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फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

४५२ फलदीपिका
महादशा में अन्तर्दशाकाल त्रैराशिक से निकालना चाहिये। उदाहरण
के लिये आपको यह निकालना है कि शुक्र की महादशा में सूर्य की
अन्तर्दशा कितने समय की होगी तो निम्नलिखित तरीके से निकालिये।
यदि १२० वर्ष में सूर्य का भाग ६ वर्ष
तो १ ,, ,, ,, ६ × १/१२० वर्ष
तो २० ,, ,, ,, ६/१२० × २० = १ वर्ष
सूर्य की महादशा ६ वर्ष की होती है और शुक्र की महादशा २० वर्ष
की इसलिये २० और ६ की संख्या ऊपर ली गयी है। जिस प्रकार
त्रैराशिक से महादशा में अन्तर्दशा निकालते हैं, उसी प्रकार अन्तर्दशा में
त्रैराशिक से प्रत्यन्तर्दशा निकाली जाती है। ऊपर हम बता चुके हैं
कि शुक्र की महादशा में सूर्य की अन्तर्दशा १ वर्ष की आयी। अब
सूर्य की एक वर्ष की अन्तर्दशा में सूर्य की प्रत्यन्तर्दशा कितने दिन
का होगा ?
१२० वर्ष में ६ वर्ष
१ वर्ष में ६/१२० वर्ष = १/२० वर्ष
= १/२० × ३६० दिन = १८ दिन
इस प्रकार शुक्र की महादशा में सूर्य की अन्तर्दशा में सूर्य की
प्रत्यन्तर्दशा का समय आया १८ दिन।
ग्रहों की महादशा, अन्तर्दशा तथा प्रत्यन्तर्दशा की सारिणी पंचांगों
में दी रहती है इसलिये यहां नहीं दी जा रही है।
महीश्वरादुपलभतेऽधिकं यशो
वनाचलस्थलवसतिं धनागमम् ।
ज्वरोष्णरुग्जनकवियोगजं भयं
निजां दशां प्रविशति तीक्ष्णदीधितौ ॥३॥

बीसवाँ अध्याय : अन्तर्दशाफल ४५३
रिपुक्षयोऽ व्यसनशमो धनागमः
कृषिक्रिया गृहकरणं सुहृद्युतिः ।
क्षयानलप्रतिहतिरर्कदायकं
शशी यदा हरति जलोद्भवा रुजः ॥४॥
रुजागमः पदविरहोऽरिपीडनं
व्रणोद्भवः स्वकुलजनैर्विरोधिता ।
महीभृतो भवति भयं धनच्युति-
र्यदा कुजो हरति तदार्कवत्सरम् ॥५॥
रिपूदयो धनहतिरापदुद्गमो
विषाद्भयं विषयविमूढता पुनः
शिरोदृशोरधिकरुगेव देहिनाम्
अहौ भवेदहिमकरायुरन्तरे ॥६॥
रिपुक्षयो विविधधनाप्तिरन्वहं
सुरार्चनं द्विजगुरुबन्धुपूजनम् ।
श्रवःश्रमो भवति च यक्ष्मरोगिता
सुरार्चिते विशति गोपतेर्दशाम् ॥७॥
धनाहतिः सुतविरहः स्त्रिया रुजो
गुरुव्ययः सपदि परिच्छदच्युतिः ।
मलिष्ठता भवति कफप्रपीडनं
शनैश्चरे सवितृदशान्तरं गते ॥८॥
विचर्चिका पिटकसकुष्ठकामिला
विशर्धनं जठरकटिप्रपीडनम् ।
महीक्षयः त्रिगदभयं भवेत्तदा
विधोः सुते चरति रवेरथाब्दकम् ॥९॥

४५४ फलदीपिका
सुहृद्व्ययः स्वजनकुटुम्बविग्रहो
रिपोर्भयं धनहरणं पदच्युतिः ।
गुरोर्गदश्चरणशिरोरुगुच्चकैः
शिखी यदा विशति दशां विवस्वतः ॥१०॥
शिरोरुजा जठरगुदार्तिपीडनं
कृषिक्रिया गृहधनधान्यविच्युतिः ।
सुतस्त्रियोरसुखमतीव देहिनां
भृगोः सुते चरति रवेरथाब्दकम् ॥११॥
सूर्य
(i) सूर्य की महादशा में सूर्य की अन्तर्दशा में राजा से अधिक
यश मिले, धनागम हो, पर्वतों और वनों में रहे, ज्वर और उष्णता
के रोग हों, पिता के वियोग का भय हो । सूर्य अच्छा हो तो अच्छा
फल लीजिये । सूर्य दुर्बल या दुःस्थान में हो तो अनिष्ट फल लीजिये ।
(ii) जब सूर्य की महादशा में चन्द्रमा का अन्तर हो तो
जातक अपने शत्रुओं का नाश करे, उसके कष्टों की शान्ति हो जावे,
धन का आगम हो, खेती बाड़ी का काम हो, मकान बने, मित्रों से
समागम हो । यदि चन्द्रमा दुःस्थान में पड़ा हो या अशुभ फलदायक
हो तो क्षय, तथा जल से उत्पन्न होने वाले रोग हों, अग्नि से भी
हानि की सम्भावना है ॥४॥
(iii) जब सूर्य की महादशा में मंगल की अन्तर्दशा हो तो
जातक बीमार पड़े, पद्च्युत हो और शत्रुओं से पीड़ा हो । अपने कुल
के आदमियों से विरोध हो । जातक को राजा से भय हो और धन
का नाश हो । जातक को यह भी भय रहता है कि उसको चोट
*ऊपर जो महादशा में अन्तर्दशा का फल दिया गया है उसी अनुसार
इस अध्याय में सर्वत्र अन्तर्दशा में प्रत्यन्तर्दशा का फल समझना चाहिये ।

