प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)
The Paleography of India by G.H. Ojha
रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
१६४ प्राचीनलिपिमाला.
इस सन् में १५५५-५६ मिलाने से ई. स. और १६१२ मिलाने से विक्रम संवत् बनता है.
यह सन् अक्बर और जहांगीर के समय तक चलता रहा परंतु शाहजहां ने गद्दी बैठते ही (ई. स.
१६२८) इस सन् को मिटा दिया. यह सन् केवल ७२ के करीब ही प्रचलित रहा और अक्बर तथा
जहांगीर के समय की लिखावटों, सिक्कों तथा इतिहास के पुस्तकों में लिखा मिलता है.
३४-ईसवी सन्.
ईसवी सन् ईसाई धर्म के प्रवर्तक ईसा मसीह (जीसम् क्राइस्ट) के जन्म के वर्ष से¹ चला
हुआ माना जाता है और ईसा मसीह के नाम से इसको ईसवी सन् कहते हैं. ई. स. की पांचवीं
शताब्दी तक तो इस सन् का प्रादुर्भाव भी नहीं हुआ था. ई. स. ५२७ के आसपास रोम नगर (इटली
में) के रहनेवाले डायोनिसिअस् एक्सिगुअस् नामक विद्वान् पादरी ने मज़हबी सन् चलाने के विचार
से हिसाब लगा कर १८४ वें ओलिंपियड्² के चौथे वर्ष अर्थात् रोम नगर की स्थापना³ से ७५४ वें वर्ष
में ईसा मसीह का जन्म होना स्थिर किया और वहां से लगा कर अपने समय तक के वर्षों की संख्या
नियत कर ईसाइयों में इस सन् का प्रचार करने का उपयोग किया. ई. स. की छठी शताब्दी में
इटली में, आठवीं में इंग्लैंड में, आठवीं तथा नवीं शताब्दी में फ्रान्स, बेल्जिअम्, जर्मनी और
स्विट्ज़रलैंड में और ई. स. १००० के आस पास तक यूरोप के समस्त ईसाई देशों में इसका प्रचार
हो गया, जहां की काल गणना पहिले भिन्न भिन्न प्रकार से थी. अब तो बहुधा सारे भूमंडल में
इसका, कहीं कम कहीं ज्यादा, प्रचार है. सन् के अंकों को छोड़ कर बाकी सब बातों में यह रोमन
लोगों का ही वर्ष है. रोमन लोगों का पंचांग पहिले जुलिअस सीज़र ने स्थिर और ठीक किया था⁴.
१. ईसा मसीह का जन्म किस वर्ष में हुआ यह अनिश्चित है. इस सन् के उत्पादक डायोनिसिअस एक्सिगुअस्
ने ईसा का जन्म रोम नगर की स्थापना से ७५४ वें वर्ष (वि. सं. ५७) में होना मान कर इस संवत् के गत वर्ष स्थिर किये
परंतु अब बहुत से विद्वानों का मानना यह है कि ईसा का जन्म ई. स. पूर्व ८ से ४ के बीच हुआ था न कि ई. स. १ में
(दी न्यू एन्साइक्लोपीडिआ; ऍच. सी. ओ' नील संपादित; पृ. ८७०).
२. ग्रीस (यूनान) देश में ज़ेअस (=जुपिटर = इंद्र) आदि देवताओं के मंदिरों के लिये पवित्र माने जानेवाले ओलिं-
पस् पर्वत के आगे के मैदान में प्राचीन काल से ही प्रति चौथे वर्ष शारीरिक बल की परीक्षा के दंगल हुआ करते थे
जिनको 'ओलिंपिक गेम्स्' कहते थे. इसपर से एक दंगल से दूसरे दंगल के बीच के ४ वर्षों की संज्ञा 'ओलिंपियड्'
हुई. पहिले उस देश में कालगणना के लिये कोई सन् (संवत्) प्रचलित न था इस लिये ई. स. पूर्व २६४ के आसपास
सिसिली नामक द्वीप के रहनेवाले टिमेइअस् नामक विद्वान् ने हिसाब लगा कर जिस ऑलिंपियड् में कोरोइबस् पैदल दौड़
में जीत पाया था उसको पहिला ओलिंपियड् मान कर ग्रीकों में कालगणना की नींव डाली. यह पहिला ओलिंपियड् ई. स.
पूर्व ७७६ में होना माना गया.
३. ग्रीकों की नांई रोमन लोगों में भी प्राचीन काल में कालगणना के लिये कोई सन् प्रचलित न था इस लिये पीछे
से रोम नगर की स्थापना के वर्ष से सन् कायम किया गया, परंतु जिस समय यह सन् स्थिर किया गया उस समय रोम
नगर को बसे कई शताब्दियां बीत चुकी थीं इस लिये वहां के इतिहास के भिन्न भिन्न पुस्तकों में रोम की स्थापना से जो
सन् लिखा गया है उसका प्रारंभ एकसा नहीं मिलता. रोमन इतिहास का सब से प्राचीन लेखक फैबिअस पिक्टर (ई.
स. पूर्व २२०) ई. स. पूर्व ७४७ से; पोलिविअस् (ई. स. पूर्व २०४-१२२) ७५० से; पॉसिअस् कैटो (ई. स. पूर्व २३४-
१४६) ७५१ से; वॉरिअस् फ्लैकस् ७५२ से और टेरेंटिअस् वैर्रो (ई. स. पूर्व ११६-२७) ई. स. पूर्व ७५३ से इस सन् का
प्रारंभ मानता है. वर्तमान इतिहास लेखक वैर्रो का अनुकरण करते हैं.
४. प्रारंभ में रोमन लोगों का वर्ष ३०४ दिन का था जिसमें मार्च से डिसेंबर तक के १० महीने थे. जुलाई के
स्थानापन्न मास का नाम 'क्विंक्टिलिस' और ऑगस्ट के स्थानापन्न का नाम 'सेक्स्टिलिस' था. फिर नुमा पॉम्पिलि-
अस् (ई. स. पूर्व ७१५-६७२) राजा ने वर्ष के प्रारंभ में जैन्युअरी (जनवरी) और अंत में फेब्रुअरी (फरवरी) मास
बढ़ा कर १२ चांद्र मास अर्थात् ३५५ दिन का वर्ष बनाया. ई. स. पूर्व ४५२ से चांद्र वर्ष के स्थान पर सौर वर्ष माना जाने
लगा जो ३५५ दिन का ही होता था परंतु प्रति दूसरे वर्ष (एकांतर से) क्रमशः २२ और २३ दिन बढ़ाते थे,
जिससे ४ वर्ष के १४६५ दिन और १ वर्ष के ३६६ १/४ दिन होने लगे. उनका यह वर्ष वास्तविक सौर वर्ष से करीब
भारतीय संवत्. १६५
उसके पीछे जो अंतर पड़ा उसको पोप ग्रेगरी ने ठीक कर दिया१. इस सन् का वर्ष सौर है जिसका
प्रारंभ तारीख १ जनवरी २ से होता है और जो ३६५ दिन के १२ महीनों में विभक्त है. प्रति चौथे
वर्ष १ दिन ३ फ़रवरी मास में बढ़ा दिया जाता है. ईसाइयों का दिन (तारीख) मध्य रात्रि से प्रारंभ
हो कर दूसरे दिन की मध्य रात्रि तक माना जाता है. इस सन् में ५७-५६ जोड़ने से वि. सं. बनता है.
हिंदुस्तान में अंग्रेज़ों का राज्य होने पर इसका प्रचार इस देश में भी हुआ और यहां का राज-
कीय सन् यही है. लोगों के सामान्य व्यवहार में भी इसका प्रचार बहुत कुछ है.
