५४ ॥ रु० ॥ ३७ ॥
पृथ्वीराज का अजित अवतार होना ॥
कवित्त ॥ सहरि गईमछ सूर, नूर नवलून नवछा मुप ।
चार वरन चिर आव, गेह विलसंत महा सुप ॥
पदत मैवासन घाउ, दाध दिज्जन दुज्जन घर ।
अडटनि उटत सुटंड, थप्पि थिर करत अप्प घर ॥
चिंधु चक्क छक्क घर थर धरत, पिसुन पिंजि किज्जय नरम ।
अवतार अजित दानव मनुष, उपजि सूर सोमच करम ॥
छं० ॥ ५५ ॥ रू० ॥ ३८ ॥
लोहाना का गैरव में से कूदना और अजानवाह
नाम और जागीर पाना ॥
कवित्त ॥ षोडस गज उरह, राज जमै गवप्प तस ।
संझ समय चीतार, पच कीनो पेसकस ॥
देषत संभीरनाथ, हथ्थ कूटन हथ सारदा ।
तीर कि गोरि बिछुदि, तुहि असमान की तारदा ॥
अधवीच नीच परतें पछिल, लोहाने लीनो झरपि ।
नट कळा खेलि जनु फेरि उठि, आनि हथ्थ पिथ्थउ अरपि ॥
छं० ॥ ५६ ॥ रु० ॥ ३९ ॥ *
३७ पाठान्तर-भंडारन १ दांम । तरवार । वढंत ॥
३८ पाठान्तर-सहरि । च्यारि । दुजन । अरटन । दटत । थपि । अप । चिंडु । चक ।
हक । किजय ॥
३८ पाठान्तर-गंवध । चित्रकार । हथ । आसमान । आनि ॥

  • ये ३९ । ४० दो रूपक सं० १६४७ की पुरानी पुस्तक में नहीं हैं और इधर की सं० १८५९
    में हैं ॥

२६८ पृथ्वीराजरासो । [तीसरा समय १४
गाथा ॥ हरषि राज प्रथिराजं, कीरति कीन सूर सामंतं ।
बगसि ग्राम गजबाजं, अजानंबाह दीनयं नामं ॥ छं० ॥ ५७॥ रु० ॥ ४० ॥ *
दिल्ली किल्ली कथा का उपसंहार ॥
दूहा ॥ सुपन सुफल दिल्ही कथा, कही चंदवरदाय ।
अब अग्गे करि उच्चरौं, पिथ्य अकूँर गुन चाय ॥ छं० ॥ ५८ ॥ रू० ॥ ४१ ॥
इति श्रीकविचंदविरचिते पृथ्वीराजरासके
दिल्ली किल्ली कथा वर्णन नाम तृतीय
प्रस्ताव संपूर्णम् ॥ : :
*४० पाठान्तर-ग्रांम । बाज । अजांनं ॥
४१ पाठान्तर-दिल्लोय । वरदाय । अगैं । उचरौं । पिथ । कूँअर । गुनचार ॥

[तीसरा समय १५] पृथ्वीराजरासो । २६६

उपसंहारणी टिप्पण ।

जो कुछ हमने प्रथम और द्वितीय समय की टिप्पणी और उपसंहारणी टिप्पण में कहा है
वह हमारे पाठकों के ध्यान में होगा और जो अब निवेदन किया जाता है वह भी उसी के साथ
सदैव स्मरण में रहेगा। क्योंकि वह सब इस महाकाव्य के विषयक अनेक वाद विवादों के
विचार और निर्णय करने के समय बहुत ही उपयोगी होगा॥
अब इस तीसरे समय-दिल्ली किल्ली कथा-का मूल लेख हमारे पाठकों की सेवा में
उपस्थित है। और जो कुछ उन्होंने अब तक इस महाकाव्य के नाम से अनेक दंत कथा और
वृत्तान्त पुस्तकादि में पढ़े और सुने हैं वे भी उन्हें ज्ञात हैं। अत एव अब यह एक बहुत ही अच्छा
अवसर है कि हम उन दोनों का मिलान कर के देखें कि क्या आज कल के ग्रन्थकर्त्ताओं ने भी
अपने लिखे वृत्तान्त ठीक ठीक इस महाकाव्य के वृत्तान्त के अनुकूल ही लिखे हैं, अथवा उनको
बदल कर उनमें कुछ और अपनी मनमानी घडन्त भी करी है? यदि उनमें परिवर्तन किया गया
है तो क्या उनका ऐसा करना ठीक है? मूल में मिला हुआ अगला क्षेपकांश तो अब निश्चित