इक्कीसवाँ अध्याय : प्रत्यन्तर्दशाफल ४५५
लगे या शरीर में फोड़े हों। हमारे विचार से सूर्य, मंगल दोनों
अच्छे पड़े हों—परस्पर इष्ट राशि में तो मंगल का अच्छा फल ही
होगा ॥५॥
(iv) सूर्य की महादशा में राहु का अन्तर बताते हैं। शत्रुओं
का उदय हो, वैर बढ़े, धन का नाश हो या चोरी हो। आपत्तियाँ
आवें। जातक को विष से भय हो। जातक के शिर में पीड़ा हो।
नेत्र में रोग हो किन्तु उसका मन सांसारिक विषयों के भोग की ओर
अधिक आकृष्ट हो ॥६॥
(v) जब सूर्य की महादशा में बृहस्पति का अन्तर हो तो
शत्रुओं का नाश हो, नाना प्रकार से धन की आमदनी हो। नित्य
देवताओं की अर्चना हो, ब्राह्मण, गुरु और बन्धुओं का सत्कार हो।
किन्तु कान में पीड़ा हो और यक्ष्मा सम्बन्धी रोग हो। हमारे विचार
से बृहस्पति की अन्तर्दशा में अनिष्ट फल तब ही होगा जब बृहस्पति
प्रबल मारक हो या दुःस्थान में पड़ा हो ॥७॥
(vi) सूर्य की महादशा में जब शनि की अन्तर्दशा होती है
तो धन का नाश हो, पुत्र से वियोग हो, स्त्री को रोग हो, किसी गुरु
जन (गुरु, पिता, चाचा आदि) की मृत्यु हो। बहुत अधिक व्यय हो।
वस्त्र तथा घर की अन्य वस्तुओं का नाश हो। गन्दगी रहे (जातक का
मकान, कपड़े, शरीर आदि स्वच्छ न रहें) और जातक को कफ-
रोगों से पीड़ा हो। यद्यपि उपर्युक्त श्लोक में कफ पीड़ा कही गयी
है किन्तु हमारे विचार से सूर्य पित्त का स्वामी है और शनि वात का
इस कारण शनि की अन्तर्दशा में वात पीड़ा होनी चाहिये ॥८॥
(vii) सूर्य की महादशा में जब बुध की अन्तर्दशा हो तो
फोड़े, फुंसी, चर्म रोग, कुष्ठ, पीलिया आदि हो। कमर में, पेट में दर्द
हो और वात, पित्त, कफ इन तीनों के विकार से शरीर में रोग
हो। बुध वात, पित्त, कफ तीनों का स्वामी है। इस कारण तीनों
दोषों से रोग होना कहा है। ॥९॥

४५६ फलदीपिका
(viii) सूर्य में जब केतु की अन्तर्दशा होती है तो किसी मित्र
की मृत्यु हो या मित्र मित्रता छोड़ दे । अपने आदमियों से और
कुटुम्ब के लोगों से विग्रह (झगड़ा) हो । शत्रु से भय हो । धन का
नाश हो (चोरी से या किसी अन्य प्रकार से), किसी गुरुजन को
बीमारी हो । जातक के पैर में तथा सिर में बहुत दर्द हो । सूर्य
और केतु परस्पर शत्रु हैं इस कारण सूर्य में केतु का बहुत दुष्ट फल
कहा गया है ॥१०॥
(ix) सूर्य की महादशा में शुक्र का अन्तर जब आवे तो सिर
में पीड़ा, पेट में रोग हो, गुदा में पीड़ा हो, खेती बाड़ी के काम,
मकान, धन और अन्न में कमी हो, बच्चे बीमार पड़ें । स्त्री बीमार
हो ॥११॥
चन्द्रमा की महादशा में एविध अन्तर्दशाओ का फल
स्त्रीप्रजाप्तिरमलांशुकागमो
भूसुरोत्तमसमागमो भवेत् ।
मातुरिष्टफलमङ्गनासुखं
स्वां दशां विशति शीतदीधितौ ॥१२॥
पित्तवह्निरुधिरोद्भवा रुजः
क्लेशदुःखरिपुचोरपीडनम् ।
वित्तमानविहतिर्भवेत्कुजे
शीतदीधितिदशान्तरं गते ॥१३॥
तीव्रदोषरिपुवृद्धिबन्धुरुङ् मारुताशनिभयार्तिरुद्भवेत् ।
अन्नपानजनितज्वरोदयाश्चन्द्रवत्सरविहारके ह्यहौ ॥१४॥
दानधर्मनिरतिः सुखोदयो वस्त्रभूषणसुहृत्समागमः ।
राजसत्कृतिरतीव जायते कैरवप्रियवयोहरे गुरौ ॥१५॥

