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फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

४३२ फलदीपिका
है कि जहाँ एक से अधिक पत्नियाँ होने के योग बताए गये हैं
वहाँ एक से अधिक पति होने का योग केवल उसी समाज की स्त्रियों
को लागू होगा जिसमें बहु विवाह (जैसे पर्वतीय प्रदेशों में एक स्त्री
के कई पति होते हैं) या जहाँ विधवा विवाह होता है वहीं लागू होगा।
हिन्दू पुरुषों की कुण्डली में भी (अब एक पत्नी के रहते हुये पुरुष
दूसरा विवाह नहीं कर सकता इस कारण) बहुत से योग अब लागू
नहीं होंगे और बहुत सी जगह जहाँ बहुविवाह के योग दिये गये
हैं विवाह न होकर एक से अधिक स्त्री से जातक का सम्बन्ध हो
ऐसा योग घटित हो सकता है। प्राचीन ग्रन्थों में लिखे हुये
फल, देश, काल, पात्र भेद से बदलते रहते हैं।
१. यदि सातवें घर का मालिक शुक्र के साथ हो और क्रूर

  • सम्बन्ध से रहित हो (सम्बन्ध चार प्रकार के होते हैं, दो ग्रहों का
    एक साथ बैठना, एक-दूसरे की राशि में बैठना, एक-दूसरे को पूर्ण
    दृष्टि से देखना, किसी ग्रह की राशि में बैठ कर उस ग्रह को पूर्ण
    दृष्टि से देखना) तो एक ही स्त्री होती है।
    २. यदि सातवें घर का मालिक पाप ग्रह से सम्बन्ध करे या
    दूसरे या सातवें घर में पाप ग्रह हों, या शुक्र लाभ में हो या नीच का
    हो या सातवें घर का मालिक छठे या बारहवें हों तो दूसरा विवाह
    होता है।
    ३. यदि लग्न में पाप ग्रह हो तो दूसरा विवाह हो।
    ४. यदि मंगल और शुक्र एक साथ दूसरे, चौथे, सातवें, आठवें
    या बारहवें घर में बैठे हों और शुक्र कमजोर हो तो द्वितीय विवाह
    हो।
    ५. यदि मंगल दूसरे, चौथे, सातवें, आठवें या बारहवें हो तो
    भी दो विवाह होते हैं।
    अन्य शास्त्रों में इसे मंगलीक दोष कहा गया है। इसलिए
    यदि जातक की स्त्री भी मंगलीक हो तो वह ज़िन्दा रहेगी और

बीसवाँ अध्याय : अन्तर्दशाफल ४३३
पुरुष का दूसरा विवाह नहीं होगा, इस सामान्य सिद्धांत को नहीं
भूलना चाहिए ।
६. यदि बृहस्पति दूसरे घर में हो और जन्म कुण्डली में
एक से अधिक विवाह का योग हो तो दूसरा विवाह प्रौढ़ावस्था
में होता है ।
७. यदि शनि दूसरे घर में हो और राहु सातवें घर में हो
तो दो विवाह होते हैं ।
८. यदि दूसरे व सातवें घर के मालिक या शुक्र दूसरे या
सातवें घर में हों और दूसरे और सातवें घरों पर शुभ ग्रहों की
दृष्टि हो तो जितने शुभ ग्रहों की दृष्टि हो उतनी पत्नियाँ हों या
उतनी स्त्रियों से सुख हो लेकिन यदि क्रूर ग्रह से युक्त ये स्थान
या शुक्र हो तो यह योग घटित नहीं होता ।
९. यदि शनि और शुक्र सप्तम में हों तो जातक अपनी स्त्री
में आसक्त रहता है ।
१०. यदि सप्तम में बुध हो तो पर स्त्री में आसक्त हो ।
११. यदि सातवें घर में बृहस्पति हो तो जातक की स्त्री पति-
परायणा हो ।
१२. यदि दूसरे, सातवें और दसवें घर के मालिक चौथे घर
में हों तो जातक पर-स्त्रियों में आसक्त हो ।
१३. सातवें घर में राहु हो तो जातक निपुण हो ।
१४. सातवें घर में केतु हो तो जातक की पत्नी धूर्ता हो ।
आयु-आरोग्य तरंग
१. सम्पत्ति, शरीर स्वास्थ्य और पुत्रों का कारक बृहस्पति
होता है ।
२. यदि बृहस्पति लग्नेश के साथ हो तो उत्तम आयु होती है ।

