पद्मावत (मलिक मोहम्मद जायसी - सटीक ऐतिहासिक महाकाव्य)
Padmavat with Hindi Commentary
मलिक मोहम्मद जायसी / पं. रामचन्द्र शुक्ल द्वारा
६६ पद्मावत।
अहो महा बिश्वासी देवा। कित मैं आय कीन्ह तू सेवा ॥
आपन नाव चढ़ै जो देइ । सो तो पार उतारै खेइ ॥
सुफलजानि पग ढेक्यों तोरा। सुआँ का सेमर तू भा मोरा ॥
पाहन चढ़ि जो चहिभा पारा । सो ऐसे बूडै मँझधारा ॥
पाहनै सेवो कहां पसीजा । जनमत पलवै जो जलभीजा ॥
बावर सोई सुपाहन पूजा । सकत की मार लई शिरदूजा ॥
काहे न पूजै सोई निराशाँ । मुँये जीत मन जाकर आशा ॥
दो० सिंह तरैंदा जेहिं गही, पार भये ते साथ।
तेपै बूडै बारहिं, भेंड पूंछ जेहि हाथ ॥
देव कहा सुनि बौरे राजा। देवहि अगमने मारा गाजौ ॥
जो पहिले अपने शिर परी । सो का काहुक धरधरै करी ॥
पद्मावत राजा की बौरी। आय सखिन सो मंडफ उघारी ॥
जैस चांद गोहने सब तारा। पख्यो भुलाय देख उजियारा ॥
चमके दर्शन बीजे की नाई। नयने चक्र चमकात भवाँई ॥
हों तेहि दीप पतङ्ग होय परा । जिवजिमि काढ स्वर्ग लै अचरा ॥
फेर न जाना वहँ का भई । वहँ कैलास कि कहें अपैंसई ॥
दो० अबहूँ मरों निसौसी, हिये न आवै सांस ।
रुगिया की को चालै, बैदहि जहां उपास ॥
अनहों दोष देउँ का काहू । सुनिके कयों मर्यो नहिं ताहू ॥
हितू पियारा मीत बिछोई । साथ न लाग आपका सोई ॥
पैर १ तोता २ पत्थर ३-४ खिदमत ५ मुश्किल समय का बोझ कौन
दूसरा उठाता है ६ नाउम्मेद ७ मरना ८ शेर ६ पकड़ना १० पहिले ११
विजुली १२-१७ दस्तगीरी १३ लड़की १४ साथ १५ दांत १६ आंख १८
घूमना १६ जिसतरह २० आसमान २१ छिपना २२ वेदम २३ दिल २४
बदन २५ मेहरबानी २६ दोस्त २७-२८ जुदाई २६ ॥
पद्मावत । ६७
कामैं कीन्ह जो कायापोषी । दोषै न मोहिं आप निरदोषी ॥
फाग बसन्त खेल गइ गोरी । मोहितनलाग आग जस होरी॥
अबअसकाहिद्यारै शिरमेलों । छारेहनों फाग तस खेलों ॥
कित तप कीन्ह छांड़िके राजू । आहुंरेंगयों न भा सिधिकांजू ॥
पायौं न होय योगी यती । अब सरैं चढ़ों जगैं जस सती ॥
दो० आय पीतम फिरगया, मिला न आय बसन्त ।
अबतन होरी लायके, जार करों भसमन्त ॥
कुकनों पंख जैसो सँरि साजा । तस सरिबैठि जराचहिराजा ॥
सकल देवता आय तुलाने । वहिं कस होय देवअस्थाने ॥
विरह अगिन वज्रांगे असूझा । जरै शूरै न बुझाये बूझा ॥
तेहिके जरत जो उठै बिजौंगी । तीनों लोकजरहिं तेहिलागी॥
अबकी घड़ी चिनग तेहिं छूटे । जराहिं पहाड़ पहनै सब फूटे ॥
देवता सबै भस्म होय जाहीं । छार समेटे पावत नाहीं ॥
धर्ती स्वर्ग होय सब तातौ । है कोई यहि राखि विधातौ ॥
दो० मुहम्मद चिनग प्रेमसुनि, गगनैं औ मही डराय ।
धन विरहिन औ धनहियों, जहँयह अगिन समाय ॥
हनुमत वीर लङ्क जे जारी । पर्वत उही अहा रखवारी ॥
बैठि तहां भा लङ्का ताका । छठये मासैं वही उठ हांका ॥
तेहिकी आग वहू पुनि जरा । लङ्का छांड़ि पलङ्गो परा ॥
तहां जाय यह कहा सँदेशू । पार्व्बती औ जहां महेँशू ॥
तनपालना १ कसूर २ राख ३ उमर ४ चिता ५-७ नाम चिड़िया ६
सब ८ पहुँचना ६ मकान १० सख्त ११ बहादुर १२ लूक १३ पत्थर १४
ज़मीन १५-२० आसमान १६-१६ गर्म १७ ईश्वर १८ दिल २१ महीना २२
कहां २३ महादेवजी २४ ॥
६८ पद्मावत ।
योगी आय बियोगी¹ कोई। तुम्हरे मँडफ आग तेहि बोई॥
जरी लँगूर सुरंती² उहां। निकस जो भाग भये करमुहां॥
तेहिं बज्राङ्ग जरेहों लागा। बजरङ्गी जरउठा तो भागा॥
दो० रावण लङ्का मैं दँही, वै मोहिं डाँढ़ी आय।
गगन पहाड़ होत है रावट, को राखे गँहि पांय॥
खण्ड अठारहवां पार्वतीमहेशखण्ड॥
ततखन पहुँचे आय महेशू। वाहन बैल कुष्ठिकर भेशू॥
काँथरे कर्या हड़ावरैं बांधे। मुण्डमाल औ जनेऊ कांधे॥
शेषनागै सोहै करकँठेमाला। तन विभूति हस्ती कर छाला॥
पहुँची रुद्र कमलकी कंठा। शशि⁴ माथे औ शिर पर जटा॥
चँवरघंटे⁵ औ डमरू हाथा। गौरा पार्वती धनि साथा॥
औ हनुमन्त वीर सँग आवा। धरे भेष जनु बन्दर छावा॥
औ तेहि कहिन न लावहु आगी। ताकर शर्म्म जरहि जेहि लागी॥