इक्कीसवां अध्याय : प्रत्यन्तर्दशाफल ४५७
नैकरोगविहतिः सुहृत्सुत-
स्त्रीरुजा व्यसनसंभवो महान् ।
प्राणहानिरथवा भवेच्छनौ
मारबन्धुवयसो गतेऽन्तरम् ॥१६॥
सर्वदा धनगजाश्वगोकुल-
प्राप्तिराभरणसौख्यसम्पदः ।
चित्तबोध इति जायते विधो-
रायुषि प्रविशति प्रबोधने ॥१७॥
चित्तहानिरपि सम्पदश्च्युति-
र्बन्धुहानिरपि तोयजं भयम् ।
दासभृत्यहतिरस्ति देहिनां
केतुके हरति चान्द्रमब्दकम् ॥१८॥
तोययानवसुभूषणाङ्गनाविक्रयक्रयकृषिक्रियादयः ।
पुत्रमित्रपशुधान्यसंयुतिश्चन्द्रदायहरगोन्मुखे भृगौ ॥१९॥
राजमाननमतीव शूरता
रोगशान्तिररिपक्षविच्युतिः ।
पित्तवातरुगिने गते तदा
स्याच्छशाङ्कपरिवत्सरान्तरम् ॥२०॥
(i) जब चन्द्रमा की महादशा में चन्द्रमा की अन्तर्दशा हो
तो कन्या-सन्तति की प्राप्ति हो, उज्ज्वल वस्त्र मिलें, उत्तम ब्राह्मणों

४५८ फलदीपिका
का समागम हो, माता की प्रसन्नता की बात हो और जातक को अपनी
स्त्री का सुख हो ॥१२॥
(ii) जब चन्द्रमा की महादशा में मंगल की अन्तर्दशा हो तो
पित्त-प्रकोप, अग्नि-प्रकोप तथा रुधिर की ख़राबी के कारण रोग हो।
शत्रुओं और चोरों से पीड़ा हो। क्लेश और दुःख हो। धन और
मान का नाश हो ॥१३॥
(iii) चन्द्रमा की महादशा में, राहु की अन्तर्दशा में तीव्र
दोष हो अर्थात् जातक के मन को कष्ट पहुंचाने वाली कोई तीव्र घटना
हो या कोई शारीरिक बीमारी हो। शत्रुओं की वृद्धि हो, वन्धु बीमार
पड़े, तूफ़ान और वज्र से भय और कष्ट हो। और खाने-पीने की
गड़बड़ी के कारण शरीर में ज्वर हो ॥१४॥
(iv) चन्द्रमा की महादशा में जब बृहस्पति की अन्तर्दशा हो
तो जातक की प्रवृत्ति दान और धर्म में होती है। राजा से सम्मान
प्राप्त हो, मित्रों से समागम हो, नवीन वस्त्र और आभूषण प्राप्त हों
और सब प्रकार के सुख का उदय हो ॥१५॥
(v) चन्द्रमा की महादशा में जब शनि का अन्तर हो तो
अनेक प्रकार के रोगों से कष्ट हो। जातक के मित्र, पुत्र और स्त्री
को बीमारी हो, कोई महान् विपत्ति की सम्भावना हो अथवा प्राण
की हानि हो। कहने का तात्पर्य यह है कि चन्द्रमा में शनि की
अन्तर्दशा बहुत पीड़ा कारक होती है ॥१६॥
(vi) जब चन्द्रमा की महादशा में बुध की अन्तर्दशा हो तो
सर्वदा हाथी, घोड़े, गौ और सब प्रकार के धन की प्राप्ति हो।
*श्लोक ५ से ११ तक जो अनिष्ट फल बताये गये हैं वे तभी
घटित होंगे जब महादशानाथ और अन्तर्दशानाथ या अन्तर्दशानाथ और
प्रत्यन्तर्दशानाथ दोनों अनिष्ट हों।