४३४ फलदीपिका
३. यदि आयु कारक शनि का आठवें घर के स्वामी से
सम्बन्ध हो तो दीर्घायु हो ।
४. आठवें घर में शनि हो तो दीर्घायु हो ।
५. यदि आठवें घर का स्वामी केतु के साथ लग्न में हो तो
अल्पायु हो ।
६. पिता का कारक सूर्य यदि नवम घर के स्वामी से सम्बन्ध
करे तो पिता की दीर्घायु हो ।
७. नवें घर में सूर्य हो तो पिता स्वल्पायु हो ।*
८. चौथे घर में चन्द्रमा हो तो माता अल्पायु हो ।
९. यदि सूर्य और नवें घर के मालिक दोनों नवें घर में बैठे
हों तो पिता अल्पायु हो । किन्तु यदि नवें घर का मालिक ग्यारहवें में
हो तो पिता दीर्घायु हो ।
१०. तीसरे घर में मंगल हो तो भाई अल्पायु हों। तीसरे घर
में बृहस्पति हो तो भाइयों के लिए कष्टकारक होता है।
११. यदि धनु या मीन राशि का बृहस्पति तीसरे घर में हो
तो जातक के केवल एक ही भाई होता है।
१२. पंचम में बृहस्पति पुत्र की आयु में कमी करता है।
१३. सातवें घर में शुक्र हो तो पत्नी की आयु कम करता है।
नोट :-- ऊपर लिखे हुये योगों का निष्कर्ष यह है कि जिस
भाव का जो कारक है उस भाव में यदि वह कारक बैठा हो तो
शुभ फल में कमी करता है । केवल शनि के विषय में यह बात
लागू नहीं होती क्योंकि वह आयु का कारक है और आठवें घर में
बैठकर आयु को बढ़ाता है ।
*दक्षिण भारत में पिता का विचार नवम घर से किया जाता है।
पिता का कारक सूर्य है । इसलिये कारक के (जिस स्थान का वह कारक
है) उस स्थान मे बैठने से यह दोष हुआ ।

बीसवाँ अध्याय : अन्तर्दशाफल ४३५
१४. यदि चन्द्रमा और चौथे घर का मालिक—५वें, ९ वें,
१०वें, ११वें, इनमें से किन्हीं घरों में हों (यह ज़रूरी नहीं कि
चन्द्रमा और चौथे घर का मालिक एक ही घर में हों) तो जातक
की माता दीर्घायु होती है। यदि चतुर्थेश का चन्द्रमा से सम्बन्ध हो तो
भी माता दीर्घायु हो।
१५. यदि मूल त्रिकोण अंशों में सूर्य सिंह में, मंगल मेष में,
बुध कन्या में, बृहस्पति धनु में, शुक्र तुला में या शनि कुम्भ में चौथे
घर में बैठा हो तो माता दीर्घायु होती है। चौथे का मालिक
चौथे में हो तो भी माता के लिए अच्छा है किन्तु यदि चौथे
का मालिक मूल त्रिकोण अंशों में हो तो बहुत उत्तम है। किन-किन
अंशों तक मूल त्रिकोण होते हैं और किन अंशों में स्वराशि होती है
यह अध्याय १ श्लोक ७ की व्याख्या में बताया जा चुका है।
१६. यदि चौथे घर का मालिक और चन्द्रमा प्रबल स्थान में
बैठे हों किन्तु यदि चन्द्रमा क्षीण हो (कृष्ण पक्ष की दशमी से शुक्ल
पक्ष की पंचमी तक चन्द्रमा क्षीण समझा जाता है*) और उन पर
शनि की दृष्टि हो तो माता अल्पायु होती है।
भाग्य योग तरंग
अब भावार्थ रत्नाकर के अनुसार कतिपय भाग्य योग दिये जा
रहे हैं :—
१. यदि नवें का मालिक ग्यारहवें हो और ग्यारहवें का मालिक
नवें में हो या नवें और ग्यारहवें के मालिक में सम्बन्ध हो।
२. यदि दो-दो ग्रह एक-एक राशि में इस प्रकार बैठे हुए हों
कि चार राशि में आठ ग्रह आ जावें।

  • एक अन्य मत से कृष्ण चतुर्दशी और अमावास्या को चन्द्र
    क्षीण होता है।

४३६ फलदीपिका
३. यदि छः ग्रह तीन राशियों में, दो-दो एक साथ बैठे हों।
४. यदि चारों शुभ ग्रहों को (बुध, बृहस्पति, शुक्र और शुक्ल
पक्ष का चन्द्रमा) पाप ग्रह देखते हों तो बहुत भाग्यशाली तो नहीं
होता लेकिन धन योग होता है।
५. यदि तीसरे, छठे और ग्यारहवें क्रूर ग्रह बैठे हों।
६. यदि कोई ग्रह लग्न से बारहवें घर में बैठा हो तो उस
भाव का भाग्य उदय करता है जिस भाव का वह कारक है।
किस भाव का कौन सा ग्रह कारक होता है यह इस पुस्तक में पहिले
बताया जा चुका है।
७. यदि चौथे घर का मालिक, शुक्र और सातवें और नवें
घर के मालिक नवें या ग्यारहवें इन दोनों घरों में (चाहे चारों एक
साथ बैठे हों चाहे कुछ नवें कुछ ग्यारहवें बैठे हों) और शनि से
सम्बन्ध करते हों तो शनि की दशा और अन्तर्दशा में अच्छा लाभ
होता है और सवारी प्राप्त होती है।
८. यदि पहले, चौथे और नवें और दसवें घरों के मालिक पहले
सातवें या दसवें घर में बैठे हों--चारों ग्रहों का इन तीनों केन्द्रों में से
किसी एक केन्द्र में एक साथ बैठना आवश्यक है तो उनकी दशा
और अन्तर्दशा में बहुत भाग्य उदय होता है।
९. यदि कोई ग्रह पाँचवें अथवा नवें घर में उच्च राशि का
होकर बैठा हो तो भाग्य उदय होता है।
१०. यदि सूर्य, बुध और शुक्र, पाँचवें हों और बृहस्पति
ग्यारहवें हों तो बुध की दशा में विशेष धनागम होता है।
११. यदि नवें घर का मालिक और सूर्य दोनों एक साथ लग्न
से बारहवें घर में हों तो पिता के ज़रिये भाग्य उदय होता है।
१२. यदि सूर्य मेष राशि का हो तो जातक के पिता का भाग्य
बढ़ता है।