होना कैसा कठिन हो रहा है, तिस पर भी क्या आधुनिक ग्रन्थकर्त्ताओं का भूल से विरुद्ध
कथन करना मानो नवीन क्षेपक मिलाना नहीं हो सकता है? आश्चर्य यह है कि आज कल के
ग्रन्थकर्त्ता प्रतिज्ञा तो पृथ्वीराजरासो वा कवि चंद के कथनानुसार अपने कथन करने की करते हैं
और जब उनकी ऐसे मूल से मिलान कर के परीक्षा की जाती है तब उनके वृत्तों में रात्रि दिन
का सा अन्तर दीख पड़ता है! इसके केवल दो तीन ही उदाहरण हम यहां पर दिखाते हैं, अन्यो
का विचार हमारे पाठक स्वयं कर लेंगे-
(क) हिन्दी रीडर नंबर ५ अर्थात् हिन्दी शिक्षावली भाग पंचम नामक पुस्तक जो पाठ-
शालाओं में पढ़ाई जाती है और जिससे बालपन से ही हमारे बालकों के हृदय पर संस्कार
होता है उसमें कवि चंद के नाम से यह कहा हुआ है-
“चंद कवि लिखता है कि तोमर वंश के १६ वें राजा अनंगपाल ने पृथिवीराज के जन्म
के उत्सव के लिये व्यास नामक एक ब्राह्मण से मुहूर्त्त पूछा। ब्राह्मण ने कुछ सोच कर उत्तर
दिया कि यही शुभ समय है, इस कीली को गाड़िये और यह शेषनाग के सिर में जा लगेगी और
फिर तुम्हारा राज्य अचल हो जायगा। यह कह कीली को धरती में गाड़दी। परंतु राजा को
विश्वास न हुआ। निदान उसने उस कीली को निकलवा डाला जो निकालने पर लोहू से
भरी मिली। तब ब्राह्मण ने राजा से कहा कि तुम्हारा राज्य कीली के समान अस्थिर हो
जायगा और तोमर वंश के बाद चौहान वंश के राजा राज्य करेंगे और उनके बाद मुसलमानों
का राज्य होगा। राजा ने क्रुद्ध होकर उस ब्राह्मण को देश से निकाल दिया परंतु वह अजमेर
में चला गया जहां कि उसका मान अधिक हुआ॥”
(देखो हिन्दी शिक्षावली पंचम भाग पृष्ठ ४१)॥
(ख) तथा उसी पुस्तक में शाहजहां के समय में हुए भट्टराव कवि के लिखे इस वृत्तान्त
को भी पढ़िये-

२४० पृथ्थीराजरासो । [ तीसरा समय १६
"व्यास ब्राह्मण ने तोमर वंश के प्रमर राजा अनंगपाल को एक पच्चीस अंगुल लंबी कीली
दी और उसने कहा कि इसको धरती में गाड़िये। शुभ संवत् ७९२ अथवा दूसवी सन् ७३५
में बैशाख बदी त्रयोदशी को राजा ने इस कीली को पृथिवी में गाड़ दिया। तब व्यास ने राजा
से कहा कि अब तुम्हारा राज्य अचल हो गया क्योंकि यह कीली शेषनाग के माथे में गड़ी है।
जब ब्राह्मण चला गया तब राजा ने उस की बात का विश्वास न कर कीली को उखाड़ देखा
तो उस को लोहू से भरी पाया। राजा ने भय भीत हो उस ब्राह्मण को फिर बुलवाया और कीली
को फिर गाड़ने की आज्ञा दी। परंतु कीली उन्नीस ही अंगुल पृथिवी में धसी और ढीली रही।
तब ब्राह्मण ने कहा कि तुम्हारा राज्य इस कीली के सदृश अस्थिर रहेगा। और उन्नीसवीं पीढ़ी
के बाद चौहानों के हाथ जायगा। और उनके बाद मुसलमान राज्य करेंगे"॥
(देखो हिन्दी शिक्षावली पंचम भाग पृष्ठ ४१)॥
तदनन्तर "पृथ्वीराज चरित्र" नामक पुस्तक को पढ़िये। उस के कर्ता ने भूमिका में हम को
