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पद्मावत (मलिक मोहम्मद जायसी - सटीक ऐतिहासिक महाकाव्य)

Padmavat with Hindi Commentary

मलिक मोहम्मद जायसी / पं. रामचन्द्र शुक्ल द्वारा

DevanagariAwadhipublished318 पृष्ठ

६२ पद्मावत ।
मरीचहहिं पै मरै न पावहिं । उठै आग सबलोग बुझावहिं ॥
घड़ी एक सुट भयो अँडूरो । पुनि पाछे बीता होय रुरो ॥
दो० टूटि मने नवं मोती, फूट मने दसें कांच ।
लीन्ह समेट सबै आभरनं, होयगा दुखकर नांच ॥
निकसा राजा सुनके पूरे । छांड़ि नगर मेला होय दुरे ॥
राये रांग सब भये बियोगी । सोरह सहसं कुँवर भये योगी ॥
माया मोह हरी सैंहाथा । देखि न बूझ नियानं न साथा ॥
छांड़हिं लोग कुटुम्ब सबकोऊ । भयेनिराश दुखसुखतर्जदोऊ ॥
सँवरहिं राजा सोइ अकेलौं । जेहिरे पन्थे खेलेहोय चेला ॥
नगरनगर औ गांवहिं गांवां । छांड़ चला सब ठांवहिं ठांवां ॥
काकर गढ़ काकर मठ माया । ताकर सब जाकर जिवकायां ॥
दो० चलाकटकै योगिनके, करके गेरुवा भेस ।
कोसबीस चारैहुँ दिश, जानहुँ फूला टेसूँ ॥
आगे सगुन सगुनैं यहितका । दहीमांझ रूपे कर टका ॥
भरे कलश तरुनी चलिआई । दही लिये ग्वालन गुहराई ॥
मालिन आय मौर ले गाथे । खंजनं बैठ नागके माथे ॥
दाहिन मिरगेँ आयगाधायें । प्रतीहारैं बोला घर बायें ॥
बिरखैं सवारिया दाहिनबोला । बायें दिशैं गीदरैं नहिं डोला ॥
बायें अकोशी धूरे आये । लोवाँ दरश आय देखराये ॥
बायें कुरेरी दाहिन कोचौं । पहुँची भुक्ति जैस मनरोचौ ॥
शोर १-२ ज़ेवर ३-शेर ४ राजा के भाई ५ दुःखी ६ हज़ार ७ आख़िर ८
छोड़ना ६ परमेश्वर १० राह ११ जगह १२ बदन १३ फ़ौज १४ चारों तरफ़
१५ टेसू १६ नजूमी १७ रुपया दही में रखके १८ जवान औरत १६ ममोला
२० हिरन २१ तीतर २२ सांड़ २३ तरफ़ २४ सियार २५ चील्ह २६ लोँवड़ी
२७ कौवा २८ उल्लू २६ रोज़ी ३० चाहना ३१ ॥

पद्मावत । ६३
दो० जाकहँ सगुनहोहिं अस, औगवनै जेहिआस ।
अष्टोमहासिद्धि पंथैहि, जस कबि कहा ब्यास ॥
भयो पयानै चला तब राजा । शंखनादै योगिनकर बाजा ॥
कहिन आज कुछथोर पयानां । काल्ह पयानैं दूर है जाना ॥
वह मिलानै जो पहुँचे कोई । तब हम कहब पुरुष भल सोई ॥
है आगे परवतकी बाँटैं । विषमै पहाड़ अगमै सठघाटैं ॥
विचविच कोह नदी औ नारा । ठाँवहिं ठांव बैठि बटपारौं ॥
हनुमंतै केर सुनत पुनि हांका । वहिको पार होयको थाका ॥
असमन जानि सँभारहु आगू । अगर्वा केर होहु पछलागू ॥
दो० करहिं पयानैं भोरउठि, नितहिं कोसदश जाहिं ।
पंथी पंथों जो चलहिं, ते कित रहैं औठाहिं ॥
करहु दृष्टि थिरै होय बटाऊँ । आगू देखि धरहु भुइँ पांऊ ॥
योगिओवैंट भुइँ परी भुलाय । कीमरि पंथै चले न जाय ॥
पांयन पहिरलेहु सब पाँवरी । कांटे न चुभै न गड़ै अँकरोरी ॥
परी आय अववनखंडै माहां । डंडौ कारन बीच निबाहां ॥
सघनै ढांखवन चहुँदिशँ फूला । बहुतुखमिलै वहांकर भूला ॥
झाँखरजहांसु छांड़हु पन्थौ । हिलगम कोयनफारहु कन्थौ ॥
दहिने विदैरै चंदेरीं । वायैं । वहिकहँ होब बाँटै दुइठाँयें ॥
दो० एक वाँट गई सिंहलैं, दूसर लंक समीपैं ।
जाना १ कामिल २ राह ३-१०-२०-२५-३१-३५-३७ कूच ४ शंखकी
आवाज़ ५ कूच तथा मौतका दिन ६ कूच दूर तथा क़यामतका दिन ७
मिलना ८ जवाँमर्द ९ टेढ़ा ११ जहां कोई न पहुँचसके १२ जगह १३-३६
राहलूटनेवाले १४ वन्दर १५ गुरू १६ कूच १७ हररोज़ १८ राहचलनेवाले १६
निगाह २१ कायम २२ मुसाफ़िर २३ राह बतलानेवाला २४ खड़ाऊँ २६ जंगल
२७ नाम जगह २८ गुंजान २६ चारोंतरफ़ ३० गुदड़ी ३२ नाम मुल्क ३३-३४
जगह ३६ नाममुल्क तथा स्वर्ग ३८ नाम मुल्क तथा नरक ३६ बराबर ४० ॥