बीसवाँ अध्याय : अन्तर्दशाफल ४३७
१३. यदि तुला का सूर्य हो तो जातक के पिता की भाग्य हानि
होता है।
१४. यदि जातक धनु लग्न हो तो जातक का अपने पिता के
जरिये भाग्य उदय होगा। या जातक के पिता का भाग्य उदय होगा।
चाहे तुला का सूर्य हो इस योग में फर्क नहीं होता।
१५. यदि (i) सूर्य और नवें का मालिक और बारहवें का मालिक
यह तीनों बारहवें घर में हों या (ii) बृहस्पति और बारहवें घर के
मालिक बारहवें घर में हों तो जातक के पिता का भाग्य उदय
होता है।
१६. यदि बारहवें घर में शुक्र हो तो कलत्र भाग्य अर्थात्
अपनी पत्नी के कारण भाग्य उदय होता है।
१७. यदि चन्द्रमा बारहवें घर में हो तो माता के कारण भाग्य
उदय होता है।
१८. यदि मंगल बारहवें हो तो भ्रातृ भाग्य (भाइयों के सम्बन्ध
में भाग्यशाली या भाई के कारण भाग्य उदय)।
१९. यदि नवें घर का मालिक बारहवें घर में हो तो पिता का
भाग्य उदय या पिता के कारण जातक का स्वयं का भाग्य उदय
होता है।
२० यदि नवें घर का मालिक सातवें में हो और सातवें घर का
मालिक नवम में हो तो अपनी पत्नी के कारण भाग्य उदय होता है।
२१. यदि दूसरे घर के मालिक और बुध छठें में बैठे हों तो
जाति वालों का (चचेरे भाई आदि सम्बन्धी का) धन प्राप्त होता है।
२२. यदि केवल बुध छठे हो तो भी यही फल है।
२३. यदि पाँचवें घर का मालिक और बृहस्पति दोनों अपनी
अपनी उच्च राशि में हो तो उसके बच्चे भाग्यशाली होते हैं।

४३८ फलदीपिका
राजयोग तरंग
नीचे कुछ राजयोग दिये जाते हैं ।
१. यदि (i) दूसरे घर का मालिक दूसरे घर में हो और
पाँचवें घर का मालिक पाँचवें घर में हो या (ii) दूसरे का मालिक
नवें और पाँचवें का मालिक दसवें घर में हों तो राजयोग है।
२. यदि दूसरे और ग्यारहवें घर के मालिक दोनों एक साथ
दसवें घर में हों और दोष से रहित हों तो उनकी दशा में राजयोग
होता है । दोष दो प्रकार के होते हैं: (i) एक तो छठे आठवें आदि
दुःस्थानों के स्वामियों से सम्बन्ध और (ii) दूसका नीच राशि या
शत्रु राशि में बैठना, अस्त होना आदि ।
३. यदि राहु चौथे, पाँचवें, दसवें या ग्यारहवें बैठा हो तो अपनी
दशा या अन्तर्दशा में राजयोग देता है ।
४. यदि केतु तीसरे घर में हो तो निश्चय ही योग देने वाला
होता है ।
५. यदि केतु पाँचवें या नवें घर में हो तो शुभ नहीं होता ।
निश्चय ही दोष कारक होता है !
६. यदि चन्द्रमा और शुक्र दोनों एक साथ तीसरे घर में हों
तो शुक्र योग देता है । शुक्र की दशा में इसका विशेष फल होगा ।
७. यदि दसवें घर का मालिक तीसरे या ग्यारहवें घर में हो
तो जीवन भर राजयोग नहीं होता, कभी किसी काल में राजयोग हो
जावेगा। पंडित जवाहरलाल जी की कुण्डली में यह लागू नहीं होता ।
९. यदि नवें घर का मालिक आठवें घर में हो तो उसकी दशा
में योग नहीं होता । लेकिन यदि नवें घर का मालिक बृहस्पति हो
और वह आठवें में हो तो भाग्य उदय होता है ।
१०. यदि आठवें और नवें घर के मालिकों का सम्बन्ध हो
तो आठवें घर के मालिक की दशा में योग होता है । सम्बन्ध चार

