फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबीसवाँ अध्याय : अन्तर्दशाफल ४३९
प्रकार के होते हैं, दो ग्रहों का एक साथ एक घर में बैठना, एक-
दूसरे को पूर्ण दृष्टि से देखना इत्यादि जो अन्यत्र बताया गया है ।
११. यदि आठवें और नवें घर के मालिक का सम्बन्ध हो तो
नवें घर के मालिक की दशा में योग नहीं होगा । किन्तु अष्टमेश
की अन्तर्दशा में योग होता है।
१२. यदि दसवें तथा ग्यारहवें घर के स्वामियों का सम्बन्ध
हो तो ग्यारहवें घर के मालिक की दशा में राजयोग होगा ।
१३. यदि दसवें और ग्यारहवे घर के मालिकों का सम्बन्ध
हो तो दसवें घर के मालिक की दशा में साधारण स्थिति रहेगी अर्थात्
न बहुत अच्छा और न बहुत खराब ।
१४. यदि शुक्र दशम में हो तो उसकी दशा में कोई योग
नही होता ।
१५. यदि शनि सातवें घर में हो तो उसकी दशा में राजयोगं
होता है।
१६. यदि सातवें घर में राहु हो तो निश्चय ही योग देने
वाला होता है।
१७. यदि शनि तीसरे या नवें घर में हो तो योग देता है ।
१८. यदि तीसरे, आठवें या नवें घर में बृहस्पति हो तो योग
देता है ।
१९. यदि बृहस्पति बारहवें घर में हो तो जातक मृत्यु--इस
जीवन-के बाद देवलोक (स्वर्ग) प्राप्त करता है।
२०. यदि भाग्य (९) और राज्य (१०) के मालिक राज्य
या भाग्य में बैठे हों तो बहुत उत्तम राजयोग होता है और बहुत
यश प्राप्त होता है।
२१. यदि नवें घर का मालिक दसवें हो और दसवें घर का
मालिक नवें में तो भी वही फल जो नं० २० में बताया गया है।