१ दिन अधिक बड़ा था. इस वर्षगणना से २६ वर्ष में करीब २६ दिन का अंतर पड़ गया जिससे ग्रीकों के वर्षमान का
अनुकरण किया गया जिसमें समय समय पर अधिक मास मानना पड़ता था. इससे भी अंतर बढ़ता ही चला और
जुलिअस सीज़र के समय वह अंतर ६० दिन का हो गया जिससे उसने ई. स. पूर्व ४६ को ४५५ दिन का वर्ष मान कर वह
अंतर मिटा दिया, क्विंक्टिलिस मास का नाम अपने नाम पर से 'जुलाई' रक्खा और आगे के लिये अधिक मास का
झगड़ा मिटा कर ३६५ १/४ दिन का वर्ष नियत कर जैन्युअरी, मार्च, मे, जुलाई, सेप्टेंवर और नवेंवर महीने तो ३१, ३१
दिन के, बाकी के, फेब्रुअरी (फरवरी) के सिवाय, ३०, ३० दिन के और फेब्रुअरी २६ दिन का, परंतु प्रति चौथे वर्ष ३० दिन
का, स्थिर किया. जुलिअस् सीज़र के पीछे ऑगस्टस् ने, जो रोम का पहिला बादशाह हुआ, सेक्स्टाइलिस मास का नाम अपने
नाम से ऑगस्ट रक्खा और उसको ३१ दिन का, फेब्रुअरी को २८ दिन का, सप्टेंबर और नवंबर को ३०, ३० दिन का और
डिसंबर को ३१ का बनाया. इसी परिवर्तन के अनुसार ई. स. के महीनों के दिनों की संख्या अब तक चली आ रही है.
१. जुलिअस् सीज़र का स्थिर किया हुआ ३६५ १/४ दिन का सौर वर्ष वास्तविक सौर वर्ष से ११ मिनिट और १४
सैकंड बड़ा था जिससे करीब १२८ वर्ष में १ दिन का अंतर पड़ने लगा. इस अंतर के बढ़ते बढ़ते ई. स. ३२५ में मेष का
सूर्य, जो जुलिअस् सीज़र के समय २५ मार्च को आया था, ता० २१ मार्च को आ गया और ई. स. १५८२ में ११ मार्च को
आ गया. पोप ग्रेगरी (१३ वें) ने सूर्य के चार में इतना अंतर पड़ा हुआ देख कर ता० २२ फ़रवरी ई. स. १५८२ को यह
आज्ञा दी कि इस वर्ष के अक्टूबर मास की चौथी तारीख के बाद का दिन १५ अक्टोबर माना जावे. इससे लौकिक सौर
वर्ष वास्तविक सौर वर्ष से मिल गया. फिर आगे के लिये ४०० वर्ष में ३ दिन का अंतर पड़ता देख कर उसको मिटाने के
लिये पूरी शताब्दियों के वर्षों (१६००, १७०० आदि) में से जिनमें ४०० का भाग पूरा लग जावे उन्हीं में फेब्रुअरी के २६
दिन मानने की व्यवस्था की. इस व्यवस्था के बाद अंतर इतना सूक्ष्म रहा है कि करीब ३३२० वर्ष के बाद फिर १ दिन का अंतर
पड़ेगा. पोप ग्रेगरी की आज्ञा के अनुसार रोमन कैथॉलिक संप्रदाय के अनुयायी देशों अर्थात् इटली, स्पेन, पोर्चुगाल आदि
में तो ता० ४ ऑक्टूबर के स्थान में १५ ऑक्टूबर मान ली गई परंतु प्रोटेस्टंट संप्रदाय के अनुयायी देशवालों ने प्रारंभ में
इसका विरोध किया तो भी अंत में उनको भी लाचार इसे स्वीकार करना पड़ा. जर्मनीवालों ने ई. स. १७६६ के अंत के १०
दिन छोड़ कर १७०० के प्रारंभ से इस गणना का अनुकरण किया. इंग्लैंड में ई. स. १७५२ में इसका प्रचार हुआ परंतु
उस समय तक एक दिन का और अंतर पड़ गया था इस लिये ता० २ सेप्टेंवर के बाद की तारीख (३) को १४ सप्टेंबर
मानना पड़ा. रशिया, ग्रीस आदि ग्रीक चर्च संप्रदाय के अनुयायी देशों में केवल अभी अभी इस शैली का अनुकरण हुआ
है. उनके यहां के दस्तावेज़ आदि में पहिले दोनों तरह अर्थात् जुलिअस् एवं ग्रेगरी की शैली से तारीखें लिखते रहे जैसे
कि २० एप्रिल तथा ३ मे आदि.
२. ई. स. का प्रारंभ तारीख १ जनवरी से माना जाता है परंतु यह गणना अधिक प्राचीन नहीं है. ई. स. के उत्पादक
डायोनिसिअस् ने इसका प्रारंभ तारीख २५ मार्च से माना था और वैसा ही ई. स. की १६ वीं शताब्दी के पीछे तक युरोप
के अधिकतर राज्यों में माना जाता था. फ्रान्स में ई. स. १६६३ से वर्ष का प्रारंभ तारीख १ जनवरी से माना जाने लगा.
इंग्लैंड में ई. स. की सातवीं शताब्दी से क्रिस्टम्स् के दिन (तारीख २५ डिसंबर) से माना जाता था. १२ वीं शताब्दी से २५
मार्च से माना जाने लगा और ई. स. १७५२ से, जब कि पोप ग्रेगरी के स्थिर किये हुए पंचांग का अनुकरण किया गया,
तारीख १ जनवरी से सामान्य व्यवहार में वर्ष का प्रारंभ माना गया (इसके पूर्व भी अंग्रेज़ ग्रंथकारों का ऐतिहासिक वर्ष
तारीख १ जनवरी से ही प्रारंभ होता था).
३. जिस वर्ष के अंकों में ४ का भाग पूरा लग जाय उसमें फेब्रुअरी के २६ दिन होते हैं. शताब्दियों के वर्षों में से
जिसमें ४०० का भाग पूरा लग जाय उसके २६ और बाकी के २८ जैसे कि ई. स. १६०० और २००० के २६, २६ दिन और
१७००, १८०० और १९०० के २८, २८ दिन.
परिशिष्ट में दिये हुए भिन्न भिन्न संवतों का ईसवी सन् से संबंध.
शताब्दी के अंक रहित सप्तर्षि संवत् = ई. स. २४-२५ (शताब्दी के अंक रहित).
कलियुग संवत् (गत) – ३१०१-३१०० = ईसवी सन्.
वीरनिर्वाण संवत् – ५२७-२६ = ईसवी सन्.
बुद्धनिर्वाण संवत् – ४८७ (?) = ईसवी सन्.
मौर्य संवत् -- ३२० (?) = ईसवी सन्.
सेल्युकिडि संवत् – ३१२-११ = ईसवी सन्.
चैत्रादि विक्रम संवत् (गत) – ५७-५६ = ईसवी सन्.
शक संवत् (गत) + ७८-७९ = ईसवी सन्.
कलचुरि संवत् + २४८-४९ = ईसवी सन्.
गुप्त संवत् + ३१९-२० = ईसवी सन्.
गांगेय संवत् + ५७० (?) = ईसवी सन्.
हर्ष संवत् + ६०६-७ = ईसवी सन्.
भाटिक
शुद्धिपत्र.
इन अशुद्धियों में से बहुत सी तो छपते समय मात्राओं के टूटने या हिल जाने या अक्षरों के निकलने से हुई हैं. संभव
है कि कितनी एक प्रतियों में इनमें से कुछ अशुद्धियां न हुई हों और उसी कारण से दूसरी अशुद्धियां हो
गई हों इसलिये पाठकों से निवेदन है कि अर्थ के अनुसार उन्हें सुधार कर पढ़ें.