आभूषण और सम्पत्ति मिले। जातक सुखी रहे और उसका मन ज्ञान
और बुद्धि में लगा रहे ॥१७॥
(vii) जब चन्द्रमा में केतु की अन्तर्दशा होती है तो तबीयत
को परेशान करने वाली घटनायें होती हैं; जल से भय हो। धन हानि
हो और बन्धुओं की भी हानि हो अर्थात् किसी बन्धु को कष्ट हो
या जातक की उससे अन-बन हो जाये। जातक को दास और भृत्यों
से भी हानि हो। संक्षेप में यह है कि चन्द्रमा में केतु कष्ट कारक होता
है ॥१८॥
(viii) चन्द्रमा में शुक्र का शुभ फल है। जल, यान (सवारी),
धन, भूषण, स्त्री सम्बन्धी कार्य में सुख हो। जातक की खेती के
काम में भी वृद्धि हो। यदि जातक व्यापारी है तो माल खरीदने-बेचने
में भी लाभ होगा। इस अन्तर्दशा में पुत्र, मित्र, पशु तथा अन्न की
प्राप्ति हो और उनसे हर्ष हो ॥१९॥
(ix) जब चन्द्रमा की महादशा में सूर्य की अन्तर्दशा आती है
तो राजा से सम्मान प्राप्त होता है। जातक शूरता के कार्य करता है।
यदि किसी रोग से पीड़ा पा रहा हो तो उस रोग की शान्ति हो
जाती है अर्थात् स्वास्थ्य उत्तम रहता है किन्तु पित्त और वात से
नवीन रोग होने की सम्भावना रहती है। इस अन्तर्दशा में जातक
विजयी होता है और उसके शत्रु पक्ष को नीचा देखना पड़ता है।
॥२०॥
मंगल की महादशा में विविध अन्तर्दशाओं का फल
पित्तोष्णरुग्व्रणभयं सहजैर्वियोगः
क्षेत्रप्रवादजनितार्थविभूतिसिद्धिः ।
ज्ञात्यग्निशत्रु नृपचोरजनैर्विरोधो
धात्रीसुतो हरति चेच्छरवं स्वकीयम् ॥२१॥

u! र is u!)
Wait, if "...रपि" is the 5th and 6th syllables:
5: र (u)
6: पि (u)
Then syllables 1, 2, 3, 4 are:
1 (u), 2 (u), 3 (u), 4 (u)!
Now look at the characters before 'रपि':
There are:
Character 1 & 2 & 3 & 4:
Look at: "द्द्रुहुति"?
Wait! If it is "द्द्रु", that has a conjunct, which would make the preceding syllable heavy! But 'शाद्' was already heavy.
What about the vowel of this first syllable?
Is it "द्रु"?
Wait, look at:
द (da)
then what?
Wait, is it "द्दुहितुरपि"?
Wait:
1: दु (u)
2: हि (u)
3: तु (u)
4: ? No, दु-हि-तु-र-पि is only 5 syllables!
Wait! What about:
"द्रुहुतिरपि"? That's 5 syllables!
Wait, could it be 6 syllables?
Look at the letters at the start of that line:
There is:

  1. द्
  2. रु? or सु? or मु?
  3. ह?
  4. ति?
    Wait! Look at the first glyph:
    Is that 'द्' at

इक्कीसवाँ अध्याय : प्रत्यन्तर्दशाफल ४६१
परिजनपरिहानिर्जायते मानवाना-
मपहरति यदायुर्भौमिजं भार्गवेन्द्रः ॥२७॥
नृपकृतपरिपूजा युद्धलब्धप्रभावः
परिजनधनधान्यश्रीमदन्तःपुरं च ।
अतिविलसितवृत्तिः साहसादाप्तलक्ष्मी-
स्तिमिरभिदि कुजायुर्दायसंहारिणीति ॥२८॥
विविधधनसुताप्तिर्विप्रयोगोऽरिवर्गे-
र्वसनशयनभूषारत्नसम्पत्प्रसूतिः ।
भवति गुरुजनातिर्गुल्मपित्तप्रपीडा
धरणीतनयवर्षे शीतगौ सम्प्रयाते ॥२६॥
(i) मंगल की महादशा में मंगल की अन्तर्दशा का फल :
पित्त, उष्णता (गर्मी से उत्पन्न होने वाले रोग हों)—घाव होने या
चोट लगने का भय हो, भाइयों से वियोग हो । जाति के लोगों से,
शत्रुओं से, राजा से तथा चोरों से विरोध हो । अग्नि पीड़ा का
भय हो । किन्तु जातक को खेत और मुकदमों से धन की प्राप्ति हो ।
हमारा अनुभव है कि मंगल यदि योग कारक हो तो तो उसकी दशा
अच्छी हो जाती है । मंगल बलवान् होने से जातक के विरोधी उत्पन्न
होने पर भी विजय जातक की होती है । किन्तु यदि मंगल बिगड़ा
हुआ हो तो जातक को शत्रुओं से पीड़ा पहुँचती है ॥२१॥
(ii) मंगल की महादशा में राहु का फल :
शस्त्र, अग्नि चोर, रिपु (शत्रु) राजा—इन सब से भय हो । विष
के कारण बीमारी या कष्ट हो । किसी गुरुजन या बन्धु की हानि हो ।
जातक के काँख, आँख और सिर में बीमारी हो । जातक की मृत्यु हो
जाये या उस पर महान् आपत्ति आवे ॥२२॥