दो० की तप करे न पारहि, की रि नसायें हि योग।
जियत जीव कस काढ़ोसि, कहो सो मोसों वियोग⁶॥
कहेसि को मोहिं बात हि विहँ भावा। हत्या केर न तोहि डिरावा॥
जरे देहु दुख जरों अपारा। निसितिरैं परों जाय यकवारा॥
जस भरथरी लाग पिंगलौँ। मोकहँ पद्मावत सिंहला॥
मैं पुनि तजौँ राज औ भोगू। मुनि सुनाउँ कीन्हों तपयोगू॥
यहिं मठ सेयों २४ आय निराशा। की सु पूज मन पूजन आशा॥
- दुखी १ लाल २ पत्थर सा चदन ३ जलाना ४-५ राख ६ पकड़ना ७
गुदड़ी ८ चदन ६ हांडों की माल १० सांप ११ गरदन १२ हाथी १३
चांद १४ घण्टी १५ क़सम १६ निबाहना १७ बरबाद १८ दुःख १६
रिहाई २० नामयोगी २१ नामरानी २२ छोड़ना २३ ख़िदमत २४॥
ते यह जिव डांढे परदाधा । आधा निकसरहाघट आधा ॥
जो अधिजरसों विलँबन लावा । करत बिलम्ब बहुत दुख पावा ॥
दो० एतना बोल कहत मुख, उठी बिरहकी आग ।
जो महेश नहिं अमी बुझावत, सकल जगत हुत लाग ॥
पार्वती मन उपजा चाऊँ । देखो कुँवरकेर सत भाऊ ॥
वहिं यह बीच किंप्रेमहि पूजा । तन मन एक कि मारगँ दूजा ॥
भईस्वरूप जानहु अप्सराँ । विहँसि कुँवरकर आँचर धरा ॥
सुनो कुँवर मोसों एक बाता । जस रंगमोर न दूसर राताँ ॥
औ विधि रूपदीन्ह है तोका । उठा सुशबदै जाय शिवलोका ॥
तबहों तोकहँ इन्द्रपठाई । की पद्मिन तुइँ अप्सरै पाई ॥
अब तजि जरन भरन तप योगू । मोसो मानि जन्म भर भोगू ॥
दो० हौं अप्सरै कैलासकी, जेहिसँ पूजनकोय ।
गो तजि सँवरजोवह मरिस, कौन लाभ तेहि होय ॥
भलहिं रंगतुहि अप्सर राताँ । मोहिं दुसर सो भावन बाता ॥
मोहिं वह सँवरि मुयेअसलहौं । नयनैं जो देखिसिपूँछसि कहा ॥
अबहिंताह जिवदिये न पावा । तेहिअस अप्सर ठाढ़ मनावा ॥
जो जिवदेहों वहकी आशा । नजनौं काह होय कैलाशा ॥
हौं कैलास काहि लै करों । सो कैलास लाग जेहिमरों ॥
वहकी बारै जीय निसवारों । शिर उतार न्योछावर डारों ॥
ताकर छाँहै कहै जो आई । दोउ जगतँ तेहिदेउँ बड़ाई ॥
दो० वह न मोर कछुआशा, हों वह आश करेउँ ।
जलाना १ महादेवजी २ अमृत ३ सब ४ पैदा होना ५ चाहना ६
राह ७ इन्द्रलोककी परी ८-१८-१६ हँसना ६ लाल १० ईश्वर ११
आवाज़ १२ इन्द्रतक भेजोंगी १३ छोड़ना १५-१८ बराबर १७ फ़ायदा १६-२१
लाल २० आंख २२ दरवाज़ा २३ न्योछावर २४ ख़बर २५ जहान २६ ॥
१०० पद्मावत ।
तेहि निराश प्रीतम कहँ, जिवनदेउँ का देउँ॥
गौरी हँसि महेशों सों कहा। निश्चयहि बिरहानलैं दहा ॥
निश्चै यहि वह कारनें तपा। प्रवलै प्रेम न आछे छिपा ॥
निश्चै प्रेम पीर यहि जागा। कसैं कसौटी कंचनं लागा ॥
बदनपिंयर जलटपकै नयना। प्रकटै दोउ प्रेमके बयना ॥
यहिं वह जन्म लागके सीखा। चही न औरहि ओही रीझा॥
महादेव देवन के पिता। तुम्हरे शरण राम रणजिता ॥
येहूँ कहँ तस मया करेहू। पूरवहु आश कि हत्या लेहू ॥
दो० हत्या चढ़ायहिं कांधदुइ, औ तिनके अपराध ।
तिसरेलेहु कि माथे, जोरलिये कियें साध ॥
सुनि के महादेव की भाखों। सिद्धैंपुरुष राजैं मनलाखा ॥
सिद्धहि अङ्गें न बैठे माखी। सिद्धिपलकनहिलावहिंआंखी ॥
सिद्धिहि अङ्गहोय नहिं छाया। सिद्धहोय नहिं भूखनमार्थों॥
जो जगैं सिद्धि गुसाईंकीन्हा। प्रकंटैं गुप्तं रहै कोचीन्हा ॥
बैल चढ़ा कुष्ठी कर भेषूँ। कहिराजासत आहिमहेशू ॥
चीन्हेसोइ रहै तेहि खोजा। जसंबिक्रमं औ राजाभोजा॥
केजिवंतन्तै मन्तै सों हेरा। गयोहिराय जो वह भा मेरा॥
दो० बिनगुरु पन्थै न पावै, भूलासोइ जो मेट ।
योगीसिद्धहोय तब, जब गोरखै सों भेट ॥
ततखनै रतनसेन घाबरा। छांड़ि डफार पांय लैपरा ॥
महादेवजी १-१८ बिरहकी आग २ जलना ३ संबध ४ ज़बरदस्त ५
सोना ६ ज़ाहिर ७-१५ आवाज़ ८ मेहरबानी ६ बातचीत १०
मर्देकामिल ११ बदन १२ दुनियां दौलत १३ दुनियां १४ छिपा हुआ १६
सूरत १७ राजाबिक्रमाजीत १६ तलाश २० देखना व ढूंढ़ना २१ राह २२
नाम योगी २३ यकायक २४ ॥
१५653 पद्मावत । १०१
माता पिता जन्म कित पाला । जो अस फंद अमों घाला ॥
धर्त्ती स्वर्ग मिले हत दोऊ । कितनिरारे करदीन्ह बिछोऊ ॥
