प्रबन्धचिन्तामणि (आचार्य मेरुतुङ्ग - राजा भोज, विक्रमादित्य, सिद्धराज जयसिंह एवं मालवा इतिहास सटीक)
Prabandhachintamani of Acharya Merutunga
आचार्य मेरुतुङ्ग (अनुवादक: मुनि जिनविजय / हजारीप्रसाद द्विवेदी) द्वारा
३६ ] प्रबन्धचिन्तामणि [ द्वितीय प्रभाव
इसके बाद राजाने उसके पुत्रको [ यह समस्या दी ]—‘हिमालय नामक पर्वतोंका राजा है !’—
‘प्रवाल (तृणाङ्कुर) की शय्याको शरीरका शरण’ बनाया। राजाके इस वाक्यको सुनकर उसने उत्तर दिया—
५८. वह जो हिमालय नामक पर्वतोंका राजा है, तुम्हारे प्रतापरूपी अग्निसे पिघल रहा है; और विरहसे
आतुर बनी हुई मेना ( हिमालय-पत्नी मेनका ) अपने शरीरको प्रवाल (तृणाङ्कुरों) की शय्याके
शरण कर रही है।
इस प्रकार उसके समस्या पूरी कर देनेपर, ज्येष्ठकी पत्नीको राजाने समस्याका यह पद अर्पित किया—
किससे पिलाऊँ दूध ?
५९. जब रावण पैदा हुआ तो उसने एक शरीरपर दस मुँह देख कर उसकी माता बड़ी विस्मित हुई
और सोचने लगी कि कौनसे मुँहसे इसे दूध पिलाऊँ ?
—उसने इस प्रकार यह समस्या पूरी की।
इसके बाद राजाने दासीसे भी इस प्रकारका पद समस्याके लिये दिया—‘कंठमें काऊ लटक रहा है!’
६०. पतिविरहसे कराल बनी हुई किसी स्त्रीने उस बेचारे कौवेको उडाया तो, बड़ा आश्चर्य मैने
हे सखि ! यह देखा कि वह काक उसके कठमें लटक रहा * ।
उसने इस तरह पूरा किया। राजाने उस कुटुम्बमर्की लड़कीको भूलकर, अन्य सबक़ो सत्कार
करके बिदा किया ।
बादमें राजाने जब सर्वोवसर ( राजसभा ) का विसर्जन किया और स्वय चन्द्रशाला ( चाँदनी=महलके
ऊपरकी छत ) की भूमिमें छत्र धारण करके टहल रहा था, तत्र द्वारपालने उस लड़कीका वृत्तान्त कहा ।
राजाने उसे [ बुलाकर ] कहा—‘कुछ बोलो’—तो वह बोली कि—
६१. हे राजन्, हे मुञ्जकुलके दीपक, हे समस्त पृथ्वीके पालक, राजाओंके चूडामणि ! इस भवनमें
रातमें भी, तुम इस प्रकार छत्र धारण करते हो वह उचित ही है। इससे न तो तुम्हारे मुखकी
कान्तिको देखकर चन्द्रमाको लज्जित होना पड़ता है ओर न भगवती अरुन्धतीको ( पर पुरुषके
मुखदर्शनसे ) दु शशीलताका भाजन होना पड़ता है।
उसके इस वाक्यके अनन्तर राजाने, जिसके चित्तको उसके सौन्दर्य और चातुर्यने हरण कर लिया था,
उससे विवाह करके अपनी भोगिनी बनाया।
- इस पद्यमें ‘काउ’ इस देश्य शब्दपर श्लेष है। काउ काग-काक-कौआ वाचक तो प्रसिद्ध है ही-इसके सिवा
गलेमें जो एक लटकता हुआ छोटासा मासपिंड है उसका नाम भी काक-काग ( गुजराती-कागडो ) है। कोई विरहिणी स्त्रीका
शरीर इतना कृश होगया है कि जिससे उसके कठमें लटकता हुआ काग स्पष्टतया बहार दिखाई देता है। उसके घरके सामने आ
आकर कौआ बोलता है, जिसका यह अर्थ समझा जाता है कि, उसका स्वजन आनेवाल है। लेकिन उसके वारवार ऐसा
बोलने पर भी वह जब नहीं आता मालूम देता है तो फिर वह विरहिणी चिढ़कर उस कौवेको उडा देती है। इस कौवेके उड़ाते
समय उसके पासमें बैठी हुई सखिने उसके दुर्बल कटमेंका वह काग नजर आया। इस अर्थकी घटना बतलानेके लिये कविने
इस पद्यमें ‘काउ’ शब्दका प्रयोग कर उसकी समस्यापूर्ति बनाई है। इस ग्रथके गुजराती और इग्रजी भाषान्तरकारोंने इन
पद्योंक कुछके कुछ ऊटपटाग अर्थ किये है।
प्रकरण ४५-४६ ] भोज और भीमका प्रबन्ध [ ३७
भोजकी गुजरातके राजा भीमके प्रति प्रतिस्पर्धा ।
४५) इसके बाद, एक समय, संधिपत्रके होते हुए भी, संधिमें दोष उत्पादनके विचारसे भोज
राजाने गूर्जर देश की बुद्धिमत्ताका ज्ञान प्राप्त करनेकी इच्छासे अपने सान्धिविग्रहिकके हाथ, भीम के पास
यह [ प्राकृत ] गाथा लिख भेजी-
६२. क्रीडा मात्रमें जिसने हाथीका कुम्भस्थल विदीर्ण किया हो और चारों दिशामें जिसका प्रताप
फैल रहा हो उस सिंहका, मृगके साथ न तो विग्रह ही [शोभता है] और न सन्धि ही [रहती है]।
भीम ने इस गाथाका उत्तर देनेके लिये सब महाकवियोंने गाथा माँगी। पर उनकी बनाई सब गाथाओंको
निःसारार्थक देखकर यह सोचमें पड़ गया । उसी समय नगरमेंके जैन मन्दिरके अन्दर नाचनेके लिये सज्ज बनी
हुई नर्तकीको खम्भेके पास खड़ी हुई देखकर मंत्रीने वहीं बैठे हुए किसी आचार्य-शिष्यसे स्तंभ-वर्णनके लिये
कहा । यह बोला-
[ ४८ ] हे स्तंभ ! तुम जो इस मृगनयनी नवयौवनाकी, कङ्कणाभरण आदिसे सज्जित बाहुलतासे [वेष्टित
होकर भी ] न स्वेद-युक्त होते हो, न हिलते हो और न काँपते हो; सो सचमुच ही तुम पत्थरके
बने हो यह निश्चित होता है ।
[ आचार्य-शिष्यकी विद्वत्ताकी यह बात जब मंत्रीने राजासे कही तो राजाने [ उसके गुरु ] आचार्यको
बुलाकर उस विषयमें पूछा-
६३. विधाताने भीम को अन्धकके * पुत्रोंको मारनेके लिये ही निर्माण किया है । जिस भीमने सौ
[ अन्धक पुत्रों ] को कुछ नहीं गिना उसके सामने तुझ अकेलेकी क्या गणना है ! '
इस प्रकार गोविन्दाचार्य की बनाई हुई चित्तको चमत्कृत कर देनेवाली इस गाथाको दूतके हाथ
भेजकर, सन्धिके दोषको दूर किया ।
४६) बादमें किसी एक रातको, जाड़ेके दिनोंमें, राजा जब वीरचर्यामें घूम रहा था, तो किसी मन्दिरके
सामने, किसी पुरुषको यह पढ़ते सुना-
६४. मेरा पेट भूखसे व्याकुल है, ओंठ फट गये हैं, ऐसी अवस्थामें फूंकते फूंकते आग ठंडी हो गई
है, चिन्ताके समुद्रमें डूब रहा हूँ, शीतसे मापके फलकी तरह सिकुड़ गया हूँ । निद्रा अपमानिता
स्त्रीकी भाँति कहीं दूर चली गई है; और सत्पात्रमें दी गई लक्ष्मीकी भाँति रात भी खतम नहीं
हो रही है ।
यह सुनकर रात बिताकर सवेरे उसे बुलाकर पूँछा-' किस प्रकार तुमने रात्रिशेषमें शीतका अत्यन्त
उपद्रव सहन किया ? ' । ' सत्पात्रमें दी गई लक्ष्मी ' इत्यादि कथनकी ओर संकेत करके उसने कहा था ।
[ वह बोला- ] ' महाराज ! मैं खूब गाढ़े तीन वस्त्रोंसे जाड़ा काटता हूँ । ' राजाने पूछा कि तुम्हारे ये तीन
वस्त्र क्या हैं ? तब उसने फिर कहा-
६५. रातमें घुटने, दिनमें सूर्य और दोनों शामको आग, इस प्रकार हे राजन्! घुटने, सूर्य और
आगके बलपर मैं शीत काटता हूँ ।
जब उसने इस प्रकार कहा तो राजाने उसे तीन लाखका दान देकर सन्तुष्ट किया ।
६६. तुमने अपनी आत्माको धारण करके बलि, कर्ण आदि उन त्यागमूर्ती धनवान पुरुषोंको मुकुर-
- यहाँपर 'अंधक' इस शब्दपर श्लेष है । कौरवोंका पिता धृतराष्ट्र अन्धा था इसलिये उसको अन्धक कहा है।
भोजका पिता सिंधुराज भी अन्धा था इसलिये उसका विशेषण भी अन्धक सार्थक है ।
दिया, जो सज्जनोंके चित्तरूपी कैदखानेमें आबद्ध थे।
इस प्रकार जब वह सारवान् काव्यका उद्गार प्रकट कर रहा था तो राजाने उसका पारितोषिक देनेमें
अपनेको असमर्थ समझ कर अनुरोधपूर्वक रोक दिया।
[ यहाँ P. B. नामक प्रतिमें निम्नांकित वर्णन अधिक पाया जाता है-]
[ ४९ ] शीतसे रक्षा करनेके लिये पटी ( वस्त्र ) नहीं है, आग सुलगानेके लिये सगड़ी नहीं है।
कमर भूमिपर घिस गई है-सोनेको शय्या नहीं है, कुटियामें हवाके रोकनेका कोई उपाय नहीं है,
खानेको मुट्ठीभर चावल नहीं है, घड़ीभर भी मनमें संतोप नहीं है, शृंगार की कोई वृत्ति नहीं है,
मनको प्रसन्न करनेवाली कोई प्रिया नहीं है, लेनदारोंसे संकटमें पड़ा हूँ; ऐसी दशामें हे भोजराज !