बीसवाँ अध्याय : अन्तर्दशाफल ४३९
प्रकार के होते हैं, दो ग्रहों का एक साथ एक घर में बैठना, एक-
दूसरे को पूर्ण दृष्टि से देखना इत्यादि जो अन्यत्र बताया गया है ।
११. यदि आठवें और नवें घर के मालिक का सम्बन्ध हो तो
नवें घर के मालिक की दशा में योग नहीं होगा । किन्तु अष्टमेश
की अन्तर्दशा में योग होता है।
१२. यदि दसवें तथा ग्यारहवें घर के स्वामियों का सम्बन्ध
हो तो ग्यारहवें घर के मालिक की दशा में राजयोग होगा ।
१३. यदि दसवें और ग्यारहवे घर के मालिकों का सम्बन्ध
हो तो दसवें घर के मालिक की दशा में साधारण स्थिति रहेगी अर्थात्
न बहुत अच्छा और न बहुत खराब ।
१४. यदि शुक्र दशम में हो तो उसकी दशा में कोई योग
नही होता ।
१५. यदि शनि सातवें घर में हो तो उसकी दशा में राजयोगं
होता है।
१६. यदि सातवें घर में राहु हो तो निश्चय ही योग देने
वाला होता है।
१७. यदि शनि तीसरे या नवें घर में हो तो योग देता है ।
१८. यदि तीसरे, आठवें या नवें घर में बृहस्पति हो तो योग
देता है ।
१९. यदि बृहस्पति बारहवें घर में हो तो जातक मृत्यु--इस
जीवन-के बाद देवलोक (स्वर्ग) प्राप्त करता है।
२०. यदि भाग्य (९) और राज्य (१०) के मालिक राज्य
या भाग्य में बैठे हों तो बहुत उत्तम राजयोग होता है और बहुत
यश प्राप्त होता है।
२१. यदि नवें घर का मालिक दसवें हो और दसवें घर का
मालिक नवें में तो भी वही फल जो नं० २० में बताया गया है।

४४० फलदीपिका

२२. यदि दसवें घर का मालिक दसवें; नवें घर का मालिक
नवें, हो तो भी वही फल जो ऊपर २० में दिया गया है ।
२३. यदि दसवें और पाँचवें घर के मालिक दोनों, एक-एक
या एक साथ दसवें या पाँचवें घर में बैठे हों तो राज योग और यश
होता है ।
२४. यदि नवें और दसवें घर के मालिक सातवें और पहले
घर में बैठे हों तो राज योग और यश प्राप्त करता है ।
२५. यदि पाँचवें, सातवें और दसवें के मालिक केन्द्र और
कोण में हों तो जातक को राज योग और यश प्राप्त होता है।
महादशा-फल तरंग
अब महादशा सम्बन्धी कुछ योग बताये जाते हैं ।
१. शुक्र की महादशा में शनि का अन्तर या शनि की महादशा
में शुक्र का अन्तर हो तो जातक योगहीन हो जाता है अर्थात् यह
अन्तर्दशा कष्टकारक होती है।
२. जिन व्यक्तियों का धनु या मीन लग्न में जन्म हो उनकी
शनि की दशा में शुक्र की अन्तर्दशा में शनि उत्तम फल करता
है और शुक्र की महादशा में शनि अच्छा फल देता है ।
३. यदि आठवें घर का मालिक छठे, आठवें या बारहवें घर
में बैठा हो और उसकी महादशा हो तो छठे आठवें या बारहवें घर
के मालिक की अन्तर्दशा में मारक फल होगा ।
४. यदि तीसरे तथा दसवें घर के मालिकों का सम्बन्ध हो तो
दसवें घर के मालिक की दशा में योग नहीं होता बल्कि अवयोग होता
है । किन्तु तीसरे घर के मालिक की दशा में उत्तम योग होता है ।
५. यदि (i) कोई ग्रह लग्न या सातवें घर में हो या (ii)
नवें घर का मालिक सातवें घर में हो तो ऐसे ग्रह की दशा में
जातक अपने पुरुषार्थ से धन कमाता है ।

बीसवाँ अध्याय : अन्तर्दशाफल ४४१
६. यदि राहु की महादशा हो तो उसमें राहु केतु-शनि या
सूर्य की अन्तर्दशा में पिता की मृत्यु हो सकती है ।
७. यदि केतु की दशा हो तो उसमें मंगल, शनि, सूर्य या
राहु की अन्तर्दशा जातक के पिता की मृत्यु कर सकती है ।
८. यदि मंगल की दशा हो तो उसमें राहु, केतु या शनि की
अन्तर्दशा में जातक के पिता का मरण हो सकता है ।
९. यदि शनि की महादशा हो तो उसमें राहु, केतु, सूर्य या
मंगल की अन्तर्दशा में पिता का मरण हो सकता है ।
१०. मंगल की महादशा का अन्त हो और राहु प्रारम्भ होने
वाला हो तो पिता की मृत्यु हो सकती है ।
११. यदि क्रूर ग्रह की महादशा हो और उसमें राहु की
अन्तर्दशा हो तो पिता की मृत्यु हो सकती है ।
१२. यदि बृहस्पति और शुक्र वृश्चिक में हों और शुक्र की दशा
आवे तो शुक्र दशा राजयोग कारक होती हैं, इसमें संशय नहीं है ।
१३. यदि सूर्य और बुध एक साथ हों या कन्या का सूर्य, सिंह
का बुध हो तो बुध की दशा प्रबल होती है; सूर्य की दशा मध्यम
होती है ।
१४. यदि चन्द्रमा और मंगल का सम्बन्ध हो तो चन्द्र की दशा
बहुत योग देने वाली होती है, मंगल की दशा मध्यम होती है ।
१५. यदि बृहस्पति और शनि का सम्बन्ध हो तो शनि की
दशा विशेष योग प्रदान करने वाली होती है; बृहस्पति की महादशा
मध्यम होती है ।
१६. यदि मंगल और बृहस्पति का सम्बन्ध हो तो मंगल की
दशा उत्तम होती है, बृहस्पति की दशा मध्यम होती है ।
१७. यदि चन्द्रमा और बृहस्पति का सम्बन्ध हो तो चन्द्र दशा
विशेष योग प्रदान करने वाली होती है, बृहस्पति की दशा मध्यम
होती है ।