पदक पद्वारथ कर हुतखोवा । टूटहिं रतनें रतनतस रोवा ॥
गंगन मेघ जस वर्षहिं भली । धर्त्ती पूर सलिलं होय चली ॥
सायरं उवटशिखरकी पौटी। चढ़ीपानि पाहने हिये फाटी ॥
बूँद पानि होय होय सब गिरे। प्रेम फन्द कोऊ जन परे ॥
दो० तसरोवे जस जिव जरै, गिरै रकत औ मांस ।
रोम रोम सब रोवहिं, सूंतै सूत भर आंस ॥
रोवत बूड़ उठा संसारू । महादेव तब भयो मयारू ॥
कहसि न रोव बहुत तैं रोवा। अब ईश्वर भा दारिद्र खोवा॥
जो दुख सहै होय सुखओका । दुखबिनसुखनजायशिवलोका॥
अब तू सिद्धै भया सुख पाई। दर्पण कयौँ छूटिगइ काई ॥
कहूं बात अबहूं उपदेशी । लाग पंथैं भूले परदेशी ॥
जौ लहि चोर सेंध नहिं देई । राजा केर न मूसै पेई ॥
चढ़े तो जाय पार वह खूंदी । परै तो सेंध शीश सों सूंदी ॥
दो० कहूंतोहिं सिंहलगढ़हि, है खंड सात चढ़ाव ।
फिरा न कोई जीते जिय, स्वर्ग पंथदे पांव ॥
गढ़ तसवाकैँ जैसतोर कार्यां । पुरुष देखि ओहीकी छाया ॥
पाई नाहिं जूझ हठ कीन्हे । नें पावा तैं आपहिं चीन्हे ॥
गर्दन १ ज़मीन २ आसमान ३-८-२५ अलग ४ लाल वा जवाहर ५
हाथ ६ आंख ७ पानी ६ तालाब १० धोबी का पाटा ११ पत्थर १२
छाती १३ खून १४ सूराख १५ मेहरबानी करनेवाले १६ कामिल १७
आईना १८ बदन १६-२८ नसीहत २० राह २१ पूंजी २२ खाई २३
शिर २४ क़िला तथा बदन आदमी २६ पेंचदार २७ मर्द २६ ॥
१०२ पद्मावत ।
नौ पौंरी १ ते गढ़ मँझियाराँ । औ तहँ फिरहिं पांचकुतवाराँ ॥
दशौंदौर गुप्त एक नाके । अगमं चढ़ाव वाट सुठिबांके ॥
भेदी जाय कोई वह घाटी । जौलहिभेद चढ़ै होयचांटी ॥
गढ़तरि कुण्ड सुरंग तेहि माहां । ते वे पंथ कहौं तोहि पाहां ॥
चोर पैठि जस सेंध संवारी । जुवा पैंत जस लाय जुवारी ॥
दो० जसमरजिया समुद्रधस, मारेहाथ आवतस सीप ।
ढूँढ़ि लेहु जो स्वर्ग द्वारे, चढ़ै सो सिंहलदीप ॥
दशौंदुवार ताल का लेखा । उलट दृष्टि१२ जो लावेसोदेखा॥
जायसोजायश्वास मनबन्दी। जसधसिलीन्हकान्है कालिन्दी ॥
तू मनमाथ मारके श्वासा । जो पै मरहि आप कर नासा ॥
प्रकट लोकचार कहुँ बाता । गुप्तं लाव मन जासों रातों ॥
होंहूँ कहत सबैमति खोई । जो तू नाहिं आहि सबकोई ॥
जीतहि जुरी मरै इकबारा । पुनि को मीचै मरै को पारा ॥
आपहिं गुरु सो आपहिं चेला । आपहिं सब औ आप अकेला ॥
दो० आपहिं जीवन मरनपुनि, आपै तनमन सोध ।
आपहिं आप करै जो चाहै, कहां सो दूसर कोय ॥
पाद-टिप्पणियाँ (Footnotes):
नौ दरवाज़ा तथा नौ सूराख बदन के आंख २ कान २ मुँह एक १
नथुना २ गुदा १ लिंग १-१ दरमियान २ पांच कोतवाल यहां मुराद
काम क्रोध अहंकार लोभ वगैरह से है ३ दश इंद्रिय बदनकी कर्मेंद्रिय ५
ज्ञानेंद्रिय ५-४ छिपा हुआ ५ जहां किसी का दखल न हो ६ राह ७
बहुतटेढ़ा ८ चींटी ६ दांव १० दश दरवाज़े बदन आदमी के ११
निगाह १२ योग की क्रिया बाँयें पैरकी रग दहिने पैरसे पकड़ श्वास
को तोंदी के नीचे से रोक दो अँगुली से होंठ बीच की अँगुली से
दोनों नथुने दोनों शहादत की अँगुली से आंख दो अँगुली से कान के
सूराख बन्द कर ईश्वर का नाम तोंदी से खींच कर ब्रह्मांड को श्वास
चढ़ाये १३ श्रीकृष्णजी १४ यमुना १५ ज़ाहिर १६ छिपा १७ लाल १८
मैं १६ अक़्ल २० मौत २१ जीना २२ ॥
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पद्मावत । १०३
खण्ड उन्नीसवां राजा गढ़ छेंका खण्ड ॥
सिधि गुटका राजैं जो पावा । औ भइसिद्धि गणेश मनावा ॥
जब शंकर सिधि दीन्ह कुटका । परी हूल योगिन गढ़ छेका ॥
सबै पद्मिनी देखहिं चढ़ी । सिंहल घेर गईं उठि मढ़ी ॥
जस घर फिरा चोर मतकीन्हा । तेहिविधिसेंधचाहिगढ़दीन्हा ॥
गुप्त चोर जो रहे सो सांचा । परगट होय जीव नहिं बांचा ॥
पँवरपँवरे गढ़ लाग केंवारा । औ राजा सों भई पुकारा ॥
योगी आय छेंक गढ़ मेली । नाजनौं कौन देश कहँ खेली ॥
दो० भयो रजायसु देखो, को भिखार अस ढीठ ।
वेगैं वरज तेहि आवहिं, जन दुइचार बसीठँ ॥
उत्तर बसीठैं दुइआय जुहारी । की तुम योगी की बनजारी ॥