तुम्हारे कृपारूपी हाथी द्वारा ही मेरी इस आपदाकी तटीका नाश हो सकता है।
इस श्लोकमें आई हुई ग्यारह टी¹ के हिसाबसे भोज राजा ने उसे ११ लाखका दान दिया।
एक बार, किसी विद्वत्कुलके निवासके लिये घर देखे जा रहे थे। उनके न मिलनेपर राजाने कहा कि
जुलाहों और मच्छीमारोंको उजाड़ दिया जाय। जब राजपुरुष उन्हें उजाड़ने लगे तो एक जुलाहा उन्हें रोककर
राजाके पास गया, और बोला कि-महाराज ! क्यों हमें उजाड़ रहे हैं? तो राजाने पूछा-क्या तू कविता
करता है ? वह बोला-
[ ५० ] जिसके चरणोंपर राजाओंके मुकुटके मणि लोटते रहते हैं ऐसे हे साहसाङ्क महाराज! मैं
काव्य तो करता हूँ पर सुन्दर नहीं कर पाता। जैसा तैसा करता हूँ पर सिद्ध नहीं होता। मैं
उसका क्या करूँ ? मैं कविता करता हूँ, कपड़ा बुनता हूँ और अन्न जाता हूँ।
धीवरकी बहू भी हाथमें मांस लेकर राजाके पास गई और बोली-
[ ५१ ] 'महाराज, तुम्हारी जय हो !'-' तू कौन है ?'-' लुब्धक (धीवर) की बहू।'-' हाथमें यह
क्या है ?'-' मांस ! '-' सूखा क्यों है ?'-' यों ही'-और यदि महाराज ! आपको कौतुक हो तो
कहती हूँ कि-तुम्हारे शत्रुओंकी प्रियाओंके आँसुकी नदीके किनारे सिद्धोंकी स्त्रियाँ गान करती
हैं। गीतमें अन्धे होकर हरिण चरते नहीं। इसलिये उनका यह मांस दुर्बल हो गया है।
इस प्रकार उक्ति प्रायुक्तिकप ये दो काव्य सुनकर राजाने उन्हें नगरके भीतर स्थापन किया।
एक बार, कोई विद्वान्, जो गर्वोद्धत था, उस नगरके निवासियोंको घरमें ही गरजनेवाले समझकर
अवज्ञापूर्वक वादके लिये आया। नगरके समीप किसी पुरुषसे (धोबीसे) जो वस्त्र धो रहा था बोला-' अरे
साड़ीका मैल धोनेवाले ! नगरमें क्या हालचाल हो रहा है ?' वह बोला-
[ ५२ ] घोड़े तोरण लगे हुए मकानोंको ढोते हैं, गायें केसरके सहित कमलोंको चरती हैं, दही यहाँ-
पर पीला मिलता है, तिलोंमें यहाँ तैल नहीं होता और मकानोंके दरवाजेके शिखरपर हिरण
चरा करते हैं।
इसके बाद, किसी बालिकासे पूँछा-' तू कौन है ?' तो वह बोली-
[ ५३ ] मरे हुए जहाँ जींदा होते हैं, जिनकी आयु बीत गई हे वे उच्छ्वसित होते हैं और अपने गोत्रमें
जहाँ कलह होता है, मैं उस कुलकी बालिका हूँ।
इसका अर्थ न समझकर उसने विचार किया, कि जहाँ बालिका भी इस तरहकी विधानादी है वहाँके
विद्वान् कैसे होंगे, यह उल्टे पाँव लौट गया।
१ इस श्लोकमें 'टी' जिसके अन्तमें है ऐसे पटी, कटी, कुटी, घटी, तटी इत्यादि ११ शब्द आये हैं उन शब्दोंको
गिनकर ११ लाखका भोजने उस कविको दान दिया ऐसा इसका तात्पर्य है।
प्रकरण ४७-५० ] भोज और भीमका प्रबन्ध [ ३९
४७) इसके बाद, एक दूसरे अवसरमें, राजा राजपाटीमें भ्रमणार्थ हाथीपर चढ़कर नगरके भीतर जा
रहा था । उस समय किसी भिक्षुकको, पृथिवीपर गिरे हुए अन्न-कणोंको चुनते हुए देखकर बोला-
६७. अपना पेट भरनेमें भी जो असमर्थ हैं उनके जन्म लेनेसे क्या है ?
-इस प्रकार उसके पूर्वार्ध कहनेपर;
सुसमर्थ होकर भी जो परोपकारी नहीं उनके [ जन्म लेने ] से भी क्या है !
६८. 'उनके [ जन्म लेने ] से भी क्या है'-यह कहनेपर, दानशूर भोज नरेन्द्र ने उसको सौ हाथी
और एक करोड़ सुवर्ण मुद्रायें दीं ।
उसके इस वचनके अन्तमें [ राजाने कहा ]-
६९. हे जननि ! ऐसा पुत्र न जन जो दूसरोंके आगे प्रार्थना किया करें ।
उसके इस वाक्यके पश्चात् [ भिक्षुक बोला ]-
उसको भी उदरमें न धारण कर जो दूसरोंकी प्रार्थनाका भंग करें ।
जब उसने इस प्रकार कहा तो राजाने पूछा-' तुम कौन हो ?' इस पर नगरके प्रधान पुरुषोंने
कहा, कि आपके यहाँ, नाना भाँतिके विद्वानोंकी घटा में जब अन्य किसी उपायसे प्रवेश न पा सका तो इसी
प्रपञ्चसे स्वामिदर्शनकी इच्छा रखनेवाला यह [ व्यक्ति ] राजशेखर है । उसको उचित महादानोंसे पुरस्कृत
करनेपर उस राजशेखर ने ये कवितायें पढ़ीं-
[ ५४ ] अकुण्ठित मेघोंके नादसे नाचती हुई मयूरियोंकी उन्नत आवाज़से आकुल, मेघागमन कालमें
( वर्षा में ) तो जमीनपर भी जल सुविधासे मिल जाया करता है । लेकिन, इस भयानक उष्णता
भरे ग्रीष्म कालमें करुणासे एक दूसरेकी ओर देखनेवाली और इधर उधर ताकती हुई मछलियोंका
यदि तू पालन नहीं करता, तो, रे कासार ( तालाब ) तेरी फिर सारता ही क्या है !,
७०. जिस सरोवरमें, मेंढक मरे हुओंकी भाँति कोटरोंमें सो गये थे, कच्छप पृथ्वीमें छिप गये थे, और
गाढ़े पंकके ऊपर लोटनेसे मछलियाँ बारंबार मूच्छित हो रही थीं, उसी तालाबमें, अकालके मेघने
उतरकर ऐसा किया कि उसमें कुंभस्थल तक डूबे हुए हाथियोंके झुंड पानी पी रहे हैं ।
इस प्रकार अकालजलद राजशेखर की यह उक्ति है ।
*
राजा भोजकी गुजरातपर आक्रमण करनेकी इच्छा ।
४८) इसके बाद, किसी साल, वर्षा न होनेके कारण राजा भीम के देशमें ( गुजरात में ) अन्न, कण और
तृण भी नहीं मिलता था ऐसे कुसमयमें, राजपुरुषोंने भोज का आना बताया ( अर्थात्-भोजराजाने गुजरात
पर चढ़ाई करनेकी बात उठाई ) । यह सुनकर भीम को चिन्ता हुई और उसने अपने डामर नामक सान्धि-
विग्रहिकको आदेश किया कि कुछ दण्ड देकर इस साल भोज को यहाँ आनेसे रोको । उसका यह आदेश
पाकर वह वहाँ गया । वह डामर अत्यंत कुरूप समझा जाता था । भोजने [ उसका उपहास करनेकी
दृष्टिसे ] कहा-
७१. ' हे ब्राह्मण ! तुम्हारे स्वामीके संधि-विग्रह पदपर तुम्हारे जैसे कितने दूत हैं ?' [ उत्तर-]
' यों तो बहुत ही हैं, हे मालव-नरेश ! पर वे सब गुणकी दृष्टिसे तीन प्रकारके हैं-अधम,
मध्यम और उत्तम । [ इनमें ] जो जिस गुणके योग्य होता है उसीके अनुसार ये दूत उन उन
४० ] प्रबन्धचिन्तामणि [ द्वितीय प्रकाश
राज्योंमें भेजे जाते हैं।' इस प्रकार भीतर ही भीतर हँसते हुए उत्तर देकर उसने धारा के
स्वामी (भोज) को प्रसन्न किया।
इस प्रकार उसकी वचन-चातुरीसे राजा चमत्कृत हुआ। गूर्जर देशके प्रति प्रयाण करनेका
राजाने नगाड़ा बजवाया। प्रयाणके समय बंदीने यह स्तुतिपाठ किया—
७२. चोड़ [ का राजा ] समुद्रकी गोदमें प्रवेश कर रहा है और आन्ध्र [ पति ] पर्वतकी खोहमें
निवास कर रहा है, कर्णाटकका राजा पट्ट बंध (पगड़ी बाँधना) नहीं करता है, गूर्जर [ का
राजा ] निर्झरका आश्रय लेता है, चेदि [ नरेश ] अब्जोंसे म्लान होगया है और राजाओंमें सुभट
समान कान्यकुब्ज कूबडा होगया है–हे भोज ! तुम्हारे मात्र सेनात्रत्रके प्रसारके भयसे ही
सभी राजा लोग व्याकुल हो रहे हैं।
७३. कोंकण [ का राजा ] कोनेमें, लाट (नरेश) दरवाज़ेके पास, कलिङ्ग [ पति ] आँगनमें
सोया करते हैं। अरे कोशल [ नरेश ], तूं अभी नया है, मेरे पिता भी इस आसनपर सोया
करते थे। इस प्रकार जिस (भोज) के कारागृहमें रातमें प्रत्यार्थियोंमें स्थानप्राप्तिके लिये उठा
हुआ पारस्परिक विरोध निरंतर बढ़ता रहता है।
प्रयाणके लिये नगाड़े बजवाये जानेके बाद, रातको समस्त राजाओंकी दुर्दशाका दृश्य दिखलानेवाला
नाटक अभिनीत होने लगा। उसमें कोई क्षुद्र राजा, कारागारके भीतर सामनेकी जमीनपर सुस्थ भारसे सोये
हुए तैलप राजाको उठाने लगा। तैलपने उससे कहा-‘मैं तो यहाँ पुश्त-दर-पुश्तसे बास कर रहा हूँ,
आप जैसे नये आये हुए राजाकी बातसे अपना पद कैसे छोड़ दूँ ?' राजा भोजने हँसकर डामर से नाटकके
रसावतारकी प्रशंसा की। इसपर वह बोला-‘महाराज ! यद्यपि नाटकमें रसकी जमावट बहुत उत्तम है
तथापि इस नटकी, कथानायकके वृत्तान्तसे जो नितान्त अनभिज्ञता है वह धिक् है। क्यों कि राजा तैलपदेव
सूलीपर चढ़ाये हुए मुण्ड के सिरसे पहचाना जाता है।' सभाके सामने जब उसने इस प्रकार कहा तो राजाको
उसकी निर्भर्त्सनापर क्रोध हो आया और उसी समय उस सामग्रीके साथ, जो दूसरोंके जुटाये न जुट सकती
थी, तैलङ्ग देशके प्रति प्रयाण किया।
४९) बादमें तैलपदेव को बड़ी भारी सेनाके साथ आता हुआ सुनकर भोज व्याकुल हुआ। उतनेमें
उसे डामर ने [अपने] राजाके यहाँसे आये हुए एक कल्पित (जाली) आदेशको दिखाकर कहा कि भीम
भी चढ़कर भोगपुरतक आंगया है। जलेपर नमक छिड़कनेके समान उसकी उस बातसे राजा भोज खूब
शंकित हो गया। उसने डामरसे कहा-इस वर्ष किसी तरह तुम अपने स्वामीको यहाँ आनेसे रोको। उसने
बार बार इस प्रकार दीनताके साथ कहा और उस अवसरके जाननेवाले [डामर] को हाथीके साथ हथिनी
भेंट दी। उनको लेकर वह पत्तनमें आया और भीमको परितुष्ट किया।
५०) एक बार, जब यह धर्मशास्त्र सुन रहा था, उस समय अर्जुनका राधा-वेध (मत्स्य-वेध) सुनकर
सोचा कि ‘अभ्यास करनेपर क्या कठिन है।' फिर बराबर अभ्यास करके उस विश्वविदित राधावेधको उसने
सिद्ध किया और उसकी सारे नगरवासियोंको जान हो इसलिये नगरमें खूब सजावट कराई। किन्तु
एक तेली और एक दर्जीके, उत्साहसे उत्सवमें कोई भाग न लेने पर, राजाको उसकी खबर की गई। तेलीने
चंदशाला (ऊपरी छत) पर खड़े होकर, पृथ्वीपर रक्खे हुए संकड़े मुँहके पात्रमें तेल डालकर; और
दर्जीने पृथ्वीपर खड़े होकर ऊपरकी ओर उठाये सूतके डोरेके अग्रभागको आकाशसे पड़ती हुई सुईके छेदमें
प्रकरण ५१-५५ ] भोज और भीमका प्रबन्ध [ ४१
पिरो कर अपने अभ्यास-कौशलका परिचय दिया; और फिर राजासे 'यदि शक्ति है तो स्वामी भी ऐसा
कर दिखावें' ऐसा कह कर राजाका गर्व खंडित किया । [ उसका राधावेध करना देखकर किसो कविने
उसकी प्रशंसा में कहा- ]
७४. हे भोजराज ! मैंने राधा-वेध ( मत्स्य-वेध ) का कारण जान लिया । वह यह कि आप 'धारा' के
विपरीत ( राधा ) को नहीं सह सकते ।
५१) विद्वानों द्वारा इस प्रकार प्रशंसित होते हुए उस राजाको नया नगर बसानेकी इच्छा हुई तो उसने
पटह बजवाया । उस समय धारा नामरू एक वेश्या अपने अग्नि वेताल नामक पतिके साथ लंका जाकर
उस नगरका निवेश देख आई; और उसने यह कह कर कि नगरको मेरा नाम देना, लंका का प्रतिच्छन्द पट
