पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२६० पृथ्वीराजरासो। [तीसरा समय ६
ग्राम नाम अप्पियै, कुसल जिन होय ग्रेह धन ॥
चिंतयौ चित्त दुजराज तब, अगम निगम करि कढ्ढयौ ।
सुभ घरी मूरत संधि कैं, फिरि पाषान सु गढ्ढयौ* छंदं० ॥ २० ॥ रु० ॥ २०
व्यास का कहना कि पांच घड़ी तक पाषाण को हाथ न
लगाने से वह शेष के सिर पर दृढ हो जायगा परन्तु
राजा का इसे अनर्थ कर मानना ॥
कवित्त ॥ कहै व्यास जग जोति, सुनहि तूंवर नरिंद तुअ ।
एह सेस सिर गाव, अंचल निहचल सुरंग धुअ ॥
सोचि अरथ पल पह, केह अप्प नह राजन ।
पंच घरी इह मुक्कि, राज रचिये इन काजन ॥
इतनौ जु कह्यौ वर व्यास तहँ, इन अनत्थ का मानयौ ।
भवक्त्तिबत्त मिहै न को, क्त कर्म नह जानयो ॥ छंदं० ॥ २१ ॥ रु० ॥ २१
साठ अंगुल की कीली गाड़ना अर्थात् शंकुपात कर्म करना ॥
अरिल्ल ॥ सुनी बत्त इह तत्त प्रमानं, व्यास करी किल्ली पुर†थानं ।
साठि सु अंगुल लोहय किल्लिय, सुकर सेस नागन सिर मल्लिय ॥
छंदं० ॥ २२ ॥ रु० ॥ २२ ॥
सब के बरजने पर भी उस कीली को उखाड़ डालना ॥
अरिल्ल ॥ मुंध लोइ आचिज्ज सु मान्यौ, भावी गति सो व्यास न जान्यौ ।
बरजे सब परिगह परिमानं, उच्चारी कील्ली भू थानं ॥ छंदं ॥ २३ रु २३
पाषाण के उखाड़तेही रुधिर की धार चलना और आश्चर्य्य होना ॥
कवित्त ॥ अनंगपाल पृथ्वी, नरेस आचिज्ज सु मान्यौ ।
भवसि बत्त जो होय, सोय ब्रह्मान न जान्यौ ॥
- “फिर पाषान सुगढ्ढयो” अर्थात वास्तुशास्त्रानुसार शिलान्यास कर्म किया ॥
२१ पाठान्तर-तूंअर । शेष । फिर । निश्चल । धुय । दक । मुक्ति । सु । तहां । अनथ ।
मांनयौ । कौं । मिट्टै । कृत । क्रम । जांनयौ ॥
२२ पाठान्तर-बत्त । प्रमांनं । किल्लीपुर । किलीय । मिलिय ॥
† अनंगपाल के समय का दिल्ली का नाम “किल्लीपुर” ॥
२३ पाठान्तर-लोय । अचरिज । मान्यौ । जान्यौ । बर्जे । सब । उपारिय । किल्लीय ॥