फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबीसवाँ अध्याय : अन्तर्दशाफल ४४३
२. तृतीय, अष्टम या ग्यारहवें घर का स्वामी होना. दोषयुक्त
होता है । पंचम या नवम का स्वामी होना शुभ होता है ।
३. तीसरे, छठे या आठवें का मालिक होने से बृहस्पति दोष-
युक्त हो जाता है लेकिन आठवें घर का मालिक होने पर भी यह योग
देने वाला होता है ।
४. यदि शुक्र छठे स्थान में हो तो योग देने वाला होता दे ।
१२वें घर में भी शुक्र का यही फल है ।
५. राहु यदि चतुर्थ, पंचम, दशम या एकादश में हो तो योग देता
है ऐसा उत्तम ज्योतिषियों ने कहा है ।
६. यदि सौम्य ग्रह केन्द्र के स्वामी हों तो योग नहीं देते । केन्द्र
में स्थित केन्द्रनाथ यदि क्रूर हों तो राजयोग देते हैं ।
७. जिस भाव में शनि स्थित हो या जिस भाव को शनि
देखता हो उस भाव की न्यूनता होती है । किन्तु शनि तृतीय या
नवम को देखे तो उस भाव की (जिस को देखता हो) प्रबलता
होती है ।
८. यदि क्षीण चन्द्रमा लग्न में हो तो जातक मन्द बुद्धि होता
है और अन्य लोगों से पोषित होता है । यदि पूर्ण चन्द्र लग्न में हो
तो जातक गुणवान्, भाग्यवान् होता है।
९. यदि चन्द्रमा और मंगल लग्न में हों या चन्द्रमा और मंगल
अष्टम में हों तो जातक भाग्यवान् होता है ।
१०. मंगल यदि चतुर्थेश के साथ हो तो निश्चय स्थावर सम्पत्ति
(खेत, मकान) का मालिक होता है ।
११. यदि चौथे घर के स्वामी के साथ वृहस्पति चौथे घर में
हो तो वह गाय आदि चौपायों का मालिक होता है ।