६४ पद्मावत ।
: है आगे पंथ दो बनहिं, गवनबै केहिदीप ।
ततखन बोला सुआ सरेखौ । अगवों सोई पंथ जेहिं देखा ॥
सो का उड़ै न जेहि तन पांखू । लैसोपलाशँहि बोलै शाखू ॥
जस अंधा आँधीकर संगी । पंथ न पाव होय सहलँगी ॥
सुनिमति काजचहसि जो साजा । बीर्जा नगर विजौगिरराजा ॥
पूंछा जहां कुण्ड औ गोलां । तजि वायें अंध्यारे खटोला ॥
दखिन दाहिने रहै तिलंगौ । उत्तरमांझ होय कहँोकंटंगा ॥
मांझ रतननपुर सौंह दुआरा । झारखण्ड वे वांयें पहारा ॥
दो० आगे बाउँ उड़ीसों, वायें देहिसु वौंट ।
दहिनाव्रत लायके, उतर समुद्रकी घाट ॥
होत पयान जाय दिनकेरों । मिरगार्ने मंहिं कीन्ह बसेरा ॥
कुश सांठर भइ सूरि सपेती । करवंटे आय वनी सुँइसेती ॥
क्यामिली जसभूमि गलीजा । चलिदसकोस ओसतनभीजा ॥
ठांव ठांव सब सोवहिं चेला । राजों जागै आप अकेला ॥
जेहिके हिये प्रेम रंग जामा । का तेहि नींद भूखविशरामाँ ॥
बन अँध्यार र्यानि अँधियारी । भादों बरन भयो अतिभारी ॥
किंगरी गहे हाथ बैरागी । पंचतन्त धुनिओही लागी ॥
दो० नयनं लाग तेहि मारेंगे, पद्मावत जेहि दीप ।
जैसे स्वाति बूँदकह, बन चातकै जलसीप ॥
राह १-६-१६-३१ जाना २ तोता होशियार ३ राहबतानेवाला ४ नाम
दरख्त ५ भोलामारहुआ ७ सलाह ८ नाम मुल्क ६ छोड़ना १० नाम मुक़ाम
तथा योग की क्रिया ११-१२-१३ नाम मुल्क तथा मुक़ाम मतलब १४ नाम
मुल्क १५ कूच १७ शामकेवक्त १८ जंगल तथा कबरिस्तान १६ तोशक
और लिहाफ़ २० तकिया २१ ज़मीन २२ जगह २३ रतनसेन सुरांद परसे-
श्वर २४ दिल २५ आराम २६ रात २७ नाम बाजा २८ पाँचतार २६ आँख ३०
पपीहा ३२ ॥

मासकै$^१$ लाग चलत तेहिबाटाँ$^२$। उतरै जाय समुद्र की घाटा ॥
रतनसेन भा योगी यती । सुनि भेटे आवा गजपती$^३$ ॥
योगी आप कटक$^४$ सब चेला । कौनदीप कहँ जाहिखेलाँ ॥
भली आय सब मायाँ कीजै । पहुँनाई कहँ आयसु$^७$ दीजै ॥
सुनहु गजपती उतरं$^८$ हमारा । हम तुम एकै भाव निरारा ॥
सो तेहिकहँ जेहिमहँ यहभावा । जोनिरार्श$^१०$ तेहिलाड़नशावाँ$^११$॥
यही बहुत जो बोहित$^{१२}$ पाऊँ । तुमते सिंहलदीप सिधाऊँ ॥
दो० जहां मोहिं निजजाना, कटकैं हौं लिये बारैं$^{१५}$ ।
जो रेजियों तौ लै फिरौं, मरौं तो वहकी बारैं॥
गजंपती कही शीर्श$^{१८}$ वरमांगा । इतनी बोल न होइहै सांगा ॥
यहि सब देउँ आन पै गढ़ी । फूल सोई जो महेश्वर$^{१८}$ चढ़ी ॥
पै गुसाई सो एक नबांती$^{२१}$ । मारगैं$^२$ कठिनैं$^{२२}$ जाव केहिभांती$^{२३}$ ॥
सात समुद्र असूझ अपारा । मारहिं मगरमच्छ घड़ियारा ॥
उठै हिलोर न जाय सँभारी । भाँगैहि कोइनिबहै व्योपारी ॥
तुम सुखया अपने घर राजा । एते दुख जो सहो केहिकाजा ॥
सिंहलद्वीप जाये सो कोई । हाथ लेहें आपन जिव होई ॥
दो० खारि$^{२५}$ क्षीर$^{२६}$ दधि$^{२७}$ उदधि$^{२८}$ सुराँ, जलपुनिकिलें$^{२६}$ किला कूतें$^{२४}$।
कोचदि नांघ समुद्रये सातों, है काकर असपूत ॥
गजपति यहिमन सकती सेवा । पैजेहिप्रेम कहां तेहि जीवा ॥
जो पहिले शिरदेपगैं$^{३२}$ धरिये । मुये केरका मीचैं$^{३४}$ करीये ॥


शब्दार्थ / पाद-टिप्पणी:
एकमहीना १ राह २-२१ नाम राजा ३-६-१७ फ़ौज ४-१४ जाना ५ मेहर-
बानी ६ ज़्याफ़त ७ हुक्म ८ जवाब १० नाउम्मेद ११ नुक़सान १२ नाव १३
दरवाज़ा १५-१६ शिर १८ महादेवजी १६ अर्ज़ करना २० मुश्किल २२
किसतरह २३ क़िस्मत २४ खारी २५ दूध २६ दही २७ मीठापानी २८ शराब
२६ नाम समुद्र ३०-३१ सख़्ती ३२ क़दम ३३ मौत ३४ ॥

६६ पद्मावत।
सुख संकल्प दुख सांभरै लीन्हा। तौ पयान सिंहल कहँ कीन्हा॥
भँवर जानि पै कमल पिरीती। जेहि महँ बिथा प्रेम की बीती॥
औ जें समुद्र प्रेम कर देखा। तें यहिं समुद्र बूँद वर लेखा॥
सातौँ समुद्र सत लीन्ह सँभारू। जों धरती का गरु पहारू॥
जो पै जीव बांध सत बेरा। परजिव जाय फिरै नहिं फेरा॥
दो० रंगनाथ हौं जाकर, हाथ वही के नाथ।
गहै नाथ सो खींचै, फिरै न फेरे माथ॥
प्रेम समुद्र जो अति अवगाहूँ। जहां न वार न पार न थाहा॥
जो वह समुद्र गाह यहिं परे। जो अवगाहँ हंस होइ तरे॥
हौं पद्मावत कर भिखमङ्गा। दृष्टि न आव समुद्र औ गङ्गा॥
जेहि कारणै मैं काँथर कंथौ। जहां सो मिलै जाउँ तेहि पंथौ॥
अब यह समुद्र परो होय मरा। प्रेम मोर पानी के करों॥
मरभा कोई कतहूँ लै जाऊँ। वहकी पंथै कोऊ घर खाऊँ॥
असमन जान समुद्र महँ पयौँ। जो कोई खाय वेगेँ निसतेरयौँ॥
दो० स्वर्ग शीश धर धरती, हियों सों प्रेम समुन्द।
नयनै कौड़यौ होयरही, लै लै उठ तेहि हुन्द॥
कठिन बियोगै योग दुखदाहूँ। जन्म जरतहौं और न पाहू॥
डर लज्जा तहँ दोउ गँवानी। देखै कछू न आग न पानी॥
आग देखि वह आगें धावा। पानि देखि वह सौंहिं धसावा॥
जस बावर न बुझाये बूझा। कौन भांति जाय का सूझा॥
तोशा १ कूच २ बराबर ३ खारी, मीठा, पानी, दही, दूध, शराब, किल-
किलाकृत ये सात समुद्र हैं ४ ज़मीन ५ पकड़ना ६ गहिरा ७-८ निगाह ६
वास्ते १० गरदन ११ गुदड़ी और कंठ्ठा १२ राह १३-१५ मानिंद १४ जल्द
१६ छूटजाना १७ आसमान १८ शिर १६ ज़मीन २० दिल २१ आँख २२ नाम
जानवर २३ मुश्किल २४ जुदाई २५ जलना २६ सामने २७ किस तरह २८ ॥