( मानचित्र ) राजाको दिया । उसके अनुसार राजाने नई धारा नगरी बसाई ।
*
दिगंबर कुलचन्द्रको सेनापति बनाना ।
५२) किसी दिन वह राजा सायंकालके सर्वावसरके बाद अपने नगरके भीतर [ वीरचर्या निमित्त ]
घूम रहा था, उसी समय किसी दिगंबर विद्वान्को यह कविता पढ़ते सुना—
७५. न किसी सुभटके सिरपर खड्गके टुकडे किये, न तेजी घोड़ोंपर सवारी ही की और न गोरी
स्त्रीको गले ही लगाई—इस प्रकार निरर्थक ही यह नग्न जन्म चला गया ।
राजाने सवेरे ही उसको बुलाकर और वह संकेत सुनाकर उसकी शक्ति पूंछी । वह बोला—
७६. महाराज ! रमणीय दीपोत्सवके बीत जानेपर जब हाथियोंका मद झरने लगेगा तो मैं अपनी
शक्तिसे गौड देशके साथ सारे दक्षिणापथ को एक छत्रनीचे कर दूँगा ।
उसने अपना ऐसा पौरुष प्रकट किया तो राजाने उसे [ योग्य समझकर ] सेनापतिके पद पर
अभिषिक्त किया ।
कुलचन्द्रकी गुजरातपर चढ़ाई ।
५३) इधर, जब राजा भीम सिन्धु देशकी विजयमें रुका हुआ था, [ वह दिगम्बर ] सारे
सामन्तोंके साथ, अणहिल्लपुर पर आक्रमण करके, उसके धवलगृहके घटिकाद्वार पर, कौड़ियाँ वपन
कराकर उसने जयपत्र ग्रहण किया । तबसे सर्वत्र "कुलचन्द्रने लूट लिया" [ कहावत ] की प्रसिद्धि
हुई । वह जयपत्र लेकर मालवा में गया । श्रीभोज को यह वृत्तान्त विदित किया । 'तुमने वहाँपर कोयला
क्यों नहीं बोया ? [ इन कौडियोंके बोनेसे तो यह सूचित होता है कि भविष्यमें ] यहाँसे कर वसूल होकर
गूर्जर देश में जायगा ।' इस प्रकार सरस्वती-कण्ठाभरण श्रीभोज ने [ यह भविष्यवचन ] कहा ।
५४) एक बार चन्द्रातप ( चाँदनी ) में श्रीभोज राजा बैठे थे, पास-ही-में कुलचंद्र भी था । पूर्ण
चन्द्रमण्डलको देखकर [ पुनः पुनः उसकी ओर देखकर ] ( राजाने ) यह पढ़ा—
७७. जिन लोगोंकी रात प्रियाके साथ क्षणभरकी तरह व्यतीत हो जाती है, चन्द्रमा उनके लिये
शीतल है; किन्तु विरहीयोंके लिये तो उल्काके समान सन्तापदायक है ।
उस कविके इस प्रकार आधा कहनेपर कुलचन्द्र बोला—
हम लोगोंके न तो प्रिया है और न विरह है, इसलिये दोनों ओरसे भ्रष्ट होनेके कारण हमको तो
चंद्रमा दर्पणकी आकृति के समान दिखाई देता है । न वह उष्ण है, न शीतल ।
ऐसा कहनेके अनन्तर ही उसे पुरस्कारमें एक वेश्या प्रदान की गई ।
*
११-१२
४२ ] प्रबन्धचिन्तामणि [ द्वितीय प्रकाश
५५) इसके बाद, मालव मण्डलसे लौटे हुए डामर नामक सन्धि-विग्रहिकने भोजकी सभाका
वर्णन करते हुए [ सबको ] बहुत आश्चर्य उत्पन्न किया।' और वहाँ ( मालवामें ) जाकर भीम के अलौकिक
रूप सौन्दर्यके वर्णनसे भोजको उसे देखनेकी इच्छासे चञ्चल कर दिया । भोज ने अनुरोध किया कि ' या तो
भीम को यहाँ ले आओ या मुझे वहाँ ले चलो।' इसी तरह भोजकी सभाको देखनेके लिये उत्कण्ठित
भीम ने भी वैसा ही अनुरोध किया । किसी एक समय, उपायोंका जाननेवाला वह (डामर) बहुतसा उपहार
लेकर भीम को, जो विप्रका वेश धारण किए हुए था और हाथमें पानदान लिये था, साथ लेकर भोज की सभामें
गया। प्रणाम करते हुए उस डामर को [ भोजने भीमके ] न आनेके वृत्तान्तके बारेमें पूछा। उसने कहा-
' हमारे स्वामी स्वतन्त्र हैं, जो काम उनको अभिमत नहीं उसे जबर्दस्ती कौन करा सकता है। महाराजको
ऐसी दुराशा सर्वथा धारण नहीं करना चाहिये ।' भोज ने भीम की उम्र, वर्ण और आकृति पूछी। डामर ने
सभामें बैठे हुए लोगोंके देखते हुए, पान-दान धारण करनेवालेको लक्ष्य करके कहा-स्वामिन् !
७८. यही आकृति है, यही वर्ण है, यही रूप और यही अवस्था है। इसमें और उस राजामें अन्तर
केवल काच और मणिके समान है ।
इस प्रकार उसके बतानेपर, चतुर चक्रवर्ती भोजने सामुद्रिक शास्त्रके आधारपर, उस निश्चल दृष्टि-
वालेको ही राजा [ यही भीम है ऐसा ] जब समझ लिया तो, उपायन वस्तुयें ( भेंटकी चीजें ) ले आनेके
बहानेसे उस सन्धि-विग्रहिक ( डामर ) ने उसे बाहर भेज दिया । जब वे ( भेंटकी ) चीजें आ गईं तो
डामर ने उनका गुण वर्णन करके तथा इधर उधरकी बातें करके बहुत-सा काल काट दिया । जब राजाने
कहा कि- ' वह पान-दानवाला अभीतक क्यों नहीं आया, कितना विलम्ब करता है !' तो उस (डामर) ने
बताया कि वही तो भीम था । तब राजा उसके पीछे सैन्य दौड़ाने लगा। इसपर डामर ने कहा-'बारह बारह
योजनके अन्तरपर सवारीके घोड़े खड़े हैं, और एक घड़ीमें योजनभर चली जानेवाली करभियों ( साँठनियों )
रखी हैं । इन सारी सामग्रियोंसे भीम प्रतिक्षण बहुत-सी भूमि तै करता चला जा रहा है। आप उसे
कैसे पकड़ेंगे ?' उसके ऐसा बतानेपर वह देर तक हाथ मलता रहा ।
[ यहाँपर Pb संज्ञक आदर्शमें निम्नलिखित प्रकरण अधिक पाये जाते हैं- ]
इसके बाद एक दूसरे साल, भीम उस डामर को मालव मण्डल में भेजनेकी इच्छासे वार्ता आदि
( नीति ) सिखा रहा था । डामरने उठकर वस्त्र झाड़ लिया । तब भीम ने [ कारण ] पूछा । वह बोला-
आपका सिखाया हुआ यहीं छोड़ जाता हूँ । क्यों कि वहाँ जाकर तो मुझे स्वयं ही अवसरोचित बोलना पड़ेगा ।
दूसरेका सिखाया कितना काम आ सकता है। इसके बाद राजाने उसकी अवसरोचित चातुरी जाननेके लिये,
प्रच्छन्न भावसे, सोनेके डिब्बेको राखसे भरकर उसके हाथमें, यह सिखाकर भेंट देनेको कहा कि भोजकी
सभाके सिवा अन्यत्र कहीं भी इसे न खोलना । उसे लेकर यह मालवा में गया । भोज की सभामें जाकर
उस डिब्बेको, जो अनेक रेशमी वस्त्रोंसे वेष्टित था, राजाको भेंट किया। जब राजाने उसे खोलकर देखा तो
भीतर राखका पुञ्ज था । तब राजाने कहा-' अजी, यह कैसी भेंट है?' हाजिर जवाब डामर ने तत्काल
कहा-' महाराज श्रीभीम ने एक कोटिहोम कराया है। यह उसीकी रक्षा है, जो तीर्थके समान
पवित्र है। प्रीति-सम्बन्धसे उन्होंने आपको भेंट किया है।' उसके ऐसा कहनेपर, राजाने प्रसन्न होकर,
अपने हाथसे सब लोगोंको वह थोड़ी थोड़ी दी। उन सबोंने उससे तिलक करके उसका वंदन किया ।
अन्त:पुरमें भी वह रक्षा भेजी गई । बादमें यह डामर सम्मानित होकर, प्रति-प्राभृतके (भेंटके बदलेमें दी हुई
भेंटके ) साथ लौट आया। भीम को जब यह वृत्तान्त ज्ञात हुआ तो उसने भी उसकी पूजा ( सम्भावना ) की ।
प्रकरण ५६ ] महाकवि माघका प्रबन्ध [ ४३
पुनः एक बार भीम के चित्त में कौतुक उत्पन्न हुआ। उसने एक बार डामरके हाथमें अपनी मुद्रासे मुद्रित
( मुहर किया हुआ ) लेख दिया और हाथमें भेंटकी सामग्री देकर उसे मालवा में भेजा । उसने उस भेंटके
साथ वह लेख राजाको दिया । राजाने जब खोलकर पढ़ा तो, उसमें लिखा मिला कि-' इसको आप शीघ्र ही
मार डालिये ।' तब विस्मयके साथ राजाने पूछा-' अजी, इसमें यह क्या लिखा है ?' तब उस शीघ्रबुद्धि ने
कहा-' महाराज ! मेरी जन्म-पत्रिका में ऐसा लिखा है कि जहाँ इसका रुधिर पड़ेगा वहाँ बारह वर्षतक अकाल
पड़ेगा। यही जानकर भीमने, स्वदेशके विनाशसे भीत होकर, प्रच्छन्न लेखके साथ मुझे यहाँ भेजा है । ऐसी
स्थिति होनेपर आप अपनी रुचिके अनुसार करें।' उसके ऐसा कहनेपर राजाने कहा-' मैं अपने देशकी
प्रजाको अनर्थमें नहीं पड़ने दूँगा।' इसके बाद, उसका सम्मान करके उसे विदा किया और वह अपने देशमें
आया । उसकी बुद्धिके कौशलसे चमत्कृत होकर भीम उसे बहुत मानने लगा ।
*
महाकवि माघका प्रबन्ध ।
५६) इसके बाद, भोज राजा माघ पंडितकी विद्वत्ता और पुण्यवत्ताको सदा सुनकर उसके दर्शनकी
उत्सुकतासे अनेक राजकीय आदेश बारंबार भेजकर श्रीमालनगरसे जाड़ेके दिनोंमें उसे अपने यहाँ बुलाया
और अत्यन्त मानके साथ भोजनादिसे उसका सत्कार किया। बादमें राजोचित विनोदोंको दिखाकर और
रातकी आरतीके अनन्तर अपने निकट ही, अपने ही समान पलँगपर सुलाकर, उसे अपनी निजकी शीतरक्षिका
( रजाई, लिहाफ ) ओढ़ने दी और चिरकाल तक उसके साथ प्रिय आलाप करता हुआ सुखपूर्वक सो गया ।
प्रातःकाल मांगल्य तूर्यनादसे जब राजाकी नींद खुली तो माघ पंडितने घर जानेके लिये विदा माँगी ।
राजाने विस्मित होकर अगले दिनके भोजन आच्छादन आदिके सुखकी बात पूँछी । उसने कहा-' उस अच्छे-
बुरे अन्नकी बात रहने दीजिये ।' और कहा कि शीतरक्षिका ( रजाई ) के भारसे तो मैं थक-सा गया ।
राजाने अपना खेद प्रकट करते हुए किसी प्रकार जानेकी अनुज्ञा दी । नगरके उपवन तक राजाने अनुगमन
किया । माघ पंडितने भी कहा कि कभी अपने आगमनसे मुझे भी धन्य करें । राजाकी अनुज्ञा लेकर
माघ पंडित अपने स्थानपर आया । उसके बाद, कितनेएक दिन बीतनेपर, भोज राजा उसकी विभव-
सामग्री देखनेकी इच्छासे श्रीमालनगरमें आया । माघ पंडितके द्वारा अगवानी आदिसे यथोचित सत्कृत
होकर वह अपनी सारी सेनाके साथ उसकी घुड़सालमें ठहरा । फिर वह अकेला माघ पंडितके महलमें गया ।
वहाँ उसने संचारक भूमि ( महलमें जानेकी पगडंडी ) को काचसे जड़ी देखी । स्नान करनेके बाद, देवताके
मन्दिरमें जानेपर, वहाँकी भूमिपर, जिसका गच मरकतका था, शैवाल सहित जलकी भ्रान्तिसे धोती और
चादरको समेटने लगा । तब पुरोहितने उसका स्वरूप बतलाया । फिर देवताकी पूजा की । बाद जब मंत्रावसर
समाप्त हुआ तो, भोजनके समय आई हुई रसोईका आस्वादन किया । ऐसे ऐसे व्यंजनों और फलोंको देखकर,
जो उस काल और उस देशमें नहीं होते थे, वह चित्तमें बड़ा विस्मित हुआ। संस्कार किये दूध और चावलकी
बनी रसोईका आकण्ठ उपभोग किया। भोजनके अन्तमें चन्द्रशालापर आरोहण करके, ऐसे ऐसे काव्यों, कथाओं,
इतिहासों और नाटकोंको देखा, जिन्हें इसके पहले कहीं देखा या सुना नहीं था। जाड़ेके दिनोंमें भी उसे
अकस्मात् उग्र ग्रीष्म ऋतु हो जानेकी भ्रान्ति हुई । उस समय सफेद स्वच्छ वस्त्र पहने, हाथमें तालके पंखे लिये
हुए अनुचर उसको हवा करने लगे । उसके वस्त्रोंमें सुन्दर चन्दन लेप दिया गया और उस रातको उसने