पृष्ठ. पंक्ति. अशुद्ध. शुद्ध. | पृष्ठ. पंक्ति. अशुद्ध. शुद्ध.
१ ३५ कहते ह ... कहते हैं | ५२ ३१ सचत् ... संवत्
८ ३१ ॰ह्यापराह्ण ... ॰ह्यपराह्ण | ५५ २५ जाड कर ... जोड़ कर
,, ३७ तृषिमषि॰ ... तृषिमृषि॰ | ७४ ६ श्रौ और श्रौ ... श्रो और श्रो
६ २७ मत्योरा॰ ... मृत्योरा॰ | ,, १४ अंशो में ... अंशों में
,, ३० स्पर्षरूपं ... स्पर्शरूपं | ७५ १ ॰लङ्कति॰ ... ॰लङ्कृति॰
,, ३३ अणकराँ ... अणकाराँ | ,, २६ जिनमें, स ... जिनमें से
,, ४१ ॰वदत्त ते. ... ॰वदत् ते | ७६ ७ सुरारिः ... मुरारिः
१० ३३ ११८; १४।१६; २८।१४... ... ११६; १४।१२; २८।२४ | ७६ २३ सी; गु. इ; ... क्री; गु. इ;
,, ३६ सप्तक्षरं ... सप्ताक्षरं | ८३ ३८ जि. पृ. १७२ ... जि. ६, पृ. १७२
,, ४२ पृष्ट ... पृष्ठ | ८४ ४ ॰गोप्रद परम॰ ... ॰गोप्रदपरम॰
११ २८ द्यते प्रवृत्तानां ... द्यूते प्रवृत्तानां | ८५ १६ जयत्यहं ... जयत्यहँ
१४ ३४ इसस ... इससे | ,, १६ ॰स्वाङ्ध्य॰ ... ॰स्वाङ्ख्या॰
१६ १७ ‘पंपायरस्’ ... ‘पॅपायरस्’ | ८७ १२ कारणः ... कारणं
१८ ३७ ॰मृत्य्र्यद्धा॰ ... ॰रयितं ॰मृत्युद्धा॰ ... रयितुं | ८६ १६ जसी ... जैसी
यज्य॰ ... ॰रयितं यज्य॰ युज्य॰ ... रयितुं युज्य॰ | ६६ ३० वालककायम ... वालककामय
२२ २७ पहिला ... पहिली | ८८ १ हस्व ... ह्रस्व
२७ ३४ और ... ओर | ८६ १६ संयुक्ताक्षिरों ... संयुक्ताक्षरों
२६ ६ रात दिन ... दिन रात | १०१ ३५ संभव हे ... संभव है
,, १२ सहित्य ... साहित्य | १०३ २८ चिह्नां के ... चिह्नों के
३२ २३ पश्चिर्मों ... पश्चिमी | ,, ३० शंका की है ... शंका ही है
३४ ३१ जामाया ... जमाया | १०४ २ चिह्न क साथ ... चिह्न के साथ
३५ ७ ई. स. पूर्व ३१६ ... ई. स. पूर्व ५१६ | १०६ २० दहाईयों ... दहाइयों
४० ५ हुई ... ... हुई | १०७ ६ किन्ही ... किन्हीं
४७ १६ गोलाइदार ... गोलाईदार | ११० १६ बन्नैल ... बर्नेल
४८ ३७ लकरि ... लकीर | १११ २४ अकौं ... ... अंकों
५२ २ नागरा ... नागरी | ११२ ३२ डिमाटिक ... डिमॉटिक्
५५ १६ ‘नौ’ और ‘मा’ ... ‘नौ’ और ‘मौ’ | ,, ३४ सामनता ... समानता
५६ १८ पांचवा ... पांचवां | ११४ १२ हिएरोग्लिफि ... हिएरोग्लिफिक्
,, ३४ त्र्रकूटक ... त्रैकूटक | ,, २५ हिपेरंटि ... हिपेरैटिक्
६१ १४ ॰जंटान्तर्गुहा- ... ॰जंटान्तर्गुहा- | ११६ २ सहाचार्य ... सिंहाचार्य
६२ ५ मतापि॰ ... मातापि॰ | ,, १६ रव्यदये ... रव्युदये
,, २३ पूवयमु॰ ... पूर्वेयमु॰ | ,, २० तदगरूणा ... तद्गुरूणा
CC-0.Dwivedi Lok Hitkari Pustakalaya, Ghaziabad. Digitzed by eGangotri
CC-0.Dwivedi Lok Hitkari Pustakalaya, Ghaziabad. Digitized by eGangotri
Plate 1. लिपिपत्र पहिला.
मौर्यवंशी राजा अशोक के गिरनार के चटान पर के लेख से
(ईसवी सन् पूर्व की ३री शताब्दी.)
अ अ अ अ आ इ इ ई उ उ ए ए ए ओ अं कं क
𑀅 𑀅 𑀅 𑀅 𑀆 𑀇 𑀇 𑀈 𑀉 𑀉 𑀏 𑀏 𑀏 𑀑 𑀅𑀁 𑀓𑀁 𑀓
ख ख ग ग ग घ च च च छ छ ज ज ज ज झ झ
𑀔 𑀔 𑀕 𑀕 𑀕 𑀖 𑀘 𑀘 𑀘 𑀙 𑀙 𑀚 𑀚 𑀚 𑀚 𑀛 𑀛
ञ ट ट ड ढ ण त त त त थ द द द ध ध न
𑀜 𑀝 𑀝 𑀟 𑀠 𑀡 𑀢 𑀢 𑀢 𑀢 𑀣 𑀤 𑀤 𑀤 𑀥 𑀥 𑀦
न प प फ फ ब ब भ भ म म य य य र र र र
𑀦 𑀧 𑀧 𑀨 𑀨 𑀩 𑀩 𑀪 𑀪 𑀫 𑀫 𑀬 𑀬 𑀬 𑀭 𑀭 𑀭 𑀭
ल ल व व व व स स स ह ह खा जा मा रा बा टि नि
𑀮 𑀮 𑀯 𑀯 𑀯 𑀯 𑀲 𑀲 𑀲 𑀳 𑀳 𑀔𑀸 𑀚𑀸 𑀫𑀸 𑀭𑀸 𑀩𑀸 𑀝𑀺 𑀦𑀺
लि टो ढी यी पी मी तु धु नु सु कू जू के टे णै थै
𑀮𑀺 𑀝𑁄 𑀠𑀻 𑀬𑀻 𑀧𑀻 𑀫𑀻 𑀢𑀼 𑀥𑀼 𑀦𑀼 𑀲𑀼 𑀓𑀽 𑀚𑀽 𑀓𑁂 𑀝𑁂 𑀡𑁃 𑀣𑁃
गो ञो नो क्र त्र त्पा ब्रा म्य न्हि र्व व्यो स्टा स्ति स्ति स्मा ख्व
𑀕𑁄 𑀜𑁄 𑀦𑁄 𑀓𑁆𑀭 𑀢𑁆𑀭 𑀢𑁆𑀧𑀸 𑀩𑁆𑀭𑀸 𑀫𑁆𑀬 𑀦𑁆𑀳𑀺 𑀭𑁆𑀯 𑀯𑁆𑀬𑁄 𑀲𑁆𑀝𑀸 𑀲𑁆𑀢𑀺 𑀲𑁆𑀢𑀺 𑀲𑁆𑀫𑀸 𑀔𑁆𑀯
𑀇𑀬𑀁 𑀥𑀁𑀫𑀮𑀺𑀧𑀺 𑀤𑁂𑀯𑀸𑀦𑀁𑀧𑀺𑀬𑁂𑀦 𑀧𑀺𑀬𑀤𑀲𑀺𑀦𑀸 𑀭𑀸𑀜𑀸
𑀮𑁂𑀔𑀸𑀧𑀺𑀢𑀸 𑀇𑀥 𑀦 𑀓𑀺𑀁𑀘𑀺 𑀚𑀻𑀯𑀁 𑀆𑀭𑀪𑀺𑀢𑁆𑀧𑀸 𑀧𑁆𑀭𑀚𑀽𑀳𑀺𑀢𑀯𑁆𑀬𑀁 𑀦
𑀘 𑀲𑀫𑀸𑀚𑁄 𑀓𑀢𑀯𑁆𑀬𑁄 𑀩𑀳𑀼𑀓𑀁 𑀳𑀺 𑀤𑁄𑀲𑀁 𑀲𑀫𑀸𑀚𑀫𑁆𑀳𑀺 𑀧𑀲𑀢𑀺
𑀤𑁂𑀯𑀸𑀦𑀁𑀧𑀺𑀬𑁄 𑀧𑀺𑀬𑀤𑀲𑀺 𑀭𑀸𑀚𑀸 𑀅𑀲𑁆𑀢𑀺 𑀧𑀺𑀢𑀼 𑀏𑀓𑀘𑀸 𑀲𑀫𑀸𑀚𑀸
𑀲𑀸𑀥
Plate II. लिपिपत्र दूसरा.
