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सर्वकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

पृष्ठ 437, कुल 684 में से

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पृष्ठ 437

४३६ फलदीपिका
३. यदि छः ग्रह तीन राशियों में, दो-दो एक साथ बैठे हों।
४. यदि चारों शुभ ग्रहों को (बुध, बृहस्पति, शुक्र और शुक्ल
पक्ष का चन्द्रमा) पाप ग्रह देखते हों तो बहुत भाग्यशाली तो नहीं
होता लेकिन धन योग होता है।
५. यदि तीसरे, छठे और ग्यारहवें क्रूर ग्रह बैठे हों।
६. यदि कोई ग्रह लग्न से बारहवें घर में बैठा हो तो उस
भाव का भाग्य उदय करता है जिस भाव का वह कारक है।
किस भाव का कौन सा ग्रह कारक होता है यह इस पुस्तक में पहिले
बताया जा चुका है।
७. यदि चौथे घर का मालिक, शुक्र और सातवें और नवें
घर के मालिक नवें या ग्यारहवें इन दोनों घरों में (चाहे चारों एक
साथ बैठे हों चाहे कुछ नवें कुछ ग्यारहवें बैठे हों) और शनि से
सम्बन्ध करते हों तो शनि की दशा और अन्तर्दशा में अच्छा लाभ
होता है और सवारी प्राप्त होती है।
८. यदि पहले, चौथे और नवें और दसवें घरों के मालिक पहले
सातवें या दसवें घर में बैठे हों--चारों ग्रहों का इन तीनों केन्द्रों में से
किसी एक केन्द्र में एक साथ बैठना आवश्यक है तो उनकी दशा
और अन्तर्दशा में बहुत भाग्य उदय होता है।
९. यदि कोई ग्रह पाँचवें अथवा नवें घर में उच्च राशि का
होकर बैठा हो तो भाग्य उदय होता है।
१०. यदि सूर्य, बुध और शुक्र, पाँचवें हों और बृहस्पति
ग्यारहवें हों तो बुध की दशा में विशेष धनागम होता है।
११. यदि नवें घर का मालिक और सूर्य दोनों एक साथ लग्न
से बारहवें घर में हों तो पिता के ज़रिये भाग्य उदय होता है।
१२. यदि सूर्य मेष राशि का हो तो जातक के पिता का भाग्य
बढ़ता है।