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सर्वकोश
प्रबन्धचिन्तामणि (आचार्य मेरुतुङ्ग - राजा भोज, विक्रमादित्य, सिद्धराज जयसिंह एवं मालवा इतिहास सटीक)

प्रबन्धचिन्तामणि (आचार्य मेरुतुङ्ग - राजा भोज, विक्रमादित्य, सिद्धराज जयसिंह एवं मालवा इतिहास सटीक)

Prabandhachintamani of Acharya Merutunga

आचार्य मेरुतुङ्ग (अनुवादक: मुनि जिनविजय / हजारीप्रसाद द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished181 पृष्ठ

पृष्ठ 76, कुल 181 में से

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पृष्ठ 76

विषम पथसे गिरते हुए इस बाष्प रूपी पानीयको, हे महाराज, तुम्हारे शत्रुओंकी स्त्रियाँ अविराम
भारसे स्तनरूपी दो कलशोंमें ढोया करती हैं।
इस प्रकार काव्योंके पूरा पढ़े जानेपर [ आगे यह आधा 'काव्य मिला-]
१०१. 'अहो ! पूर्वकृत कर्मोंका परिणाम प्राणियोंके लिये सचमुच ही बड़ा विषम होता है।'
इस काव्यका उत्तरार्द्ध ठिट्ठप प्रभृति सैकड़ों पंडितोंके पूरा करनेपर भी ठीक नहीं जमता था तब
राजाने धनपाल पंडितसे पूछा [ तो उसने अपनी प्रतिभाके बलसे यह यथार्थ पाठ कहा ]-"हरेहरे ! जो
सिर शिवके सिर पर विराज रहे थे वे गधोंके पैरोंसे लुण्ठित हो रहे हैं।" 'यही उत्तरार्द्ध ठीक जमता है' इस
प्रकार जब राजाने कहा तो पंडित बोला-'यदि पदबन्ध और अर्थ दोनों ही, श्रीरामेश्वर प्रासादकी दीवालपर
ये इसीप्रकार न हों तो, इसके बाद आजीवन मैं कविताका त्याग कर दू।' उसकी इस प्रतिज्ञाके सुननेके
साथ ही राजाने जहाजके यात्रियोंको उसी समुद्रमें गोता लगवाकर मंदिरको खोज निकालनेकी आज्ञा दी।
६ महीने बाद उसे ढूंढ निकाला और उसपर फिरसे मोमकी पट्टी लगा कर [ लेखकी नकल ली ] उसमें
यही उत्तरार्द्ध निकला। यह देखकर [ राजाने ] उसको उपयुक्त पारितोषिक दिया। इस प्रकार, इस खण्ड
प्रशस्ति के अनेक काव्य परंपराके अनुसार समझने चाहिये।
६०) एक बार राजाने सेवामें ढील-ढाल होनेका कारण पंडितसे पूछा । उसने अपनी तिलक
मंजरी [ नामक कथा ] की रचनाको व्यग्रताका कारण बताया। शीतकालकी एक रात्रिके अन्तिम प्रहरमें
राजाको कोई विनोद नहीं मिल रहा था। उसने पंडितको बुला कर, स्वयं उसकी उस तिलक मंजरी कथाको
पढ़ने लगा और पंडित उसकी व्याख्या करने लगा। राजाने उसके 'रस' के गिरनेके भयसे उसके नीचे
सोनेकी थालीमें कचोलक (कटोरा) रखा और इस तरह [ बड़े चावके साथ ] समाप्त किया। उस अद्भुत
काव्यसे चित्तमें चमत्कृत होकर राजाने कहा कि-'यदि मुझे इस काव्यका कथानायक बनाओ और विनीता
के स्थानमें अवन्ती का नाम रखो, तथा शक्रावतारतीर्थकी जगह महाकाल को उल्लिखित करो तो जो माँगो
वही मैं तुम्हें दूंगा।' राजाके ऐसा कहने पर उसने कहा कि-जिस प्रकार खद्योत और सूर्यमें, सरसों और
सुमेरुमें, काच और काञ्चनमें, तथा धतूरे और कल्पवृक्षमें महान् अन्तर है उसी तरह तुममें और उनमें है।
ऐसा कहता हुआ-
१०२. हे दो मुँहवाली, निरक्षर, लोहेकी तराजू ! तुझे क्या कहूँ ² जो तू गुनाके साथ सोनेको तोलते
समय पाताल नहीं चली गई।
इस प्रकार जब पंडित झिड़क रहा था, तो राजाने उस मूल प्रतिको जलती आगमें इन्धन बना दिया।
इस प्रकार वह द्विधा निर्वेद * होकर और द्विधा अवाङ्मुख × होकर अपने मकानके पिछले भागमें एक पुराने
मञ्चपर जा बैठा और नीसासें डालता हुआ लगा होकर सो गया। बालपंडिता ऐसी उसकी लड़कीने उस
भक्तिपूर्वक उठाकर स्नान-पान-भोजन आदि कराके, तिलकमञ्जरीकी प्रथम प्रतिके लेखनका स्मरण कर करके
आधा ग्रंथ लिखा दिया। फिर पण्डितने उत्तरार्द्ध नया लिखकर ग्रंथ संपूर्ण किया।
[ यहाँ पर इसके आगे Pb आदर्शमें निम्न लिखित कथन पाया जाता है-]
पंडितने ग्रंथ संपूर्ण किया और फिर रुष्ट होकर नानागाँव में चला गया। एक बार भोजकी सभामें धर्म
नामक वादी आया। उस समय वहाँ ऐसा कोई विद्वान् नहीं था, जो उसके साथ प्रतिवाद करनेका साहस करता।
* द्विधा निर्वेदका मतलव दोनों तरहसे निर्वेद हुआ। १ निर्वेद=खिन्न हुआ २ निर्वेद=ज्ञानशून्य हुआ।
× द्विधा अवाङ्मुख १=नीचा मुखवाला, २=वाणीशून्य मुखवाला।