४६२ फलदीपिका
(iii) मंगल की महादशा में बृहस्पति की अन्तर्दशा का फल :
इस अन्तर्दशा में शुभ फल होते हैं। अशुभ फल तो केवल इतना
ही है कि कान में पीड़ा हो और कफ के कारण शरीर में रोग हो।
बाकी सब शुभ फल ही हैं। जातक के पुत्र और मित्रों में वृद्धि
हो, देवताओं और ब्राह्मणों, की अर्चना हो, सदैव अतिथि पूजा
का अवसर मिले। पुण्य कर्मों मे प्रसक्ति हो और तीर्थों में यात्रा
हो ॥२३॥
(iv) मंगल की महादशा में शनि की अन्तर्दशा :
यह समय बहुत कष्ट कारक होता हैं। जातक के पुत्र, गुरुजन और
पुरखों पर एक के बाद एक विपत्ति आती है। जातक स्वयं विपत्तियों का
शिकार होता है। शत्रु उसका धन हर लेते हैं। अग्नि और वायु
से भय हो--सम्पत्ति आदि चली जावे या पित्त और वात के प्रकोप
के कारण शरीरिक रोग हो। जातक के शत्रु उसका धन हर ल। उसकी
धन हानि हो और मन को भीतर ही भीतर दुःख पहुचाने वाली
घटनायें घटित हों ॥२४॥
(v) मंगल की महादशा में बुध की अन्तर्दशा का फल :
राजा से या सरकार से पीड़ा हो। किसी शूद्र जाति के वैरी के
कारण बहुत कष्ट हो। शत्रुओं से भय हो, चोर उपद्रव करे और धन
की हानि हो। पशु, हाथी और घोड़ों का नाश हो और शत्रुओं से
समागम हो। अब पशु, हाथी या घोड़े तो प्रायः लोग रखते नहीं। तात्पर्य
यह है कि ख़राब फल हो ॥२५॥
(vi) मंगल की महादशा में केतु की अन्तर्दशा का फल :
अकस्मात् वज्र से भय हो, अग्नि और शस्त्र से पीड़ा हो, अपने
देश से जाना पड़े या धन नाश हो और या तो जातक के स्वयं
के प्राण छूट जायें या उसकी स्त्री का नाश हो जाये ॥२६॥
(vii) मंगल की महादशा में शुक्र के अन्तर का फल :
युद्ध में पराजय, अपना स्वदेश छोड़ना पड़े और विदेश में जाकर

इक्कीसवाँ अध्याय : प्रत्यन्तर्दशाफल ४६३
रहे। चोर लोग धन चुरा कर ले जायें, बाँये नेत्र में कष्ट हो। नौकरों
की हानि हो। अर्थात् जातक को नौकरों को कष्ट हो या नौकरों की
संख्या में कमी हो जाये ॥२७॥
(viii) मंगल की महादशा में सूर्य की अन्तर्दशा का फल :
राजा से सम्मान प्राप्त हो। युद्ध के कारण जातक के प्रभाव में वृद्धि;
जातक के नौकरों में, धन में, धान्य में लक्ष्मी में और उसकी स्त्रियों में
वृद्धि और विलास हो। अर्थात् इन सब वस्तुओं का अधिकाधिक वैभव
और विलास हो। जातक अपने साहस से लक्ष्मी का उपार्जन
करे ॥२८॥
(ix) मंगल की महादशा में चन्द्रमा की अन्तर्दशा का फल :
नाना प्रकार के धनों का आगम हो। पुत्र-प्राप्ति हो, वस्त्र, शय्या,
आभूषण, रत्न और सम्पत्ति मिले। शत्रुओं से जुदाई हो अर्थात्
शत्रु पीड़ा न रहे। लेकिन किसी गुरुजन को पीड़ा हो और जातक
को स्वयं को भी गुल्म और पित्त के कारण कष्ट हो सकता
है ॥२९॥
राहु की महादशा में विविध अन्तर्दशाओं का फल
विषाम्बुरुग्दुष्टभुजङ्गदर्शनं
पराबलासंयुतिरिष्टविच्युतिः ।
अरिष्टवाग्दुष्टजनव्यथा
भवेद्विधुंतुदेनापहृते स्ववत्सरे ॥३०॥
सुखोपनीतिः सुरविप्रपूजनं
विरोगता वामदृशां समागमः ।
सुपुण्यशास्त्रार्थविचारसम्भवः
सुरारिदायान्तरगे बृहस्पतौ ॥३१॥