४४२ फलदीपिका
१८. यदि राहु केन्द्र या कोण में हो तो स्वतंत्र राजयोग है ।
जातक को बहुत यश प्राप्त होता है ।
१९. यदि बुध, बृहस्पति और शुक्र का सम्बन्ध हो तो यह
विशेष धन योग है, जातक भाग्यवान् और यशस्वी होता है ।
२०. यदि शुक्र का बुध या बृहस्पति से सम्बन्ध हो, शुक्र की
दशा में धन योग होता है । बृहस्पति की दशा में जातक धन हीन होता
है और बुध की दशा मिला जुला फल देती है अर्थात् कभी धनागम
कभी धन की हानि ।
२१. यदि सूर्य किसी ग्रह के साथ हो तो सूर्य की दशा में
धनागम, अन्य ग्रह मध्यम फल देता है ।
२२. यदि राहु का अन्य ग्रहों से सम्बन्ध हो तो जो ग्रह सबसे
प्रबल होगा राहु उसका फल देगा ।
२३. यदि राहु, सूर्य और शनि एक साथ तृतीय में हों तो
राहु की दशा, अन्तर्दशा पराक्रम और भाग्योदय करती है ।
२४. यदि बुध तृतीय में हो तो राहु की दशा में जातक धैर्य
हीन (कातर, या डरपोक) हो जाता है ।
ग्रह सामान्य योग तरंग
१. यदि किसी भाव का स्वामी-उस भाव के कारक से संयुक्त
हो तो उस भाव की प्रबलता होती है अर्थात् वह भाव पुष्ट होता है।
किस भाव का कौन सा कारक होता है यह फलदीपिका के अध्याय १५
श्लोक १७ में बताया गया है। उदाहरण के लिये पंचम कारक बृहस्पति
है और सप्तम कारक शुक्र है। यदि पंचमेश बृहस्पति के साथ हो
या सप्तमेश शुक्र के साथ हो तो पंचम भाव या सप्तम भाव पुष्ट
होगा ।

बीसवाँ अध्याय : अन्तर्दशाफल ४४३
२. तृतीय, अष्टम या ग्यारहवें घर का स्वामी होना. दोषयुक्त
होता है । पंचम या नवम का स्वामी होना शुभ होता है ।
३. तीसरे, छठे या आठवें का मालिक होने से बृहस्पति दोष-
युक्त हो जाता है लेकिन आठवें घर का मालिक होने पर भी यह योग
देने वाला होता है ।
४. यदि शुक्र छठे स्थान में हो तो योग देने वाला होता दे ।
१२वें घर में भी शुक्र का यही फल है ।
५. राहु यदि चतुर्थ, पंचम, दशम या एकादश में हो तो योग देता
है ऐसा उत्तम ज्योतिषियों ने कहा है ।
६. यदि सौम्य ग्रह केन्द्र के स्वामी हों तो योग नहीं देते । केन्द्र
में स्थित केन्द्रनाथ यदि क्रूर हों तो राजयोग देते हैं ।
७. जिस भाव में शनि स्थित हो या जिस भाव को शनि
देखता हो उस भाव की न्यूनता होती है । किन्तु शनि तृतीय या
नवम को देखे तो उस भाव की (जिस को देखता हो) प्रबलता
होती है ।
८. यदि क्षीण चन्द्रमा लग्न में हो तो जातक मन्द बुद्धि होता
है और अन्य लोगों से पोषित होता है । यदि पूर्ण चन्द्र लग्न में हो
तो जातक गुणवान्, भाग्यवान् होता है।
९. यदि चन्द्रमा और मंगल लग्न में हों या चन्द्रमा और मंगल
अष्टम में हों तो जातक भाग्यवान् होता है ।
१०. मंगल यदि चतुर्थेश के साथ हो तो निश्चय स्थावर सम्पत्ति
(खेत, मकान) का मालिक होता है ।
११. यदि चौथे घर के स्वामी के साथ वृहस्पति चौथे घर में
हो तो वह गाय आदि चौपायों का मालिक होता है ।