क्षणभरकी नांई बिता दी । सबेरे जब शंखके नादसे राजाकी नींद खुली तो माघ पंडितने शीतकालमें अक-
'स्मात् कैसे ग्रीष्म ऋतु उतर आई इसका स्वरूप समझाया । [इस प्रकार प्रत्येक क्षण विस्मयके साथ बिताता हुआ
४४ ] प्रबन्धचिन्तामणि [ प्रथम प्रकाश
कुछ दिनोंतक वहाँ रहकर ] स्वदेशगमनके लिये विदा माँगते हुए, अपने बनाये हुए नये भोजस्वामी
मन्दिरके पुण्यको उसे समर्पण कर मालव मण्डलको प्रस्थान किया।
माघ के जन्म दिनके समय उसके पिताने ज्योतिषीसे जन्मपत्र बनवाया था। ज्योतिषीने उसमें लिखा
या कि पहिले तो इसकी समृद्धि बराबर बढ़ती जायगी; पर बाद में (पिछली अवस्थामें) विभव नष्ट हो जायगा
और चरणोंमें कुछ सूजन आ कर मृत्यु प्राप्त करेगा। माघ के पिताने अपने विभव-सम्भारसे ग्रहदशाका
निवारण करना चाहा और यह सोचा कि मनुष्यकी आयु यदि सौ वर्ष की होगी, तो ३६ हज़ार दिन होंगे,
एक नया कोश (निधि) बनवा कर उसमें उतनी ही संख्याके मणियोंका हार बनाकर रख दिया। इससे सैकड़ों गुनी
अधिक और समृद्धि रख दी। लड़केका नाम माघ रखा और अपने कुलके उचित शिक्षा दे कर और यह समझ
कर कि मैंने अपना कर्तव्य पूरा कर दिया, वह मर गया। इसके बाद माघ कुबेरकी भाँति विशाल समृद्धि-
साम्राज्य पाकर, विद्वज्जनोंको उनकी इच्छाके अनुसार धन देने लगा। अपरिमित दानसे अर्थि-जनोंको कृतार्थ
करते हुए और भोगकी विविसे अपनेको अमानुषकी भाँति दिखाते हुए, उसने 'शिशुपालवध' नामक महा
काव्य बनाया। इस काव्यको देखकर विद्वानोंका मन चमत्कृत हो गया। अन्तमें पुण्य-क्षय होने पर जब उसका
धन क्षीण हो गया और विपत्तिका समय आ गया, तो उसने अपने देशमें रहना अयुक्त समझ कर, अपनी स्त्रीके साथ
मालव मण्डल में जा कर धारा नगरीमें वास किया। राजा भोज के पास पत्नीको यह कह कर भेजा कि
मेरा पुस्तक है उसे बंधक रख कर, राजाके पाससे कुछ भी द्रव्य ले आओ। स्वयं उसकी आशामें चिरकाल तक
बैठा रहा। उधर भोजने उसकी स्त्रीकी वह अवस्था देखकर संभ्रमके साथ उस पुस्तकको हाथमें लिया और
उसकी शलाका निकाल कर उसे खोला तो उसमें पहला ही यह काव्य देखा-
७९. कुमुदवनकी शोभा नष्ट हो गई और कमलोंका समूह शोभान्वित हो उठा। घूक हर्ष छोड़ रहा
है और चकवा प्रीतिमान् हो रहा है। सूर्यका उदय हो रहा है और चन्द्रमाका अस्त ! अहो,
दुर्भाग्यके खेलका परिणाम 'ही' विचित्र है !
काव्यका मर्म समझकर भोजने कहा कि सारे प्रबन्धकी तो बात ही क्या है, इसी एक काव्यके मूल्यके लिये
पृथ्वी भी दे दी जाय तो वह कम है। समयोचित और अनुच्छिष्ट इस 'ही' शब्दके पारितोषिकमें ही एक लाख
रुपये दे कर राजाने उसे विदा किया। यह भी जब वहाँसे चली तो याचकोने उसे माघकी पत्नी समझकर
माँगना शुरू किया। इस पर उसने वह सारा-का-सारा पारितोषिक उन याचकोंको दे दिया और स्वयं ज्यों की
त्यों घर लौटी। उसने अपने पतिको, जिसके चरनमें कुछ सूजन हो आई थी, उस वृत्तान्तको कह सुनाया।
इस पर माघने यह कह कर उसकी प्रशंसा की कि-'तुम्ही मेरी शरीर-धारिणी कीर्ति हो।' इसी समय एक
भिक्षुकको, जो उसके घरपर आया था, देखा। घरमें उस देने योग्य कुछ न देखकर दुःखके साथ वह बोला-
८०. धनतो है नहीं, और दुराशा भी मुझे छोड़ती नहीं। मैं बुरी तरहसे बहका हुआ हूँ और फिर
त्यागसे हाथ भी संकुचित नहीं होता। याचना करना लघुताका कारण है और आत्महत्यामें पाप
लगता है। अतः हे प्राणों! तुम स्वयं चले जाओ तो अच्छा है। मुझे इस प्रकार दुःख देनेसे
क्या होगा !।
८१. दारिद्रयकी आगका जो सन्ताप था वह तो सन्तोष रूपी जलसे शान्त हो गया; किन्तु दीन जनोंकी
आशा भंग करनेमे जो [ सन्ताप ] पैदा हुआ है, वह किससे शान्त होगा ?।
८२. अकालमें भिक्षा कहाँ ? बुरी अवस्थावालोंको ऋण क्योंकर मिले ! भू-स्वामियोंसे काम क्योंकर
प्रकरण ५६-५७ ] भोज और भीमका प्रबन्ध [ ४१
कराते [ । और दान भी कौन देना चाहे, जब कि ] बिना दान दिये यह सूर्य भी अस्त हो जाता
है । [ इस प्रकार ] हे गृहिणी ! कहाँ जायें, और क्या करें ? जीवन-विधि बड़ा गहन हो गया है ।
८३. भूखसे कातर बना हुआ यह पथिक मेरा घर पूछते पूछते कहींसे आया है, सो हे गृहिणी !
क्या कुछ है कि इस बुभुक्षितको खानेको दिया जाय ? '–पत्नीने वचनसे तो ' है ' यह कहालेकिन
फिर ' नहीं है ' यह बात बिना अक्षरोंके ही, चंचल नेत्रोंसे टपकते हुए बड़े बड़े अश्रुबिन्दुओंसे
सूचित की ।
८४. हे प्राणों ! जाओ, याचकके व्यर्थ लौट जानेपर, चले जाओ; बादको भी तो जाना है; ' फिर ऐसा
साथी कहाँ मिलेगा ? '
' फिर ऐसा साथी कहाँ मिलेगा ? '–इस वाक्यके बोलते ही माघ पण्डितकी मृत्यु हो गई ।
प्रातःकाल राजा भोजने उस वृत्तान्तको सुनकर, श्रीमालनगर में [ अनेक ] धनवान् सजातियोंके
रहते हुए भी, जो ऐसा पुरुष-रत्न क्षुधापीड़ित हो कर मर गया, इसलिये उसने उस जातिका नाम
' भिल्लमाल ' * ऐसा रख दिया ।
इस प्रकार श्री माघपण्डितका प्रबन्ध समाप्त हुआ ।
*
महाकवि धनपालका प्रबन्ध ।
५७) प्राचीन कालमें, समृद्धिसे विशाल ऐसी विशाला (उज्जयिनी) नामक नगरीमें, मध्य देशोत्पन्न सं का
श्य गोत्रीय सर्वदेव नामक ब्राह्मण वास करता था । जैनदर्शनके संसर्गसे उसका मिथ्यात्व प्रायः शान्त हो गया
था । उसके दो पुत्र थे जिनका नाम धनपाल और शोभन था । एक बार श्रीवर्द्धमान सूरि वहाँ आये ।
गुणानुरागी होनेके कारण सर्वदेव ने उन्हें अपने उपाश्रयमें निवास कराया और अपनी अनन्य भक्तिसे उन्हें सन्तुष्ट
किया । उन्हें ' सर्वज्ञ-पुत्रक ' जानकर गुम हो जानेवाली पूर्वजोंकी निधिके बारेमें पूँछा । उन्होंने वचन-
चातुरीसे पुत्रोंका आधा हिस्सा माँग लिया । संकेत बतानेपर निधि मिली । जब वह आधा भाग देने लगा तो
सूरिने दोनों पुत्रोंमेंसे आधा हिस्सा माँगा । धनपाल ने, जिसकी मति मिथ्यात्वके कारण अन्धी हो रही
थी, जैन मार्गकी निन्दा करते हुए नहीं कर दी । छोटे लड़के शोभन पर कृपा-परायण हो कर, पिताने
उसको देना नहीं चाहा । इसपर उसने अपनी प्रतिज्ञाके भंग होनेके पापको तीर्थमें जाकर प्रक्षालन करनेकी
इच्छासे, तीर्थोंके प्रति प्रस्थान करना निश्चित किया । पितृभक्त शोभन नामक छोटे पुत्रने, उसको उस आग्रहसे
रोककर, पिताकी प्रतिज्ञाका पालन करनेके लिये जैन दीक्षाव्रत ग्रहण कर स्वयं गुरुका अनुसरण किया ।
धनपाल समस्त विद्याओंका अध्ययन करके श्री भोज के प्रसाद-प्राप्त समस्त पंडित-मण्डलमें सुप्रतिष्ठ हुआ
और फिर अपने सहोदरकी ईर्ष्यासे बारह वर्षतक अपने देशमें जैन दर्शनियोंका आगमन निषिद्ध कराया ।
- श्रीमाल नगरका दूसरा नाम भिल्लमाल भी है । वर्तमानमें वह स्थान इसी नामसे प्रसिद्ध है । श्रीमाली जातिके
वैश्य और ब्राह्मण कुल इसी स्थानसे निकले हुए हैं । श्रीमालका दूसरा नाम भिल्लमाल ऐसा कब और क्यों पड़ा इसका अन्य
कोई दूसरा ऐतिहासिक उल्लेख अभी तक प्राप्त नहीं हुआ । महाकवि माघ की जन्मभूमि श्रीमाल थी यह बात कविके कथन ही
से सिद्ध होती है, लेकिन उसकी मृत्युका जो यह करुण वृत्तान्त मेरुतुङ्गाचार्यने लिखा है और उसी प्रसंग परसे भोज राजाने श्री
मालका नाम भिल्लमाल रख दिया यह जो उल्लेख किया है, इसकी सत्यताके लिये और कोई सुनिश्चित प्रमाण जबतक प्राप्त न
हो तबतक इस कथनको एक किंवदन्तीके रूपमें ही समझना चाहिए । माघ और भोजकी समकालीनता भी सन्दिग्ध है । और
कम से कम यह भोज प्रसिद्ध धारापति परमारवंशीय राजा भोज तो किसी तरह सम्भवित नहीं है । इसकी विशेष विवेचना
अगले ऐतिहासिक अवलोकनवाले खण्डमें की जायगी ।
४४ ] प्रबन्धचिन्तामणि [ प्रथम प्रकाश
कुछ दिनोंतक यहाँ रहकर ] स्वदेशगमनके लिये बिदा माँगते हुए, अपने बनाये हुए नये भोजस्वामी
मन्दिरके पुण्यको उसे समर्पण कर मालव मण्डलको प्रस्थान किया।
माघ के जन्म दिनके समय उसके पिताने ज्योतिषीसे जन्मपत्र बनवाया था। ज्योतिषीने उसमें लिखा
था कि पहले तो इसकी समृद्धि बराबर बढ़ती जायगी; पर बाद में (पिछली अवस्थामें) विभव नष्ट हो जायगा
और चरणोंमें कुछ सूजन आ कर मृत्यु प्राप्त करेगा। माघ के पिताने अपने विभव-सम्भारसे ग्रहदशाका
निवारण करना चाहा और यह सोचा कि मनुष्यकी आयु यदि सौ वर्ष की होगी, तो ३६ हजार दिन होंगे,
एक नया कोश (निधि) बनवा कर उसमें उतनी ही संख्याके मणियोंका हार बनाकर रख दिया। इससे सैकड़ों गुनी
अधिक और समृद्धि रख दी। लड़केका नाम माघ रखा और अपने कुलके उचित शिक्षा दे कर और यह समझ
कर कि मैंने अपना कर्तव्य पूरा कर दिया, वह मर गया। इसके बाद माघ कुबेरकी भाँति विशाल समृद्धि-
साम्राज्य पाकर, विह्वज्जनोंको उनकी इच्छाके अनुसार धन देने लगा। अपरिमित दानसे अर्थि-जनोंको कृतार्थ
करते हुए और भोगकी त्रिविसे अपनेको अमानुषकी भाँति दिखाते हुए, उसने 'शिशुपालवध' नामक महा
काव्य बनाया। इस काव्यको देखकर विद्वानोंका मन चमत्कृत हो गया। अन्तमें पुण्य-क्षय होने पर जब उसका
धन क्षीण हो गया और विपत्तिका समय आ गया, तो उसने अपने देशमें रहना अयुक्त समझ कर, अपनी स्त्रीके साथ
मालव मण्डल में जा कर धारा नगरीमें वास किया। राजा भोज के पास पत्नीको यह कह कर भेजा कि
मेरा पुस्तक है उसे बंधक रख कर, राजाके पाससे कुछ भी द्रव्य ले आओ। स्वय उसकी आशामें चिरकाल तक
बैठा रहा। उधर भोज ने उसकी स्त्रीकी वह अवस्था देखकर सभ्रमके साथ उस पुस्तकको हाथमें लिया और
उसकी शलाका निकाल कर उसे खोला तो उसमें पहला ही यह काव्य देखा-
७९. कुमुद्वनकी शोभा नष्ट हो गई और कमलोंका समूह शोभान्वित हो उठा। छूक हर्ष छोड़ रहा
है आर चकवा प्रीतिमान् हो रहा है। सूर्यका उदय हो रहा है और चन्द्रमाका अस्त! अहो,
दुर्भाग्यके खेलका परिणाम 'ही' विचित्र है!