भयो रजायसुँ आगेंखेलहिं । गढ़ तरछांड़ि अन्तँ होय मेलहिं ॥
असलागहिकेहिकेसिखै दीन्हें।आयहिम रहिहाथंजिवलीन्हें॥
यहां इन्द्रासन राजा तपा । जाहि रिसाय सूरै डरछिपा ॥
हो बनजार तो वनजैं विसाहो । भर व्योपार लेहु जो चाहो ॥
योगी होहुतो युक्ति सों मांगहु । मुक्ते लेहु लैमारेगं लागहु ॥
यहां देवता आश के हारी । तुम पतङ्गै को आहि भिखारी ॥
दो० तुम योगी वैरागी, कहत न मानी कोह ।
लेहु मांग कछु भिक्षा, खेल अन्तकहँ होहिं ॥
आन जो भीखहों आयों लिये । कसन लेउँ जो राजा दिये ॥
पद्मावत राजा की बारी । हौं योगी वह लाग भिखारी ॥
पाद-टिप्पणी:
दरवाज़ा १ हुक्म २-७ जल्द ३. वकील ४-५ सलाम ६ जाना ८
क़िला ६ और जगह १० सिखाना ११ सूर्य १२ माल १३ तदवीर १४
रोज़ी १५ राह १६ पांखी १७ चले जाउ और कहीं १८ भीखके वास्ते १६
लड़की २० ॥
१०४ पद्मावत ।
खप्पर लिये बारे भा माँगों । भुक्तिं देइ लै मारगे लागों ॥
सोई भुक्ति परापत पूजा । कहां जाउँ असबार न दूजा ॥
अब धर यहां जीव वह ठाँऊँ । भस्म होहुँ पै तजों न नाऊँ ॥
जस बिनप्रान पिण्डै है हूँछा । धर्म लाग कहिये जो पूँछा ॥
तुम सों बसीठ राजा की ओरा । शाखै होहु यह भीख निहोरा ॥
दो० योगीबार आवसो, जेहि भिक्षा की आस ।
जो निराश दृढ़ आसन, कितगवैने केहिपास ॥
सुनि बसीठ मन अपने रिसा । यव पीसंत घुनजायहि पिंसा ॥
योगी ऐस कहै नहिं कोई । सो कहुबात योग तेहि होई ॥
वह बड़ राज इन्द्र कर पाटोँ । धर्त्ती परे स्वर्ग को चाटा ॥
जो यह बात जाय तहँ चली । छूटहिं अबहिं हस्तिं सिंहली ॥
औ छूटहिं तहँ वज्र के कूटों । बिसरे झुके होय सबखूटों ॥
जँहलग दृष्टि न जाय पसारी । तहां प्रसारसि हाथ भिखारी॥
आगे देखि पांवधरि नाथा । तहां न देखि टूटि जहँ माथा ॥
दो० वहरानी जेहिजुगतमहँ, तेहि राज औ पाँटँ ।
सुन्दर जाय राजघर, योगिहि बन्दर काट ॥
जो योगी सत बन्दर काटा । एके योग न दूसर बाँटा ॥
और साधना आवै साधे । योग साधना आपहिं दाँधे ॥
सरै पहुँचाउ योग कर साथू । दृष्टि २१ चाहि अगमनै होय हाथू॥
तुम्हरे जोर सिंहल के हाथी । हमरे हस्तिं २२ गुरु है साथी ॥
दरवाज़ा १ भीख २ रास्ता ३ जगह ४ छोड़ना ५ बदन ६ शाख मेवा
भरी ७ कहां जाउँ ८ लायक ६ तख़्त १० आसमान ११ हाथी १२
पत्थरके गोले १३ भीख मांगना १४ चारों तरफ़ १५ निगाह १६ तख़्त १७
राह १८ जलाना १६ आखिर २० नज़र से ज्यादा २१ पहिले २२ हाथी २३ ॥
हस्तनेस्तै १ वह करतन बारौँ २। परबत करै पांव की छारौँ ३॥
जोरगिरे ४ गढ़ जानवन्तैं ५ भये । जो गढ़ गर्ब करहिं तें नये ६॥
अन्तैं जो चलना कोउ न चीन्हा। जो आवा सो आपन कीन्हा॥
दो० योगिहि कोह न चाही, तब न मोहिं रिस लाग ।
योग तन्त ज्यों पानी, काहि करै तेहि आग ॥
बसीठहिं जायकही सबबाता। राजा सुनत कोह भा राता १०॥
ठांवहिं १२ ठांव कुँवर सर्वभीखे १३। के अबलहिं ये योगी राखे ॥
अवहूँ वेगहि १४ करो संयाऊँ १५। तस मारहु हत्या किन होऊ १६॥
मन्त्रिनैं कहा रहो मनबूझे । प्रति १७ न होय योगिहिसों जूझे १८॥
वे मारे तो काह भिखारी। लजि होय जो मानी हारी ॥
ना भल मुये १९ न मारे मोखूँ २०। दुहूँवात तुम्ह लागहि दोखूँ ॥
रहे देहु जो गढ़तरैं २१ मेली। योगी कितैं २२ आये पुनि खेली ॥
दो० आयेदेहुँ जो गढ़तरे, जनि चालहु यह बात।
नितहिं २४ जो पाहन २५ भखकरहिं, असकेहिकेमुखदांत ॥
गये बसीठैं पुनि बहुरि न आये। राजैं कहा बहुत दिन लाये ॥
नाजनौं स्वर्ग २६ बात धौं काहा। काहुन आयकही फिर चाहाँ २८॥
पंख न कार्यों २९ पवनैं ३० न पाया। केहिविधिमिलों होउँकेहिधाया॥
सँवर रक्त नयनहि भर चुवा । रोय हँकारेस ३१ माँभी ३२ सुवा ३३॥
परी जो आंसु रक्त ३४ की टूटी। रंग चली जस बीरबहूटी ॥
टिप्पणी/शब्दार्थ:
१ नाश २ ढेर २ राख ३ पहाड़ ४ जहां तक ५ गुरूर ६ मरना ७ खुद-
बीनी की ८ गुस्सा ९ वकील १०-२७ लाल ११ जगह १२ भुलाया १३
जल्द १४ तदबीर १५ सलाहकार १६ बड़ाई १७ लड़ाई १८ मरना १९