४४४ फलदीपिका
१२. जो भाव, भावेश या कारक पाप ग्रहों के मध्य में हो
वह भाव, भावेश या कारक दुःखदायक होता है ।
१३. यदि ग्यारहवें और बारहवें भावों के स्वामियों का सम्बन्ध
हो तो योग प्रद होता है ।
१४. ग्यारहवें घर का स्वामी यदि तीसरे घर या बारहवें घर
में हो तो योग प्रद होता है ।
१५. कोई भी लग्न हो, यदि भाग्येश (नवें घर का मालिक)
आठवें घर में हो तो योग प्राप्त नहीं होता, जातक सामान्य स्थिति
में रहता है ।
१६. यदि चन्द्रमा छठे हो तो जातक की बुद्धि कुशल होती
है । यदि द्वितीय में हो तो उसके नेत्र चंचल हों ।
ग्रह मालिका योग
१. यदि नौ ग्रह लग्न से नवम भाव तक, प्रत्येक भाव में एक
ग्रह हो तो मालिका योग होता है ।
२. यदि लग्न से छठे स्थान तक सब ग्रह हों तो “षष्टखेट
मालिका” योग होता है ।
३. यदि लग्न से सातवें घर तक—सातों भावों में सब
ग्रह प्रत्येक भाव में कोई ग्रह होना चाहिये—तो मालिका योग
होता है ।
४. यदि सब ग्रह लग्न से अष्टम भाव तक (प्रत्येक भाव में
ग्रह होना चाहिये) हों तो हो “अष्ट खेचर माला योग” होता है ।
५. बहुत से जपोतिषियों की राय है कि सूय राशि से प्रारंभ-
मालिका योग उत्तम योग है ।

बीसवाँ अध्याय : अन्तर्दशाफल ४४५
कर मालिका योग होता है; अन्य ज्योतिषियों के विचार से लग्न
से ही प्रारंभ करने से मालिका योग होता है।
६. यदि लग्न से ६, ७, ८ ओर ९ में सब ग्रह हों तो भाग्यप्रद
योग होता है।
७. यदि लग्न से ५वें घर तक सब भावों में ग्रह हों और
सब ग्रह इन पाँचों भावों में आ जावें तो भी भाग्य योग होता है।
दो स्थानों के अधिपतियों के फल में क्रम
१. जो ग्रह समराशि में होते हैं--वे पहले अपनी मूल त्रिकोण
राशि का फल देते हैं--फिर अपनी दूसरी राशि का। उदाहरण के
लिये शनि यदि समराशि, वृषभ, कर्क कन्या, वृश्चिक या मीन में
हो तो अपनी दशा, अन्तर्दशा के पूर्वार्द्ध में अपनी मूल त्रिकोण राशि
अर्थात् कुंभ का फल देगा और अपना उत्तरार्द्ध (दशा, अन्तर्दशा के
काल को यदि दो हिस्सों में बाँटा जावे--तो बाद के आधे काल में)
अपनी दूसरी राशि का-अर्थात् मकर का फल देगा।
उदाहरण के लिये किसी जातक का मिथुन लग्न है-शनि आठवें
तथा नवें का मालिक हुआ। आठवें घर में मकर राशि है। नवें
घर में कुंभ राशि है तो मान लीजिये शनि कन्या राशि में है।
अगले पृष्ठ पर देखिये सेठ रामकृष्ण जी डालमिया की जन्म कुण्डली।
जन्म ता० ७ अप्रैल सन् १८९३।
कन्या राशि का शनि सम राशि में है। इसलिये शनि अपनी
मूल त्रिकोण राशि कुंभ के स्वामित्व का फल पहिले आधे काल में
करेगा और मकर के स्वामित्व का फल बाद के आधे काल में ।

४४६ फलदीपिका
यदि ग्रह ओज (ऊनी राशि में हो। तो मूल त्रिकोण राशि
[कुंडली: लग्न ३; द्वितीय ४; तृतीय ५; चतुर्थ ६ श; पंचम ७ कें; षष्ठ ८; सप्तम ९ चं ०; अष्टम १०; नवम ११; दशम १२ बु. सू. शु.; एकादश १ बृ.; द्वादश २ मं ०] के स्वामित्व का फल उत्तरार्द्ध में
करेगा और अपनी अन्य राशि के
स्वामित्व का फल पूर्वार्द्ध में। उदा
हरण के लिये बृहस्पति मेष में है।
मेष ओज (या ऊनी राशि है) इस
कारण अपनी मूल त्रिकोण राशि
धनुष के स्वामित्व का प्रभाव
उत्तरार्द्ध में दिखलावेगा और अपनी
स्वराशि मीन का प्रभाव पूर्वार्द्ध में। वैसे तो मंगल, बुध, बृहस्पति,
शुक्र, शनि-इन पाँचों की दो-दो राशि स्वराशि होती है किन्तु समझाने
के लिये--एक को मूल त्रिकोण राशि दूसरी को स्व राशि इन शब्दों
में समझाया।
मारक तरंग
१. व्ययेश की दशा में धनेश मारक होता है। द्वितीयेश की दशा
में व्ययेश मारक हो सकता है।
२. व्ययेश की दशाकाल के द्वितीयेश के साथ रहने वाले अथवा
द्वितीयेश से दृष्ट ग्रह मारक हो सकते हैं।
३. द्वितीयेश की दशा में, व्यय में बैठे हुए और व्ययेश से दृष्ट
ग्रह मारक हो सकते हैं।
४. व्ययेश की दशा में, व्यय में बैठे हुए पाप ग्रह अपनी अन्तर्दशा
में मारक हो सकते हैं।
५. द्वितीय स्थान में पापग्रह हों और व्ययेश के साथ हों तो
व्ययेश की दशा में, यह पाप ग्रह मारक हो सकते हैं।
६. व्यय में पापी ग्रह हो तो उसकी दशा में द्वितीयेश से
सम्बन्धित पाप ग्रह की अन्तर्दशा मारक हो सकती है।