काव्यका मर्म समझकर भोज ने कहा कि सारे ग्रंथकी तो बात ही क्या है, इसी एक काव्यके मूल्यके लिये
पृथ्वी भी दे दी जाय तो यह कम है। समयोचित और अनुच्छिष्ट इस 'ही' शब्दके पारितोषिकमें ही एक लाख
रुपये दे कर राजाने उसे बिदा किया। वह भी जब वहाँसे चली तो याचकोंने उसे माघ की पत्नी समझकर
माँगना शुरू किया। इस पर उसने वह सारा-का-सारा प रितोषिक उन याचकोंको दे दिया और व्यर्थ ज्यों की
त्यों घर लौटी। उसने अपने पतिको, जिसके चरनमें कुछ सूजन हो आई थी, उस वृत्तान्तको कह सुनाया।
इस पर माघने यह कह कर उसकी प्रशंसा की कि- 'तुम्ही मेरी शरीर-धारिणी कीर्ति हो।' इसी समय एक
भिक्षुकको, जो उसके घरपर आया था, देखा। घरमें उसे देने योग्य कुछ न देखकर दुःखके साथ यह बोला-
८०. धनतो है नहीं, और दुराशा भी मुझे छोड़ती नहीं। मैं बुरी तरहसे बहका हुआ हूँ और फिर
त्यागसे हाथ भी संकुचित नहीं होता। याचना करना लघुताका कारण है और आत्महत्यामें पाप
लगता है। अतः हे प्राणों ! तुम स्वय चले जाओ तो अच्छा है। मुझे इस प्रकार दुःख देनेसे
क्या होगा! ।
८१. दरिद्रतारूपी आगका जो सन्ताप था वह तो सन्तोष रूपी जलमे शान्त हो गया; किन्तु दीन जनोंकी
आशा भग करनेसे जो [सन्ताप] पैदा हुआ है, वह किससे शान्त होगा ?।
८२. अकालमें भिक्षा कहाँ? बुरी अवस्थावालोको ऋण क्योंकर मिले? भू स्वामियोंसे काम क्योंकर
प्रकरण ५७ ] महाकवि धनपालका प्रबन्ध [ ४७
८८. अहो ! मैंने इसके पहले मोहवश, कुछ ही नगरोंके स्वामीका, जो शरीर दे देनेपर भी
दुर्ग्रहणीय है, मति-दान करते हुए अनुसरण किया । इस समय ऐसे त्रिभुवनपति प्रभु मिल गये हैं
जो बुद्धि-ही-से आराध्य हैं और जो अपना पद तक दे देनेवाले हैं । इससे उन प्राचीन दिनोंका बीत
जाना खेदकारक हो रहा है ।
८९. हे जिन ! जबतक मैंने तुम्हारा धर्म नहीं जाना था तबतक समझता था कि धर्म सब कहीं है ।
जिस प्रकार धतूरेके विषसे आतुर रोगीको सब कुछ सोना ( पीतवर्ण ) ही सोना दिखाई देता है; और
कोई सफेद वस्तु, नजर नहीं आती ।
[ ५५ ] घासके जैसे निःसार ऐसे उन करोड़ों श्लोकोंको पढ़ लेनेसे भी क्या होता है—यदि जिससे
' दूसरेको पीडा न पहुँचाना ' इतना भी ज्ञान प्राप्त नहीं होता ।
[ ५६ ] देशका मालिक [ तुष्ट होनेसे ] एक गाँव देता है, गाँवका मालिक एक खेत देता है, खेतका
मालिक शिम्बिका ( सेम, छीमी ) देता है परन्तु सार्थ ( सर्वज्ञ जिन ) तो सन्तुष्ट होकर अपनी सारी
सम्पद दे देते हैं !
इत्यादि वाक्योंको पढ़ा करता । एक दिन राजाने धनपालको शिकार खेलनेके लिये साथ ले लिया ।
राजाने जब बाणसे मृगको विद्ध किया, तो उसके वर्णनके लिये धनपालके मुँहकी ओर देखा ।
धनपाल बोला—
९०. इस तरहका पौरुष रसातलको चला जाय । यह कुनीति है कि निर्दोष और शरणागतको मारा
जाय । बलवान् भी जब दुर्बलको मारते हैं तो यह बड़े दुःखकी बात है । जगत् अराजक हो गया ।
उसकी इस निर्भर्त्सनासे क्रुद्ध राजाके यह पूछने पर कि यह क्या बात है—
९१. प्राणान्तके समय यदि तृण भक्षण करना चाहे तो वैरी भी छोड़ दिया जाता है, तो फिर ये
पशु तो सदा तृण ही खाकर जीते रहते हैं, ये क्यों मारे जाते हैं ?
राजाको इस कथनसे अद्भुत कृपा उत्पन्न हुई । उसने धनुष्य बाणके भंगको स्वीकार करके आजीवनके
लिये मृगयाका त्याग किया । बादमें नगरकी ओर जब लोट रहा था, तो यज्ञमण्डपके यज्ञस्तंभमें बँधे हुए
छाग ( बकरे) की दीन वानी सुनकर पूँछा कि यह पशु क्या कह रहा है ? इस पर धनपालने कहा कि सुनिये—
९२. हे साधो, मैं स्वर्गफलको भोगनेके लिये तृषित नहीं हूँ, मैंने [ इसके लिये ] तुमसे प्रार्थना भी
नहीं की । मैं तो केवल तृण खाकर ही सन्तुष्ट हूँ । तुम्हारा यह कार्य उचित नहीं । यदि तुम्हारे
द्वारा यज्ञमें मारे हुए प्राणी निश्चय ही स्वर्गगामी होते हैं तो फिर अपने माता-पिता और पुत्रों तथा
बाँधवोंका यज्ञ ( वलिदान ) क्यों नहीं करते ?
उसके इस वाक्यके अनन्तर जब राजाने कहा कि इसका क्या मतलब है? तो फिर बोला कि—
९३. यूप ( यज्ञ ) करके, पशु मारकर और खूनका कीचड़ बना कर यदि स्वर्गमें जाया जाता है तो फिर
नरकमें कैसे जाया जाता है ?
