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सर्वकोश
प्रबन्धचिन्तामणि (आचार्य मेरुतुङ्ग - राजा भोज, विक्रमादित्य, सिद्धराज जयसिंह एवं मालवा इतिहास सटीक)

प्रबन्धचिन्तामणि (आचार्य मेरुतुङ्ग - राजा भोज, विक्रमादित्य, सिद्धराज जयसिंह एवं मालवा इतिहास सटीक)

Prabandhachintamani of Acharya Merutunga

आचार्य मेरुतुङ्ग (अनुवादक: मुनि जिनविजय / हजारीप्रसाद द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished181 पृष्ठ

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४० ] प्रबन्धचिन्तामणि [ द्वितीय प्रकाश
राज्योंमें भेजे जाते हैं।' इस प्रकार भीतर ही भीतर हँसते हुए उत्तर देकर उसने धारा के
स्वामी (भोज) को प्रसन्न किया।
इस प्रकार उसकी वचन-चातुरीसे राजा चमत्कृत हुआ। गूर्जर देशके प्रति प्रयाण करनेका
राजाने नगाड़ा बजवाया। प्रयाणके समय बंदीने यह स्तुतिपाठ किया—
७२. चोड़ [ का राजा ] समुद्रकी गोदमें प्रवेश कर रहा है और आन्ध्र [ पति ] पर्वतकी खोहमें
निवास कर रहा है, कर्णाटकका राजा पट्ट बंध (पगड़ी बाँधना) नहीं करता है, गूर्जर [ का
राजा ] निर्झरका आश्रय लेता है, चेदि [ नरेश ] अब्जोंसे म्लान होगया है और राजाओंमें सुभट
समान कान्यकुब्ज कूबडा होगया है–हे भोज ! तुम्हारे मात्र सेनात्रत्रके प्रसारके भयसे ही
सभी राजा लोग व्याकुल हो रहे हैं।
७३. कोंकण [ का राजा ] कोनेमें, लाट (नरेश) दरवाज़ेके पास, कलिङ्ग [ पति ] आँगनमें
सोया करते हैं। अरे कोशल [ नरेश ], तूं अभी नया है, मेरे पिता भी इस आसनपर सोया
करते थे। इस प्रकार जिस (भोज) के कारागृहमें रातमें प्रत्यार्थियोंमें स्थानप्राप्तिके लिये उठा
हुआ पारस्परिक विरोध निरंतर बढ़ता रहता है।
प्रयाणके लिये नगाड़े बजवाये जानेके बाद, रातको समस्त राजाओंकी दुर्दशाका दृश्य दिखलानेवाला
नाटक अभिनीत होने लगा। उसमें कोई क्षुद्र राजा, कारागारके भीतर सामनेकी जमीनपर सुस्थ भारसे सोये
हुए तैलप राजाको उठाने लगा। तैलपने उससे कहा-‘मैं तो यहाँ पुश्त-दर-पुश्तसे बास कर रहा हूँ,
आप जैसे नये आये हुए राजाकी बातसे अपना पद कैसे छोड़ दूँ ?' राजा भोजने हँसकर डामर से नाटकके
रसावतारकी प्रशंसा की। इसपर वह बोला-‘महाराज ! यद्यपि नाटकमें रसकी जमावट बहुत उत्तम है
तथापि इस नटकी, कथानायकके वृत्तान्तसे जो नितान्त अनभिज्ञता है वह धिक् है। क्यों कि राजा तैलपदेव
सूलीपर चढ़ाये हुए मुण्ड के सिरसे पहचाना जाता है।' सभाके सामने जब उसने इस प्रकार कहा तो राजाको
उसकी निर्भर्त्सनापर क्रोध हो आया और उसी समय उस सामग्रीके साथ, जो दूसरोंके जुटाये न जुट सकती
थी, तैलङ्ग देशके प्रति प्रयाण किया।
४९) बादमें तैलपदेव को बड़ी भारी सेनाके साथ आता हुआ सुनकर भोज व्याकुल हुआ। उतनेमें
उसे डामर ने [अपने] राजाके यहाँसे आये हुए एक कल्पित (जाली) आदेशको दिखाकर कहा कि भीम
भी चढ़कर भोगपुरतक आंगया है। जलेपर नमक छिड़कनेके समान उसकी उस बातसे राजा भोज खूब
शंकित हो गया। उसने डामरसे कहा-इस वर्ष किसी तरह तुम अपने स्वामीको यहाँ आनेसे रोको। उसने
बार बार इस प्रकार दीनताके साथ कहा और उस अवसरके जाननेवाले [डामर] को हाथीके साथ हथिनी
भेंट दी। उनको लेकर वह पत्तनमें आया और भीमको परितुष्ट किया।
५०) एक बार, जब यह धर्मशास्त्र सुन रहा था, उस समय अर्जुनका राधा-वेध (मत्स्य-वेध) सुनकर
सोचा कि ‘अभ्यास करनेपर क्या कठिन है।' फिर बराबर अभ्यास करके उस विश्वविदित राधावेधको उसने
सिद्ध किया और उसकी सारे नगरवासियोंको जान हो इसलिये नगरमें खूब सजावट कराई। किन्तु
एक तेली और एक दर्जीके, उत्साहसे उत्सवमें कोई भाग न लेने पर, राजाको उसकी खबर की गई। तेलीने
चंदशाला (ऊपरी छत) पर खड़े होकर, पृथ्वीपर रक्खे हुए संकड़े मुँहके पात्रमें तेल डालकर; और
दर्जीने पृथ्वीपर खड़े होकर ऊपरकी ओर उठाये सूतके डोरेके अग्रभागको आकाशसे पड़ती हुई सुईके छेदमें