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सर्वकोश
प्रबन्धचिन्तामणि (आचार्य मेरुतुङ्ग - राजा भोज, विक्रमादित्य, सिद्धराज जयसिंह एवं मालवा इतिहास सटीक)

प्रबन्धचिन्तामणि (आचार्य मेरुतुङ्ग - राजा भोज, विक्रमादित्य, सिद्धराज जयसिंह एवं मालवा इतिहास सटीक)

Prabandhachintamani of Acharya Merutunga

आचार्य मेरुतुङ्ग (अनुवादक: मुनि जिनविजय / हजारीप्रसाद द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished181 पृष्ठ

पृष्ठ 75, कुल 181 में से

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पृष्ठ 75

५० ] प्रबन्धचिन्तामणि [ द्वितीय प्रकाश
५९) इसके बाद, धनपालने ऋषभपञ्चाशिका स्तुतिकी रचना की। सरस्वतीकण्ठाभरण
प्रासाद में उसकी बनाई प्रशस्ति-पट्टिकामें किसी समय राजाने [ यह काव्य पढ़ा-]
९५. इसने [ अपने जन्ममें ] पृथ्वीका उद्धार किया, शत्रुके वक्षःस्थलको विदारण किया, और बलिकी
राजलक्ष्मी ( विष्णुके पक्षमें बलि नामक राजा और भोजके पक्षमें बलशाली राजा ) को आत्मसात्
किया । इस प्रकार इस युवकने ये काम एक ही जन्ममें किये जो पुराण पुरुष ( विष्णु ) ने तीन
जन्ममें किये थे ।
इस काव्यको पढ़कर उसके पारितोषिकमें एक सोनेका कलश दिया । उस प्रासादसे निकलकर उसीके
द्वारके खंभोंपर मूर्तिमान् मदनको, जो रतिके साथ हस्तताल ( ताली ) दे रहा था, देखकर राजाने धनपाल से
उनके हंसनेका कारण पूछा । इस पर पंडित बोला-
९६. यह है त्रिभुवनमें संयमके लिये विख्यात ऐसा वह शिव, जो इस समय विरहकातर हो कर अपने
शरीरमें ही स्त्रीको धारण किये है। इसीने हमें एक समय जीता था ! इस प्रकार प्रियाके हाथसे
अपने हाथको बजाता हुआ और हंसता हुआ यह मदनदेव जयवान् हो रहा है।
[ यहाँ D पुस्तकमें "अत्रांशे शिवभवने ० " "दिग्बाण यदि तस्मिंश्च धनुरा०" "अमेव्यमक्षाति० "
"पय प्रदान० " "अख्युतम्भाद्रे" इत्यादि पद्य पाये जाते हैं। पर चूंकि वे यहाँ अप्रासंगिक हैं और Pb आदर्शके अनुसार
इसके पहले ही उल्लिखित हो चुके हैं इसलिये फिर उद्धृत नहीं किये गये । ]
९७. पाणिग्रहणके समय शिवका जो भूतिभूषित शरीर पुलकित हुआ उसकी जय हो-जिस
शरीरमें [ पुलकके बहाने ] भस्मावशेष मदन मानों फिर अंकुरित हुआ है।
इस प्रकारके तथा इसीतरहके, अन्य अन्य प्रसिद्ध और सिद्ध सारस्वतकवियोंके काव्योंको कह कह कर
जब धनपाल राजाको रञ्जित कर रहा था, उसी समय द्वारपालने एक व्यापारीका आना निवेदन किया।
सभामें प्रवेश करके, राजाको नमस्कार कर, उसने मोमकी बनी पट्टीपर लिखे हुए कुछ काव्योंको दिखाया।
राजाके उसके प्रतिष्ठानके बारेमें पूछने पर वह बोला कि-' मेरा जहाज अकस्मात् समुद्रमें एक जगह रुक
गया, जहाजिन्होंने खोज करके देखा तो वहाँ एक शिवमन्दिर मिला, जिसके ऊपर चारों ओर जल लहरा
रहा है पर भीतर पानीका अभाव है। उन्होंने उसकी एक दीवार पर अक्षर देखकर उसे जाननेकी इच्छासे
उसपर मोमकी पट्टी लगा दी। उसी के उभड़े हुए अक्षर इस पट्टीपर हैं। राजाने जब यह सुना तो,
उसपर [ वैसी ही ] मिट्टीकी पट्टी लगवा कर, उसपर पड़े हुए उलटे अक्षरोंको पंडितोंसे पढ़वाया ।
९८. 'लड़कपनसे ही, मेरी प्राप्तिके कारण ही यह उन्नतिकी परा कोटिको प्राप्त हुआ है, और इस
समय मेरी ही बातसे यह रागका लड़का लजाता है।' इस प्रकार खिन्न होकर अपने
पुत्ररूपी यशसे अवलंब दिया जाकर वृद्ध 'गुणोंका समूह' समुद्रके तीरपर तपस्याके
लिये चला गया ।
९९. जो धनुर्धारी प्रतिद्वंद्वियोंकी स्त्रियोंको वैधव्य व्रत देनेवाला है ऐसे उस राजाके दिग्विजयके लिये
उद्यत होनेपर और क्रुद्ध होकर प्रति दिशामें उसके भ्रमण करनेपर, और स्त्रियोंकी तो बात ही
क्या स्वयं रति भी मारे डरके अपने पतिको, मदान्ध भ्रमरियोंका नील चोला धारण किये हुए
पुष्पधनुषको [भी हाथमें] नहीं लेने देती।
१००. चिन्तारूपी गभीर कूपपर महाशोकरूपी चलती अरघट्ट (घड़ारी) परसे निःश्वास फेंककर
अपने बड़ी बड़ी आँखरूपी घटीयंत्रसे छोड़े हुए अश्रुधारको और नासिकाकी वंशप्रणालीके