नजात २० पाप २१ क़िलेके नीचे २२ कितने आये और चले गये २३
रहने दो २४ हर रोज़ २५ पत्थर २६ आसमान तथा क़िला २८
खबर २९ बदन ३० हवा अर्थात् ज़ोर ३१ बुलाया ३२ दरमियानी ३३
तोता ३४ खून ३५॥
१०६ पद्मावत।
बहीरक्त लिख दीन्हीं पाती। सुंवा जो लीन्ह चोंच भइरांती ॥
बांधी कंठ पड़ा जस क्रांथौ। बिरहिकैं जरा जायकहँ नाथौ ॥
दो० मसि नयनों लिखनी बरन, रोय रोय लिखा अकथ्थै।
आखरैं दहै न कोई छुवै, दीन्ह परेवा हाथ ॥
औ मुख बचन सो कहौसि परेवा। पहिले मोर बहुतके सेवा ॥
पुनिरै सँवार कहोसि अस दूजी। जेउ बलैं दीन्ह देवतन पूँजी ॥
सो अबहीं तब से बल लागा। वल जिवरहा न तन सो जागा ॥
अलहि ईशहूँ तुमवल दीन्हा। जहाँ तुम तहाँ भाववल कीन्हा॥
जो तुम मयौ कीन्ह पग धारा। दृष्टि दिखाय बान विषमारा ॥
जो असजाकर आशा सुखी। दुख महँ एसन मारै दुखी ॥
नयनै भिखार न मानहिं सीखा। अगमनै दौरे लीन्ह पै भीखा ॥
दो० नयनहिं नयन जो बेधगये, नहिं निकसैं वे बानै।
हिये जो आखरं तुम लिखी, ते शठ घटहिं परान ॥
ते बिष बान लिखूँ कहँ ताई। रक्तै जो चुआ भीज दुनियाई ॥
जान सुकोरी रक्तपसेऊँ। सुखी न जान दुखीकर भेऊँ ॥
गिनलपीरतिन काकर चिन्तौं। प्रीतमनिष्ठुर होहि अस निन्तौं॥
कासों कहूँ बिरह की भाखा। जासों कहों होय जरराखा ॥
बिरह आग तन जरमैं जरै। नयननीर सायर सब भरै ॥
पाती लिखी सँवर तुम नामा। रक्त लिखे आखर भय श्यामा॥
आखर जरहिं न कोई छुवा। तब दुख देख चला लै सुवा ॥
लाल १ गरदन २ निशान ३ आशिक ४ काजल आंखका ५ पलक ६
हाल ७ हर्फ ८-२० जलना ६ ज़ोर १० मौजूद ११ ईश्वर १२ मेहर-
बानी १३ नज़र १४ आंख १५-१७ आगे १६ तीर १८ छाती १६ खून २१
कालासांप २२ लाल पसीना २३ भेद २४ अंदेश २५ बेदर्द २६ अर्थात्
हमेशा से होते आये हैं २७ आँखका पानी तथा आँसू २८ तालाब २६
अर्थात् कालेहर्फ ३० ॥
पद्मावत। १०७
दो० अय शठ मरों बुद्धि गई पाती प्रेमपियारे हाथ।
भेंट होत दुख रोय सुनावत जीव जात जो साथ॥
कंचनतार १ बाँधगये २ पाती। लैगा सुवा जहां धनराती॥
जैसे कमल सूर्य की आसा। तोर कंथ बहु मरै पियासा॥
बिसरा भोग सेज सुख बासू। जहाँ भँवर सब तहां हुलासू॥
तवलगि धीर सुना नहिं पीउ। सुना तो घड़ी रहै नहिं जीउ॥
तवलगि सुख हियँ प्रेम न जामा। जहां प्रेमका सुख विश्रामा॥
अगर चंदन दुखदहे शरीरूं। औ भा अगिनकणों करचीरूँ॥
कथा कहानी सुनि सुठि जरा। जानो घीव बसन्दरै परा॥
दो० बिरहन आप सँभारे मैल चीर शिर रूख।
पिउपिउ करत रातदिन, पपिहा मुख मै सूख॥
ततखन गा हीरामने आई। मरत पियास ओह जनु पीई॥
भल तुम सुआ कीन्ह है फेरा। गाँठि नजानहु प्रीतम केरा॥
बातहिं जानो विषम पहारा। हृदये नमिला न होय निराराँ॥
मर्म पानि कर जानि पियासी। जो जल मैहें ताकहँ काआसा॥
का रानी यहि पूँछहु बाता। जन कोई होय प्रेमकर राताँ॥
तुम्हरे दरशनलाग वियोगी २४। अहा सो महादेव मठ योगी॥
तुम वसन्तलै तहां सिधाई। देव पूज पुनि औ फिर आई॥
दो० दृष्टि २५ बान तस मारेहु खाय रहा तेहि ठांव।
दूसर बार न बोलहि लै पद्मावत नांव॥
० खाली १ सोनेका तार २ गरदन ३ अर्थात् पद्मावत ४ खाविन्द ५ खुशी ६
दिल ७ आराम ८ जलना ६ बदन १०-११ कपड़ा १२-१४ आग १३
उसी वक्त १५ नाम तोता १६ मुश्किल १७ टेढ़ा १८ दिल १६ अलग २०
भेद २१ पानी २२ अर्थात् दीवाना २३ दुःखी २४ निगाह २५ जगह २६॥
१०८ पद्मावत ।
रोम रोम बान वे फूटी। सूतहिं सूत रुधिर मुख छूटी ॥
नयनन्हि चली रक्तकी धारा। कन्था भीज भयो रतनारौ ॥
सूरूज बूड उठा परभाताँ। औ मंजीठ टेसू वनराँता ॥
भयो बसन्त राती बनपती। औ जितने सब योगी यती ॥
भूमि० जो भीज भयो सब गेरू। औ राती तहँ पङ्खपखेरू ॥
राती सती अगिन सबकार्याँ। गगन मेघ राती तहँ छाया ॥
इंगुरभा पहाड़ जो भीजा। पै तुम्हार नहिं रोम पसीजा ॥
दो० तहां चकोर औ कोकिला, मर्यो हिये तेहि पैठ।
नयनन रक्तै भरायहि, तुम फिर कीन्ह न डीठ ॥
ऐसो बसन्त तुम्हीं पै खेलहु। रक्त पराये सेंदुर मेलहु ॥
