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पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

पृष्ठ 264, कुल 470 में से

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पृष्ठ 264

अथ दिल्ली किल्ली कथा लिख्यते ।
(द्वितीय समय)
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मंगलाचरण ।
चंद की अपनी स्त्री के प्रति उक्ति कि विधना ने दिल्ली
सोमेसरनंद के बसने को निर्माण की है ॥
साटक ॥ राजं जा अजमेर केलि कलयं, वंदं व्रतं संभरी ।
जुद्धारा भर भीर मीर वचनो, दहनो दुरंगो अरी ॥
सो सोमेसरनंद दंड गछिला, वच्छिला वनं * वासनं ।
निम्मानं विधना सुजान कविना, दिल्हीपुरं वासनं ॥ छं० ॥ १ ॥ रू० ॥ १ ॥
चंद का अपनी स्त्री को कहना कि अनंगपाल की पुत्री को पुत्र
उत्पन्न होने से दिल्ली की पूर्व कथा का प्रसंग प्राप्त हुआ है ॥
कवित्त ॥ अनगपाल पुत्तीय सुरँग †, पुत्त इच्छा फल दिन्नौ ।
नारिकेर फल सुफल, संत आरंभन किन्नौ ॥
तब प्रसाद उप्पन्नौ, पुब्ब संडो कथ भारिय ।
बर बीसल वै बंस, कह्यौ वर द्रुग्ग विचारिय ॥
पृथिराज जोति बरनीह कवि, अस्तिमंत सामंत भर ।
चंदानि बदनि सुनि चंदमति, भयौ दानवी बंसवर ॥ छं०॥२॥ रू० ॥२॥
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१ पाठान्तर–बच्छिला । बासन । सुजांन । बासनं ॥
विदित रहे कि यहां कवि ने किसी देवता का मंगलाचरण न कर के पदार्थनिर्देशवत्
मंगलाचरण किया है ॥ * जहां दिल्ली बसी है उस बन का पुराना नाम है ।
२ पाठान्तर–†अधिक पाठ है । पुत्र । इच्छा । दीनौ । कीनौ । प्रशादं । रूपनौ । चारिय ।
वै । दुग्ग । विचारीय । प्रथीराज । अस्तमंत । दानव ॥