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पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

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पृष्ठ 270

तीसरा समय ० ] पृथ्वीराजरासो । ०६१
आराधन वर ग्यान, होइ संसार मुषादौ ।
दैवक्रम करि जोग, सोइ पाषान उपाट्यौ ॥
रुधि डंक त्रुटिट संमुह चलिय, अति अद्भुत सु दिप्पियौ ।
परिगह प्रवास मंची नृपति इन आचिज्ज सु लप्पियौ। छं० ॥ २४ रु० ॥ २४॥
पाषाण का उखाड़ लेना सुन व्यास का दुःखित हो
राजा के पास आना ॥
दूह्रा ॥ सुनि आयौ वर व्यास तँह, दुष पायौ मन मस्झ ।
का जंप्यौ सुप नृपति सौं, इह मति मूढ अबुझ्झ ॥ छं० ॥ २५ ॥ रु० ॥ २५ ॥
अनंगपाल का पश्चाताप करना और व्यास का आगम कहना ॥
कवित्त ॥ अनंगपाल चक्कवै, बुद्धि जो इसी उकिल्लिय ।
भयौ तुअर मति चीन, करी किल्लीय तैं ढिल्लिय ॥
कहै व्यास जग जोति, अगम आगम हौं जानों ।
तूंअर तैं चहुआन, अंत व्हैहै तुरकानों ॥
तूंअर सु अवनि मंडव घरह, इक्क राय वन्नि विक्कवै ।
नव सत्त अंत मेवात पति, इक्क छत्र मच्चि चक्कवै ॥ छं० ॥ २६ ॥ रु० ॥ २६॥
व्यास का अनंगपाल को खेद न करने का उपदेश करना ॥
पद्धरी ॥ उच्चरयौ व्यास जग जोति वीर । मृत सुग्गं लोक पाताल नीर ।
चयकान दरस दरसिय सु देव । व्यासद्द समान जोतिगिय तेव ॥ छं० ॥ २७
संसार सार अस्सार कीन । वर व्यास बुद्धि कोविद्द प्रवीन ॥
मंडयौ सु राज सौं क्रोध नूप । बरज्यौ सुकिष्ण व्यासद्द सरूप ॥ छं० ॥ २८ ॥
२४ पाठान्तर-अनंगपाल । प्रथवी । अचरिज । वत । होइ । सोइ । सांख्यौ । ग्यान ।
सोय । सोइ । चलोय । अदभूत । दिपियै । परिगृह । नृपति । आचिज । लिपियै ॥
२५ पाठान्तर-तहां । तह । संझ । नृपति । सों । मूढ मति अससंझ ॥
२६ पाठान्तरः- अनंगपाल । यती । उक्तिलिय । भय । तौंअर । तैं । ढिल्लीय । किल्लाय । हूं
जानै। तोअर । तैं । चहुवानं । हू हैं । होइ है । तुरक । इक । राइ । बिक्कवै । अंति । मनि । इक ।
छत्र०। चक्ववै ॥
२७ पाठान्तर-उच्चयो । मत । स्वर्ग । समांन । जोग्गी । असार । बुधि । सौ ॥
२८ जनमेज । मत । मांन । आंनी । थ्यान ॥