९४. सनातन यज्ञ तो उसका नाम है, जिसमें सत्य तो यूप हो, तप ही अग्नि हो और अपने सारे
कर्म समिध् ( काष्ठ ) हो, अहिंसाकी [ उसमें ] आहुति दी जाय ।
इस प्रकार, शुक संवादमें कहे हुए वचनोंको उसने राजाके सामने पढ़ा और [ ब्राह्मणोंको ] जो हिंसा-
शास्त्रके उपदेशक और हिंस्र-प्रकृति हैं, ब्रह्मरूपमें राक्षस बताते हुए, राजाको अर्हद्धर्म ( जैन धर्म ) की ओर
प्रवृत्त किया ।
४६ ] प्रबन्धचिन्तामणि [ द्वितीय प्रकाश
उस देशके उपासकोंद्वारा अत्यन्त अभ्यर्थनाके साथ गुरुको बुलानेपर, सकल शास्त्ररूपी समुद्रके पारको प्राप्त कर
लेनेवाला वह शोभन नामक तपोधन गुरुसे अनुमति लेकर वहाँ आया । धारा में प्रवेश करते ही, पण्डित
धनपालने, जो उस समय राजपाटिका में [ राजाके साथ ] भ्रमण में जा रहा था, उसे न पहचान कर,
उपहासके साथ कहा-'गर्दभदन्त (गधेके समान दाँतवाले) भदन्त, तुमको नमस्कार !' इसपर उसने-
'कपिके वृषणके समान मुँहवाले मित्र, तुम्हें सुख हो !' [ इस प्रकार प्रत्युत्तर दिया । तब चमत्कृत होकर
धनपालने सोचा कि मैंने तो दिल्लगीमें भी 'नमस्ते' कहा और इसने तो 'मित्र तुम्हें सुख हो' ] इतना ही
कहकर अपनी वचन-चातुरीसे मुझे जीत लिया । फिर धनपालके यह कहने पर कि 'आप किसके अतिथि
हैं ?' शोभनमुनि ने कहा-'हमें आपके ही अतिथि समझिये।' उसकी यह बात सुनकर एक विद्यार्थीके
साथ उन्हें अपने स्थानपर भेजकर वहीं ठहराया । स्वयं घर आकर धनपाल ने प्रिय आलापोंके साथ उसे
सपरिकर भोजनके लिये निमंत्रित किया । पर वे तपोधन तो प्रासुक ( अनुद्दिष्ट ) आहार भोजी थे इसलिये
उन्होंने निषेध किया । आग्रहपूर्वक जब उसने दोषका हेतु पूँछा तो कहा-
८५. मुनि म्लेच्छ कुलसे भी मधुकरी वृत्तिके साथ भिक्षा ग्रहण करे परन्तु बृहस्पतिके समान श्रेष्ठ कुलीन
एक ही गृहस्थके यहाँ भोजन न करे ।
इसी प्रकार जैन धर्मके दशवैकालिक सूत्रमें भी कथन है-
८६. जो अनिश्रित हो कर मधुकरके समान नाना स्थानोंमेंसे अपना भिक्षापिण्ड प्राप्त करते हैं उन्हीं
बुद्ध और दान्त भिक्षुओंको साधु कहते हैं ।
इस प्रकार, अपने धर्मसे और परधर्मसे भी, निषिद्ध ऐसे कल्पित आहारको त्याग करके हम लोग शुद्ध
भोजन ग्रहण करते हैं । धनपाल उनके चरित्रसे चकित होकर चुप हो रहा और उठकर स्नान करने चला
गया । स्नानके आरम्भमें ही अचानक भिक्षाचर्याके लिये आये हुए उन दो मुनियोंको देखा। उन्हें एक ब्राह्मणी,
रसोई तैयार न होनेके कारण, दही देने लगी । मुनियोंने पूँछा कि दही कितने दिनोंका है ? तो धनपाल ने
मजाक करते हुए कहा 'क्या कोई उसमें कीड़े पड़ गये हैं ?' ब्राह्मणीने जवाब दिया कि इसे दो दिन बीत चुके
हैं । यह सुनकर दोनों मुनि बोले कि-हाँ कीड़े पड़ गये हैं ! यह सुनकर धनपाल उसे देखनेके लिये स्नानसे
उठकर वहाँ आया । पात्रमें रखे हुए दहीके पास ही एक महावर (लाख) का ढेला रखा जिस पर उन जीवों ने चढ़कर
उसे दहीके समान ही सफेद कर दिया । धनपाल ने यह देखा और सोचा कि जैन धर्ममें जीव रक्षाकी ही
प्रधानता है; और उसमें भी जीवोत्पत्ति विषयक ज्ञानका वैदग्ध्य [ विशिष्ट प्रकारका ] है । जैसा कि कहा है-
८७. मूंग और उड़द इत्यादि द्विदल धान्य जो कच्चे गोरसमें पड़े तो उसमें त्रस (द्विरिन्द्रियादि)
जीवोंकी उत्पत्ति होती है; और तीन दिनके बाद दहीमें भी जीवोंकी उत्पत्ति हो जाया करती है ।
यह बात एक जैन शास्त्रमें ही कही गई है । ऐसा निश्चय करके शोभनमुनिके शुभोपदेशसे सम्यक्
विश्वास पूर्वक उसने सम्यक्त्व (जैन धर्म) ग्रहण किया । [ इतने दिनोंके बाद अपने मिथ्यात्वको समझते हुए,
सो मनसे ही पूँछा कि मेरे भाईको भी कहीं देखा है? शोभन ने वय, अवस्था और गुण आदिमें अपने-ही-से
उसकी तुलना की । इसपर उसने अनुमानसे समझा कि यही मेरा भाई है । यह निश्चय करके आनन्दाश्रु त्याग
करते हुए उसे आलिंगन करके अपने लड़केको भेज कर उसके गुरुको भी बुलवाया।] स्वभावतः ही धनपाल
बड़ा बुद्धिमान था अतएव कर्म्मप्रकृति प्रभृति जैन-विचार-ग्रंथोंमें भी बड़ा प्रवीण हुआ । प्रति दिन सबेरे
जिन पूजाके अन्तमें-
प्रकरण ५७] महाकवि धनपालका प्रबन्ध [४७
८८. अहो ! मैंने इसके पहले मोहवश, कुछ ही नगरोंके स्वामीका, जो शरीर दे देनेपर भी
दुर्ग्रहणीय है, मति-दान करते हुए अनुसरण किया। इस समय ऐसे त्रिभुवनपति प्रभु मिल गये हैं
जो बुद्धि-ही-से आराध्य हैं और जो अपना पद तक दे देनेवाले हैं। इससे उन प्राचीन दिनोंका बीत
जाना खेदकारक हो रहा है।
८९. हे जिन ! जबतक मैंने तुम्हारा धर्म नहीं जाना था तबतक समझता था कि धर्म सब कहीं है।
जिस प्रकार धतूरेके विषसे आतुर रोगीको सब कुछ सोना (पीतवर्ण) ही सोना दिखाई देता है; और
कोई सफेद वस्तु नजर नहीं आती।
[ ५५ ] घासके जैसे निःसार ऐसे उन करोड़ों श्लोकोंको पढ़ लेनेसे भी क्या होता है—यदि जिससे
‘दूसरेको पीड़ा न पहुँचाना’ इतना भी ज्ञान प्राप्त नहीं होता।
[ ५६ ] देशका मालिक [तुष्ट होनेसे] एक गाँव देता है, गाँवका मालिक एक खेत देता है, खेतका
मालिक शिम्बिका (सेम, छीमी) देता है परन्तु सार्व (सर्वज्ञ जिन) तो सन्तुष्ट होकर अपनी सारी
सम्पद दे देते हैं !
इत्यादि वाक्योंको पढ़ा करता। एक दिन राजाने धनपालको शिकार खेलनेके लिये साथ ले लिया।
राजाने जब बाणसे मृगको विद्ध किया, तो उसके वर्णनके लिये धनपालके मुँहकी ओर देखा।
धनपाल बोला-
९०. इस तरहका पौरुष रसातलको चला जाय। यह कुनीति है कि निर्दोष और शरणागतको मारा
जाय। बलवान् भी जब दुर्बलको मारते हैं तो यह बड़े दुःखकी बात है। जगत् अराजक हो गया।
उसकी इस निर्भर्त्सनासे क्रुद्ध राजाके यह पूछने पर कि यह क्या बात है-
९१. प्राणान्तके समय यदि तृण भक्षण करना चाहे तो वैरी भी छोड़ दिया जाता है, तो फिर यें
पशु तो सदा तृण ही खाकर जीते रहते हैं, ये क्यों मारे जाते हैं?
राजाको इस कथनसे अद्भुत कृपा उत्पन्न हुई। उसने धनुष्य बाणके भंगको स्वीकार करके आजीवनके
लिये मृगयाका त्याग किया। बादमें नगरकी ओर जब लौट रहा था, तो यज्ञमण्डपके यज्ञस्तंभमें बँधे हुए
छाग (बकरे) की दीन वाणी सुनकर पूँछा कि यह पशु क्या कह रहा है? इस पर धनपालने कहा कि सुनिये-
९२. हे साधो, मैं स्वर्गफलको भोगनेके लिये तृषित नहीं हूँ, मैंने [इसके लिये] तुमसे प्रार्थना भी
नहीं की। मैं तो केवल तृण खाकर ही सन्तुष्ट हूँ। तुम्हारा यह कार्य उचित नहीं। यदि तुम्हारे
द्वारा यज्ञमें मारे हुए प्राणी निश्चय ही स्वर्गगामी होते हैं तो फिर अपने माता-पिता और पुत्रों तथा
बाँधवोंका यज्ञ (बलिदान) क्यों नहीं करते !
उसके इस वाक्यके अनन्तर जब राजाने कहा कि इसका क्या मतलब है? तो फिर बोला कि-
९३. यूप (यज्ञ) करके, पशु मारकर और खूनका कीचड़ बना कर यदि स्वर्गमें जाया जाता है तो फिर
नरकमें कैसे जाया जाता है ?
९४. सनातन यज्ञ तो उसका नाम है, जिसमें सत्य तो यूप हो, तप ही अग्नि हो और अपने सारे
कर्म समिध् (काष्ठ) हो, अहिंसाकी [उसमें] आहुति दी जाय।
इस प्रकार, शुक संवादमें कहे हुए वचनोंको उसने राजाके सामने पढ़ा और [ब्राह्मणोंको] जो हिंसा-
शास्त्रके उपदेशक और हिंस्र-प्रकृति हैं, बहुरूपमें राक्षस बताते हुए, राजाको आर्हद्धर्म (जैन धर्म) की ओर
प्रवृत्त किया।
४८ ] प्रबन्धचिन्तामणि [ प्रथम प्रकाश
[ इस जगह Pb आदर्शमें तो मूल ही में, पर B आदर्शके हाशियेपर निम्नलिखित कथोपकथन
अधिक लिखा हुआ पाया जाता है।]
इसके बाद जब राजा गौकी वन्दना करने लगा तो धनपाल भैंसको नमस्कार करता हुआ बोला-
[ ५७ ] अपवित्र वस्तु खाती है, विवेक-शून्य है, आसक्त होकर अपने पुत्रसे ही रति करती है,
खुराप्रसे और सींगसे जीवोंको मारती है। हे राजन् ! ऐसी यह गौ किस गुणसे वन्दनीय है ?।
[ ५८ ] दूध देनेके सामर्थ्यसे अगर यह गौ वन्दनीय है तो, भैंस क्यों नहीं है ? भैंससे इसमें थोड़ी
भी तो विशेषता नहीं दिखाई देती ।
[ ५९ ] अमेध्य भक्षण करनेवाली गायोंका स्पर्श पापको हरनेवाला है, चेतनाहीन वृक्ष वन्दनीय है,
छागका वध करनेसे स्वर्ग मिलता है, ब्राह्मणोंको खिलाया हुआ अन्न पितरोंको स्वर्गमें पहुँचता है,
छल-कपटपरायण देवता आप्त पुरुष हैं, अग्निमें हवन किया हुआ हवि देवताओंको प्रीत करता
है-इस प्रकारकी स्पष्ट दोषयुक्त और व्यर्थ श्रुतियोंके वचनोंकी लीलाको कौन ठीक मान सकता है !
[ ६० ] जिनका [ प्राणी- ] वध तो धर्म है, जल तीर्थ है, गौ वन्दनीय है, गृहस्थ गुरु है, अग्नि देवता
है, और ब्राह्मण पात्र है उनके साथ परिचय रखनेसे फल ही क्या हो !
एक बार, जिनपूजा करनेमें, दूसरोंसे पंडित ( धनपाल ) की विशेष एकाग्रता जानकर राजाने फूलकी
डाली देते हुए कहा कि देवोंकी पूजा करो। धनपाल शिव आदि देवताओंके स्थानों पर यों ही घूमकर जिन देवकी
पूजा करके चला आया । चार पुरुषके मुँहसे राजाने सारा वृत्तान्त जानकर पूजाका हाल पूँछा। उसने कहा कि
महाराज ! जहाँ [ पूजाका उचित ] अवसर हुआ वहाँ पूजा की । राजाने पूछा-' अवसर कहाँ नहीं हुआ ?'
पण्डित बोला-विष्णुके पास एकान्त कलत्र होनेसे; रुद्रके आधे शरीरमें पार्वती रहनेसे; ब्रह्माके यहाँ इस भयसे
कि कहीं ध्यानभंग होनेके कारण शाप न दे दे; विनायकके यहाँ इसलिये कि ये थालीभर मोदक खा रहे थे,
उनका स्पर्श मैंने रोका; चण्डिकाके यहाँ उनके शूलाग्रसे संत्रस्त महिष मेरे सामने न आ जाय इस भयसे,
हनुमानके यहाँ उन्हें कोपपूर्ण देखकर यह भय हुआ कि कहीं चपेटादान न कर बैठें; इस तरह, [ इन देवोंके
स्थानमें ] कहीं भी अवसर नहीं हुआ । और भी [ शिवलिङ्गको देखकर तो मनमें विचार आया कि- ]
[ ६१ ] इसके शिरके विना पुष्पमाला व्यर्थ है, और जब ललाट ही नहीं है तो पट्ट बन्ध कैसे
हो ? जिसके कान और आँख नहीं है उसके लिये गीत और नृत्य कैसे ? और जिसके पैर ही नहीं
उसको मेरा प्रणाम कैसा ?
