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सर्वकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

पृष्ठ 441, कुल 684 में से

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४४० फलदीपिका

२२. यदि दसवें घर का मालिक दसवें; नवें घर का मालिक
नवें, हो तो भी वही फल जो ऊपर २० में दिया गया है ।
२३. यदि दसवें और पाँचवें घर के मालिक दोनों, एक-एक
या एक साथ दसवें या पाँचवें घर में बैठे हों तो राज योग और यश
होता है ।
२४. यदि नवें और दसवें घर के मालिक सातवें और पहले
घर में बैठे हों तो राज योग और यश प्राप्त करता है ।
२५. यदि पाँचवें, सातवें और दसवें के मालिक केन्द्र और
कोण में हों तो जातक को राज योग और यश प्राप्त होता है।
महादशा-फल तरंग
अब महादशा सम्बन्धी कुछ योग बताये जाते हैं ।
१. शुक्र की महादशा में शनि का अन्तर या शनि की महादशा
में शुक्र का अन्तर हो तो जातक योगहीन हो जाता है अर्थात् यह
अन्तर्दशा कष्टकारक होती है।
२. जिन व्यक्तियों का धनु या मीन लग्न में जन्म हो उनकी
शनि की दशा में शुक्र की अन्तर्दशा में शनि उत्तम फल करता
है और शुक्र की महादशा में शनि अच्छा फल देता है ।
३. यदि आठवें घर का मालिक छठे, आठवें या बारहवें घर
में बैठा हो और उसकी महादशा हो तो छठे आठवें या बारहवें घर
के मालिक की अन्तर्दशा में मारक फल होगा ।
४. यदि तीसरे तथा दसवें घर के मालिकों का सम्बन्ध हो तो
दसवें घर के मालिक की दशा में योग नहीं होता बल्कि अवयोग होता
है । किन्तु तीसरे घर के मालिक की दशा में उत्तम योग होता है ।
५. यदि (i) कोई ग्रह लग्न या सातवें घर में हो या (ii)
नवें घर का मालिक सातवें घर में हो तो ऐसे ग्रह की दशा में
जातक अपने पुरुषार्थ से धन कमाता है ।