तुम तो खेल मन्दिर कहँ आई। वह का मर्म१६ जसजान गुसांई१७॥
कहेसि मरै को वारहि बारा। एकहि वार होहुँ जरछारौ ॥
सैर रच चहा आग जो लाई। महादेव गौरी सुधि पाई ॥
आय बुझाय दीन्ह पँथ तहां। मरनखेलकर आगमें जहां ॥
उलटा पंथ प्रेमकी वारों। चढ़ै स्वर्ग जो परै पतारा ॥
अब धसलीन्ह चही तेहिआशा। पावै श्वास कि मरै निराशा ॥
दो० पाती लिख सो पठाई, लिखा सबै दुख रोय।
धौं जिवरहै कि निसरै, कहा रजायसुँ होय ॥
कहिके सुआ छोड़ दइ पाती। जानहु दब्वै छूट तसताँती ॥
गेउं२७ जो बांधा कञ्चनै तागा। राती श्याम कण्ठ जर लागा ॥
सूराख १ खून २-१५ आँख ३ गुदड़ी ४ लाल ५-८ भोर ६ लाख ७
जंगल की बूटी ६ ज़मीन १० परिन्द जानवर ११ चदन १२ आसमान १३
मेहरवानी १४ भेद १६ ईश्वर १७ राख १८ चिंता १६ राह २० पहिले २१
दरवाज़ा २२ आसमान २३ हुक्म २४ निहाई २५ गर्म २६ गरदन २७
सोना २८ लाल वा काला २६ ॥
यहाँ पृष्ठ का यथावत देवनागरी लिप्यंतरण प्रस्तुत है:
पद्मावत । १०६
अगिन श्वास मुख निसरै ताती । तरवरै जरहिं तहां को पाती ॥
रोय रोय सुवे कही सो बाता । रक्त कि आंशु भयो मुखराता ॥
देख करठ जरलाग सो केरा । सो कस जरै बिरह अस घेरा ॥
जर जर हाड़ भये सब चूना । तहां मांस को रक्त बहूना ॥
वै तोंहिं लाग कर्यो सब जारो । तपत मीनै जल रहै न पारो ॥
दो० तुहि कारने वह योगी, भस्म कीन्ह तनदाह ।
तू अस निठुर निछोई, बात न पूँछी ताह ॥
कहेस सुआ मोसों सुनि बाता । चहौंतो आज मिलों जसराता ॥
पैसो मर्म न जानै भोरों । जानै मर्म जो मर के होरों ॥
हौं जानतहूँ अबहूँ कांचा । नाजेहि प्रीति रंग थिरैं रांचा ॥
नाजेहि भयो मलयगिरि १३ बासा। नाजेहिरबि १४ होय चढ़े उ अकासा
ना जेहि होय भँवरकर रंगू । ना जेहि दीपक भयो पतंगू ॥
ना जेहिं किरा भृंगै की होई । ना जेहि आप जिये मर सोई ॥
ना जेहिं प्रेम ओट इक भयो । ना जेहि हिये मांझ डरगयो ॥
दो० तेहिंका कहिये रहन, जो है प्रीतम लाग ।
जो वह सुने लेइ धस, का पानी का आग ॥
पुनिधने कनक वान मसि १८ मांगी। उत्तरँ लिखत भीजतनआँगी॥
तस कञ्चने कहँ वही सुहागा । जोनिरमलै नगहोयसुलागा॥
हों योगी मठ मएडफ बहोरी २३ । तहवां कसन गांठ तुम जोरी ॥
गा विपभौरें देखके नयना । सखिनलाजका बोलों बयनों ॥
पेड़ १ चदन २ मछली ३ बेक़रार ४ वास्ते ५ जलाना ६ बेदर्द ७-८
भेद ९ नादान १० मरके जलना ११ क़ायम १२ चन्दन १३ सूर्य १४
नाम कौड़ा १५ तिसको रहने के वास्ते क्या कहूँ १६ पद्मावत १७
क़लम १८ सियाही १९ जवाब २० सोना २१ पाक साफ़ २२ जाना २३
बेहोश २४ आवाज़ २५ ॥
११० पद्मावत ।
खेल मिसें¹ मैं चन्दन घाला । मगें जागेसि तो देवों जैमाला ॥
तबहुँ न जागा गा तू सोई । जागे भेट न सोये होई ॥
अब शँशि² होय चढ़े आकासा³ । जो जिव देय सो आवै पासा ॥
दो० तबलागि भेंकि न लैसका, रावनसिय इकसाथ ।
कौन भरोसे अब कहों, जीव पराये हाथ ॥
अब जो सूर⁴ गगन⁵ चढ़ आवै । राहु होय तौ शँशि कहँ पावै ॥
बहुतेहिं ऐसो जीवपर खेला । तू योगी किनमाहँ अकेला ॥
बिक्रम⁶ धसा प्रेमके बारा⁷ । सम्पावतें कहँ गयो पतारा ॥
सुदीपच्छैँ खण्डारवतैं लागी । गंगनें पूर होयगा बैरागी ॥
राजकुँवरैं कंचनपुरैं गयो । मिरगावतैं कहँ योगी भयो ॥
साधुकुँवरैं खण्डारवतैं योगू । मधु मालतिकहँ कीन्ह वियोगू ॥
प्रेमावतैं कैसुरसरें सांधा । ऊषैं लगि अनिरुद्धैं बरबांधा ॥
दो० हों रानी पद्मावत, सात स्वर्ग पर वास ।
हाथ चढ़ों सो तेहिंके, प्रथमै करै अपनास ॥
हौं पुनि अहौं ऐस तुम रँती । आधी भेट पिरीतम पाती ॥
तोहुँ जो प्रीति निबाहै आंटा । भँवरन देख केतमहँ कांटा ॥
होहु पतङ्ग आवगँहुँ दिया । लेहसमुद्रधसहोय मरि जिया ॥
रँतै रंगजिमि²⁹ दीपकवाती । नयनै लावहोयसीपसेवाति ॥
चात्रिकैं होहु पुकारपियासा । पियो न पानि स्वातिकी आसा ॥
सारंस हो बिछुरी जस जोरी । रैयनि³³ होयजलचकइ चकोरी ॥
बहाना १ शायद २ चाँद ३-७ भीख ४ सूर्य ५ आसमान ६ राजा
बिक्रमाजीत ८ दरवाजा ६ नामरानी १०-१२-१६-१८-२१ राजाभोज ११