पद्मावत । ६७
मगर मच्छ डर मने न लेखा । आपहिं चहौं पारभा देखा ॥
औ नहिं साय वह सिंहंसिंदूरी । काठै जाहि अधिकै यह झूरी ॥
कायाँ सायों सङ्गन साथी । जेहि जिव सौंपा सोई साथी ॥
दो० जो कुछ दैर्व अहा सङ्ग, दान दीन्ह संसार ।
काजानी केहिकी संतः दई उतारै पार ॥
धन जीवनैं औ ताकर जिया । ऊँच जगतैं महिजाकर दिया ॥
दिया सो सर्व जपतप उपर्राहीं । दिया बराबर कुछ जगं नाहीं ॥
एक दियातें दशगुन लाहा । दिया देखि सबको मुख जाहा ॥
दिया करै आगे उजियारा । जहां न दिया तहां अँधियारा ॥
दिया मंदिरे निशि करै उजोरा । दिया नाहिं घर मूसहिं चोरा ॥
हौतिम करनैं दिया जो सिखा । दिया रहा धर्मन महँ लिखा ॥
दिया सो काज दोहूँ जग आवा । यहां जो दिया वहां सब पावा ॥
दो० निरमलैं पंथै कीन्ह तेहि, जेहिरे दिया कुछ हाथ ।
कुछ नहिं कोई लैजायही, दिया जाय पै साथ ॥
खण्ड ग्यारहवां बोहितखण्ड ॥
संत नडोल देखा गजपंती । राजादत्त संत दोनों सती ॥
आपन नाहिं कर्यो पी कंथा । जीवदीन्ह अगमन तेहि पंथाँ ॥
निश्चै चला भर्म डर खोय । साहंसैं जहां सिद्ध तहँ होय ॥
निश्चै चला छांड़िकै राजू । बोहितैं दीन्ह दीन्ह सब साँजू ॥
चढ़ा वेगै औ बोहितैं पेली । धन वह पुरुष प्रेमपंथै खेली ॥
शेरलाल १ ज़्यादा २ बदन ३-२१ दुनियां दौलत ४ रुपया ५ ईश्वर ६
ज़िन्दगानी ७ दुनियां ८-१० ऊपर ६ मकान ११ रात १२ नाम सखी १३-१४
पाक्साफ़ १५ राह १६-२३-३१ ईमान १७ नाम राजा १८ सखावत १६
सच्चाई २० पहिले २२ बहादुर २४ कामिल २५ नाव २६ सामान २७ जल्द २८
जहाज़ २६ मर्द ३० ॥

६८ पद्मावत ।
प्रेम पंथं जो पहुँचै पारा । बहुरै न आय मिलै यहि छारौँ ॥
तेहि पावा उत्तमै कैलासू । जहां न मीचै सदा सुख वासू ॥
दो० यहि जीवनकी आशका, जैसे स्वप्न तिल आध ।
मुहम्मद जीतहि जो मुये, ते पूरुष सिध साध ॥
जस दिनरयँनि चलै गजं भांती । बोहितं चली समुद्रकी पांती ॥
धावहिं बोहितं मन उपराहीं । सहसैं कोस एक पलमहँ जाहीं ॥
समुद्र अपार स्वँग जनु लागा । स्वँगै नखाँलैं गिनै बैरागा ॥
ततखनै एक चालैँ दिखराये । जनु धौलाँगिरि पर्वत आये ॥
उठे हिलोर जो चालैँ निरोजे । लहर अकाशलानि भुँई बाजे ॥
राजा सितैं कुँवर सब कहैं । अस अस मच्छ समुद्रमहँ अहँ ॥
तेहिरे पंथं हम चाहत गवनौं । होहु सचेतै बहुरै न हिं अवनौ ॥
दो० गुरु हमार तुम राजा, हम चेला तुम नाथ ।
जहां पाउँ गुरु राखै, चेला राखै माथ ॥
केवटैँ हँसे सुनत को बंजौं । समुद्र न जानि कुवांकर मंजौं ॥
यहि तो चालैँ न लागै कोहू । का कहियो जब देखब रोहू ॥
सो अबहीं तुम देखे नाहीं । जेहि मुख ऐसे सहसँ समाहीं ॥
राजपंखैँ तेहिपर मँडराहीं । सहसँ कोस तिनकी परछाहीं ॥
तेवै मच्छ ठौर भैंहि लेहीं । शावकैं मुख चारा ले देहीं ॥
गरजे गगनैँ पंख जो खोलहिं । डोले समुद्र डहन जो डोलहिं ॥
तँहाँ न सूर्य न चांद असूझा । चढ़ै सोई जेहि अगम नैनैं बूझा ॥
राह १-२०-३४ लौटना २-२३ मिट्टी ३ वैकुण्ठ ४ मौत ५ मर्द ६ रात ७
हाथी ८ नाव ६-१० हज़ार ११-२८-३० आसमान १२-३३ ऊँचा १३ नीचा
१४ यकायक १५ नाम जानवर १६-१८-२७ नाम पहाड़ १७ हिलना १६
जाना २१ होशियार २२ मल्लाह २४ बातचीत २५ मेढक २६ सीमुर्ग २६ पक-
ड़ना ३१ बच्चा ३२ तथा परमेश्वरकी दूरन्देशी ३५ ॥