मोर्य्यवंशी राजा अशोक के अन्य लेखों से उद्धृत किये हुए मुख्य मुख्य अक्षर.
(ई. स. पूर्व की तीसरी शताब्दी).
देहल्ली के शिवालिक स्तंभ के लेख से.
अ आ ओ ख च ज ठ द ध म स जा पिं नी ख्य ध्य भ्युं
𑀅 𑀆 𑀑 𑀔 𑀘 𑀚 𑀞 𑀤 𑀥 𑀫 𑀲 𑀚𑀸 𑀧𑀺𑀁 𑀦𑀻 𑀔𑁆𑀬 𑀥𑁆𑀬 𑀪𑁆𑀬𑀼𑀁 .
खालसी के चटान के लेख से.
अ अ उ ए ए ख ख ग घ कू ज ज ज ड त ल ल गू
𑀅 𑀅 𑀉 𑀏 𑀏 𑀔 𑀔 𑀕 𑀖 𑀓𑀽 𑀚 𑀚 𑀚 𑀟 𑀢 𑀮 𑀮 𑀕𑀽
गू गू गू ष ष स ह ता शा शि तु खे गे ले व्य ह्म
𑀕𑀽 𑀕𑀽 𑀕𑀽 𑀱 𑀱 𑀲 𑀳 𑀢𑀸 𑀰𑀸 𑀰𑀺 𑀢𑀼 𑀔𑁂 𑀕𑁂 𑀮𑁂 𑀯𑁆𑀬 𑀳𑁆𑀫 .
जोगड के लेख से. सिद्धापुर. रधिआ. सारनाथ. सांची.
ओ द ल स ह ह अ फ म र खु ड द ह खु
𑀑 𑀤 𑀮 𑀲 𑀳 𑀳 . 𑀅 𑀨 𑀫 𑀭 . 𑀔𑀼 𑀟 . 𑀤 𑀳 . 𑀔𑀼 .
𑀤
Plate III. लिपिपत्र तीसरा.
रामगढ़, घोसुंडी आदि के लेखों से उद्धृत किये हुए मुख्य मुख्य अक्षर.
(ई. स. पूर्व की दूसरी शताब्दी).
रामगढ़. घौंसुंडी. बेसनगर.
खे चि गु क चे प्रा र्णं अ आ य चा चे द्र छ्व मं
𑀔𑁂 𑀘𑀺 𑀕𑀼 𑀓 𑀘𑁂 𑀧𑁆𑀭 𑀭𑁆𑀡𑀁 𑀅 𑀆 𑀬 𑀘𑀸 𑀘𑁂 𑀤𑁆𑀭 𑀙𑁆𑀯 𑀫𑀁.
नागार्जुनी गुफ़ा. नाना घाट के लेखों से.
द ल ष सू इं ख ग च ड त प भ ल स ह णी
𑀤 𑀮 𑀱 𑀲𑀽 . 𑀇 𑀔 𑀕 𑀘 𑀟 𑀢 𑀧 𑀪 𑀮 𑀲 𑀳 𑀡𑀻
वी पु ऊ सु सु धू यो लो कं प्र ब्र न्ह र्ग ब्र
𑀯𑀻 𑀧𑀼 𑀊 𑀲𑀼 𑀲𑀼 𑀥𑀽 𑀬𑁄 𑀮𑁄 𑀓𑀁 𑀧𑁆𑀭 𑀩𑁆𑀭 𑀦𑁆𑀳 𑀭𑁆𑀕 𑀩𑁆𑀭 .
भरझुत स्तूप के लेखों से. सांची हाथो गुंफा.
उ ऊ ख ज ण र क्रि वि गो ळी ए ऐ क घ कू
𑀉 𑀊 𑀔 𑀚 𑀡 𑀭 𑀓𑁆𑀭𑀺 𑀯𑀺 𑀕𑁄 . 𑀴𑀻 . 𑀏 𑀐 𑀓 𑀖 𑀓𑀽
ड त द न प म र धि भिं लिं वो रो ङ ळे ले गो मो यो
𑀟 𑀢 𑀤 𑀦 𑀧 𑀫 𑀭 𑀥𑀺 𑀪𑀺𑀁 𑀮𑀺𑀁 𑀯𑁄 𑀭𑁄 𑀴𑁂 𑀮𑁂 𑀕𑁄 𑀫𑁄 𑀬𑁄
𑀲𑀼𑀢𑀦𑀼𑀓𑀸 𑀦𑀸𑀫 | 𑀤𑁂𑀯𑀤𑀸𑀲𑀺𑀓𑁆𑀬𑀺 | 𑀢𑀁 𑀓𑀸𑀫𑀬𑀣 | 𑀯𑀮𑀦𑀼𑀱𑁂
𑀤𑁂𑀯𑀤𑀺𑀦𑁂 𑀦𑀸𑀫 | 𑀮𑀼𑀧𑀤𑀔𑁂 | 𑀤𑁂𑀯𑀤𑀸𑀲𑀺𑀓𑁆𑀬𑀺 | 𑀢𑀁 𑀓𑀸𑀫𑀬𑀣 |
𑀯𑀮𑀦𑀼𑀱𑁂 𑀤𑁂𑀯𑀤𑀺𑀦𑁂 𑀦𑀸𑀫 𑀮𑀼𑀧𑀤𑀔𑁂 .
𑀲𑀺𑀥𑀁 𑀭𑀜𑁄 :: 𑀲𑀺𑀥𑀁 𑀭𑀜𑁄 𑀫𑀸𑀠𑀭𑀺𑀧𑀼𑀢𑀲 𑀲𑀺-
𑀯𑀲---------𑀭---------𑀲𑀺𑀤𑀢𑁄 . 𑀲 𑀚𑀸𑀢𑀼𑀓𑀡𑁄 𑀲𑀯𑀞𑀸𑀦-
𑀢𑀯𑀸𑀲𑀺𑀓𑀸𑀦𑀁 𑀭𑀜𑁄 𑀢𑁂𑀯𑀸𑀲𑀺𑀓𑁂𑀦 𑀉𑀧𑀸𑀲𑀓𑁂𑀦 |----------
CC-0.Dwivedi Lok Hitkari Pustakalaya, Ghaziabad. Digitzed by eGangotri
Plate IV. लिपिपत्र चौथा.