नाम जगह १३-१५ नाम राजा १४-१७-२२ भंवर १६ दुखी २० बेटी
बाणासुर २३ पोता श्रीकृष्णचन्द्रजी २४ पहिले २५ लाल तथा खुश २६
निबाह करना २७ पकड़ना २८ सुर्ख २६ जिस तरह ३० आँख ३१
पपीहा ३२ रात ३३ ॥
पद्मावत । ३११
होहु चकोर दृष्टि शश पाहां। औ रवि होहु कमल वहमाहां ॥
दो० होहुँ ऐस तुहिराती, सकेसि तो प्रीति निबाह ।
राहुबेध अर्जुनै होय, जीत दुरपदी ब्याह ॥
राजा यहां तैसे तप झूरा । भा जर बिरह छार कर कूंरा ॥
जिव गँवाय सों गयो विमोही। भाबिनजिव जिवदीन्हेसिओही ॥
कहा पिंगलौ सुखमन नारी। सुन्नसमाधि लाग गइ तारी ॥
बूँद समुद्र जैसो हो मेरा । गा हेराय तस मिलै न हेरा ॥
रंगहि पान मिला जस होय । आपहिं खोय रहा होय सोय ॥
सुवे आय देखा भा नाशू। नयन रक्त भर आये आंशू ॥
सदा प्रीतम गाढ़े करेई। वह न भूल भूला जिव देई ॥
दो० मूरे संजीवन आनके, औ मुखछिड़का नीर ।
गरुड़पंख जस झारै, अमृत बरसा कीर ॥
मुवा जिया अस वास जो पावा। लीन्हेसि श्वास पेट जिव आवा॥
देखिसि जाग सुआ शिरनावा । पाति दीन्ह मुखबचन सुनावा ॥
शब्दै सुनाय अमीमुख मेला । गुरु बुलाय बेगें चल चेला ॥
तोहि अलि कीन्ह आप भाकेवौ। हों पठवा गुरु बीच परेवा ॥
पवन श्वास तोसों मनलाई। जोवै मारगे दृष्टि बिझाई॥
जस तुम काया कीन्हों दांहूं । सो सब गुरु कहँ भयो अगाँहूं ॥
तपावन्तैं बालों लिख दीन्हा । बेगें चलावचहूँसिधि कीन्हा॥
दो० वेग चल आवो अस कहेउ, जीव बसे तुम नाउँ ।
निगाह १ चाँद २ सूर्य ३ नाम भाई राजा युधिष्ठिर ४ रंग ५-६
जुल्म ७ नाम बूटी ८ पानी ६ तोता १० बोल ११ जल्द १२-२४ भँवर १३
केतकी १४ बिचवानी १५ हवा १६ ढूंढ़ना १७ राह १८ निगाह १६
जलाना २० खबर २१ दिन मिला २२ ख़त २३ काम पूरा २५ ॥
११२ पद्मावत।
नयनन्हि भीतरपन्थ है, हिरदयै भीतर ठाँउँ ॥
सुनि पद्मावत की अस मयाँ । भावसन्त उपँजी नई कयाँ ॥
सुआका बोल पवन होयलागा । उठासोय हनुमंत होय जागा ॥
चांदमिलनकहँ दीन्हेसि आशा । सहसँ किरनसूर्यपरकाशा ॥
पाति लीन्ह लै शीश चढ़ावा । दृष्टि चकोर चांद जस पावा ॥
आश पियासा जो जेहि केरा । जो झिककार वही सो हेरों ॥
अब यहि कौन पानि मैं पिया । भै तन पांख पतङ्ग मरजिया ॥
उठा फूल हिरदय न समाना । कन्थों टूक टूक भर आना ॥
दो० जहां प्रीतम वै बसहिं, यहि जिववलै तेहिवाँटे ।
जो सो बुलावै पांव सों, हम तहँ चलै ललोटें ॥
जो पन्थ मिला महेशहि सेई । गयो समुद्र ओही धसलेई ॥
जहँ वहं कुण्ड बिषमै औगाहों । जायपरा तहँ पाव न थाहा ॥
बावर अन्ध प्रेम कर लागू । सौहें धसा कुछ सूझ न आगू ॥
लीन्हेसि धसजोश्वासमनमारा । गुरू मुछन्दर नाथ सँभारा ॥
चेला परी न छांडहि पाछू । चेला मच्छ गुरू जस कांछू ॥
जस धसलीन्ह समुद्र मरजिया । उघरे नयन बरै जस दिया ॥
खोज लीन्ह सो स्वर्ग दुआरा । बज्रं जो मूंदे जाय उघारा ॥
दो० बांकचढ़ाव स्वर्ग गढ़, चढ़त गयो होय भोर ।
भइ पुकार गढ़ ऊपर, चढ़े सेंध दै चोर ॥
राजैं सुनि योगी गढ़ चढ़े । पूँछी पास पंडित जो पढ़े ॥
योगी गढ़ जो सेंध दै आवहिं । बोलहुशब्द शुद्धजसपावहिं ॥
आँख १ राह २ दिल ३ जगह ४ मेहरवानी ५ पैदा होना ६ बदन ७
हज़ार ८ शिर ६ देखना १० गुदड़ी ११ न्योछावर १२ राह १३ माथा १४
महादेवजी १५ टेढ़ा १६ खंवर १७ सामने १८ आसमान १६-२१ पत्थर २०
कहो क्या दण्ड २२ ॥
पद्मावत। ११३
कहहिं बेद पंडित पढ़ बेदी। योग भँवर जसमालति भेदी ॥
जैसे चोर सेंध शिर मेलहिं। तस ये दोउ जीव पर खेलहिं ॥
पंथे नहिं चलहिंबेदजस लिखी। स्वर्गजाय शूलीचढ़ि सिखी ॥
चोर होय शूली पर मोषू। देजो शूली तेहि नहिं दोषू ॥
चोर पुकार बेध घर मूसा। खोलो राज भँडार मंजूसों ॥
दो० जसयेहि राजमंदिर कहँ, दीन्हरयन होय सेंध ।
तैसो इन्ह कहँ मोषहोय, मारहु शूली बेध ॥
खण्डबीसवां मन्त्रीखण्ड गन्धर्वसेन ॥
रांध जो मन्त्री बोले सोई। एसो जो चोर सिद्ध पै कोई ॥
सिद्ध निशंक रयनदिन भोहीं। ताकों जहां तहां अपसोहीं ॥