पद्मावत । ६६
दो० दशमहँ एक जायकोइ, कर्म धर्म संत नेम ।
वोहिते पार होइ जो, तौहो कुशल औ खेम ॥ (१५८)
बात कहत भइ देश गुहारी। केवटँहि चालैँ समुद्रमहँ मारी ॥
हस्ती लाय सिष्टं सब ढीला । दौड़आय इक चालैंहि लीला ॥
केवर्ट लागिलागि सब बली। फिरैन चालैँ जाय बहिचली ॥
वोहितँ सहसैं जाहिं चहुँओरा । होयकलोलैं जाहिं तरि बोरा॥
सुनिके आप चढ़ौँसें राजा । औ सबलोग देशमिलबाजाँ ॥
भालवांस खांड़े बहु परहीं। जान पखालै बाजके चढ़हीं ॥
चारालोल जो माछर बाभी । कहां जाय जो जाकर खंभी ॥
दो० माछरकर भूखहि हृदयँ, तेहि साधै विषं वान ।
सबहिँ पहुँचकै मारा, चालैहि तजौ परान ॥ (१५९)
जस धौलागिरि २४ परवत होई । तेही भांति उतरान्यो सोई ॥
सबै देश मिलि तैरहिं आना। लिये कुल्हाड़ी लोग जहाना ॥
जनु परवत कहँ लागहि चांटी २५। लेगये मांस रही सब कांटी ॥
मांजर परी कोसदस वँड़ी । मांजरिकस जस श्वेतँ बरेंड़ी ॥
नयनँ सोजानिकोटकी पँवरे २८ । कितअसगहे २६ फिरेतेहिभँवरे॥
रतनसेन से संघी कहें । अस अस मच्छ समुद्र महँ अहँ ॥
राजा तुमचाहो तहिँगवनौँ । होइकेसजगै बहुरि नहिँअवना ॥
दो० तुम राजा औ गुरू, हम सेवक औ चेरै ।
कीन्ह चहैं सब आयसैं, अबगवैनी तहिफेर ॥ (१५०)
नाव १-११ खैरियत २ नाखुदा अर्थात् मल्लाह ३-८ नाम जानवर
४-७-१०-२२ हाथी ५ ज़ंजीर ६ ज़बरदस्त ६ हज़ार १२ तैर १३ पानी के
नीचे १४ फ़ौज १५ पहुँचना १६ तलवार १७ नासजानना १८ खुराक १६
पेट २० ज़हर २१ छोड़ना २३ नाम पहाड़ २४ चूंटी २५ सफ़ेद २६ आंख २७
क़िलेका दरवाज़ा २८ पकड़ना २६ जाना ३०-३५ होशियार ३१ लौटना ३२
गुलाम ३३ हुक्म ३४ ॥

७० पद्मावत ।
राजैं कहा कीन्ह मो प्रेमा । जहां प्रेम तहँ कुशल १ क्षेमा ॥
तुम खेवो जो खेवहि पारहिं । जैसे आप तरहिं मोहिं तारहिं ॥
मोहिंकुशल २ कर सोच न ओता । कुशल ३ होत जो जन्म न होता ॥
धर्ती ४ स्वर्ग ५ जाँट पर दोऊ । जो यहिविच जिव राखनकोऊ ॥
हौं अब कुशल एक पै माँगौं । प्रेमपंथ सतबांधि न खाँगौं ॥
जो सतहिये ६ तो पंथहि १० दिया । समुद्रन डरे देखि मरजिया ॥
तहँलग हेरौं ११ समुद्र ढिंढोरौं । जहँलग रतन १२ पदारथ जोरौं ॥
दो० सप्तपातालै १३ खोजके, काढौं वेद गैरंथ ।
सातसमुद्र चढ़ि धावौं, पद्मावत जेहि पंथै १५ ॥
खण्ड बारहवां सात समुद्र खण्ड ॥
सायर १६ तरे हिये १७ सतपूरा । जो जीसंतें १८ कायर १९ पुनि सूरा ॥
तहँ सब बोहितं २० पूर चलाई । जहँ सतपवनै २१ पंख जनुलाई ॥
सतसाँथी सतगुरु हम वारू । सत गहीले लावे पारू ॥
सती नाक सबे आगू पाछू । जहँ जहँ मगर मच्छ औ काछू ॥
उठे लहर जनु उठे पहारा । चढ़े स्वर्ग औ परै पतारा ॥
डोलहिं बोहितं २२ लहरें खाई । सहँसै कोस इक पलमहँ जाई ॥
राजैं सो सत हिरदयँ बांधा । जेहि सत टेके करगुर कांधा ॥
दो० खारिसमुद्र सब नांघा, आये समुद्र जहँ खीर २७ ।
मिले समुद्र वै सातों, बेहरेँ बेहर नीरेँ ॥
क्षीरसमुद्र का बरैणों नीरू । श्वेतैं स्वरूप पियत जस क्षीरू ॥
खैरिचत १-२-३ ज़मीन ४ आसमान ५-२३ चक्की का पिल ६ राह ७-१०-
१५ कमी ८ दिल ९-१७-२६ देखना ११ लाल जवाहर तथा पद्मावत १२
सात पाताल १३ पोथी १४ बहादुर १६ सच्चाई १८ नामर्द १६ नाव २०
हवा २१ मददगार २२ जहाज़ २४ हज़ार २५ दूध २७-३२ अलग २८ पानी
२६ तारीफ़ ३० सफ़ेद ३१ ॥

पद्मावत । ७१
उलटहिं माणिक मोती हीरा । दर्ब देखि मन होय न धीरा ॥
मनो अनचाह दर्ब औ भोगू । पंथ भुलाय बिनाशै योगू ॥
योगी मनहिं उही रिस मारहिं । दर्ब हाथकै समुद्र पयारहिं ॥
दर्ब लेइ जो इस्तिरे राजा । जो योगी तेहिके केहि काजा ॥
पंथी पंथै दर्ब रिपु होई । ठग बटपारं चोर सँग सोई ॥
पंथी सोई दर्ब सो रूसे । दर्ब समेट बहुत अस मूसे ॥
दो० क्षीरसमुद्र सब नांघा, आये समुद्रदधि माहिं ।
जोहै पंथ के बावरे, नांतेहिं धूप न छांहिं ॥
दधि समुद्र देखत तसदहों। प्रेमके लुब्धै दग्धै पैसा ॥
प्रेम जो डांढौ धन वह जीव । दधि जमाय मथिकाढ़ै घीव ॥
दधि इकबूंदजामिसवक्षीरूँ । कांजी बूंदविनशियोयनीरूँ ॥
स्वांस डांढे मनमथनी गाढ़ी । हिये ज्योति बिनफूटिनसोंढी ॥
जेहिजियप्रेम चंदन तेहिआगे । प्रेमभवैनै फिर डर नहिंभागे ॥
प्रेमकी आग जरै जो कोय । ताकर दुख नहिं मिथ्यों होय ॥
जो जानहि सत आपहिंजारा । नास्तै हिये संत करेन पारा ॥
दो० दधि समुद्र पुनि पारभे, प्रेमहि कहां सँभार ।
भावै पानी शिरपरै, भावै परहि अँगार ॥
आय उदधिजलै समुद्रअपारा । धर्ती स्वर्ग जरै तेहिं झारा ॥
आग जो उपँजी ओही समुन्दा । लंका जरी वही एकबुन्दा ॥
विरह जो उपजी ओही काढ़ा । खन न बुझाय जाय तन बाढ़ा॥
राह १-५-१० तैरना २ क़ायम ३ मुसाफ़िर ४ राह लूटनेवाले ६ राह
चलनेवाले ७ अर्थात् माल वा दौलत पास अपने न राखे ८ दही ९-१६-
१७-२८ दीवाने ११ जलताहुआ १२ आशक १३ आंच १४ औटाहुआ १५
दूध १८ खटाई १६ पानी २० रस्सी २१ दिल २२-२७ चालाई २३ मकान २४
ख़राब २५ कमहिम्मत २६ नामसमुद्र २९ ज़मीन ३० आसमान ३१ पैदा
होना ३२-३३ ॥