भट्टिप्रोलु के स्तूप के १० लेखों से.
(ई. स. पूर्व की दूसरी शताब्दी.)
अ अ आ आ उ ओ क ख ग ग घ च छ ज ठ ण त
𑀅 𑀅 𑀆 𑀆 𑀉 𑀑 𑀓 𑀔 𑀕 𑀕 𑀖 𑀘 𑀙 𑀚 𑀞 𑀡 𑀢
त थ द ध न प फ ब भ म म य र र ल ल व ष
𑀢 𑀣 𑀤 𑀥 𑀦 𑀧 𑀨 𑀩 𑀪 𑀫 𑀫 𑀬 𑀭 𑀭 𑀮 𑀮 𑀯 𑀱
श ह ह ळ का खा जा दा ता पा रा रा कि ठि नि पि वि
𑀰 𑀳 𑀳 𑀴 𑀓𑀸 𑀔𑀸 𑀚𑀸 𑀤𑀸 𑀢𑀸 𑀧𑀸 𑀭𑀸 𑀭𑀸 𑀓𑀺 𑀞𑀺 𑀦𑀺 𑀧𑀺 𑀯𑀺
ळि णी षी कु खु जु जु तु तु तु पु बु मु जू बू बू
𑀴𑀺 𑀡𑀻 𑀱𑀻 𑀓𑀼 𑀔𑀼 𑀚𑀼 𑀚𑀼 𑀢𑀼 𑀢𑀼 𑀢𑀼 𑀧𑀼 𑀩𑀼 𑀫𑀼 𑀚𑀽 𑀩𑀽 𑀩𑀽
के के खे जे को गो गो टो णो णो दो नो पो बो रो रो
𑀓𑁂 𑀓𑁂 𑀔𑁂 𑀚𑁂 𑀓𑁄 𑀕𑁄 𑀕𑁄 𑀝𑁄 𑀡𑁄 𑀡𑁄 𑀤𑁄 𑀦𑁄 𑀧𑁄 𑀩𑁄 𑀭𑁄 𑀭𑁄
लो षो सो हो गं जं सं ग ला ग्र श्ला हि
𑀮𑁄 𑀱𑁄 𑀲𑁄 𑀳𑁄 𑀕𑀁 𑀚𑀁 𑀲𑀁 . 𑀕 𑀮𑀸 𑀕𑁆𑀭 𑀰𑁆𑀮𑀸 𑀳𑀺 .
𑀓𑀼𑀭𑀲𑀧𑀺𑀢𑀼 𑀘 𑀓𑀼𑀭𑀲 𑀘 𑀓𑀼𑀭𑀼𑀘𑀳𑀼 𑀘 𑀉𑀢𑀭𑁄 𑀘 𑀫... (कुरा[र]सपितु च कुरस च कुरुचहु च उतरो च म...)
𑀧𑀸𑀲𑀁 𑀧𑁄𑀝𑀓 𑀕𑁄𑀯𑀢𑀺𑀲𑀲 𑀘 𑀩𑀼𑀥𑀺𑀲𑀺𑀭𑀺𑀲𑁄 𑀲𑀸𑀢... (पास[ष] पोटक गोवतिसस च बुधिसिरिसो सात...)
𑀩𑀼𑀯𑀺𑀲𑀲 𑀓𑀼𑀭𑀼 𑀅𑀧𑀮𑀓𑀲 𑀫𑀳𑀺... 𑀧𑀸𑀭𑀸 𑀳𑀺... (बुविसस कुरु अपलकस महि... पारा हि...)
𑀕𑁄𑀯𑀺𑀲 𑀓𑁂𑀯𑀝... 𑀆𑀚𑀤𑀸𑀢𑀺... 𑀲𑀫𑀡... (गोविस केवल... आजदाति... समण...)
𑀳 𑀘 𑀅𑀭𑀕 𑀘 𑀢𑁄𑀲𑁄 𑀓𑁂𑀯𑀝𑁄 𑀚𑀦𑁄 𑀓𑁄𑀭𑀸𑀓𑁄 𑀭𑁂 (ह च अरग च तोसो केवल जनो कोराको रे)
𑀭𑀢... 𑀦𑀸𑀣 𑀞𑀞 𑀘𑀧 𑀧𑁂𑀭 𑀧𑀢 𑀢𑀭 𑀦𑀢... (रत... नाथ ठठ चप पेर पत तर नत...)
𑀫𑀤𑀦 𑀅𑀦𑀓 𑀫𑀢𑀭 𑀓𑁂𑀮 𑀓𑁂 𑀯𑀝 𑀢𑁂 𑀞𑀤... (मदन अनक मतर केल के वट ते ठद...)
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Plate V.
लिपिपत्र पांचवां.
पभोसा और मथुरा के लेखों से उद्धृत किये हुए मुख्य मुख्य अक्षर.
(ई. स. पूर्व की पहिली शताब्दी के आसपास).
पभोसा के २ लेखों से.
अ आ ज क ढ त द र सा मि री पू ले गो ज्ञो
𑀅 𑀆 𑀚 𑀓 𑀠 𑀢 𑀤 𑀭 𑀲𑀸 𑀫𑀺 𑀭𑀻 𑀧𑀽 𑀮𑁂 𑀕𑁄 𑀚𑁆𑀜𑁄
मथुरा के ४ जैन लेखों से.
आं इं उ ख त द प फ म य र र र र व व व स
𑀆𑀁 𑀇𑀁 𑀉 𑀔 𑀢 𑀤 𑀧 𑀨 𑀫 𑀬 𑀭 𑀭 𑀭 𑀭 𑀯 𑀯 𑀯 𑀲
ह ळ मा कि शि शि गो पो तो मो च द्र र्ध स्य
𑀳 𑀴 𑀫𑀸 𑀓𑀺 𑀰𑀺 𑀰𑀺 𑀕𑁄 𑀧𑁄 𑀢𑁄 𑀫𑁄 𑀘 𑀤𑁆𑀭 𑀭𑁆𑀥 𑀲𑁆𑀬
महाक्षत्रप शोडास के समय के मथुरा के जैन लेख से:
अ आ क ज ठ ड त थ द ध न प भ म य र
𑀅 𑀆 𑀓 𑀚 𑀞 𑀟 𑀢 𑀣 𑀤 𑀥 𑀦 𑀧 𑀪 𑀫 𑀬 𑀭
ल व श स ह जा था दि घो शो क्ष त्त त्थ र्ध स्व
𑀮 𑀯 𑀰 𑀲 𑀳 𑀚𑀸 𑀣𑀸 𑀤𑀺 𑀖𑁄 𑀰𑁄 𑀓𑁆𑀱 𑀢𑁆𑀢 𑀢𑁆𑀣 𑀭𑁆𑀥 𑀲𑁆𑀯
[अभिलेख पं० १] 𑀭𑀸𑀜𑁄 𑀯𑀁𑀕𑀧𑀸𑀮𑀲 𑀅𑀳𑀺𑀙𑀢𑁆𑀭𑀸𑀥𑀺𑀧𑀢𑀺𑀦𑁄 𑀩𑁄𑀥𑀺𑀫𑀺𑀢𑁆𑀢𑀧𑁄𑀢𑁆𑀢𑀲
[अभिलेख पं० २] 𑀬𑀲 ---------- 𑀢𑁂𑀦𑁂𑀤𑀁 𑀮𑁂𑀡𑀁 𑀓𑀸𑀭𑀺𑀢𑀁 ----------
[अभिलेख पं० ३] 𑀲𑀯𑀦 𑀫𑀼𑀔𑀲𑀯𑀲 𑀅𑀫𑁄𑀳𑀺𑀦𑀸𑀬𑁂 𑀓𑁄𑀘𑀺𑀬𑀸𑀬𑁂
[अभिलेख पं० ४] 𑀭𑀡𑁄 𑀪𑀸𑀭𑀺𑀬𑀸𑀬𑁂 𑀯𑀸𑀡𑀲 𑀲𑀢𑁄 . 𑀪𑀤𑁆𑀭𑀖𑁄𑀱𑀲 𑀪𑀚𑀸𑀬𑀸
[अभिलेख पं० ५] 𑀢𑀲𑀸 𑀧𑀼𑀢𑁂𑀡 𑀫𑁄𑀳𑀺𑀬𑁂𑀡 𑀧𑀸𑀲𑀸𑀤𑁄 𑀭𑀢𑁄 𑀅𑀭𑀳𑀁𑀢𑀧𑀽𑀚𑀸𑀬𑁂
[अभिलेख पं० ६] 𑀦𑀸𑀦𑀸𑀯𑀺𑀥𑀸𑀬 𑀧𑀽𑀚𑀸𑀬 𑀉𑀧𑀝𑁆𑀞𑀺𑀢𑁄 𑀪𑀯𑀢𑀼 𑀲𑀯𑁆𑀯𑀲𑀢𑁆𑀢𑀸𑀦𑀁
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Plate VI.