बीसवाँ अध्याय : अन्तर्दशाफल ४४७
७. अष्टमेश की दशा में स्वयं उसकी अन्तर्दशा मारक हो
सकती है।
८. अष्टमेश की दशा में—षष्ठ स्थान स्थित पापी की दशा मारक
हो सकती है।
९. षष्ठेश की महादशा में, अष्टम में स्थित ग्रह की अन्तर्दशा
मारक हो सकती है।
१०. अष्टमेश की दशा में, अष्टमेश से दृष्ट ग्रह की अन्तर्दशा
मारक हो सकती है।
११. अष्टमेश की दशा में षष्ठेश के साथ बैठे हुए ग्रह की दशा
मारक हो सकती है।
१२. अष्टम स्थान में पाप ग्रह हो तो उसकी दशा में षष्ठेश की
अन्तर्दशा मारक हो सकती है।
१३. षष्ठेश की महादशा में अष्टमेश की अन्तर्दशा मारक हो
सकती है।
१४. षष्ठ स्थान में पाप ग्रह हो तो उसकी दशा में अष्टम स्थान
स्थित ग्रह की अन्तर्दशा मारक हो सकती है।
१५. षष्ठेश की दशा में—अष्टमेश की अन्तर्दशा मारक हो
सकती है।
१६. अष्टम में पाप ग्रह हो तो उसकी दशा में—षष्ठ स्थान
स्थित पाप ग्रह की अन्तर्दशा मारक हो सकती है।
यह जो षष्ठेश, अष्टमेश या व्ययेश या षष्ठ, अष्टम द्वादश स्थित
ग्रहों के मारकेश होने के नियम बतलाये हैं उन्हें निम्नलिखित रूप से
अच्छी तरह समझा जा सकता है। उपर्युक्त योगों का निष्कर्ष यह
निकला कि मारक ग्रह की दशा, अन्तर्दशा, निश्चित करने के लिये
नियमों का सार यह है :—
(i) अष्टमेश की महादशा में :—
(क) अष्टमेश की अन्तर्दशा (ख) षष्ठ स्थान स्थित

४४८ फलदीपिका
पापी ग्रहों की अत्तर्दशा (ग) षष्ठेश से युक्त ग्रह की
अन्तर्दशा (घ) अष्टमेश से वीक्षित ग्रह की अन्तर्दशा ।
(ii) अष्टम स्थान स्थित यदि पापी ग्रह हो तो उसकी महा-
दशा में :—
(क) षष्ठेश की अन्तर्दशा (ख) षष्ठ स्थान स्थित पापी
की अन्तर्दशा ।
(iii) षष्ठेश की महादशा में :—
(क) अष्टमेश की अन्तर्दशा (ख) अष्टम स्थान स्थित
ग्रह की अन्तर्दशा ।
(iv) षष्ठ स्थान स्थित पाप ग्रह की दशा में :--
(क) अष्टमेश की अन्तर्दशा । अष्टमेश अष्टम में हो
तो भी उसकी अन्तर्दशा ।
(v) व्ययेश की महादशा में :—
(क) धनेश की अन्तर्दशा (ख) द्वितीयेश के साथ बैठे
हुए ग्रह की अन्तर्दशा (ग) द्वितीयेश से दृष्ट ग्रह की
अन्तर्दशा (घ) व्यय में बैठे हुए पाप ग्रह की अन्तर्दशा
(ङ) व्ययेश के साथ द्वितीय में बैठे हुए पाप ग्रह की
अन्तर्दशा ।
(vi) व्यय में पापी ग्रह हो तो उसकी महादशा :--
(क) द्वितीयेश से सम्बन्धित पाप ग्रह की अन्तर्दशा ।
(vii) द्वितीयेश की महादशा में :--
(क) व्ययेश की अन्तर्दशा (ख) व्यय में बैठे हुए और
व्ययेश से दृष्ट ग्रह की अन्तर्दशा ।
मारक निर्णय करने के लिये मारक तरंग में अन्य योग निम्न-
लिखित हैं :—
१७. यदि बुध और शुक्र दोनों एक साथ पंचम में हों तो एक

