फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
पृष्ठ 435, कुल 684 में से
संदर्भ में पढ़ें४३४ फलदीपिका
३. यदि आयु कारक शनि का आठवें घर के स्वामी से
सम्बन्ध हो तो दीर्घायु हो ।
४. आठवें घर में शनि हो तो दीर्घायु हो ।
५. यदि आठवें घर का स्वामी केतु के साथ लग्न में हो तो
अल्पायु हो ।
६. पिता का कारक सूर्य यदि नवम घर के स्वामी से सम्बन्ध
करे तो पिता की दीर्घायु हो ।
७. नवें घर में सूर्य हो तो पिता स्वल्पायु हो ।*
८. चौथे घर में चन्द्रमा हो तो माता अल्पायु हो ।
९. यदि सूर्य और नवें घर के मालिक दोनों नवें घर में बैठे
हों तो पिता अल्पायु हो । किन्तु यदि नवें घर का मालिक ग्यारहवें में
हो तो पिता दीर्घायु हो ।
१०. तीसरे घर में मंगल हो तो भाई अल्पायु हों। तीसरे घर
में बृहस्पति हो तो भाइयों के लिए कष्टकारक होता है।
११. यदि धनु या मीन राशि का बृहस्पति तीसरे घर में हो
तो जातक के केवल एक ही भाई होता है।
१२. पंचम में बृहस्पति पुत्र की आयु में कमी करता है।
१३. सातवें घर में शुक्र हो तो पत्नी की आयु कम करता है।
नोट :-- ऊपर लिखे हुये योगों का निष्कर्ष यह है कि जिस
भाव का जो कारक है उस भाव में यदि वह कारक बैठा हो तो
शुभ फल में कमी करता है । केवल शनि के विषय में यह बात
लागू नहीं होती क्योंकि वह आयु का कारक है और आठवें घर में
बैठकर आयु को बढ़ाता है ।
*दक्षिण भारत में पिता का विचार नवम घर से किया जाता है।
पिता का कारक सूर्य है । इसलिये कारक के (जिस स्थान का वह कारक
है) उस स्थान मे बैठने से यह दोष हुआ ।