लिपिपत्र छठा.
कुशनवंशी राजाओं के समय के मथुरा, सारनाथ आदि के लेखों से.
(ई. स. की पहिली व दूसरी शताब्दी).
मथुरा के लेखों से.
अ अ अ आ इ ई उ उ ए ए ए ओ क ख ख ख ग ग
[तदनुरूप ब्राह्मी वर्ण]
ग घ च च च च च छ ज ज झ ट ठ ड ढ ढ ण ण
[तदनुरूप ब्राह्मी वर्ण]
ण ण ण त थ द द ध न न न प ब भ भ भ म म
[तदनुरूप ब्राह्मी वर्ण]
य य र र र ल ल व व श श ष ष ष स स स स
[तदनुरूप ब्राह्मी वर्ण]
ह ह ह ह ळ जा जा णा णा ता वा रा षा णि थि वी सी
[तदनुरूप ब्राह्मी वर्ण]
दु तु तु दू गु गृ वृ $\frac{हि}{हे}$ $\frac{तो}{गो}$ खो ग्ग द्य द्ध र्य्य स्ति स्य
[तदनुरूप ब्राह्मी वर्ण]
सारनाथ के लेखों से. चार गांव के लेख से.
णि दि वु च छ द्धे व्य स्फ . ग ह ण्ड य्य य्य स्य स्य
[तदनुरूप ब्राह्मी वर्ण]
[चारगांव अभिलेख, पंक्ति १ — ब्राह्मी लिपि: महाराजस्य राजातिराजस्य देवपुत्रस्य हुविष्कस्य सं...]
[चारगांव अभिलेख, पंक्ति २ — ब्राह्मी लिपि]
[चारगांव अभिलेख, पंक्ति ३ — ब्राह्मी लिपि]
[चारगांव अभिलेख, पंक्ति ४ — ब्राह्मी लिपि]
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Plate VII.
लिपिपत्र सातवां.
शक उषवदात और उसकी स्त्री दक्षमित्र के नाशिक के ५ लेखों से.
(ई. स. की दूसरी शताब्दी).
अ आ इ उ उ ए ओ क ख ख ख ग घ च च छू ज
झ ट ठ ड ढ ण त त थ द द ध न प फ ब भ
भ म य य र र ल ल ल व व श ष स स ह ह
ळ म् जा जा टा दा सा नि यि रि लि ली दो नो कु खु डुं नू
भू मू क्त वृ ये ले पो न्न या ज्ञः त्य त्र ब्रा ब्रा र्णी र्षस्य
𑀲𑀺𑀥𑀁 [𑀭𑀜𑁄] 𑀔𑀳𑀭𑀸𑀢𑀲 𑀔𑀢𑀧𑀲 𑀦𑀳𑀧𑀸𑀦𑀲 𑀤𑀸-
𑀢𑀼 𑀤𑀻𑀦𑀻𑀓𑀧𑀼𑀢𑁂𑀦 𑀉𑀱𑀯𑀤𑀸𑀢𑁂𑀦 𑀢𑁆𑀭𑀺𑀭𑀲𑁆𑀫𑀺𑀧𑀯𑀢𑁂𑀱𑀼 𑀕𑁄-
𑀯𑀥𑀦𑁂 𑀢𑁆𑀭𑀬𑁄𑀤𑀰𑀮𑁂𑀡𑀓𑁂𑀱𑀼 𑀇𑀫𑀸𑀦𑀺 𑀘𑁂𑀢𑀺𑀬-𑀖𑀭𑀸𑀡𑀺
𑀘𑁂𑀢𑀺𑀬𑀯𑀭𑀸𑀡𑀺 𑀘 𑀧𑀢𑀺𑀞𑀸𑀧𑀺𑀢𑀸𑀦𑀺 𑀅𑀦𑁂𑀓𑀸𑀦𑀺 𑀧𑁄𑀣𑀺𑀬𑁄-
𑀤𑀓𑀯𑀸𑀧𑀻𑀑 𑀘 𑀧𑀤𑀭𑀢𑁄 𑀢𑀢𑁄 𑀧𑀯𑀢𑁂𑀲𑀼 𑀅𑀧𑀭𑀸𑀦𑁆𑀢𑁂𑀱𑀼
𑀲𑀧𑁆𑀢𑀸𑀡𑀁 𑀅𑀧𑀡𑁂 𑀕𑀸𑀯𑁂 𑀓𑀤𑀺𑀢𑀸 𑀯𑀮𑀽𑀭𑀓𑁂𑀲𑀼
𑀧𑀼𑀯𑀭𑀫𑁂𑀢𑁂𑀱𑀼 𑀅𑀚𑀺𑀢𑀫𑁂𑀢𑁂𑀱𑀼 𑀏𑀢𑁂𑀱𑀼 : 𑀩𑀸𑀳𑀼𑀓𑀸𑀬𑀁
𑀦𑀤𑀺𑀬𑀁 𑀩𑀸𑀡𑀸𑀲𑀸𑀬𑀁 𑀧𑀺𑀢𑀮𑀺𑀬𑀸𑀁 𑀓𑀭𑀯𑀺𑀓𑀸𑀬𑀁 𑀤𑀳𑀦𑀼𑀓𑀸𑀬𑀁
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Plate VIII. लिपिपत्र आठवां.
क्षत्रप वंशी राजा रुद्रदामा के गिरनार के चट्टान पर के लेख से.
(ई. स. की दूसरी शताब्दी).