यह कह कर उस के लेख की परम प्रामाणिकता का विश्वास कराया है-
"प्रगट है कि पृथ्वीराज रासा नाम का पुस्तक भारतवर्ष के इस प्रान्त (राजपूताना) में
अति ही प्रसिद्ध है और प्रत्येक चत्री व चारण भाट इस के लिये निर्विवाद ऐसा मानते चले
आये हैं कि दिल्ली के अंतिम महाराजाधिराज पृथ्वीराज चौहान के प्रधान कवि व मित्र चन्द
बरदाई ने इस पुस्तक को बनाया है।"
"मैंने चाहा कि इस प्रसिद्ध पुस्तक का, जो छन्दबद्ध है, सरल साधुभाषा में कथारूप से
सारांश लिख कर इसके सत्यासत्य विषय में जो कुछ प्रमाण मिल सकें वे भूमिका में लिख दूं"॥
"तथापि ऐतिहासिक विषय में मूल पुस्तक के विरुद्ध कुछ भी नहीं लिखा गया है।"
मैंने जो यह आशय गद्य में किया वह उदयपुर राज्य के विक्टोरिया हाल के पुस्तकालय
में रासे की एक लिखित पुस्तक से लिया है।"
और अपनी इस प्रतिज्ञा के अनुसार उसने इस महाकाव्य के मूल पद्य का यह गद्य किया है:-
"यमुना तट पर हस्तिनापुर नाम्री नथ प्राचीन काल से विख्यात है जहां पांडववंशी राजा
अनंगपाल तंवर राज्य करता था। राजा की सुनीति और धर्माचरण से सर्व प्रजा सुखी और
राज्यकार्य आनन्द पूर्वक चलता था। इस राजा ने अपने भुज बल से कई भूपालों का गर्व
गंजन कर अपनी प्रभुता के सूर्य का प्रकाश दूर दूर तक फैला दिया था सहस्रों सामन्त देश
देशान्तर से आकर इस की सेवा करते थे। राजा के दो कन्या थीं बड़ी का नाम सुरसुन्दरी और
छोटी का नाम कमला। सुरसुन्दरी का विवाह कनौज के राठौड़ राजा बिजयपाल से
हुआ था और कमला जो रूप में रति को भी लज्जित करती थी अपनी बालक्रीड़ा से माता
पिता के हृदय को हुलसाती हुई शुक्लपक्ष की चंद्रकला के तुल्य सुन्दरता सुघड़ाई और यौवन
में वृद्धि को प्राप्त होती थी॥
एक दिन राजा अनंगपाल अपने सुभट सामन्तों सहित हस्तिनापुर से कुछ दूर आखेट
के वास्ते वन में गया। अपनी हिनहिनाहट से वज्र के तुल्य हृदय को भी कपाने और टापों
के प्रताप से शेष के सीस तक धरा को धुजाने का अभिमान रखने वाले चंचल तुरंगों पर कई
बांके छत्री शिकारी पोशाक पहने नेजे हाथ में लिये चलते थे, काली रात्रि के तुल्य कई मदो-
न्मत्त हस्तियों के झुंड साथ थे जिन के गंडस्थल में से झरने वाले सुगन्धित मद के पान करने

। तीसरा समय १०] पृथ्वीराजरासो । २७१
को आये हुए भ्रमरों का गुंजार शब्द ऐसा प्रतीत होता था कि मानो कई बन्दीजन मधुर वाणी
में महाराज का यश गाते हों। रेशमी डोरियों से बन्धे हुए कई कुत्ते अपने रक्तकों को ताने लिये
जाते थे मानो सूअर साभर कुरंग आदि पशुओं का गंध पाकर उनके रुधिर से अपनी पिपासा
बुझाने को आतुर हो रहे हों। पायदलों के ठट्ठ ने चारों ओर घिरर कर वन को घेर लिया और
भेरी नफीरी आदि कई वाजिन्न बजा कर पशुओं को डराने और उनका स्थान छुड़ाने लगे। राजा
और उनके साथी सामंतों ने सेल संभाले सूअरों के पीछे घोड़े छोड़े और बात की बात में कई
