प्रबन्धचिन्तामणि (आचार्य मेरुतुङ्ग - राजा भोज, विक्रमादित्य, सिद्धराज जयसिंह एवं मालवा इतिहास सटीक)
Prabandhachintamani of Acharya Merutunga
आचार्य मेरुतुङ्ग (अनुवादक: मुनि जिनविजय / हजारीप्रसाद द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रकरण ४५-४६ ] भोज और भीमका प्रबन्ध [ ३७
भोजकी गुजरातके राजा भीमके प्रति प्रतिस्पर्धा ।
४५) इसके बाद, एक समय, संधिपत्रके होते हुए भी, संधिमें दोष उत्पादनके विचारसे भोज
राजाने गूर्जर देश की बुद्धिमत्ताका ज्ञान प्राप्त करनेकी इच्छासे अपने सान्धिविग्रहिकके हाथ, भीम के पास
यह [ प्राकृत ] गाथा लिख भेजी-
६२. क्रीडा मात्रमें जिसने हाथीका कुम्भस्थल विदीर्ण किया हो और चारों दिशामें जिसका प्रताप
फैल रहा हो उस सिंहका, मृगके साथ न तो विग्रह ही [शोभता है] और न सन्धि ही [रहती है]।
भीम ने इस गाथाका उत्तर देनेके लिये सब महाकवियोंने गाथा माँगी। पर उनकी बनाई सब गाथाओंको
निःसारार्थक देखकर यह सोचमें पड़ गया । उसी समय नगरमेंके जैन मन्दिरके अन्दर नाचनेके लिये सज्ज बनी
हुई नर्तकीको खम्भेके पास खड़ी हुई देखकर मंत्रीने वहीं बैठे हुए किसी आचार्य-शिष्यसे स्तंभ-वर्णनके लिये
कहा । यह बोला-
[ ४८ ] हे स्तंभ ! तुम जो इस मृगनयनी नवयौवनाकी, कङ्कणाभरण आदिसे सज्जित बाहुलतासे [वेष्टित
होकर भी ] न स्वेद-युक्त होते हो, न हिलते हो और न काँपते हो; सो सचमुच ही तुम पत्थरके
बने हो यह निश्चित होता है ।
[ आचार्य-शिष्यकी विद्वत्ताकी यह बात जब मंत्रीने राजासे कही तो राजाने [ उसके गुरु ] आचार्यको
बुलाकर उस विषयमें पूछा-
६३. विधाताने भीम को अन्धकके * पुत्रोंको मारनेके लिये ही निर्माण किया है । जिस भीमने सौ
[ अन्धक पुत्रों ] को कुछ नहीं गिना उसके सामने तुझ अकेलेकी क्या गणना है ! '
इस प्रकार गोविन्दाचार्य की बनाई हुई चित्तको चमत्कृत कर देनेवाली इस गाथाको दूतके हाथ
भेजकर, सन्धिके दोषको दूर किया ।
४६) बादमें किसी एक रातको, जाड़ेके दिनोंमें, राजा जब वीरचर्यामें घूम रहा था, तो किसी मन्दिरके
सामने, किसी पुरुषको यह पढ़ते सुना-
६४. मेरा पेट भूखसे व्याकुल है, ओंठ फट गये हैं, ऐसी अवस्थामें फूंकते फूंकते आग ठंडी हो गई
है, चिन्ताके समुद्रमें डूब रहा हूँ, शीतसे मापके फलकी तरह सिकुड़ गया हूँ । निद्रा अपमानिता
स्त्रीकी भाँति कहीं दूर चली गई है; और सत्पात्रमें दी गई लक्ष्मीकी भाँति रात भी खतम नहीं
हो रही है ।
यह सुनकर रात बिताकर सवेरे उसे बुलाकर पूँछा-' किस प्रकार तुमने रात्रिशेषमें शीतका अत्यन्त
उपद्रव सहन किया ? ' । ' सत्पात्रमें दी गई लक्ष्मी ' इत्यादि कथनकी ओर संकेत करके उसने कहा था ।
[ वह बोला- ] ' महाराज ! मैं खूब गाढ़े तीन वस्त्रोंसे जाड़ा काटता हूँ । ' राजाने पूछा कि तुम्हारे ये तीन
वस्त्र क्या हैं ? तब उसने फिर कहा-
६५. रातमें घुटने, दिनमें सूर्य और दोनों शामको आग, इस प्रकार हे राजन्! घुटने, सूर्य और
आगके बलपर मैं शीत काटता हूँ ।
जब उसने इस प्रकार कहा तो राजाने उसे तीन लाखका दान देकर सन्तुष्ट किया ।
६६. तुमने अपनी आत्माको धारण करके बलि, कर्ण आदि उन त्यागमूर्ती धनवान पुरुषोंको मुकुर-
- यहाँपर 'अंधक' इस शब्दपर श्लेष है । कौरवोंका पिता धृतराष्ट्र अन्धा था इसलिये उसको अन्धक कहा है।
भोजका पिता सिंधुराज भी अन्धा था इसलिये उसका विशेषण भी अन्धक सार्थक है ।