७२ पद्मावत ।
जेहिसोबिरहतेहिआगनदीठी १ । सौहिं २ जरैफिरदेहि न पीठी ॥
जगँमहँ कठिनें खड्ग की धारा । तेहिते अधिकँ बिरहकी झारा ॥
अगमें पंथ जो ऐस न होई । साधु कहै पावै सब कोई ॥
तेहि समुद्र महँ राजा परा । जरा चहै पै रोवैं न जरा ॥
दो० तलफैतेल कराह जिमि ८; इमि ९ तलफै सबनीरे १० ।
वहि जो मलयगिरि ११ प्रेमका, सुबुन्दसमुद्र शरीर ॥
सुरौ समुद्र पुनि राजा आवा । महुवामँधु छाती देखरावा ॥
जो तेहि पिये सो भांवर लेय । शीशैं फिरै पंथ पैगैं न देय ॥
प्रेमसुरौ जेहिके जिय माहां । कितै बैठे महुवा की छाहां ॥
गुड़ की पास दाखें रस रसा । बेरी २० वेर मार मन गसाँ ॥
बिरहिन दग्धैकीन्ह तन भौंठे । हाड़ जराय दीन्ह जस काठे ॥
नयनैं नीर २६ सों पोतै क्यौँ । तस मँधु चुवै बरै जस दिया ॥
बिरह सुरँगें भूँजै माँसू । गिर गिर पड़ैं रँक्त के आँसू ॥
दो० मुहम्मद जो प्रेमका, हिये ३१ दीप तेहि याख ।
शीशैं न देइपतंग ज्यों, तबलंग चाखन वाख ॥
पुनिकिलकिला समुद्रमहँ आई । गा धीरज देखत डर खाई ॥
भा किलकिल अस उठै हिलोरा । जनुअकाश टूटै चहुँ ओरा ॥
उठै लहर परबत की नाई । फिर आवै योजन लखताई ॥
धर्तीलेत स्वर्ग लहि बाढ़ा । सकलै समुद्र जानो भाठाढ़ा ॥
नीरे ३७ होय तरि ऊपर सोई । मँह अरम्भ समुद्रमहँ होई ॥
१ देखना १ सामने २ दुनियां ३ मुश्किल ४ तलवार ५ ज्यादा ६ जहां कोई
न पहुँचसकै ७ राह ८-१६ जिसतरह ९ इसतरह १० पानी ११ चन्दन १२
शराब १३-१४-१८-२८ शिर १५ क़दम १७ क्योंकर १६ अंगूर २० बेर
नाम मेवा फ़सली २१ लेना २२ गर्म २३ भट्टी २४ आंख २५ आंसू २६ बदन
२७ सीख २६ खून ३० दिल ३१-३२ पांखी ३३ नामसमुद्र ३४ आसमान ३५
सूर्य ३६ पानी ३७ शेर ३८ ॥

फिरत नीर योजन१ लख तांका। जैसे फिरै कुम्हार का चांका॥
भा परलौ२ नेराना जबहीं। मरे सो तकहैं परलौ तबहीं॥
दो० गये औसान३ सबनके, देख समुद्रकी बाढ।
नेरिहोत जनुलीले, रहा नयन४ अस काढ़॥
हीरामन५ राजासों बोला। यही समुद्र आय सतडोलाँ॥
सिंहलद्वीप जो नाहिं निबाहू। यही ठाँउ सांकर सबकाहू॥
यहिकिलकिलै अससमुद्रगँभीरू। जेहिगुनहोयसोपावैतीरू॥
यही समुद्रपंथ मँझधारा। खांडे की असरेखें हजारा॥
तीस सहस कोसनकी बाटो। अस सांकर चलिसकै न चाँटा॥
खांडे१६ चाहि१७ पैन पैनाई। वारे चाहि पातर पतराई॥
वही पंथें सब काहू जाना। होय दूसरे बिश्वास नदानां॥
दो० मरन जियन यहि पंथहि, येही आशे निराशें।
पड़ा सो गयो पतालहि, तरा सो गा कैलाशे॥
राजे दीन्ह कटक कहँ वीरा। सपुरुष होहु करहु मनधीरा॥
ठाकुर जेहिक शूरै भा कोई। कटक शूरै पुनि आपहि होई॥
जौलहि सतीन जिय सतबांधा। तौलहि देइ कहार न कांधा॥
प्रेम समुद्र महँ बांधा बेरा। यहि सब समुद्र बुन्द जेहि केरा॥
नाहीं स्वर्ग न चाहौं राजू। ना मोहिं नरक सितै कुछकाजू॥
चाहौं वह कर दर्शन पावा। जेहिमो आन प्रेमपंथ लावा॥
काठ काहि गाढ़ का ढीला। बूड़न समुद्र मगर नहिं लीला॥
१ चारलाख कोस १ क्यामत २-३ हवास ४ आंख ५ नामतोता ६ बद-
हवास ७ जगह ८ मुश्किल ६ नाम समुद्र १० गहरा ११ किनारा १२ राह
१३-१५-१६-३० धार १४ तलवार १६ ज्यादा १७ पानी १८ नादान २०
रास्ता २१ उम्मेद २२ नाउम्मेद २३ नाम वैकुण्ठ २४-२६ फ़ौज २५ क़ायम
२६ बहादुर २७-२८ ॥