४६४ फलदीपिका
समीरपित्तप्रगदक्षतिस्तनौ
तनूजयोषित्सहजैश्च विग्रहः ।
स्वभृत्यनाशश्च पदच्युतिर्भवेत्-
दितिप्रजायुः प्रविशत्यथार्कजे ॥३२॥
सुतस्वसिद्धिः सुहृदां समागमो
मनोवनिन्द्यत्वमतीव जायते ।
पटुक्रियाभूषणकौशलादयो
भुजङ्गसंवत्सरहारिणीन्दुजे ॥३३॥
ज्वराग्निशस्त्रारिभयं शिरोरुजा
शरीरकम्पः स्वसुहृद्गुरुव्यथा ।
विषव्रणार्तिः कलहः सुहृज्जनै-
रहोन्द्रदाथान्तरगे शिखाधरे ॥३४॥
कलत्रलब्धिः शयनोपचारता
तुरङ्गमातङ्गमहीसमागमः ।
कफानिलाप्तिः स्वजनैर्विरोधिता
भवेद्भुजङ्गायुरपाहृतौ भृगोः ॥३५॥
अरिव्यथा स्यादतिपीडनं
दृशोर्विषाग्निशस्त्राहतिरापदुद्गमः ।
वधूसुतार्तिर्नृपतेर्महद्भयं
भुजङ्गवर्षे तिमिरारिणा हृते ॥३६॥
वधूविनाशः कलहो मनोरुजा
कृषिक्रियावित्तपशुप्रजाक्षयः ।

इक्कीसवां अध्याय : प्रत्यन्तर्दशाफल ४६५
सुहृद्विपत्तिः सलिलाद्भयं भवे-
द्विधौ दशाभक्तरि देवविद्विषः ॥३७॥
नृपाग्निचोरास्त्रभयं शरीरिणां
शरीरनाशो यदि वा महारुजः ।
पदभ्रमो हृन्नयनप्रपीडनं
यदात्र सर्पायुषि संचरेत्कुजः ॥३८॥
(i) राहु की महादशा में राहु की अन्तर्दशा का फल :
विष और जल के कारण रोग हो । जातक को सर्प का दशन हो ।
दूसरे आदमी की स्त्री से संयोग हो । अपने किसी इष्टजन का
वियोग हो । जातक कड़ी बोली बोले । और उसे दुष्टजनों के कारण
कष्ट हो ॥३०॥
(ii) राहु की महादशा में बृहस्पति की अन्तर्दशा का फल :
सुख की प्राप्ति हो, देवताओं, ब्राह्मणों, का पूजन हो, शरीर में कोई
रोग न रहे और सुन्दर नेत्र वाली स्त्रियों से समागम हो । विद्वत्ता
के विचार-विनिमय और धार्मिक शास्त्रार्थ में समय व्यतीत हो ॥३१॥
(iii) राहु की महादशा में शनि की अन्तर्दशा का फल :
अपनी स्त्री, पुत्रों और भाईयों से झगड़ा हो । जातक की पदच्युति
हो और उसके नौकरों का नाश हो । शरीर में चोट लगे तथा
वात और पित्त के कारण रोग हो ॥३२॥
(iv) राहु की महादशा में बुध की अन्तर्दशा का फल :
धन और पुत्र की प्राप्ति हो, मित्रों से समागम हो, मन
में प्रसन्नता हो ।* जातक चातुर्य से कार्य करे । भूषण तथा कुश-

  • एक टीकाकार ने यह भी अर्थ किया है कि मन में तुच्छता
    हो—पर अन्य शुभ फलों का विचार करते हुए यह अर्थ नहीं जँचता ।

४६६ फलदीपिका
लता प्राप्त हो । संक्षेप में यह है कि राहु और बुध मित्र हैं और
बुध से क्रिया कुशलता, चतुरता व्यापार आदि का विचार किया
जाता है । इस कारण राहु की महादशा में बुध की अन्तर्दशा में बुध
से सम्बन्धित कार्यों में शुभता और वृद्धि लाती है ॥३३॥
(v) राहु की महादशा में केतु की अन्तर्दशा का फल :
इस अन्तर्दशा में अशुभ फल होता है । ज्वर, अग्नि, शस्त्र और
शत्रुओं से भय हो, सिर में रोग हो, शरीर में कम्प हो, जातक को
विष और व्रण के कारण कष्ट हो । मित्रों से कलह हो और जातक
के मित्रों और गुरु जनों को व्यथा हो ॥३४॥
(vi) राहु की महदशा में शुक्र की अन्तर्दशा का फल :
स्त्री की प्राप्ति हो । स्त्री-सहवास का सुख हो । हाथी, घोड़े और
ज़मीन की प्राप्ति हो या इनका उपभोग प्राप्त हो । किन्तु अपने
आदमियों से विरोध हो और जातक को वात और कफ के कारण रोग
हो ॥३५॥
(vii) राहु की महादशाँ में सूर्य के अन्तर का फल :
शत्रु से पीड़ा हो, अनेक आपत्तियां आवें; विष और अग्नि से पीड़ा
हो । शस्त्र से चोट लगे । और जातक के नेत्रों को अति पीड़ा हो ।
जातक को राजा या सरकार से महान् भय उपस्थित हो और उसकी
स्त्री तथा पुत्र को भी कष्ट हो । राहु और सूर्य शत्रु हैं । इस
कारण यह अन्तर्दशा इतना अशुभ प्रभाव दिखाती है ॥३६॥
(viii) राहु की महादशा में चन्द्रमा की अन्तर्दशा का फल :
स्त्री का विनाश हो, लोगों से कलह हो । मन को सन्ताप हो,
नोट—जब महादशानाथ और अन्तर्दशानाथ एकदूसरे से छठे या
आठवें होते हैं या अन्तर्दशानाथ महादशा नाथ से बारहवें होता है तो
प्रायः अनिष्ट फल होता है। यदि कोई ग्रह दुःस्थान में बैठा है तो भी
कष्ट-कारक होता है। इसी प्रकार अन्तर्दशानाथ और प्रत्यन्तर्दशानाथ
का विचार करना चाहिये ।

