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सर्वकोश
प्रबन्धचिन्तामणि (आचार्य मेरुतुङ्ग - राजा भोज, विक्रमादित्य, सिद्धराज जयसिंह एवं मालवा इतिहास सटीक)

प्रबन्धचिन्तामणि (आचार्य मेरुतुङ्ग - राजा भोज, विक्रमादित्य, सिद्धराज जयसिंह एवं मालवा इतिहास सटीक)

Prabandhachintamani of Acharya Merutunga

आचार्य मेरुतुङ्ग (अनुवादक: मुनि जिनविजय / हजारीप्रसाद द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished181 पृष्ठ

पृष्ठ 59, कुल 181 में से

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पृष्ठ 59

३६ ] प्रबन्धचिन्तामणि [ द्वितीय प्रभाव
इसके बाद राजाने उसके पुत्रको [ यह समस्या दी ]—‘हिमालय नामक पर्वतोंका राजा है !’—
‘प्रवाल (तृणाङ्कुर) की शय्याको शरीरका शरण’ बनाया। राजाके इस वाक्यको सुनकर उसने उत्तर दिया—
५८. वह जो हिमालय नामक पर्वतोंका राजा है, तुम्हारे प्रतापरूपी अग्निसे पिघल रहा है; और विरहसे
आतुर बनी हुई मेना ( हिमालय-पत्नी मेनका ) अपने शरीरको प्रवाल (तृणाङ्कुरों) की शय्याके
शरण कर रही है।
इस प्रकार उसके समस्या पूरी कर देनेपर, ज्येष्ठकी पत्नीको राजाने समस्याका यह पद अर्पित किया—
किससे पिलाऊँ दूध ?
५९. जब रावण पैदा हुआ तो उसने एक शरीरपर दस मुँह देख कर उसकी माता बड़ी विस्मित हुई
और सोचने लगी कि कौनसे मुँहसे इसे दूध पिलाऊँ ?
—उसने इस प्रकार यह समस्या पूरी की।
इसके बाद राजाने दासीसे भी इस प्रकारका पद समस्याके लिये दिया—‘कंठमें काऊ लटक रहा है!’
६०. पतिविरहसे कराल बनी हुई किसी स्त्रीने उस बेचारे कौवेको उडाया तो, बड़ा आश्चर्य मैने
हे सखि ! यह देखा कि वह काक उसके कठमें लटक रहा * ।
उसने इस तरह पूरा किया। राजाने उस कुटुम्बमर्की लड़कीको भूलकर, अन्य सबक़ो सत्कार
करके बिदा किया ।
बादमें राजाने जब सर्वोवसर ( राजसभा ) का विसर्जन किया और स्वय चन्द्रशाला ( चाँदनी=महलके
ऊपरकी छत ) की भूमिमें छत्र धारण करके टहल रहा था, तत्र द्वारपालने उस लड़कीका वृत्तान्त कहा ।
राजाने उसे [ बुलाकर ] कहा—‘कुछ बोलो’—तो वह बोली कि—
६१. हे राजन्, हे मुञ्जकुलके दीपक, हे समस्त पृथ्वीके पालक, राजाओंके चूडामणि ! इस भवनमें
रातमें भी, तुम इस प्रकार छत्र धारण करते हो वह उचित ही है। इससे न तो तुम्हारे मुखकी
कान्तिको देखकर चन्द्रमाको लज्जित होना पड़ता है ओर न भगवती अरुन्धतीको ( पर पुरुषके
मुखदर्शनसे ) दु शशीलताका भाजन होना पड़ता है।
उसके इस वाक्यके अनन्तर राजाने, जिसके चित्तको उसके सौन्दर्य और चातुर्यने हरण कर लिया था,
उससे विवाह करके अपनी भोगिनी बनाया।

  • इस पद्यमें ‘काउ’ इस देश्य शब्दपर श्लेष है। काउ काग-काक-कौआ वाचक तो प्रसिद्ध है ही-इसके सिवा
    गलेमें जो एक लटकता हुआ छोटासा मासपिंड है उसका नाम भी काक-काग ( गुजराती-कागडो ) है। कोई विरहिणी स्त्रीका
    शरीर इतना कृश होगया है कि जिससे उसके कठमें लटकता हुआ काग स्पष्टतया बहार दिखाई देता है। उसके घरके सामने आ
    आकर कौआ बोलता है, जिसका यह अर्थ समझा जाता है कि, उसका स्वजन आनेवाल है। लेकिन उसके वारवार ऐसा
    बोलने पर भी वह जब नहीं आता मालूम देता है तो फिर वह विरहिणी चिढ़कर उस कौवेको उडा देती है। इस कौवेके उड़ाते
    समय उसके पासमें बैठी हुई सखिने उसके दुर्बल कटमेंका वह काग नजर आया। इस अर्थकी घटना बतलानेके लिये कविने
    इस पद्यमें ‘काउ’ शब्दका प्रयोग कर उसकी समस्यापूर्ति बनाई है। इस ग्रथके गुजराती और इग्रजी भाषान्तरकारोंने इन
    पद्योंक कुछके कुछ ऊटपटाग अर्थ किये है।