बीसवां अध्याय : अन्तर्दशाफल ४४९
दूसरे की महादशा, अन्तर्दशा में मारक हो सकते हैं। बुध में शुक्र,
शुक्र में बुध। आधिपत्य का विचार भी कर लेना चाहिये।
१८. यदि मंगल मारक स्थान या अनिष्ट का स्वामी हो (मूल
श्लोक में लिखा है कि यदि मंगल को क्रूराधिपत्य हो) तो मंगल की
दशा मारक होती है।
१९. चाहे शनि अच्छे घरों का मालिक हो यदि मारक ग्रह
के साथ हो तो प्रबल मारक होता है।
२०. यदि अष्टमेश लग्न में हो तो अपनी महादशा में मारक
होता है।
२१. यदि किसी व्यक्ति के दो या तीन पुत्रों को राहु की महा-
दशा जा रही हो तो जातक का निधन होता है।
उपर्युक्त महादशा तथा अन्तर्दशा के साथ-साथ दीर्घायु, मध्यायु,
अल्पायु योगों के आधार पर मृत्यु की संभावना का भी विचार कर
लेना चाहिये। अन्यथा षष्ठ, अष्टम, व्यय स्थित किंवा इन भावों के
स्वामियों की दशा, अन्तर्दशा आती जाती ही रहती है। मृत्यु नहीं
होती। धन आदि की कमी कर देती है। या शत्रु रोग आदि से पीड़ा
होती है।
ग्रंथकार श्री रामानुज का कहने का अभिप्राय यह है कि छठा,
आठवां, बारहवां दुःस्थान है। इनके स्वामी और इन भावों में बैठे
पापी ग्रह कष्ट कारक होते हैं।
जातक चन्द्रिका के मत से निम्नलिखित ग्रह मारक होते हैं :—
(i) दूसरे घर का मालिक।
(ii) दूसरे घर में बैठे हुए पाप ग्रह।
(iii) सातवें घर का मालिक।
(iv) सातवें घर में बैठे हुए पाप ग्रह।
(v) दूसरे घर के मालिक से युत पाप ग्रह।
(vi) सातवें घर के मालिक से युत पाप ग्रह।

४५० फलदीपिका
(vii) अष्टमेश ।
(viii) तृतीय या अष्टम का मालिक यदि द्वितीय या सप्तम के
मालिक के साथ हो ।
(ix) मारक ग्रह के साथ बैठा हुआ शनि ।
(x) षष्ठेश ।
(xi) जो ग्रह जन्म कुंडली में सबसे निर्मल हो ।
द्वितीय मुख का स्थान है । सप्तम गुप्तेन्द्रिय का स्थान है ।
प्रसिद्ध है कि आहार (मुख) और विहार (स्त्री संग) जितना नियमित
होगा, उतनी आयु अच्छी होगी। जितना मनुष्य अपने द्वितीय और
सप्तम स्थान को बिगाड़ेगा, उतना ही अपने पैर पर कुल्हाड़ी मार कर
अपनी आयु को नष्ट करेगा।
पृष्ठ ४२३ से पृष्ठ ४५० तक भावार्था रत्नाकर में दिये गये फलित
ज्योतिष सम्बन्धी २२५ नियम बतलाये गये हैं । जिससे पाठकों को
लाभ हो ।

इक्कीसवां अध्याय
प्रत्यन्तर्दशाफल
अपहारविभागलक्षणं तत्पंक्ति क्रमशः स्फुटं प्रवच्मि ।
यदुदीरितमत्र तत्समस्तं कथयेत्स्वदशान्तरान्तरादौ ॥१॥
पाकेशाब्दहता दशेश्वरसमा नेत्राङ्कभक्ताः समाः
शिष्टा रूपहता नराङ्कविहृता मासा नगैर्वासराः ।
छिद्रादिष्वपि चैवमेव कलयेत्पाकक्रमाच्चेद्वशा-
नाथाद्या पुनरन्तरान्तरदशास्तत्पाकनाथक्रमाः ॥२॥
अब इस अध्याय में अन्तर्दशा और प्रत्यन्तर्दशा लगाना बताते हैं।
एक महादशा में नवों ग्रहों की अन्तर्दशा होती है। जैसे सूर्य की
महादशा छः वर्ष की है तो इस छः वर्ष में सूर्यादि नौ ग्रहों की
अन्तर्दशा आवेंगी। जिस ग्रह की महादशा होती है सबसे पहले उसी
की अन्तर्दशा भी होती है। उदाहरण के लिये बृहस्पति की महादशा
में अन्तर्दशा का क्रम निम्नलिखित होगा : बृ०, श० बु० के० शु०,
आ० चं० भौ० रा० । शुक्र की महादशा में अन्तर्दशा का क्रम होगा—
शु० आ० चं० भौ० रा० बृ० श० बु० के० ।
जिस प्रकार एक महादशा में नौ अन्तर्दशा होती हैं उसी प्रकार
किसी एक अन्तर्दशा में नौ प्रत्यन्तर्दशा होती हैं। जिस ग्रह की अन्त-
दशा होती है उसी की प्रत्यन्तर्दशा सबसे पहले आती है। ग्रहों का
जो फल पिछले अध्यायों में बता चुके हैं वह उनकी महादशा, उनकी
अन्तर्दशा और उनकी प्रत्यन्तर्दशा में लागू करने चाहिये ॥१॥