बड़े बड़े वराहों को भूमि पर गिरा दिया। वन में चारों ओर धूम मच रही थी बिचारे पशु
प्राण भय से इधर उधर भागते फिरते थे कि कंज कली को प्रफुल्लित करने वाले सूर्य्यदेव ने
सिर पर आकर मानो इस हिंसा से शिकारियों को निवारण करने के लिये क्रोध दृष्टि धारण
की हो, प्रचंड ताप से पृथ्वी को तपा दिया सूर सामन्त व सिपाहियों ने जहां तहां वृक्षों की
छाया देख कमर खोली और जलपानादि करके श्रम दूर करने को लेटे, राजा भी एक घट वृक्ष
की सघन छाया में बैठा हुआ था कि अचानक उसकी दृष्टि वन में एक स्थान पर पड़ी तो
क्या देखता है कि झाड़ी की ओट में एक अजा अपने दो बच्चों को लिये बैठी है उधर से एक
भेड़िया आकर बच्चों पर लपका चाहता था कि दोनों को उठा कर ले जावे इतने में माता ने
सचेत हो भेड़िये से युद्ध करना आरंभ किया और भेड़िये को भगा कर बच्चों को बचा लिया।
यह कौतुक देख राजा को बड़ा आश्चर्य हुआ। उस स्थान पर कुछ चिन्ह कर दिया कि भूल न जावे
जब अपनी राजधानी को लौटा तो दिन भर के परिश्रम से थका हुआ भोजनान्तर वह शयन
गृह में आकर निद्रा निमग्न हुआ। प्रभात् होते ही गुरु व्यास देव के आश्रम पर जा हाथ जोड़
कर ऋषि से वह वन का चरित्र वर्णन किया। व्यास देव कुछ काल तक समाधिस्थ हो बोले कि
राजन्! वह भूमि महा पवित्र और वीर है यदि वहां गढ़ बनाया जावे तो उस गढ़ का स्वामी सर्व
भूमंडल के अधिपतियों का सर्दार होवे। राजा ने निवेदन किया कि महाराज मैं वहां एक नग्र
बसा कर गढ़ बनाऊंगा व्यास देव बोले कि आज तिथि, नक्षत्र वार योगादि सर्व शुभ हैं अत एव
एक लोहे की कीली मंगवाओ कि वहां गाड़ दी जावे आज्ञानुसार कीली मंगवाई गई व्यास राजा
सहित उसी स्थान पर गये और मंत्र पढ़ कर कीली वहां गाड़ दी जहां बकरी ने वृक को
भगाया था। फिर राजा से कहा कि यहाँ गढ़ की नींव दिलवाना इस कीली को निकालने का
साहम मत करना यह कीली शेषनाग के सिर में जाकर बैठ गई है सो जब तक यह अचल है
तुम्हारा राज्य भी अचल रहेगा व्यास के मुख यह सुन कर कि "यह किल्ली शेष के सिर में जा
बैठी है" राजा को बड़ा आश्चर्य हुआ और कहने लगा कि महाराज! इतनी सी किल्ली शेष
के सिर तक कैसे पहुंच सक्ती है? एक दिन कुतूहल बस राजा ने अपनी शंका निवारण करने
को बिना बिचारे उस कीली को निकलवा ली कील के निकलते ही भीतर से रुधिर की धारा
छूटी और कील का मुख भी रुधिर से भींगा हुआ देखा। राजा को बड़ा पश्चाताप हुआ कि
मैंने केवल अपने संशय युक्त चित्त का संताप करने के निमित्त उस महर्षि की आज्ञा उल्लंघन
की और अपने को महा हानि पहुंचाई फिर उस स्थान पर एक नग्र बसाया क्योंकि उस किल्ली को
राजा ने ढीली कर दी थी अत एव उस नग्र का नाम भी 'ढिल्ली ही रहा जो वर्त्तमान काल में
