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सर्वकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

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पृष्ठ 446

बीसवाँ अध्याय : अन्तर्दशाफल ४४५
कर मालिका योग होता है; अन्य ज्योतिषियों के विचार से लग्न
से ही प्रारंभ करने से मालिका योग होता है।
६. यदि लग्न से ६, ७, ८ ओर ९ में सब ग्रह हों तो भाग्यप्रद
योग होता है।
७. यदि लग्न से ५वें घर तक सब भावों में ग्रह हों और
सब ग्रह इन पाँचों भावों में आ जावें तो भी भाग्य योग होता है।
दो स्थानों के अधिपतियों के फल में क्रम
१. जो ग्रह समराशि में होते हैं--वे पहले अपनी मूल त्रिकोण
राशि का फल देते हैं--फिर अपनी दूसरी राशि का। उदाहरण के
लिये शनि यदि समराशि, वृषभ, कर्क कन्या, वृश्चिक या मीन में
हो तो अपनी दशा, अन्तर्दशा के पूर्वार्द्ध में अपनी मूल त्रिकोण राशि
अर्थात् कुंभ का फल देगा और अपना उत्तरार्द्ध (दशा, अन्तर्दशा के
काल को यदि दो हिस्सों में बाँटा जावे--तो बाद के आधे काल में)
अपनी दूसरी राशि का-अर्थात् मकर का फल देगा।
उदाहरण के लिये किसी जातक का मिथुन लग्न है-शनि आठवें
तथा नवें का मालिक हुआ। आठवें घर में मकर राशि है। नवें
घर में कुंभ राशि है तो मान लीजिये शनि कन्या राशि में है।
अगले पृष्ठ पर देखिये सेठ रामकृष्ण जी डालमिया की जन्म कुण्डली।
जन्म ता० ७ अप्रैल सन् १८९३।
कन्या राशि का शनि सम राशि में है। इसलिये शनि अपनी
मूल त्रिकोण राशि कुंभ के स्वामित्व का फल पहिले आधे काल में
करेगा और मकर के स्वामित्व का फल बाद के आधे काल में ।