प्रबन्धचिन्तामणि (आचार्य मेरुतुङ्ग - राजा भोज, विक्रमादित्य, सिद्धराज जयसिंह एवं मालवा इतिहास सटीक)
Prabandhachintamani of Acharya Merutunga
आचार्य मेरुतुङ्ग (अनुवादक: मुनि जिनविजय / हजारीप्रसाद द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रकरण ५१-५५ ] भोज और भीमका प्रबन्ध [ ४१
पिरो कर अपने अभ्यास-कौशलका परिचय दिया; और फिर राजासे 'यदि शक्ति है तो स्वामी भी ऐसा
कर दिखावें' ऐसा कह कर राजाका गर्व खंडित किया । [ उसका राधावेध करना देखकर किसो कविने
उसकी प्रशंसा में कहा- ]
७४. हे भोजराज ! मैंने राधा-वेध ( मत्स्य-वेध ) का कारण जान लिया । वह यह कि आप 'धारा' के
विपरीत ( राधा ) को नहीं सह सकते ।
५१) विद्वानों द्वारा इस प्रकार प्रशंसित होते हुए उस राजाको नया नगर बसानेकी इच्छा हुई तो उसने
पटह बजवाया । उस समय धारा नामरू एक वेश्या अपने अग्नि वेताल नामक पतिके साथ लंका जाकर
उस नगरका निवेश देख आई; और उसने यह कह कर कि नगरको मेरा नाम देना, लंका का प्रतिच्छन्द पट
( मानचित्र ) राजाको दिया । उसके अनुसार राजाने नई धारा नगरी बसाई ।
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दिगंबर कुलचन्द्रको सेनापति बनाना ।
५२) किसी दिन वह राजा सायंकालके सर्वावसरके बाद अपने नगरके भीतर [ वीरचर्या निमित्त ]
घूम रहा था, उसी समय किसी दिगंबर विद्वान्को यह कविता पढ़ते सुना—
७५. न किसी सुभटके सिरपर खड्गके टुकडे किये, न तेजी घोड़ोंपर सवारी ही की और न गोरी
स्त्रीको गले ही लगाई—इस प्रकार निरर्थक ही यह नग्न जन्म चला गया ।
राजाने सवेरे ही उसको बुलाकर और वह संकेत सुनाकर उसकी शक्ति पूंछी । वह बोला—
७६. महाराज ! रमणीय दीपोत्सवके बीत जानेपर जब हाथियोंका मद झरने लगेगा तो मैं अपनी
शक्तिसे गौड देशके साथ सारे दक्षिणापथ को एक छत्रनीचे कर दूँगा ।
उसने अपना ऐसा पौरुष प्रकट किया तो राजाने उसे [ योग्य समझकर ] सेनापतिके पद पर
अभिषिक्त किया ।
कुलचन्द्रकी गुजरातपर चढ़ाई ।
५३) इधर, जब राजा भीम सिन्धु देशकी विजयमें रुका हुआ था, [ वह दिगम्बर ] सारे
सामन्तोंके साथ, अणहिल्लपुर पर आक्रमण करके, उसके धवलगृहके घटिकाद्वार पर, कौड़ियाँ वपन
कराकर उसने जयपत्र ग्रहण किया । तबसे सर्वत्र "कुलचन्द्रने लूट लिया" [ कहावत ] की प्रसिद्धि
हुई । वह जयपत्र लेकर मालवा में गया । श्रीभोज को यह वृत्तान्त विदित किया । 'तुमने वहाँपर कोयला
क्यों नहीं बोया ? [ इन कौडियोंके बोनेसे तो यह सूचित होता है कि भविष्यमें ] यहाँसे कर वसूल होकर
गूर्जर देश में जायगा ।' इस प्रकार सरस्वती-कण्ठाभरण श्रीभोज ने [ यह भविष्यवचन ] कहा ।
५४) एक बार चन्द्रातप ( चाँदनी ) में श्रीभोज राजा बैठे थे, पास-ही-में कुलचंद्र भी था । पूर्ण
चन्द्रमण्डलको देखकर [ पुनः पुनः उसकी ओर देखकर ] ( राजाने ) यह पढ़ा—
७७. जिन लोगोंकी रात प्रियाके साथ क्षणभरकी तरह व्यतीत हो जाती है, चन्द्रमा उनके लिये
शीतल है; किन्तु विरहीयोंके लिये तो उल्काके समान सन्तापदायक है ।
उस कविके इस प्रकार आधा कहनेपर कुलचन्द्र बोला—
हम लोगोंके न तो प्रिया है और न विरह है, इसलिये दोनों ओरसे भ्रष्ट होनेके कारण हमको तो
चंद्रमा दर्पणकी आकृति के समान दिखाई देता है । न वह उष्ण है, न शीतल ।
ऐसा कहनेके अनन्तर ही उसे पुरस्कारमें एक वेश्या प्रदान की गई ।
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