अ आ इ ए क ख ग घ च छ ज झ ञ ट ठ ड
𑀅 𑀆 𑀇 𑀏 𑀓 𑀔 𑀕 𑀖 𑀘 𑀙 𑀚 𑀛 𑀜 𑀝 𑀞 𑀟
ड ढ ण त थ द ध न प फ ब भ म म य य र
𑀟 𑀠 𑀡 𑀢 𑀣 𑀤 𑀥 𑀦 𑀧 𑀨 𑀩 𑀪 𑀫 𑀫 𑀬 𑀬 𑀭
र ल ल व व श ष स स ह ह ळ का जा टा मा धि
𑀭 𑀮 𑀮 𑀯 𑀯 𑀰 𑀱 𑀲 𑀲 𑀳 𑀳 𑀴 𑀓𑀸 𑀚𑀸 𑀝𑀸 𑀫𑀸 𑀥𑀺
यिं की पी कु नु रु डू मू रू क्क गृ वृ दे पे नै वै गो तो
𑀬𑀺𑀁 𑀓𑀻 𑀧𑀻 𑀓𑀼 𑀦𑀼 𑀭𑀼 𑀟𑀽 𑀫𑀽 𑀭𑀽 𑀓𑁆𑀓 𑀕𑀾 𑀯𑀾 𑀤𑁂 𑀧𑁂 𑀦𑁃 𑀯𑁃 𑀕𑁄 𑀢𑁄
नौ पौ मौ यौ क्रि च्त ज्ञ द्वा द्य द्यु द्र प्र र्जि र्या द्व स्मा त्
𑀦𑁅 𑀧𑁅 𑀫𑁅 𑀬𑁅 𑀓𑁆𑀭𑀺 𑀘𑁆𑀢 𑀚𑁆𑀜 𑀤𑁆𑀯𑀸 𑀤𑁆𑀬 𑀤𑁆𑀬𑀼 𑀤𑁆𑀭 𑀧𑁆𑀭 𑀭𑁆𑀚𑀺 𑀭𑁆𑀬𑀸 𑀤𑁆𑀯 𑀲𑁆𑀫𑀸 𑀢𑁆
𑀲𑀺𑀤𑁆𑀥𑀁 𑀇𑀤𑀁 𑀢𑀟𑀸𑀓𑀁 𑀲𑀼𑀤𑀭𑁆𑀰𑀦𑀁 𑀕𑀺𑀭𑀺𑀦𑀕𑀭𑀸𑀤𑁆𑀭𑀺𑀧𑀸-
𑀤𑀸𑀤𑁆 𑀯𑀺𑀱𑁆𑀝𑀫𑁆𑀪𑀯𑁆𑀬𑀸𑀬𑀢𑀧𑀭𑀺𑀡𑀸𑀳𑀁 𑀧𑀭𑁆𑀯𑁆𑀯𑀢𑀧𑀸𑀤𑀧𑁆𑀭𑀢𑀺-
𑀲𑁆𑀧𑀭𑁆𑀤𑁆𑀥𑀺 𑀩𑀦𑁆𑀥𑀫𑀦𑀼𑀢𑁆𑀢𑀫 𑀧𑁆𑀭-----------------𑀣𑀁 𑀯𑀸𑀧𑀻𑀓𑀸𑀭𑀼𑀡𑁆𑀬𑀢𑁄
𑀘 𑀲𑀼𑀧𑁆𑀭𑀢𑀺𑀯𑀺𑀳𑀺𑀢 𑀧𑁆𑀭𑀦𑀸𑀮𑀻𑀧𑀭𑀻𑀯𑀸𑀳𑀫𑀻𑀟𑁆𑀯𑀺𑀥𑀸𑀦𑀁 𑀘𑀧𑁆𑀭𑀢𑀻𑀖𑀸𑀢𑀁 𑀏𑀱𑀁
𑀫𑀼𑀭𑁆𑀢𑁆𑀢𑀺𑀫𑀤𑁆𑀪𑀺𑀭𑀺𑀯 𑀥𑀭𑁆𑀫𑁆𑀫 𑀓𑀸𑀫𑀸𑀭𑁆𑀣𑁃𑀂 𑀧𑁆𑀭𑀣𑀺𑀢𑀥𑀭𑁆𑀫𑁆𑀫𑀡𑀸 𑀘 𑀭𑀸𑀚𑁆𑀜𑀸
𑀫𑀳𑀸𑀔𑀢𑁆𑀭𑀧𑁂𑀦 𑀲𑀼𑀕𑀾𑀳𑀻𑀢 𑀦𑀸𑀫𑁆𑀦𑀸 𑀭𑀼𑀤𑁆𑀭------------------𑀬𑀢𑁆𑀢𑁆𑀭 𑀮𑀸𑀪𑀸𑀦𑀸𑀁
𑀯𑀭𑁆𑀱𑁂 𑀲𑀧𑁆𑀢𑀲𑀧𑁆𑀢𑀢𑀻𑀢𑀫𑁂 𑁭𑁦 𑁭 𑀭𑀸𑀚𑁆𑀜𑁄 𑀫𑀳𑀸𑀔𑀢𑁆𑀭𑀧𑀲𑁆𑀬 𑀚𑀬𑀤𑀸𑀫𑀧𑀼𑀢𑁆𑀭𑀲𑁆𑀬 𑀭𑀸𑀚𑁆𑀜𑁄 𑀫𑀳𑀸-
𑀔𑀢𑁆𑀭𑀧𑀲𑁆𑀬 𑀭𑀼𑀤𑁆𑀭𑀤𑀸𑀫𑁆𑀦𑁄 𑀯𑀭𑁆𑀱𑀧𑁆𑀭𑀪𑀯𑀸𑀪𑀺𑀯𑀭𑁆𑀥𑀺𑀢𑀯𑁃𑀰𑁆𑀬𑀸𑀦𑀼𑀕𑁆𑀭𑀳𑀸𑀭𑁆𑀣𑀁 𑀧𑀭𑀺𑀯𑀭𑁆𑀢𑀺𑀢𑁂𑀦
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Plate IX. लिपिपत्र नवमा.
सातवाहन (आन्ध्र) वंशी राजाओं के नासिक के लेखों से
(ई. स. की दूसरी शताब्दी).
वासिष्ठीपुत्रपुळुमायि के ४ लेखों से.
अ आ इ उ ए ऐ ओ क ख ख ख ग घ च कृ ज
[तदनुरूप ब्राह्मी वर्ण]
ज झ ञ ट ठ ड ढ ण त त थ द ध ध न प ब
[तदनुरूप ब्राह्मी वर्ण]
भ म य य र ल व स ह ळ मा वा गि डि रि यि भि
[तदनुरूप ब्राह्मी वर्ण]
वी कु खु तु नु सु ळु भू सू खे ले गो मो लो गृह म्हा ह्य
[तदनुरूप ब्राह्मी वर्ण]
गौतमीपुत्रयज्ञशातकर्णी के लेख से. गौतमीपुत्रशातकर्णी के २ लेखों से.
ठ त त द प ले जो इ ग ग च च ट ड त त
[तदनुरूप ब्राह्मी वर्ण]
त द द ध ध न भ य दा डो रु भू खे धो लो ण्ह स्वा
[तदनुरूप ब्राह्मी वर्ण]
[नासिक अभिलेख अनुकृति - पंक्ति १]
[नासिक अभिलेख अनुकृति - पंक्ति २]
[नासिक अभिलेख अनुकृति - पंक्ति ३]
[नासिक अभिलेख अनुकृति - पंक्ति ४]
[नासिक अभिलेख अनुकृति - पंक्ति ५]
CC-0.Dwivedi Lok Hitkari Pustakalaya, Ghaziabad. Digitized by eGangotri
𑀢𑁆𑀭𑀧𑀲 𑀤𑀸𑀫𑀚𑀤𑀲𑁆𑀭𑀺𑀬𑀲𑁄 .`
Wait, let's check:
Chashtana was son of Ghsamotika!
Jayadaman was son of Chashtana!
Rudradaman I was son of Jayadaman!
Damajadasri I was son of Rudradaman!
Rudrasimha I was son of Rudradaman!
Jivadaman was son of Damajadasri!
Rudrasena I was son of Rudrasimha!
YES! That is the EXACT genealogy of the Western Kshatrapas on their coins!