इत्यादि बातें कहने पर, राजाने कहा-'फिर अवसर हुआ भी कहीं ?' तब पंडितने 'प्रशमरसनिमग्नं' और 'नेत्रे
सारसुधा ' इत्यादि ( वचन बोलकर ) और इसी प्रकारकी बातें कह कर अन्तमें कहा कि [ इस प्रकार ] चैत्यालय
में सदा अवसर रहता है, अतः वहीं मैने पूजा की ।
. [ ६२ ] इसके बाद-एक दूसरे दिन, शिवमन्दिरके द्वारदेशमें भृंगीगणको देख कर राजाने धनपाल
से पूछा कि-यह दुर्बल क्यों हैं ? वह बोला- [ भृंगी शिवकी निम्न प्रकारकी विचित्र ] लीलायें देखकर सोचता
रहता है कि-
[ ६३ ] यदि यह ( शिव ) दिगंबर है तो इसकी धनुषसे क्या काम है? अगर धनुष्य है ही तो भस्म
क्यों ! यदि भस्म भी हुआ तो स्त्री क्यों ? और यदि स्त्री है तो फिर कामसे द्वेष क्यों है ?-इस
प्रकारकी अपने स्वामीकी परस्पर विरुद्ध चेष्टाओंको देखकर [ यह भृंगी हैरान हो रहा है और
इसी लिये ] शिराओंसे गाढ बँधे हुए अस्थि-शेष शरीरको धारण कर रहा है।
प्रकरण ५८-५९ ] महाकवि धनपालका प्रबन्ध [ ४९
५८) इसके अनन्तर एक बार राजा सरस्वतीकण्ठाभरण नामक प्रासादमें जा रहा था । उस समय
धनपाल पण्डितने, जो सदा सर्वज्ञ-शासन (जैन धर्म) की प्रशंसा किया करता था, पूछा कि 'सर्वज्ञ तो
कभी एक बार हुए थे। पर अब भी उस धर्ममें क्या कुछ ज्ञानातिशय है ?' उसके ऐसा कहनेपर [धनपाल
बोला-] 'अर्हत् विरचित (उपदिष्ट) अर्हन्त श्रीचूडामणि नामक ग्रन्थमें त्रैलोक्यके तीनों कालके वस्तु
विषयके स्वरूपका परिज्ञान आज भी वर्त्तमान है।' उसके ऐसा कहनेपर राजाने पूछा कि 'हम लोग अभी इस
तीन दरवाजेके मण्डपमें स्थित हैं। किस रास्ते होकर यहाँसे बाहर निकलेंगे ?' राजाको इस प्रकार शास्त्रपर
कल्क लगानेको उद्यत होते देखकर उसने 'बुद्धि यह तेरहवीं मात्रा है' इस लोकोक्तिको सत्य करते हुए, भोजपत्रपर
राजाके प्रश्नका निर्णय लिख कर उसे मिट्टीके गोलेमें रख दिया, और उसे ताम्बूलग्राहकको सौंपकर राजासे
बोला कि 'महाराज, पधारिये !' राजाने अपनेको उसकी बुद्धिके जालमें फँसा समझा और सोचा कि इसने
तीनमेंसे ही किसीका निर्णय किया होगा, इसलिये बढ़इयोंको बुलाकर मण्डपकी पद्मशिलाको हटवा दिया और
उसी मार्गसे बाहर निकला। फिर उस मिट्टीके गोलेको तोड़कर उसके लिखित अक्षरोंमें, निकलनेके लिये उसी
मार्गके निर्णयको पढ़कर कौतुकसे चित्तमें चकित होता हुआ जैन धर्मकी ही प्रशंसा की।
(यहाँ D पुस्तकमें निम्नलिखित पद्य अधिक पाये जाते हैं-)
[ ६४ ] जो चीज विष्णु दो आँखोंसे, शिव तीनसे, ब्रह्मा आठसे, कार्तिकेय बारहसे, रावण बीससे,
इन्द्र दस सौसे और जनता असंख्य नेत्रोंसे भी नहीं देख पाती, बुद्धिमान् पुरुष उसीको एक प्रज्ञा-
(बुद्धि) रूपी नेत्रसे स्पष्ट देख लेता है।
( Pb आदर्शमें यहाँ निम्नलिखित एक और कथन अधिक पाया जाता है-)
एक बार जलाशय (तालाब) के अच्छे-बुरे-पनके विषयमें पूछ हुई [सो पण्डितने कहा-]
[ ६५ ] सचमुच ही तालाबोंमेंका ठंडा और चन्द्रमाकी किरणोंसे श्वेत बना हुआ जल खूब पी करके
प्राणियोंकी सारी तृष्णा नष्ट हो जाती है और वे मनमें प्रमुदित होते हैं, परन्तु जब सूर्यकी
किरणे उसे सोख लेती है तो [उसमेंके] अनन्त प्राणी विनष्ट हो जाते हैं और इसीलिये मुनि-
लोग कुआँ बावड़ी आदिके बनानेके विषयमें उदासीन भाव प्रकट करते हैं।
एक बार राजा अपने बनवाये हुए बहुत बड़े नये तालाबके पास गया। यहाँ पण्डितसे पूछा कि यह
धर्मस्थान कैसा है। धनपाल बोला-
[ ६६ ] तड़ागके बहाने यह आपकी [एक] दानशाला है जिसमें सदा ही मछली आदि जलजन्तु
अच्छी तरहकी रसोई है और जिस स्थानपर बक, सारस, चक्रवाक आदि [मत्स्य भोजी दान ग्रहण
करनेवाले] पात्र हैं, वहाँ कितना पुण्य होता होगा सो तो हम नहीं जान सकते।
इससे राजा [मनमें] कुपित हुआ। नगरको आते समय वाटिकाके साथ एक बुढ़ियाको वृद्धावस्थासे
सिर धुनती हुई देखकर राजाने पूछा-'यह सिर क्यों धुन रही है !' तब धनपाल बोला-
[ ६७] क्या यह नदी है, या विष्णु ? क्या कामदेव है या चन्द्रमा ? क्या विधाता है अथवा
विद्याधर है ? क्या इन्द्र ह; कि नल है, कि कुवेर है ? ना, ना, यह नहीं है, यह भी नहीं है,
यह भी नहीं है, विल्कुल यह नहीं, यह भी नहीं, वह भी नहीं, और वह भी नहीं, यह तो क्रीड़ा
करनेमें प्रवृत्त वैसा ही सखे ! स्वयं राजा भोजदेव है।
[ इसके सिरके धुननेका यह मतलब है-ऐसा कह कर] इस श्लोकसे रुष्ट राजा को सन्तुष्ट किया।
१३-१४
५० ] प्रबन्धचिन्तामणि [ द्वितीय प्रकाश
५९) इसके बाद, धनपालने ऋषभपञ्चाशिका स्तुतिकी रचना की। सरस्वतीकण्ठाभरण
प्रासाद में उसकी बनाई प्रशस्ति-पट्टिकामें किसी समय राजाने [ यह काव्य पढ़ा-]
९५. इसने [ अपने जन्ममें ] पृथ्वीका उद्धार किया, शत्रुके वक्षःस्थलको विदारण किया, और बलिकी
राजलक्ष्मी ( विष्णुके पक्षमें बलि नामक राजा और भोजके पक्षमें बलशाली राजा ) को आत्मसात्
किया । इस प्रकार इस युवकने ये काम एक ही जन्ममें किये जो पुराण पुरुष ( विष्णु ) ने तीन
जन्ममें किये थे ।
इस काव्यको पढ़कर उसके पारितोषिकमें एक सोनेका कलश दिया । उस प्रासादसे निकलकर उसीके
द्वारके खंभोंपर मूर्तिमान् मदनको, जो रतिके साथ हस्तताल ( ताली ) दे रहा था, देखकर राजाने धनपाल से
उनके हंसनेका कारण पूछा । इस पर पंडित बोला-
९६. यह है त्रिभुवनमें संयमके लिये विख्यात ऐसा वह शिव, जो इस समय विरहकातर हो कर अपने
शरीरमें ही स्त्रीको धारण किये है। इसीने हमें एक समय जीता था ! इस प्रकार प्रियाके हाथसे
अपने हाथको बजाता हुआ और हंसता हुआ यह मदनदेव जयवान् हो रहा है।
[ यहाँ D पुस्तकमें "अत्रांशे शिवभवने ० " "दिग्बाण यदि तस्मिंश्च धनुरा०" "अमेव्यमक्षाति० "
"पय प्रदान० " "अख्युतम्भाद्रे" इत्यादि पद्य पाये जाते हैं। पर चूंकि वे यहाँ अप्रासंगिक हैं और Pb आदर्शके अनुसार
इसके पहले ही उल्लिखित हो चुके हैं इसलिये फिर उद्धृत नहीं किये गये । ]
९७. पाणिग्रहणके समय शिवका जो भूतिभूषित शरीर पुलकित हुआ उसकी जय हो-जिस
शरीरमें [ पुलकके बहाने ] भस्मावशेष मदन मानों फिर अंकुरित हुआ है।
इस प्रकारके तथा इसीतरहके, अन्य अन्य प्रसिद्ध और सिद्ध सारस्वतकवियोंके काव्योंको कह कह कर
जब धनपाल राजाको रञ्जित कर रहा था, उसी समय द्वारपालने एक व्यापारीका आना निवेदन किया।
सभामें प्रवेश करके, राजाको नमस्कार कर, उसने मोमकी बनी पट्टीपर लिखे हुए कुछ काव्योंको दिखाया।
राजाके उसके प्रतिष्ठानके बारेमें पूछने पर वह बोला कि-' मेरा जहाज अकस्मात् समुद्रमें एक जगह रुक
गया, जहाजिन्होंने खोज करके देखा तो वहाँ एक शिवमन्दिर मिला, जिसके ऊपर चारों ओर जल लहरा
रहा है पर भीतर पानीका अभाव है। उन्होंने उसकी एक दीवार पर अक्षर देखकर उसे जाननेकी इच्छासे
उसपर मोमकी पट्टी लगा दी। उसी के उभड़े हुए अक्षर इस पट्टीपर हैं। राजाने जब यह सुना तो,
उसपर [ वैसी ही ] मिट्टीकी पट्टी लगवा कर, उसपर पड़े हुए उलटे अक्षरोंको पंडितोंसे पढ़वाया ।
९८. 'लड़कपनसे ही, मेरी प्राप्तिके कारण ही यह उन्नतिकी परा कोटिको प्राप्त हुआ है, और इस
समय मेरी ही बातसे यह रागका लड़का लजाता है।' इस प्रकार खिन्न होकर अपने
पुत्ररूपी यशसे अवलंब दिया जाकर वृद्ध 'गुणोंका समूह' समुद्रके तीरपर तपस्याके
लिये चला गया ।
९९. जो धनुर्धारी प्रतिद्वंद्वियोंकी स्त्रियोंको वैधव्य व्रत देनेवाला है ऐसे उस राजाके दिग्विजयके लिये
उद्यत होनेपर और क्रुद्ध होकर प्रति दिशामें उसके भ्रमण करनेपर, और स्त्रियोंकी तो बात ही
क्या स्वयं रति भी मारे डरके अपने पतिको, मदान्ध भ्रमरियोंका नील चोला धारण किये हुए
पुष्पधनुषको [भी हाथमें] नहीं लेने देती।
१००. चिन्तारूपी गभीर कूपपर महाशोकरूपी चलती अरघट्ट (घड़ारी) परसे निःश्वास फेंककर
अपने बड़ी बड़ी आँखरूपी घटीयंत्रसे छोड़े हुए अश्रुधारको और नासिकाकी वंशप्रणालीके
विषम पथसे गिरते हुए इस बाष्प रूपी पानीयको, हे महाराज, तुम्हारे शत्रुओंकी स्त्रियाँ अविराम
भारसे स्तनरूपी दो कलशोंमें ढोया करती हैं।
इस प्रकार काव्योंके पूरा पढ़े जानेपर [ आगे यह आधा 'काव्य मिला-]
१०१. 'अहो ! पूर्वकृत कर्मोंका परिणाम प्राणियोंके लिये सचमुच ही बड़ा विषम होता है।'
इस काव्यका उत्तरार्द्ध ठिट्ठप प्रभृति सैकड़ों पंडितोंके पूरा करनेपर भी ठीक नहीं जमता था तब
राजाने धनपाल पंडितसे पूछा [ तो उसने अपनी प्रतिभाके बलसे यह यथार्थ पाठ कहा ]-"हरेहरे ! जो
सिर शिवके सिर पर विराज रहे थे वे गधोंके पैरोंसे लुण्ठित हो रहे हैं।" 'यही उत्तरार्द्ध ठीक जमता है' इस
प्रकार जब राजाने कहा तो पंडित बोला-'यदि पदबन्ध और अर्थ दोनों ही, श्रीरामेश्वर प्रासादकी दीवालपर
ये इसीप्रकार न हों तो, इसके बाद आजीवन मैं कविताका त्याग कर दू।' उसकी इस प्रतिज्ञाके सुननेके