७४ पद्मावत ।
दो० कान्हेँ समुद्गधस लीन्हेँसि, भा पीछे सब कोय ।
कोई काहू न सँभारे, आपन आपन होय ॥
कोई बोहितैं जस पवनैं उड़ाहीं । कोई चमकबीजैं परजाहीं ॥
कोई भल जस धाव तुषारूँ । कोई जैस बैल गरियारूँ ॥
कोई हरूँ जानि रथ हांका । कोई गरु पहाड़भा थाका ॥
कोई रेंगहिं जानहु चांटी । कोई टूटि होहिं सर माटी ॥
कोई खाय पवनैं कर झोला । कोई गिरहिं पात ज्यों डोला ॥
कोई परहिं भँवर जल माहीं । फिरत रहहिं कोई दियेन बाहीं ॥
राजा कर भा अगमनैं खेवा । खेवकै आगे सुवा परेवा ॥
दो० कोई दिन मिला सबेरैं, कोई आवा पछरात ।
जाकर हुत जस साजूँ, सो उतरा तेहिभांत ॥
सतैं समुद्र मानसरेँ आये । सत जो कीन्ह सहेंसैं सिधिपाये ॥
देखि मानसरेँ रूप सुहावा । हियेँ हुलासैं पुरइनैं होयछावा ॥
गा अँधियार रयनैं मसि छूटी । भा भिनसार किरनरवि फूटी ॥
अस्त अस्तैं सबसाथी बोले । अन्ध जो अहे नयनैं विधि खोले ॥
कमल बिकलैं तसबिहँसीं देहीं । भँवर दरश होयहोयरसलेहीं ॥
हँसहिं हंस औ करहिं कुरेरौं । चुनहिं रतनैं मुक्ताहलँ हेरा ॥
जो अस आवसाधि तपयोगू । पूजी आस मानरस भोगू ॥
दो० भँवर जो मूँसौं मानसरेँ, लीन्ह कमलरस आय ।
घुनजो हियावैं न कैसका, झूर काठ तस खाय ॥
श्रीकृष्णचन्द्रजी १ नांव २ हवा ३-६ बिजुली ४ घोड़ा ५ भारी ६ हलकी
७ चूंटी ८ आगे १० मल्लाह ११ सामान १२ नाम तालाव जिसमें हंस
रहते हैं १३-१५ हज़ारतरह की आराम १४ दिल १६ खुश १७ कमल १८
रात १६ सियाही २० सूर्य २१ घाहवाह २२ आंख २३ ईश्वर २४ खिलना २५-
२६ कुलेलकरना २७ जवाहर जिसकी पैदाइश खानिसे होती है २८ मोती २६
हिम्मत बांधना ३० नामतालाव ३१ दिलेरी करना ३२ ॥

पद्मावत । ७५
खण्ड तेरहवां सातसमुद्रपार भाव
सिंहलदीपखण्ड ॥
पूँछा राजैं कहु गुर सुवा । नजनों आज कहां दिन उवा ॥
पवनैं बास शीतलैं लै आवा । क्या दहतेँ चंदन जनुलावा ॥
कबहुँन ऐसोजुड़ान शरीँरू। पड़ा अगिनमहँ जानहु नीरू ॥
निकसत आव किरन रबि रेखा । तिमिरँ गई निरमलं जगँ देखा
उठे मेघ जस जानहु आगे । चमकै बीजै गगनैं परलागे ॥
तेहिऊपर जनु शशि परकासौँ। औसगत्रीवहँ भयोनिरासा
और नखतचहुँदिशँ उनियारी । ठावहिंठांवैँ दीप असबारी ॥
दो० और दखिनदिश नेरे, कंचन मेरुँ दिखाउ ।
जैसे बसंतऋतु आवे, तैसिबास जगँ आउ ॥
तुइँ राजा जस विक्रमँ आदी । तुइँ हरिचंद बैनैँ सतबॉदी ॥
गोपिचंदैँ तुइँ जीता योगा । औ भरथैरीन पूज बियोगौँ ॥
गोरखँ सिद्ध दीन्ह तुहि हाथू । तारी गुरु मछन्दरै नाथू ॥
जीति प्रेम तुइँ भूमिँ अकांशू । दृष्टि परा सिंहल कैलाशू ॥
वै जो मेघ गढ़ेँ लाग अकासा । बजैरी कटी कोटेँ बहुँपासा ॥
और नखत वेहिके चहुँपासा । सेब रानिन की अहैं उड़ासौँ ॥
तेहिपरशशि जोगग्रहत्रहिं भरा राजमंदिर सोने नगजरा ॥
दो० गगनैं सरोवर सहस कमल, कुमुँद तराइँ पास ।
हवा १ ठंढी २ बदन ३-५ जलना ४ पानी ६ सूर्य ७ अँधियारा ८
पाक साफ़ ६ दुनियां १०-२० बिजुली ११ आसमान १२-३७ चांद १३-३५
रोशनी १४ छोटे नखत १५-३६ चारों तरफ १६ हरजगह १७ सोना १८ नाम
पहाड़ १६ राजाविक्रमाजीत २१ नाम राजा २२-२४-२५ सच बोलनेवाला २३
दुखी २६ नाम योगी २७-२८ ज़मीन २६ निगाह ३० क़िला ३१-३३ बुर्ज ३२
महल ३४ तालाव ३८ हज़ार ३६ कोकावेली ४० नखत ४१ ॥

७६ पद्मावत ।
तुइँ रबि१ उवा भँवर होय, पवन२ मिलाले वास ॥
सो गढ़ देखि गगन३ ते ऊंचा । नयन४ देखिकर ज्ञाननपहुँचा ॥
बिजुरी५ चक्र फिरै चहुँ फेरे । औ जमकात६ फिरहिं यमँ घेरे ॥
धायँ जो बाजा कियमनसाधा । मारा चक्र भयो दुइ आधा ॥
चांद सूर्य औ नखत तराई । तेहिडर अंतरिखं फिरें सबेई ॥
पवनजाय तहँ पहुँचा चहा । मारा तैसो लोटि भुइँ रहा ॥
अगिन उठे जरिबुझे नियानों । धुवांउठा उठि बीच मिलाना ॥
पानि उठा उठिजाय न छुवा । फिरा रोय आय भुइँ चुवा ॥
दो० रवन चहा सौहिं१२ के हेरों१३ उत्तर दशोगयेमाथ १४।
शंकरधरा ललाटै भुइँ, और को योगी नाथ ॥
तहां देख पद्मावत रामा । भँवर न जाय न पंखे१६ नामा ॥
अबसिखैं एक देउँ तुहि योगी । पहिले दरशन होय तो भोगी ॥
कंचन मेरु१७ दिखावे जहां । महादेव कर मण्डफ तहां ॥
वह खखरेण्ड जस परवत मेरुँ । मेरुहि १९ लाग होय तस फेरु ॥
माघमास पाछल पख लागें । श्री पंचमी होय यहि आगे ॥
उघरे महादेव कर बारू२२ पूजनजाय सकलै संसारू ॥
पद्मावत पुनि पूजन आई । हैहै वह दिन दृष्टि २४ मिलाई ॥
दो० तुम गवनो वह मण्डफ कहँ, हौ पद्मावत पास ।
पूजे आय बसन्त जो, पूजे मन की आस ॥
राजै कहा दरश जो पाऊँ । पर्बत काहि गगन कहँ धाऊँ ॥
सूर्य १ हवा २ आसमान ३-२६ आंख ४ बिजुली ५ राँद ६ यमराज ७
दौड़ना ८ पहुँचना ६ बीचोबीच १० सब ११-२३ आखिर १२ सामने १३ देखना १४
शिर १५ उड़नेवाले जानवर १६ सबाह १७ सोने का पहाड़ १८-२०-२१
बीहड़ १६ दरवाज़ा २२ दीदार २४ जाना २५