इक्कीसवां अध्याय : प्रत्यन्तर्दशाफल ४६७
मित्रों पर विपत्ति पड़े । जल से भय हो । कृषि, धन, पशु और
सन्तान की हानि हो ॥३७॥
(ix) राहु की महादशा में मंगल की अन्तर्दशा का फल :
राजा, अग्नि, चोर और अस्त्र से भय हो या तो जातक का शरीर
नाश हो जाये या मानस रोग हो । नेत्रों को पीड़ा हो, हृदय रोग
(Heart trouble) हो और जातक अपने पद से भ्रष्ट हो जाये ।
अर्थात् स्थान हानि का भय हो ॥ ३८ ॥
बृहस्पति की महादशा में विविध अन्तर्दशाओं का फल
सौभाग्यकान्तिबहुमानगुणोदयः
स्यात्सत्पुत्रसिद्धिरवनीपतिपूजनं च ।
आचार्यसाधुजनसंयुतिरिष्टसिद्धिः
संवत्सरं हरति देवगुरौ स्वकीयम् ॥३६॥
वेश्याङ्गनामदकृदासवदोषसङ्गः
उत्कर्षसौख्यसकुटुम्बपशुप्रपीडा ।
अर्थव्ययोरुभयमक्षिजरुक्सुतार्ति
जौवीं दशां विशति दैनकरे नराणाम् ॥४०॥
स्त्रीद्यूतमद्यजमहाव्यसनं त्रिदोषैः
केचिद्वदन्त्यपि च केवलमङ्गलाप्तिः ।
देवद्विजार्चनसुतार्थसुखप्रयोगै-
र्गीर्वाणपूजितदशां हरतीन्दुसूनौ ॥४१॥
शस्त्रव्रणं भवति भृत्यजनैर्विरोध-
श्चित्तव्यथा तनययोषिदुपद्रवश्च ।

४६८ फलदीपिका
प्राणच्युतिर्गुरुसुहृज्जनविप्रयोगः
सौरेड्यमायुरपहृत्य ददाति केतुः ॥४२॥
नानाविधार्थपशुधान्यपरिच्छदस्त्री-
पुत्रान्नपानशयनाम्बरभूषणाप्तिः ।
देवद्विजार्चनमुपासनतत्परत्व-
मायुर्यदा हरति जैवमथासुरेड्यः ॥४३॥
शत्रोर्जयः क्षितिपमाननकीर्तिलाभः
स्याच्चण्डता नरतुरङ्गमवाहनाप्तिः ।
श्रेण्यग्रहारपुरराष्ट्रसमस्तसंपद्
दुच्चैरुचथ्यसहजायुरपाहृतेऽर्के ॥४४॥
योषिद्बहुत्वमरिनाशनमर्थलाभः
कृष्यर्थवस्तुपरमोन्नतकीर्तिलाभः ।
देवद्विजार्चनपरत्वमतीव पुंसां
संजायते गुरुदशाहृति शर्वरीशे ॥४५॥
बन्धूपतोषममरिव्रजतोऽर्थलाभः
सुक्षेत्रसत्कृतिरिह

