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सर्वकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

पृष्ठ 436, कुल 684 में से

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पृष्ठ 436

बीसवाँ अध्याय : अन्तर्दशाफल ४३५
१४. यदि चन्द्रमा और चौथे घर का मालिक—५वें, ९ वें,
१०वें, ११वें, इनमें से किन्हीं घरों में हों (यह ज़रूरी नहीं कि
चन्द्रमा और चौथे घर का मालिक एक ही घर में हों) तो जातक
की माता दीर्घायु होती है। यदि चतुर्थेश का चन्द्रमा से सम्बन्ध हो तो
भी माता दीर्घायु हो।
१५. यदि मूल त्रिकोण अंशों में सूर्य सिंह में, मंगल मेष में,
बुध कन्या में, बृहस्पति धनु में, शुक्र तुला में या शनि कुम्भ में चौथे
घर में बैठा हो तो माता दीर्घायु होती है। चौथे का मालिक
चौथे में हो तो भी माता के लिए अच्छा है किन्तु यदि चौथे
का मालिक मूल त्रिकोण अंशों में हो तो बहुत उत्तम है। किन-किन
अंशों तक मूल त्रिकोण होते हैं और किन अंशों में स्वराशि होती है
यह अध्याय १ श्लोक ७ की व्याख्या में बताया जा चुका है।
१६. यदि चौथे घर का मालिक और चन्द्रमा प्रबल स्थान में
बैठे हों किन्तु यदि चन्द्रमा क्षीण हो (कृष्ण पक्ष की दशमी से शुक्ल
पक्ष की पंचमी तक चन्द्रमा क्षीण समझा जाता है*) और उन पर
शनि की दृष्टि हो तो माता अल्पायु होती है।
भाग्य योग तरंग
अब भावार्थ रत्नाकर के अनुसार कतिपय भाग्य योग दिये जा
रहे हैं :—
१. यदि नवें का मालिक ग्यारहवें हो और ग्यारहवें का मालिक
नवें में हो या नवें और ग्यारहवें के मालिक में सम्बन्ध हो।
२. यदि दो-दो ग्रह एक-एक राशि में इस प्रकार बैठे हुए हों
कि चार राशि में आठ ग्रह आ जावें।

  • एक अन्य मत से कृष्ण चतुर्दशी और अमावास्या को चन्द्र
    क्षीण होता है।