पद्मावत (मलिक मोहम्मद जायसी - सटीक ऐतिहासिक महाकाव्य)
Padmavat with Hindi Commentary
मलिक मोहम्मद जायसी / पं. रामचन्द्र शुक्ल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें११४ पद्मावत ।
बाइस सहस १ सिंहली चाले । गिरि २ पहाड़ पेई सब हाले ॥
जगत बराबर वै सब चाँपा । डरा इन्द्र बासुकि ३ हियें कांपा ॥
पदम कोटि रथ साजे आवहिं । गढ़ होय खेहँ गगन ५ कहँ धावहिं ॥
जनु भौचाल जगत महँ परा । कुर्महिं ७ पीठ टूटि हिय डरा ॥
दो० छत्रहिं स्वर्ग छायगा, सूरय भयो अलोप ।
दिनहि रात अस देखी, चढ़ा इन्द्र होय कोप ॥
देख कटक औ मनमंतं हाथी । बोले रतनसेन के साथी ॥
होत आव दल बहुत असूझा । अस जानव कुछ होय है जूझा ॥
राजा तुइँ योगी होय खेला । यही दिवसैं कहँ हम भये चेला ॥
जहां गाढ़े ठाकूरै कर होई । सङ्ग न छांड़े सेवक सोई ॥
जो हम मरन दिवस मन ताका । आज आय पूजी वह शाका ॥
पर जिव जाय जायनहिं बोला । राजा सतसुमेरु नहिं डोला ॥
गुरू केर जो आयसु पावहिं । साँहें होहिं औ चक्र १६ चलावहिं ॥
दो० आज करहिं रण भारथ, सत बाचा दै राख ।
सत गुरू सत कौतुकैं, सत भरै पुनि साख ॥
गुरू कहा चेला सिध्र होहू । प्रेमबौर दै करो न कोहू ॥
जा कहँ शीशँ नायकै दीजै । रङ्ग न होय जूझ जो कीजै ॥
जेहि जिय प्रेम पानि भासोई । जेहि रंग मिलै वही रंग होई ॥
जो पै जाय प्रेम सों जूझों । कित तपमरहि सिद्ध जेहि बूझा ॥
यहि सत बहुत जूझ नहिं करिये । खड्गै देख पानी है हरिये ॥
पानी कहा खड्ग की धारा । लोट पानि सोई जो मारा ॥
= हज़ार १ पहाड़ २ नाम राजा सापोंका ३ दिल ४ राख ५ आसमान ६-८
कछुवा ७ फ़ौज ६ मस्त १० दिन ११ मुसीबत १२ मालिक १३ हुक्म १४
सामने १५ नाम हथियार १६ तमाशा १७ दरवाज़ा १८ गुस्सा १६ शिर २०
पानी २१ लड़ाई २२-२३ तलवार २४ ॥