पद्मावत। ७७
जेहि परबतपर दरशन लीन्हा। शिरसों चढ़ों पायँका कीन्हा॥
मोहिं सो भावै ऊँचे ठाऊँ। ऊँचे लेवों प्रीतम नाऊँ॥
पुरुषै चाहिये ऊँच हियाऊ। दिन दिन ऊँचे राखे पांऊ॥
सदा ऊँच पैसैये बारूँ। ऊँचै से कीजै ब्योहारू॥
ऊँचे चढ़ै ऊँच खंड सूझा। ऊँचे पास ऊँच मति बूझा॥
ऊँच सङ्ग सङ्गत नितै कीजे। ऊँचे लाय जीव बलि दीजे॥
दो० दिन दिन ऊँचहोय सो, जेहि ऊँचे पर जाव।
ऊँच चढ़े जो खसिपड़े, ऊँच न छांड़े काव॥
नीच संग नितँ होय निचाई। जैसे हंस काग की नाई॥
नीच से कबहूँ न होय भलाई। नीचहिसों पर होय मुड़ाईँ॥
नीच न कबहूँ जिय महँ तांके। नीच नहीं कबहूँ मुख भाँखे॥
नीच न कबहूँ आवे काज़ा। नीचहि अहै न एकौ लाजा॥
नीचेका सँग कबहूँ न कीजे। नीचे पंथै पाँउ नहिं दीजे॥
नीचे नहिं कीजे ब्योहारूँ। नीच न कबहूँ दीजै भारूँ॥
नीचे केर न कीजे साथा। नीच गहे कुछ आवि न हाथा॥
दो० होय नीच नहिं कबहूँ, जेहि ऊँचै मन भाव।
नीच ऊँचते हँसी, नीचे केर स्वभाव॥
हीरामने दे बचों कहानी। चली जहां पद्मावत रानी॥
राजा चला सँवारि सो लत्ताँ। परबतकहँ जो चला परबतीँ॥
का परबती चढ़ि देखे राजा। ऊँच मण्डप सोने सब साजीँ॥
अमृत फर सब लागि अपूरे। औ तहँ लागि सजीवन मूरै॥
जगह १ मर्द २ हिम्मत ३ दरवाज़ा ४ हमेशा ५-७ कुर्बान ६ गुमनामी ८
ख्याल करना ६ मुँह से बोलना १० राह ११ धोखा १२ पकड़ना १३ नाम तोता
१४ क़ौल १५ धन १६ तोता १७ सामान १८ नाम बूटी १६

७८ पद्मावत ।
चौमुख मण्डफ चँहूँ केवारा। बैठे देवता चहूँ दुवारा॥
भीतर मण्डफ चारंखम्भ लागे। जेहि वे छुवे पाप तेहि भागे॥
शंख घंट नितैं बाजहिं सोई। औ बहु होम जाप तहँ होई॥
दो० महादेव कर मण्डफ, सकलैं यात्रा आव।
जस इच्छामन जेहिकी, सो तैसो फल पाव॥
खण्ड चौदहवां गवन मण्डफ
खण्ड राजा रतनसेन॥
राजा बावर विरह बियोगी¹। चेला सहसें तीस सँग योगी॥
पद्मावत की दरशन आसा। दण्डवतकीन्ह मण्डफचहुँपासा॥
पूर्बद्वार होयके शिरनावा। नावतशीशँ देव पुनि आवा॥
नमो नमो नारायण देवा। कामैं योग सकौं कै सेवाँ॥
तुइँ दयालु सबके उपराँहीं। सेवाकेर आशैं तुहिनाहीं॥
नामोहिं गुनैन जीभ रसबाता। तुइँदयालु गुनैं निरगुनैं दाता॥
पुरवहु मोर दरश की आसा। हौं मारँग जो करौं श्वासा॥
दो० तेहि बिधिविनयै न जान्यो, जेहिबिधि अस्तुति तोर।
कर सुदृष्टि औ कृपा, इच्छा पूजै मोर॥
कै अस्तुति जो बहुत मनावा। शब्देँ कोटिमण्डफ मँहँआवा॥
मानुष प्रेम भयो बैकुण्ठी। नाहत काहि छारँ एकमूठी॥
प्रेमहि माहिं बिरह रसरसा। प्रेमके घर मधु अमृतवसा॥
नैतैं धाय जो मरै तो काहा। संतजो करै बैठि तेहिलाहौं॥
एकबार जौं मन दै सेवा। सेवेहि फल प्रसन्नै है देवा॥
चार १ हमेशा २ सर्व ३ दुखी ४ हज़ार ५ दरवाज़ा ६ शिर ७ ख़िदमत ८
दया करनेवाला ९-१३ ऊपर १० उम्मेद ११ हुनर १२ दाना १४ नादान १५
अर्थात् उसी तरह का दम बदम ढूंढनेवाला हूं १६ तारीफ़ १७ निगाह
अच्छी १८ आवाज़ १९ माटी २० शराब २१ बदराह २२ फ़ायदा २३ खुश २४॥