सिद्ध निडरपै अपने जीवा। स्वर्ग देख वो नावहि ग्रीवा ॥
सिद्ध जाय पै जिवं बघतहां। औरहिं मरन पंख अस कहां ॥
सिद्ध अमर कायो जसपारा। जरहिं मरहिं परजाय न मारा ॥
चढ़ा जो कोप गगन उपराहीं। थोरे साज मरै ते नाहीं ॥
जम्बुकै जूझचढ़े जो राजा। सिंह साजके चढ़े सो छाजा ॥
दो० छेरहि काज कृष्ण करसाजा, राजा चढ़े रिसाय ।
सिद्धगिद्धजहँहृष्टि गगनमहँ, बिनछरकुबनाबिसाय॥
आवहु करहुकदैरै मससाजू। चढ़हिं बजाय जहालगिराजू ॥
होहसंजोवलै कुँवरजो भोगी। सब दललैकैघरहु अब योगी॥
चौबिसलाख छत्रपति साजे। छपनकोटि दैं बाजनबाजे ॥
राह १ नजात २ पाप ३ सन्दूक ४ मर्दैकामिल ५ फिरना ६ देखना ७
पहुँचना ८ गर्दन ६ हमेशाज़िन्दा १० बदन ११ आसमान १२ सियार १३
शेर १४ फ़रेब १५ निगाह १६ लश्कर तय्यार हो १७ मुक़ाबिला १८
राजा १६ फ़ौज २० ॥
११४ पद्मावत ।
बाइस सहस १ सिंहली चाले । गिरि २ पहाड़ पेई सब हाले ॥
जगत बराबर वै सब चाँपा । डरा इन्द्र बासुकि ३ हियें कांपा ॥
पदम कोटि रथ साजे आवहिं । गढ़ होय खेहँ गगन ५ कहँ धावहिं ॥
जनु भौचाल जगत महँ परा । कुर्महिं ७ पीठ टूटि हिय डरा ॥
दो० छत्रहिं स्वर्ग छायगा, सूरय भयो अलोप ।
दिनहि रात अस देखी, चढ़ा इन्द्र होय कोप ॥
देख कटक औ मनमंतं हाथी । बोले रतनसेन के साथी ॥
होत आव दल बहुत असूझा । अस जानव कुछ होय है जूझा ॥
राजा तुइँ योगी होय खेला । यही दिवसैं कहँ हम भये चेला ॥
जहां गाढ़े ठाकूरै कर होई । सङ्ग न छांड़े सेवक सोई ॥
जो हम मरन दिवस मन ताका । आज आय पूजी वह शाका ॥
पर जिव जाय जायनहिं बोला । राजा सतसुमेरु नहिं डोला ॥
गुरू केर जो आयसु पावहिं । साँहें होहिं औ चक्र १६ चलावहिं ॥
दो० आज करहिं रण भारथ, सत बाचा दै राख ।
सत गुरू सत कौतुकैं, सत भरै पुनि साख ॥
गुरू कहा चेला सिध्र होहू । प्रेमबौर दै करो न कोहू ॥
जा कहँ शीशँ नायकै दीजै । रङ्ग न होय जूझ जो कीजै ॥
जेहि जिय प्रेम पानि भासोई । जेहि रंग मिलै वही रंग होई ॥
जो पै जाय प्रेम सों जूझों । कित तपमरहि सिद्ध जेहि बूझा ॥
यहि सत बहुत जूझ नहिं करिये । खड्गै देख पानी है हरिये ॥
पानी कहा खड्ग की धारा । लोट पानि सोई जो मारा ॥
= हज़ार १ पहाड़ २ नाम राजा सापोंका ३ दिल ४ राख ५ आसमान ६-८
कछुवा ७ फ़ौज ६ मस्त १० दिन ११ मुसीबत १२ मालिक १३ हुक्म १४
सामने १५ नाम हथियार १६ तमाशा १७ दरवाज़ा १८ गुस्सा १६ शिर २०
पानी २१ लड़ाई २२-२३ तलवार २४ ॥
पद्मावत । ११५
पानी से ते आग का करई। आये बुझाय पानी जोपरई ॥
दो० शीश दीन्हे मैं आगमने, प्रेमपानि शिरमेल।
अबसो प्रीति निवाहूँ, चलौं सिद्धहोय खेल ॥
राजै छेक धरा सब योगी। दुखेऊपर दुखसहै बियोगी² ॥
नाजिय धड़क हिये³ डरकोई। नाजियमरन जिवनकसह होई॥
नागफांस उनमेली ग्रीवाँ⁴। हर्ष न विसमो⁵ अबकोजीवाँ ॥
जोजिव दीन्ह सोलेव निरासा। बिसरेन हिंजोलहतनश्वासा॥
करै किंगरी तेहि तन्तबंजावा। यही गीत वैरागी गाँवा ॥
भलहिं अनंगगे मेली फांसी। हिये⁷ नशोचऐसीरिसनासी॥
मँगये फांद वही दिन मेला। जेहि दिन प्रेमपन्थ खेला ॥
दो० परगटे गुप्त सकलै महँ, पूररहा सो नाउँ।
जहँ देखों वह देखों, दूसर नहिं कहुँ जाउँ॥
जबलग गुरु मैं अहानचीन्हा। कोटिअन्तरपैट बिचहुतदीन्हा॥
जो चीन्हा तौ और न कोई। तनमन जिव यौवन सबसोई॥
होंहों कहत धोख अन्तराहीं। जो भा सिद्ध कहां परछाहीं ॥
मारे गुरू कि गुरू जियावा। और को मारमरै सब आवा॥
सूरी मेल हस्ति¹⁴ गुरु परू। हौं नहिं जानौ जानै गुरू ॥
गुरू हस्ति परचढेसोपेखा¹⁵। जगतैं¹⁶ जोनास्तै नास्तसबदेखा ॥
अंधिमीने¹⁸ जसजलमहँधावा। जलजीवनै¹⁹ जलदृष्टि²⁰ न आवा॥
दो० गुरुमोर मोरे हिये, दिये तुरङ्गहिदोठ।
भीतर करहि डुलावै, बाहर नाचै काठ ॥
शिर १ पहिले २ दुखी ३ दिल ४-१० गरदन ५-६ खुशी ६ दुःख ७
हाथ ८ ज़ाहिर ११ छिपा हुआ १२ सब १३ करोरों परदाका बीच १४
हाथी १५ देखना १६ दुनियां १७ नाश होनेवाला १८ मछली १६
ज़िंदगी २० निगाह २१ घोड़ेकी बाग २२ ॥