पद्मावत (मलिक मोहम्मद जायसी - सटीक ऐतिहासिक महाकाव्य)
Padmavat with Hindi Commentary
मलिक मोहम्मद जायसी / पं. रामचन्द्र शुक्ल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें११२ पद्मावत।
नयनन्हि भीतरपन्थ है, हिरदयै भीतर ठाँउँ ॥
सुनि पद्मावत की अस मयाँ । भावसन्त उपँजी नई कयाँ ॥
सुआका बोल पवन होयलागा । उठासोय हनुमंत होय जागा ॥
चांदमिलनकहँ दीन्हेसि आशा । सहसँ किरनसूर्यपरकाशा ॥
पाति लीन्ह लै शीश चढ़ावा । दृष्टि चकोर चांद जस पावा ॥
आश पियासा जो जेहि केरा । जो झिककार वही सो हेरों ॥
अब यहि कौन पानि मैं पिया । भै तन पांख पतङ्ग मरजिया ॥
उठा फूल हिरदय न समाना । कन्थों टूक टूक भर आना ॥
दो० जहां प्रीतम वै बसहिं, यहि जिववलै तेहिवाँटे ।
जो सो बुलावै पांव सों, हम तहँ चलै ललोटें ॥
जो पन्थ मिला महेशहि सेई । गयो समुद्र ओही धसलेई ॥
जहँ वहं कुण्ड बिषमै औगाहों । जायपरा तहँ पाव न थाहा ॥
बावर अन्ध प्रेम कर लागू । सौहें धसा कुछ सूझ न आगू ॥
लीन्हेसि धसजोश्वासमनमारा । गुरू मुछन्दर नाथ सँभारा ॥
चेला परी न छांडहि पाछू । चेला मच्छ गुरू जस कांछू ॥
जस धसलीन्ह समुद्र मरजिया । उघरे नयन बरै जस दिया ॥
खोज लीन्ह सो स्वर्ग दुआरा । बज्रं जो मूंदे जाय उघारा ॥
दो० बांकचढ़ाव स्वर्ग गढ़, चढ़त गयो होय भोर ।
भइ पुकार गढ़ ऊपर, चढ़े सेंध दै चोर ॥
राजैं सुनि योगी गढ़ चढ़े । पूँछी पास पंडित जो पढ़े ॥
योगी गढ़ जो सेंध दै आवहिं । बोलहुशब्द शुद्धजसपावहिं ॥
आँख १ राह २ दिल ३ जगह ४ मेहरवानी ५ पैदा होना ६ बदन ७
हज़ार ८ शिर ६ देखना १० गुदड़ी ११ न्योछावर १२ राह १३ माथा १४
महादेवजी १५ टेढ़ा १६ खंवर १७ सामने १८ आसमान १६-२१ पत्थर २०
कहो क्या दण्ड २२ ॥