इक्कीसवाँ अध्याय : प्रत्यन्तर्दशाफल ४६९
(i) बृहस्पति की महादशा में बृहस्पति की अन्तर्दशा का फल :
सौभाग्य की वृद्धि हो, कान्ति बढ़े, सब ओर से मान-सम्मान मिले,
पुत्र प्राप्ति हो, जातक के गुणों का उदय और राजदरबार में
इज्जत हो। आचार्य और साधु-जनों से संयोग हो। मन की आकांक्षायें
पूर्ण हों ॥३९॥
(ii) बृहस्पति की महादशा में शनि की अन्तर्दशा का फल :
वेश्याओं की संगति हो, शराब पीना आदि दोषों की वृद्धि हो, सांसा-
रिक स्थिति में उन्नति हो, सुख प्राप्ति हो, किन्तु जातक के कुटुम्ब
और पशुओं को पीड़ा हो। धन बहुत अधिक खर्च हो। जातक के हृदय
में सदैव भय बना रहे। आँखों में रोग हो और पुत्र को पीड़ा ॥४०॥
(iii) बृहस्पति की महादशा में बुध की अन्तर्दशा का फल :
इस सम्बन्ध में दो मत हैं। एक मत यह है कि बृहस्पति में बुध की
अन्तर्दशा अशुभ फल दिखाती है। स्त्रियों से संग हो, शराब पीने का
घोर दुर्व्यसन हो और जातक जुआ खेले। वात, पित्त, कफ तीनों दोषों के
कारण जातक बीमार पड़े। दूसरा मत यह है कि बृहस्पति की महा-
दशा में बुध की अन्तर्दशा केवल शुभ फल देने वाली होती है। और
जातक देवताओं और ब्राह्मणों का पूजन करता है। पुत्र, धन और
सुख की प्राप्ति होती है ॥४१॥
(iv) बृहस्पति की महादशा में केतु की अन्तर्दशा का फल :
शस्त्र के व्रण होते हैं। नौकरों से विरोध बढ़ता है। चित्त में व्यथा
रहती है, जातक के स्त्री और पुत्रों को कष्ट हो, गुरुजनों अथवा
प्रियजनों से वियोग हो और जातक के स्वयं के प्राण जाने का भी
कष्ट हो ॥४२॥
(v) बृहस्पति की महादशा में शुक्र की अन्तर्दशा का फल :
अनेक प्रकार के धन, पशु, अन्न, वस्त्र, स्त्री, पुत्र, भोजन, पीने की
वस्तुएँ, आभूषण, शयन-सुख, घर में काम में आने वाली वस्तुएँ प्राप्त

४७० फलदीपिका
हों और इन सबसे सुख हो। जातक देवताओं और ब्राह्मणों के अर्चन
में तत्पर रहे ॥४३॥
(vi) बृहस्पति की महादशा में सूर्य की अन्तर्दशा का फल :
शत्रु पर विजय प्राप्त हो, राजा से मान मिले, यश वृद्धि हो, लाभ हो,
पालकी और घोड़े की सवारी मिले। जातक के हृदय में पुरुषार्थ बढ़े
और जातक किसी बड़े शहर में रहता हुआ समस्त सम्पत्ति का
उपभोग करे ॥४४॥
(vii) बृहस्पति की महादशा में चन्द्रमा की अन्तर्दशा का फल :
बहुत सी स्त्रियों की प्राप्ति हो, धन-लाभ हो, देवता और ब्राह्मणों
की पूजा हो, जातक का यश बढ़े, कृषि से लाभ हो, माल के खरीद-
फ़रोख़्त में भी नफ़ा हो और शत्रुओं का नाश हो ॥४५॥
(viii) बृहस्पति की महादशा में मंगल की अर्न्तदशा का फल :
इस समय जातक के कार्य से बन्धुओं को सन्तोष होता है और जातक
को शत्रुओं के संग से लाभ होता है। उत्तम भूमि की प्राप्ति हो,
जातक सत्कर्म करे और उसके प्रभाव में वृद्धि हो। जातक के किसी
गुरुजन को चोट लगे या उसके स्वयं के नेत्रों में कष्ट हो ॥४६॥
(ix) बृहस्पति की महादशा में राहु की अन्तर्दशा का फल :
बन्धुओं को संताप हो या बन्धुओं से संताप हो। मस्तिष्क में
घोर दुश्चिन्तायें और व्यथायें रहें। बीमारी हो, चोर से भय हो।
किसी गुरुजन को बीमारी हो या जातक को स्वयं को उदर-विकार
हो। राजा से पीड़ा प्राप्त हो। शत्रुओं से कष्ट वृद्धि हो, धन का नाश
हो। बृहस्पति देवताओं के गुरु हैं। राहु देवताओं का शत्रु है, इसलिये
बृहस्पति में राहु का अशुभ फल होना स्वाभाविक ही है ॥४७॥
शनि को महादशा में विविध अन्तर्दशाओं का फल
कृषिवृद्धिभृत्यमहिषाभ्युदयः
पवनामयो वृषलजातिधनम् ।

इक्कीसवाँ अध्याय : प्रत्यन्तर्दशाफल ४७१
स्थविराङ्गनाप्तिरलसत्वमघो
निजवत्सरान्तरगते रविजे ॥४८॥
सुभगत्वमस्ति सुखिता वनिता
नृपलालनं विजयमित्रयुतिः ।
त्रिगदोद्भवः सहजपुत्ररुजा
शनिदायहारिणि शशाङ्कसुते ॥४९॥
मरुदग्निपीडनमरि व्यसनं
सुतदारविग्रहमतिः सततम् ।
अशुभावलोकनमहेश्च भयं
, मृदुवत्सरं हरति केतुपतौ ॥५०॥
सुहृदङ्गनातनयसौख्ययुतः
कृषितोययानजनितार्थचयः ।
शुभकीर्तिरुद्भवति देहभृतां
यमदायहारिणि भृगोस्तनये ॥५१॥
मरणं तु वा रिपुभयं सततं
गुरुवर्गरुग्जठरनेत्ररुजा ।
धनधान्यविच्युतिरिह प्रभवेत्-
रविजाय