साथ ही राजाने जहाजके यात्रियोंको उसी समुद्रमें गोता लगवाकर मंदिरको खोज निकालनेकी आज्ञा दी।
६ महीने बाद उसे ढूंढ निकाला और उसपर फिरसे मोमकी पट्टी लगा कर [ लेखकी नकल ली ] उसमें
यही उत्तरार्द्ध निकला। यह देखकर [ राजाने ] उसको उपयुक्त पारितोषिक दिया। इस प्रकार, इस खण्ड
प्रशस्ति के अनेक काव्य परंपराके अनुसार समझने चाहिये।
६०) एक बार राजाने सेवामें ढील-ढाल होनेका कारण पंडितसे पूछा । उसने अपनी तिलक
मंजरी [ नामक कथा ] की रचनाको व्यग्रताका कारण बताया। शीतकालकी एक रात्रिके अन्तिम प्रहरमें
राजाको कोई विनोद नहीं मिल रहा था। उसने पंडितको बुला कर, स्वयं उसकी उस तिलक मंजरी कथाको
पढ़ने लगा और पंडित उसकी व्याख्या करने लगा। राजाने उसके 'रस' के गिरनेके भयसे उसके नीचे
सोनेकी थालीमें कचोलक (कटोरा) रखा और इस तरह [ बड़े चावके साथ ] समाप्त किया। उस अद्भुत
काव्यसे चित्तमें चमत्कृत होकर राजाने कहा कि-'यदि मुझे इस काव्यका कथानायक बनाओ और विनीता
के स्थानमें अवन्ती का नाम रखो, तथा शक्रावतारतीर्थकी जगह महाकाल को उल्लिखित करो तो जो माँगो
वही मैं तुम्हें दूंगा।' राजाके ऐसा कहने पर उसने कहा कि-जिस प्रकार खद्योत और सूर्यमें, सरसों और
सुमेरुमें, काच और काञ्चनमें, तथा धतूरे और कल्पवृक्षमें महान् अन्तर है उसी तरह तुममें और उनमें है।
ऐसा कहता हुआ-
१०२. हे दो मुँहवाली, निरक्षर, लोहेकी तराजू ! तुझे क्या कहूँ ² जो तू गुनाके साथ सोनेको तोलते
समय पाताल नहीं चली गई।
इस प्रकार जब पंडित झिड़क रहा था, तो राजाने उस मूल प्रतिको जलती आगमें इन्धन बना दिया।
इस प्रकार वह द्विधा निर्वेद * होकर और द्विधा अवाङ्मुख × होकर अपने मकानके पिछले भागमें एक पुराने
मञ्चपर जा बैठा और नीसासें डालता हुआ लगा होकर सो गया। बालपंडिता ऐसी उसकी लड़कीने उस
भक्तिपूर्वक उठाकर स्नान-पान-भोजन आदि कराके, तिलकमञ्जरीकी प्रथम प्रतिके लेखनका स्मरण कर करके
आधा ग्रंथ लिखा दिया। फिर पण्डितने उत्तरार्द्ध नया लिखकर ग्रंथ संपूर्ण किया।
[ यहाँ पर इसके आगे Pb आदर्शमें निम्न लिखित कथन पाया जाता है-]
पंडितने ग्रंथ संपूर्ण किया और फिर रुष्ट होकर नानागाँव में चला गया। एक बार भोजकी सभामें धर्म
नामक वादी आया। उस समय वहाँ ऐसा कोई विद्वान् नहीं था, जो उसके साथ प्रतिवाद करनेका साहस करता।
* द्विधा निर्वेदका मतलव दोनों तरहसे निर्वेद हुआ। १ निर्वेद=खिन्न हुआ २ निर्वेद=ज्ञानशून्य हुआ।
× द्विधा अवाङ्मुख १=नीचा मुखवाला, २=वाणीशून्य मुखवाला।
५२ ] प्रबन्धचिन्तामणि [ द्वितीय प्रकाश
तब भोजने बहुत मानके साथ धनपाल को बुलाया। उसे आते सुन कर ही वह वादी भाग गया।
लोगोंने हँसकर कहा-धर्मस्य त्वरिता गतिः=धर्मकी गति शीघ्र होती है। [ इस कहावतको उसने चरितार्थ
किया ] राजाने सम्मान किया....और वहाँपर योगक्षेमके निर्वाह (गुज़र) की क्या हालत थी सो पूछी।
पंडित बोला-
[ ६२ ] हे राजन्, इस समय हमारा और आपका घर समान है, क्योंकि दोनों ही पृथुकर्तस्वर
पात्र (१ गंभीर आर्तनादका पात्र, और २ विपुल सुवर्णपात्रवाला) हैं, दोनों ही भूषित निःशेष परिजन
है (१ अलंकारहीन परिजनवाला, और २ सारे परिजन जिसमें भूषित है, ऐसा) हैं, और दोनों ही विलस
त्करेणुगहना (१ धूलिपूर्ण, और २ हाथियोंसे सुसज्जित) हैं।
(यहाँ P प्रतिमें निम्नलिखित और विशेष पंक्तियाँ पाई जाती हैं-)
एक बार उसने भोज की सभामें यह काव्य पढ़ा-
[ ६९ ] हे धाराके अधीश्वर ! पृथ्वीके राजाओंकी गणनामें कौतूहलवान् होकर इस ब्रह्मा ने आकाशमें
खड़ियासे लकीर खींच खींचकर तुम्हारी ही (अकेलेकी) गणना की। वही रेखायें यह स्वर्गगा
हो गई हैं और तुम्हारे समान पृथ्वीमें अन्य भूमिधव (राजा) का अभाव होनेसे उसने उस
खड़ियाको फेंक दिया वही यह हिमालय बना है।
अन्य पंडित इस काव्य [को अत्युक्ति] पर हँसे। पर धनपालने कहा-
[ ७० ] वाल्मीकिने वानरोंसे आहत (मँगवाये गये) पर्वतोंसे समुद्रको बँधवाया और व्यास ने
अर्जुनके बाणोंसे। तथापि उनकी बातें अयुक्ति नहीं समझी जाती। हम तो कुछ प्रस्तुत विषय ही
कहते हैं, तथापि लोग मुँह फाड़ कर हँसते हैं! इसलिये हे प्रतिष्ठे, तुझे नमस्कार है।
एक बार किसी पण्डितके यह कहनेपर कि-हे राजन्, महाभारतकी कथा सुनिये, उसपर परम आर्हत
पंडितने कहा-
[ ७१ ] कानीन (कुमारी कन्याके पुत्र=व्यास) मुनि, जो अपनी भ्रातृवधूके वैधव्यका विध्वंस करने
वाला है, उसकी रचना, जिसमें गोलक (विधवा पुत्र) के पाँच पुत्र पाण्डव नेता हैं, जो स्वयं
कुण्ड (जीवितपतिका स्त्रीके अन्य उपपतिसे उत्पन्न पुत्र) हैं। कहा गया है कि ये पाँचो समान
जातिके हैं ! इनका संकीर्तन करना भी यदि पुण्य-कर और कल्याण-कारक हो तो फिर पापकी
दूसरी कौन सी गति होगी ?
६१) शोभन मुनिकी 'शोभन चतुर्विंशतिकास्तुति' प्रसिद्ध ही है।
'इस समय क्या कोई [नया] प्रबंध आदि लिखा जा रहा है?' राजाके यह पूछनेपर
धनपालने कहा-
[ ७२ ] गलेमें उतरनेवाली गरम कांजीसे, जल जानेकी आशंकाके कारण सरस्वती मेरे मुँहसे निकल
कर चली गई है। इसलिये वैरीयोंकी लक्ष्मीके केश पकड़नेमें व्यग्र हाथवाले महाराज ! मेरे पास
अब कवित्व नहीं रहा।
राजाने [प्रसन्न होकर दूध पीनेके लिए] सौ गायें दिलवाई। राजाने जब यह पूछा कि
'गायें मिलीं !' तो-
[ ७३ ] हे नरवर ! ये गौ तो दूध देती नहीं है और ना ही इन सौमेंसे एकको भी बछड़ा है। इन
सौमेंसे बड़ी मुश्किलसे घौंसामा खाती हुई २० गायें घर तक पहुँच सकती हैं!
इस प्रकार धनपालने [उन बुड्ढी और बेकार गायोंकी] बात कही।
प्रकरण ६२-६४ ] महाकवि धनपालका प्रबन्ध [ ५३
[ ७४ ] धनपाल कविका सरस वचन और मलयगिरिका सरस चन्दन, हृदयमें रखकर कौन निर्वृत
(शान्त) नहीं होता ।
[ इधर शोभन मुनि स्तुति करनेके ध्यानमे [ लीन होनेसे ] एक स्त्रीके घर तीन बार [ भिक्षा लेने ]
गया । इससे उस स्त्रीका दृष्टिदोष लगा और वह मर गया । उसने अपने भाईमे अन्त समयमें ९६ स्तुतियोंकी
वृत्ति कराके अनशनपूर्वक सौधर्म स्वर्ग प्राप्त किया । ]
—इस प्रकार यह धनपाल पंडितका प्रबंध पूर्ण हुआ ।
*
६२) कभी, उस नगरका निवासी कोई ब्राह्मण, जिसकी वृत्ति केवल भिक्षा ही थी, एक पर्व दिनमें
नगरके सब लोगोंके स्नानमें व्यस्त रहनेके कारण भिक्षा न पाकर खाली ताम्र-पात्रके साथ ही घर लौट आया ।
इसलिये ब्राह्मणी उसे फटकारने लगी । झगड़ा वढ़ा और ब्राह्मणने उसपर प्रहार किया । आरक्षक पुरुष
( नगररक्षक=पुलीस ) उसे कैद करके राजमंदिरमें लाये । राजाके पूछने पर उसने यह श्लोक पढ़ा-
१०३. माँ मुझसे सन्तुष्ट नहीं रहती, और अपनी पतोहूसे भो सन्तुष्ट नहीं रहती; वह (बहू) भी
न मुझसे और न माँसे [सन्तुष्ट] है । मैं भी न उस (माँ) से और न उस (स्त्री) से [सन्तुष्ट
रहता हूँ] । हे राजन् ! बताओ इसमें दोष किसका है ?
इसका अर्थ पंडितोंके न समझने पर, राजाने अपनी बुद्धिसे उसके अभिप्रायको प्राय समझ कर, उसे
तीन लाख [दानमें] दिलवाये । और श्लोकके अर्थका व्याख्यान करते हुए कहा कि दारिद्र्य ही
कलहका मूल है ।
सब दर्शनोंसे सत्यमार्गकी पृच्छा ।
६३) बादमें, किसी समय, एक बार सब दर्शनोंको एकत्र बुलाकर राजाने मुक्तिका मार्ग पूछा । वे
अपने-अपने दर्शनका पक्षपात करने लगे । सत्यमार्ग जाननेकी इच्छासे राजाने उन सबको एकमत होनेको
कहा । वे सब ६ महीने तक शारदाके आराधनमें लगे रहे । किसी रात्रिके अन्तमें शारदाने यह कहकर कि
'जागते हो ?' राजाको उठाया और
१०४. सौगत (बौद्ध) धर्म है सो तो सुनने लायक हे (अर्थात् उसके सिद्धान्त सुननेमें अच्छे हैं),
और आर्हत (जैन) धर्म है सो करने लायक है । व्यवहारमें वैदिक धर्मका अनुसरण करना
योग्य हे और परम पदकी प्राप्तिके लिए शिवका ध्यान करना उचित है ।
(अथवा-अक्षय पदका ध्यान करना चाहिए ) राजाको तथा दर्शनों (सब मतवाले पंडितों) को यह
श्लोक सुनाकर श्रीभारती तिरोहित हुई ।
१०५. 'अहिंसा' जिसका मुख्य लक्षण है वही धर्म है । भारती (सरस्वती) है वही सबकी मान्य
देवी है । ध्यानसे मुक्ति प्राप्त होती है यही सब दर्शनोंका मन्तव्य है ।
इन दो श्लोकोंको बनाकर उन्होंने राजाको मुक्तिका निर्णय बताया ।
*
शीता पण्डिताका प्रबन्ध ।
६४) बादमें, उस नगरकी निवासिनी शीता नामक स्वयनी (रसोई बनानेवाली) को किसी विदेशी-
कार्पटिकने सूर्य पर्वके दिन भोजन बनानेके लिए अन्न दे कर, मध्य जलाशयमें स्नान करते समय कगुनीके
तेलका पान कर जानेसे, उसके घरपर आते ही, वमन करके मृत्यु प्राप्त हुआ । उसे देखकर, अपनेको द्रव्यके
निमित्त मार डालनेका कलंक लगनेकी आशंकासे उस रन्धनीने मरनेके लिए उसी अन्नको खा लिया । वह
[उसके पेटमें] टिक गया । और उसके प्रभावसे उसको प्रतिभाका बड़ा विभव प्रादुर्भूत हुआ । तीनों