Let's verify each line from this exact historical sequence:
Line 1:
`𑀭𑀜𑁄 𑀫𑀳𑀔𑀢𑁆𑀭𑀧𑀲 𑀘𑀱𑁆𑀝𑀦𑀲 . 𑀭𑀜𑁄 𑀫𑀳𑀔𑀢𑁆𑀭𑀧𑀲 𑀖
Plate XI. लिपिपत्र ११वां.
दक्षिण की भिन्न २ गुफाओं के कई लेखों से उद्धृत किये हुए मुख्य २ अक्षर.
(ई. स. की दूसरी से चौथी शताब्दी).
भाजा. पित्तलखोरा. महाड़. सेलारवाडी, बेडसा.
ठ द. द दा. उ ग ध ध म र स दे. उ व. भो.
𑀞 𑀤 . 𑀤 𑀤𑀸 . 𑀉 𑀕 𑀥 𑀥 𑀫 𑀭 𑀲 𑀤𑁂 . 𑀉 𑀯 . 𑀪𑁄 .
कन्हेरी. कार्ली.
ख घ त त ध भ ह ह पू लो. ओ ख घ थ थ द
𑀔 𑀖 𑀢 𑀢 𑀥 𑀪 𑀳 𑀳 𑀧𑀽 𑀮𑁄 . 𑀑 𑀔 𑀖 𑀣 𑀣 𑀤
कार्ली. जुन्नर.
द न ह ह दा सि मु वु यू लू भो. अ उ उ ग घ
𑀤 𑀦 𑀳 𑀳 𑀤𑀸 𑀲𑀺 𑀫𑀼 𑀯𑀼 𑀬𑀽 𑀮𑀽 𑀪𑁄 . 𑀅 𑀉 𑀉 𑀕 𑀖
भ य ल व व स ढि ति मि रि रि लि वी पु तो व्य.
𑀪 𑀬 𑀮 𑀯 𑀯 𑀲 𑀠𑀺 𑀢𑀺 𑀫𑀺 𑀭𑀺 𑀭𑀺 𑀮𑀺 𑀯𑀻 𑀧𑀼 𑀢𑁄 𑀯𑁆𑀬 .
नाशिक. कूडा.
इं उ जा स मू न्नि द्रा न्ये. अ का रि लि लि वी पु दे न्ह.
𑀇𑀁 𑀉 𑀚𑀸 𑀲 𑀫𑀽 𑀦𑁆𑀦𑀺 𑀤𑁆𑀭𑀸 𑀦𑁆𑀬𑁂 . 𑀅 𑀓𑀸 𑀭𑀺 𑀮𑀺 𑀮𑀺 𑀯𑀻 𑀧𑀼 𑀤𑁂 𑀦𑁆𑀳 .
[ब्राह्मी शिलालेख पाठ - पंक्ति १]
[ब्राह्मी शिलालेख पाठ - पंक्ति २]
[ब्राह्मी शिलालेख पाठ - पंक्ति ३]
[ब्राह्मी शिलालेख पाठ - पंक्ति ४]
[ब्राह्मी शिलालेख पाठ - पंक्ति ५]
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Plate XII. लिपिपत्र १२ वां.
अमरावती और जगय्यपेट के लेखों से.
(ई. स. की दूसरी व तीसरी शताब्दी).
अमरावती के लेखों से उद्धृत किये हुए मुख्य मुख्य अक्षर (ई. स. की दूसरी शताब्दी.)
अ इ इ ई क ड त न ध भ ह ह जा णि दु लो ह
[अमरावती लिपि के अक्षर / Glyphs of Amaravati script]
जगय्यपेट के ३ लेखों से (ई. स. की तीसरी शताब्दी के आसपास).
अ आ आ इ इ ई ए क ख ख ग ग घ च कृ ञ ठ ड ढ ण
[जगय्यपेट लिपि के अक्षर - पंक्ति १ / Glyphs of Jaggayyapeta script - Row 1]
ण त त थ थ द ध न प ब भ म य र ल व व स स
[जगय्यपेट लिपि के अक्षर - पंक्ति २ / Glyphs of Jaggayyapeta script - Row 2]
ह बा हा धि लि सि वी कु डु यु तू पू रू दे मे णो खं
[जगय्यपेट लिपि के अक्षर - पंक्ति ३ / Glyphs of Jaggayyapeta script - Row 3]
[जगय्यपेट के अभिलेख की अनुकृति - पंक्ति १ / Inscription facsimile - Line 1]
[जगय्यपेट के अभिलेख की अनुकृति - पंक्ति २ / Inscription facsimile - Line 2]
[जगय्यपेट के अभिलेख की अनुकृति - पंक्ति ३ / Inscription facsimile - Line 3]
[जगय्यपेट के अभिलेख की अनुकृति - पंक्ति ४ / Inscription facsimile - Line 4]
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Plate XIII.
लिपिपत्र १३वां.
मयिडवोलु से मिले हुए पल्लववंशी शिवस्कंदवर्मन् के दानपत्र से.
(ई. स. की चौथी शताब्दी के प्रारंभ के आसपास).
अ आ उ ए अं क क ख ग च च छ ज ज ञ ञ
ट ठ ड ण त त त थ द द ध ध न न न प
प प ब ब भ म म म म य य र ल व व
व व स ह ह ह गा जा दा रा हा गि लि सि
पी टु कू के डे जो जो सो बो म्हो म्ह म्ह म्हे
--- सिधं युवमहाराजो भारदायसगोत्तो प-
ल्लवाणं सिवखंदवम्मो धंनकडके वावतं अम-
च्चं आणवेति एथ अम्हेहिं गामं विरिप-
परं सव्वबाधापरिहारेहिं परिहरितव्वो...
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Plate XIV. लिपिपत्र १४वां.
कोणडमुडि से मिले हुए राजा जयवर्मन् के दानपत्र से.
(ई. स. की चौथी शताब्दी के प्रारंभ के आसपास.)
अ अ आ ई ए ओ क ख ख ग घ च छ ज ज ज
ट ट ठ ड ड ढ त त थ द ध ध न न न
प प प फ ब भ म य र ल व व व श ष स
स ह ह जा पा च्छि गु यु रू टू बृ के तो न्हु म्ह्ने द्य
[सि]धं विजयखंधावारा कोदूरतो गो[त]मपुतस
[सि]रिजयवम्मस्स वचनेन कुदुरे वा[पतो]
आनपयति अम्हेहि इध अपणो आयुबल
वद्धनिके वानेय्यस गोतस बह्मणेस्स
तायनम्हि गामे पांटूर [ए]को भ[ागो]
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Plate XV.
लिपिपत्र १५वां.
हौरहड़गल्ली से मिले हुए पल्लववंशी राजा शिवस्कंदवर्मन् के दानपत्र से.
(ई. स. की चौथी शताब्दी के प्रारंभ के आसपास.)
अ आ इ उ ए ए क ख ख ग घ च च छ ज ट ट
[तदनुरूप लिपि-चिह्न]
ठ ड ड ढ ण ण त त त थ थ द ध ध ध न न प
[तदनुरूप लिपि-चिह्न]
प फ ब भ भ म य र ल व व श स ह म् का गा
[तदनुरूप लिपि-चिह्न]
णा वि जी कु गु द्र के मे को गो रो लो त्य त्य त्र क्ष
[तदनुरूप लिपि-चिह्न]
[अभिलेख पंक्ति १ / Inscription Line 1]
[अभिलेख पंक्ति २ / Inscription Line 2]
[अभिलेख पंक्ति ३ / Inscription Line 3]
[अभिलेख पंक्ति ४ / Inscription Line 4]
[अभिलेख पंक्ति ५ / Inscription Line 5]
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