दिल्ली करके प्रसिद्ध है राजा की आज्ञां से वहां बड़े २ महल चौहट्टे और विशाल भवन बनाये
गये और फिर वहीं राजधानी स्थापन हुई" ॥
३

२७२ पृथ्वीराजरासो। [ तीसरा समय १८
(पृथ्वीराज चरित्र पृष्ठ ३२-३५)
निदान इन तीनों वृत्तान्तों को जिस चंद कवि के नाम के ओट से ग्रन्थकर्त्ताओं ने लिखा
है उनको उसी कवि के मूल पद्य से मिलाने पर स्पष्ट ज्ञात होता है कि उन्होंने (ग्रन्थकर्त्ता)
इस दिल्ली किल्ली कथा के मूल पद्य को भले प्रकार पढ़े और समझें बिना जैसा जिसके ध्यान
में केवल दंत कथाओं पर से आशय आया वह अपने अपने ग्रन्थों में लिख लिया है। इन को मूल
पद्य से मिलाने पर वृत्तौँ में यह बड़े बड़े अंतर स्पष्ट देख पड़ते हैं-
हिन्दी शिक्षावली के कथन में ॥
१ चंद का मूल पद्य चाहे शुद्ध वा अशुद्ध वा जाली कैसा ही क्यों न हो परंतु उसके
अनुसार वृत्तान्त लिखने की प्रतिज्ञा करने वाले को उसके विरुद्ध कुछ भी नहीं लिखना चाहिये
उपन्यास और नाटकादि लिखने के भी नियम हैं। ऐसा कदापि नहीं हो सकता कि जहां से
मूल कथा ग्रहण करी हो उस लेख के वृत्तौँ को ऐसे बदल देना कि उनमें रात्रि दिन का सा
अंतर पड़ जाय। देखो चंद ने अपने मूल पद्य में दो दिल्ली किल्ली कथा वर्णन करी हैं। एक तो
कलहन वा कल्हन वा किल्हन राजा के समय की और दूसरी राजा अनंगपाल के समय की।
परंतु इन ग्रंथकर्त्ताओं ने दोनों के वृत्तों को घेल मेल करके एक ही कथा कर दी है। क्या मूल
पद्य को पढ़ और समझ कर लिखने वाला ऐसी भूल कर सकता है?
२ चंद ने मूल पद्य में कहीं नहीं कहा है कि राजा अनंगपाल तोमर वंश में १६ सोलहवां
राजा हुआ था ॥
३ और उसने यह भी नहीं कहा है कि अनंगपाल ने पृथ्वीराज के जन्म उत्सव के लिये
व्यास नामक ब्राह्मण से किल्ली गाड़ने का मुहूर्त्त पूछा था ॥
४ और न यह कहीं मूल में कहा है कि भविष्य कहने पर राजा ने अप्रसन्न हो कर व्यास
को निकाल दिया और वह अजमेर चला गया जहां कि उसका अधिक मान हुआ ॥
खड्गराय के कथन में ॥
५ व्यास का राजा को पच्चीस अंगुल कीली देना मूल पद्य में वर्णन नहीं किया हुआ
है। किन्तु जो किल्ली कलहन के समय में गड़ी उसका कुछ परिमाण नहीं लिखा है और जो
अनंगपाल के समय में गड़ी थी उसका रूपक १२ में-साठि सु अंगुर लोहय किल्लिय-साठ ६०
अंगुल का परिमाण लिखा है ॥
६ कीली गाड़ने का संवत् ७९२ वैशाख बदी १३ मूल पद्य में कहीं नहीं कहा है ॥
७ कीली को उखाड़ने पीछे फिर उसका गाड़ना और केवल उन्नीस ही अंगुल पृथ्वी में
धसना कहीं भी मूल पद्य में नहीं कहा हुआ है ॥
८ व्यास का अनंगपाल को कहना कि तुम्हारी उन्नीस पीढ़ी पीछे राज्य चौहानों के हाथ
में जायगा मूल पद्य में कहीं नहीं वर्णन किया हुआ है ॥
पृथ्वीराज चरित्र के कथन में ॥
९ हस्तिनापुर का नाम तक मूल पद्य में नहीं है और न उसका और अनंगपाल, के.
राज्यशासन की अत्यन्त प्रशंसा उस में चंद ने कथन की है ॥