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पद्मावत (मलिक मोहम्मद जायसी - सटीक ऐतिहासिक महाकाव्य)

पद्मावत (मलिक मोहम्मद जायसी - सटीक ऐतिहासिक महाकाव्य)

Padmavat with Hindi Commentary

मलिक मोहम्मद जायसी / पं. रामचन्द्र शुक्ल द्वारा

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पृष्ठ 105

१०४ पद्मावत ।
खप्पर लिये बारे भा माँगों । भुक्तिं देइ लै मारगे लागों ॥
सोई भुक्ति परापत पूजा । कहां जाउँ असबार न दूजा ॥
अब धर यहां जीव वह ठाँऊँ । भस्म होहुँ पै तजों न नाऊँ ॥
जस बिनप्रान पिण्डै है हूँछा । धर्म लाग कहिये जो पूँछा ॥
तुम सों बसीठ राजा की ओरा । शाखै होहु यह भीख निहोरा ॥
दो० योगीबार आवसो, जेहि भिक्षा की आस ।
जो निराश दृढ़ आसन, कितगवैने केहिपास ॥
सुनि बसीठ मन अपने रिसा । यव पीसंत घुनजायहि पिंसा ॥
योगी ऐस कहै नहिं कोई । सो कहुबात योग तेहि होई ॥
वह बड़ राज इन्द्र कर पाटोँ । धर्त्ती परे स्वर्ग को चाटा ॥
जो यह बात जाय तहँ चली । छूटहिं अबहिं हस्तिं सिंहली ॥
औ छूटहिं तहँ वज्र के कूटों । बिसरे झुके होय सबखूटों ॥
जँहलग दृष्टि न जाय पसारी । तहां प्रसारसि हाथ भिखारी॥
आगे देखि पांवधरि नाथा । तहां न देखि टूटि जहँ माथा ॥
दो० वहरानी जेहिजुगतमहँ, तेहि राज औ पाँटँ ।
सुन्दर जाय राजघर, योगिहि बन्दर काट ॥
जो योगी सत बन्दर काटा । एके योग न दूसर बाँटा ॥
और साधना आवै साधे । योग साधना आपहिं दाँधे ॥
सरै पहुँचाउ योग कर साथू । दृष्टि २१ चाहि अगमनै होय हाथू॥
तुम्हरे जोर सिंहल के हाथी । हमरे हस्तिं २२ गुरु है साथी ॥
दरवाज़ा १ भीख २ रास्ता ३ जगह ४ छोड़ना ५ बदन ६ शाख मेवा
भरी ७ कहां जाउँ ८ लायक ६ तख़्त १० आसमान ११ हाथी १२
पत्थरके गोले १३ भीख मांगना १४ चारों तरफ़ १५ निगाह १६ तख़्त १७
राह १८ जलाना १६ आखिर २० नज़र से ज्यादा २१ पहिले २२ हाथी २३ ॥