पद्मावत । ७६
सुनिकै शब्दै मण्डफ झंकारा । बैठो आय पूरब कें द्वारा ॥
पिंडे चढ़ाय छारै चित आंटी । माटी होय अन्त जो माटी ॥
दो० माटी मोल न कछुलहै, औ माटी सब मोल ।
दृष्टि जो माटी सो करै, माटी होय अमोल ॥
बैठि सिंह छाला होय तपा । पद्मावत पद्मावत जपा ॥
दृष्टि समाधि वही सों लगी । जेहि दर्शन कारण बैरागी ॥
किंगरी गँहे बजावे मूरी । भोर सांझ सुनिके नितैं पूरी ॥
कन्था जरै अगिन जनु लाये । बिरहँदँदौरैं जरत न बुझाये ॥
नयनराते निशि मारगै जागे । चंपै चकोर जानु शशि लागे ॥
कुण्डल गँहे शीशँ भुँइलावा । पांवरेँ होउँ जहां वै पावा ॥
जटा छोरके बार बहारों । जेहि पंथ आव शीश तहँवारों ॥
दो० चारहुचक्र फिरे मनखोजत, डंडै नरहँ थिर बार ।
होयके भस्म पवनँ सँगधाऊं, जहां सो प्रान अधार ॥
पद्मावत तहँ योगैं संयोगा । परी प्रेमवश गँहे बियोगी ॥
नींद न परी रयन जो आवे । सेज केवांच जानु कोइलावे ॥
दहै चन्द औ चन्दन चीरैं । दग्धै करै तन बिरह गँभीरूँ ॥
कल्पसमानै रयन ही बाढ़ी । तिलै तिल मरु युग युग परगाढ़ी ॥
गँहे बीन मगै रयन विहाँये । शशिवाहनै नितैं रहै उनाये ॥
पुनि धुनि संग और ही लागे । ऐसी बिथा रयन सब जागे ॥
आवाज़ १ चंदन २ बिभूति ३ निगाह ४-५ वास्ते ६ पकड़ना ७-१६-३६
हररोज़ ८ गुदड़ी ६ जंगल १० आंखलाल ११ रात १२-२६ राह १३-२०
आंख १४ चांद १५ शिर १७ खड़ाऊं १८ दरवाज़ा १६ न्योछावर २१ चारों
तरफ़ २२ घड़ी २३ क़ायम २४ हवा २५ अर्थात् फ़क़ीरी का हाल २६ लेना २७
दुख २८ जलना ३०-३२ कपड़ा ३१ भारी ३३ बराबर ३४ तिलके बराबर
कम और करन से ज्यादह ३५ पकड़ा ३६ शायद ३७ आख़िर ३८ हिरन
चांद के रथका ३६ हमेशा ४० आवाज़ ४१ ॥

८० पद्मावत। १
कहां सो भँवर कमल रसलेवा। आय परीहोय घरन परेवो॥
दो० सो धनी बिरहपतंग भइ, जरा चहैं तेहि दीप।
कंतै न आवभृंग होय, को चन्दन तन लीप॥
परी बिरह बन जानौ घेरी। अगमँ असूझ जहांलग हेरी४॥
चतुरदिशा चितवे जनु भूले। सो बन कौन जो मालतिफूले॥
कमल भँवर ओही वन पावे। कोमिलाय तनतपन बुझावे॥
अंग अंग अस कमल शरीरा। हियँ भा पियर प्रेम की पीरा॥
चहीदरशराँवि कीन्हविकाशू। भँवरदृष्टि मनलागचकासू॥
पूँछे धायँ बौरि कहु वाता। तुइँजस कमल करी रंगराताँ॥
केसरबरनें रंग भा तोरा। मानहुँ मनहि भयो कुछ फोरा॥
दो० पवन न पावै संचरी, भँवर तेहों नहिं बैठि।
भूलकुरंगिनें कसभई, जानु सिंहँ तुइ डीठि॥
धाय सिंह धेरै खात्यों भारी। कीतसें रहत अहे जसवारी॥
जो बनसुनो किं नवेँल बसन्ता। तेहिबन परा हस्तमैमन्ताँ॥
अब जोबन बौरी को राखा। कुंजरै विरहबिखा सें शाखा॥
मैं जानो जतिन रस भोगू। जोवनकठिनँ सतापवियोगूँ॥
जोबन गरुश्रा पेल पहारू। सहि न जाय जोवनकर भारू॥
जोबन अस मँनमत्तै न कोई। नवे हस्तै जो अंकुश होई॥
जोबन भरि भादों जस गङ्गा। लहरें देइ समाय न अङ्गा॥
दो० पखों अथाह धायहौं, जोवन उदधिगँभीरँ।
कबूतर १ पद्मावत २ खाविन्द ३ मुश्किल ४-२२ देखना ५ दिल ६ सूर्य ७
खिलना ८ निगाह ६ लौंडी १० लड़की ११-२० लाल १२ पीला १३
हिरनी १४ शेर १५ शेर ने क्या मारा है १६ अर्थात् लड़काँई में कैसी
थी १७ नया १८ हाथी मस्त १६-२१-२६ दुख २३ बोझ २४ मस्त २५
समुद्र गहरा २७॥

पद्मावत । ८१
तहँ चितवों चारहुदिशि को गहि लावे तीरै ।
पद्मावत तुइ समुद्र सयानी । तुइ सरै समुद्र न पूजी रानी ॥
नदी समाय समुद्र महँ आई । समुद्रडोल कहु कहाँ समाई ॥
अवहीं कमलकरी हियँ तोरा । अइहै भँवर जो तोकहँ जोरा ॥
जोबन तुरी हाथ गहि लीजे । जहां जाय तहँ जाय न दीजे ॥
जोबनैं जोर माँते गज अहे । गहहु ज्ञान अंकुश जिमि रहे ॥
अवहिं बारँ तुइँ प्रेम नखेला । काजानिस कस होय दहेलाँ ॥
गगनें दृष्टि करपाय तराहीं । सूर्य देखकर आवत नाहीं ॥
दो० जब लग पीउ मिले तुहि, साधि प्रेमकी पीर ।
जैसे सीप स्वातिकहँ, तप समुद्र मैंभैं नीरै ॥
दहतैं धार्य जोबन औ जीव । जानहु परा अगिनिमहँ घीव ॥
करवट सहों होत दुइ आधा । सही न जाय बिरहकी दाधा ॥
बिरह समुद्र बिपहर अस भारा । भँवर मेल जिव लहरनमारा ॥
विरह नाग होय शिर चढ़ डसा । वही अगिन चन्दनमहँ बसा ॥
जोवन पंखी बिरह बियाधूँ । केहरि भयो कुरङ्गिंन खाँधूँ ॥
कनक पानि कित जोबन कीन्हा । औटन कठिनैं बिरह वह दीन्हा
जोबन जलहि बिरहमैंसि छुवा । भूलहिंभँवर फिरहिं भासुवाँ ॥
दो० जोबन चन्द उजास, विरह भयो सँग राहु ।
घटतहि घटत खीनँ भय, कहेन पैरों काहु ॥ १७२
नयनँ जो चक्र फिरे चहुँओरा । चरची बायैं समाय न कोरा ॥
चारों तरफ १ पकड़ना २ किनारा ३ बराबर ४ दिल ५ घोड़ा ६ जबानी
७ हाथी मस्त ८ लड़की ६ मारी १० आसमान ११ नज़र १२ बीच १३
पानी १४-२३ जलना १५ दाया १६ परदार जानवर १७ बहेलिया १८ शेर १६
हिरन २० खाना २१ सोना २२ मुश्किल २४ सियाही २५ तोता २६ बारीक २७
कहि नहीं सकता २८ आंख २६ दाया ३० ॥