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सर्वकोश
प्रबन्धचिन्तामणि (आचार्य मेरुतुङ्ग - राजा भोज, विक्रमादित्य, सिद्धराज जयसिंह एवं मालवा इतिहास सटीक)

प्रबन्धचिन्तामणि (आचार्य मेरुतुङ्ग - राजा भोज, विक्रमादित्य, सिद्धराज जयसिंह एवं मालवा इतिहास सटीक)

Prabandhachintamani of Acharya Merutunga

आचार्य मेरुतुङ्ग (अनुवादक: मुनि जिनविजय / हजारीप्रसाद द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished181 पृष्ठ

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पृष्ठ 68

प्रकरण ५६-५७ ] भोज और भीमका प्रबन्ध [ ४१
कराते [ । और दान भी कौन देना चाहे, जब कि ] बिना दान दिये यह सूर्य भी अस्त हो जाता
है । [ इस प्रकार ] हे गृहिणी ! कहाँ जायें, और क्या करें ? जीवन-विधि बड़ा गहन हो गया है ।
८३. भूखसे कातर बना हुआ यह पथिक मेरा घर पूछते पूछते कहींसे आया है, सो हे गृहिणी !
क्या कुछ है कि इस बुभुक्षितको खानेको दिया जाय ? '–पत्नीने वचनसे तो ' है ' यह कहालेकिन
फिर ' नहीं है ' यह बात बिना अक्षरोंके ही, चंचल नेत्रोंसे टपकते हुए बड़े बड़े अश्रुबिन्दुओंसे
सूचित की ।
८४. हे प्राणों ! जाओ, याचकके व्यर्थ लौट जानेपर, चले जाओ; बादको भी तो जाना है; ' फिर ऐसा
साथी कहाँ मिलेगा ? '
' फिर ऐसा साथी कहाँ मिलेगा ? '–इस वाक्यके बोलते ही माघ पण्डितकी मृत्यु हो गई ।
प्रातःकाल राजा भोजने उस वृत्तान्तको सुनकर, श्रीमालनगर में [ अनेक ] धनवान् सजातियोंके
रहते हुए भी, जो ऐसा पुरुष-रत्न क्षुधापीड़ित हो कर मर गया, इसलिये उसने उस जातिका नाम
' भिल्लमाल ' * ऐसा रख दिया ।
इस प्रकार श्री माघपण्डितका प्रबन्ध समाप्त हुआ ।
*
महाकवि धनपालका प्रबन्ध ।
५७) प्राचीन कालमें, समृद्धिसे विशाल ऐसी विशाला (उज्जयिनी) नामक नगरीमें, मध्य देशोत्पन्न सं का
श्य गोत्रीय सर्वदेव नामक ब्राह्मण वास करता था । जैनदर्शनके संसर्गसे उसका मिथ्यात्व प्रायः शान्त हो गया
था । उसके दो पुत्र थे जिनका नाम धनपाल और शोभन था । एक बार श्रीवर्द्धमान सूरि वहाँ आये ।
गुणानुरागी होनेके कारण सर्वदेव ने उन्हें अपने उपाश्रयमें निवास कराया और अपनी अनन्य भक्तिसे उन्हें सन्तुष्ट
किया । उन्हें ' सर्वज्ञ-पुत्रक ' जानकर गुम हो जानेवाली पूर्वजोंकी निधिके बारेमें पूँछा । उन्होंने वचन-
चातुरीसे पुत्रोंका आधा हिस्सा माँग लिया । संकेत बतानेपर निधि मिली । जब वह आधा भाग देने लगा तो
सूरिने दोनों पुत्रोंमेंसे आधा हिस्सा माँगा । धनपाल ने, जिसकी मति मिथ्यात्वके कारण अन्धी हो रही
थी, जैन मार्गकी निन्दा करते हुए नहीं कर दी । छोटे लड़के शोभन पर कृपा-परायण हो कर, पिताने
उसको देना नहीं चाहा । इसपर उसने अपनी प्रतिज्ञाके भंग होनेके पापको तीर्थमें जाकर प्रक्षालन करनेकी
इच्छासे, तीर्थोंके प्रति प्रस्थान करना निश्चित किया । पितृभक्त शोभन नामक छोटे पुत्रने, उसको उस आग्रहसे
रोककर, पिताकी प्रतिज्ञाका पालन करनेके लिये जैन दीक्षाव्रत ग्रहण कर स्वयं गुरुका अनुसरण किया ।
धनपाल समस्त विद्याओंका अध्ययन करके श्री भोज के प्रसाद-प्राप्त समस्त पंडित-मण्डलमें सुप्रतिष्ठ हुआ
और फिर अपने सहोदरकी ईर्ष्यासे बारह वर्षतक अपने देशमें जैन दर्शनियोंका आगमन निषिद्ध कराया ।


  • श्रीमाल नगरका दूसरा नाम भिल्लमाल भी है । वर्तमानमें वह स्थान इसी नामसे प्रसिद्ध है । श्रीमाली जातिके
    वैश्य और ब्राह्मण कुल इसी स्थानसे निकले हुए हैं । श्रीमालका दूसरा नाम भिल्लमाल ऐसा कब और क्यों पड़ा इसका अन्य
    कोई दूसरा ऐतिहासिक उल्लेख अभी तक प्राप्त नहीं हुआ । महाकवि माघ की जन्मभूमि श्रीमाल थी यह बात कविके कथन ही
    से सिद्ध होती है, लेकिन उसकी मृत्युका जो यह करुण वृत्तान्त मेरुतुङ्गाचार्यने लिखा है और उसी प्रसंग परसे भोज राजाने श्री
    मालका नाम भिल्लमाल रख दिया यह जो उल्लेख किया है, इसकी सत्यताके लिये और कोई सुनिश्चित प्रमाण जबतक प्राप्त न
    हो तबतक इस कथनको एक किंवदन्तीके रूपमें ही समझना चाहिए । माघ और भोजकी समकालीनता भी सन्दिग्ध है । और
    कम से कम यह भोज प्रसिद्ध धारापति परमारवंशीय राजा भोज तो किसी तरह सम्भवित नहीं है । इसकी विशेष विवेचना
    अगले ऐतिहासिक अवलोकनवाले खण्डमें की जायगी ।