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सर्वकोश
प्रबन्धचिन्तामणि (आचार्य मेरुतुङ्ग - राजा भोज, विक्रमादित्य, सिद्धराज जयसिंह एवं मालवा इतिहास सटीक)

प्रबन्धचिन्तामणि (आचार्य मेरुतुङ्ग - राजा भोज, विक्रमादित्य, सिद्धराज जयसिंह एवं मालवा इतिहास सटीक)

Prabandhachintamani of Acharya Merutunga

आचार्य मेरुतुङ्ग (अनुवादक: मुनि जिनविजय / हजारीप्रसाद द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished181 पृष्ठ

पृष्ठ 62, कुल 181 में से

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पृष्ठ 62

प्रकरण ४७-५० ] भोज और भीमका प्रबन्ध [ ३९
४७) इसके बाद, एक दूसरे अवसरमें, राजा राजपाटीमें भ्रमणार्थ हाथीपर चढ़कर नगरके भीतर जा
रहा था । उस समय किसी भिक्षुकको, पृथिवीपर गिरे हुए अन्न-कणोंको चुनते हुए देखकर बोला-
६७. अपना पेट भरनेमें भी जो असमर्थ हैं उनके जन्म लेनेसे क्या है ?
-इस प्रकार उसके पूर्वार्ध कहनेपर;
सुसमर्थ होकर भी जो परोपकारी नहीं उनके [ जन्म लेने ] से भी क्या है !
६८. 'उनके [ जन्म लेने ] से भी क्या है'-यह कहनेपर, दानशूर भोज नरेन्द्र ने उसको सौ हाथी
और एक करोड़ सुवर्ण मुद्रायें दीं ।
उसके इस वचनके अन्तमें [ राजाने कहा ]-
६९. हे जननि ! ऐसा पुत्र न जन जो दूसरोंके आगे प्रार्थना किया करें ।
उसके इस वाक्यके पश्चात् [ भिक्षुक बोला ]-
उसको भी उदरमें न धारण कर जो दूसरोंकी प्रार्थनाका भंग करें ।
जब उसने इस प्रकार कहा तो राजाने पूछा-' तुम कौन हो ?' इस पर नगरके प्रधान पुरुषोंने
कहा, कि आपके यहाँ, नाना भाँतिके विद्वानोंकी घटा में जब अन्य किसी उपायसे प्रवेश न पा सका तो इसी
प्रपञ्चसे स्वामिदर्शनकी इच्छा रखनेवाला यह [ व्यक्ति ] राजशेखर है । उसको उचित महादानोंसे पुरस्कृत
करनेपर उस राजशेखर ने ये कवितायें पढ़ीं-
[ ५४ ] अकुण्ठित मेघोंके नादसे नाचती हुई मयूरियोंकी उन्नत आवाज़से आकुल, मेघागमन कालमें
( वर्षा में ) तो जमीनपर भी जल सुविधासे मिल जाया करता है । लेकिन, इस भयानक उष्णता
भरे ग्रीष्म कालमें करुणासे एक दूसरेकी ओर देखनेवाली और इधर उधर ताकती हुई मछलियोंका
यदि तू पालन नहीं करता, तो, रे कासार ( तालाब ) तेरी फिर सारता ही क्या है !,
७०. जिस सरोवरमें, मेंढक मरे हुओंकी भाँति कोटरोंमें सो गये थे, कच्छप पृथ्वीमें छिप गये थे, और
गाढ़े पंकके ऊपर लोटनेसे मछलियाँ बारंबार मूच्छित हो रही थीं, उसी तालाबमें, अकालके मेघने
उतरकर ऐसा किया कि उसमें कुंभस्थल तक डूबे हुए हाथियोंके झुंड पानी पी रहे हैं ।
इस प्रकार अकालजलद राजशेखर की यह उक्ति है ।
*
राजा भोजकी गुजरातपर आक्रमण करनेकी इच्छा ।
४८) इसके बाद, किसी साल, वर्षा न होनेके कारण राजा भीम के देशमें ( गुजरात में ) अन्न, कण और
तृण भी नहीं मिलता था ऐसे कुसमयमें, राजपुरुषोंने भोज का आना बताया ( अर्थात्-भोजराजाने गुजरात
पर चढ़ाई करनेकी बात उठाई ) । यह सुनकर भीम को चिन्ता हुई और उसने अपने डामर नामक सान्धि-
विग्रहिकको आदेश किया कि कुछ दण्ड देकर इस साल भोज को यहाँ आनेसे रोको । उसका यह आदेश
पाकर वह वहाँ गया । वह डामर अत्यंत कुरूप समझा जाता था । भोजने [ उसका उपहास करनेकी
दृष्टिसे ] कहा-
७१. ' हे ब्राह्मण ! तुम्हारे स्वामीके संधि-विग्रह पदपर तुम्हारे जैसे कितने दूत हैं ?' [ उत्तर-]
' यों तो बहुत ही हैं, हे मालव-नरेश ! पर वे सब गुणकी दृष्टिसे तीन प्रकारके हैं-अधम,
मध्यम और उत्तम । [ इनमें ] जो जिस गुणके योग्य होता है उसीके अनुसार ये दूत उन उन