पद्मावत (मलिक मोहम्मद जायसी - सटीक ऐतिहासिक महाकाव्य)
Padmavat with Hindi Commentary
मलिक मोहम्मद जायसी / पं. रामचन्द्र शुक्ल द्वारा
१३२ पद्मावत ।
पच्छिम का बार पूर्बकी बारी । लिखी जो जोरी होयनन्यारी ॥
मानुषसाज लाख मन साजा । सोई होयजो बिधिउपराजा ॥
दो० गये बाजन जो बा जंत, जिय मारण रणमाहँ ।
फिर बाजन ते बाजे, मंगलचार उनाहँ ॥
बोल गुसाईं कर मैं माना । कहिसोजगतउतरे कहँआना ॥
मानाबोल हर्ष जिव बाढ़ा । औ बिरोकैं भा टीका गाढ़ा ॥
दोनों मिले मनावा भला । पुरुष आप आप कहँ चला ॥
लीन्ह उतारी जो हत योगू । जो तप करै सो पावै भोगू ॥
वह मन चित जो एकै अहा । मार लीन्ह न दूसर कहा ॥
जो अस कोई जिव परछैंवा । देवता आय करहिं तेहिसेवा ॥
दिनदश जीवन जो दुख देखा । भायुगयुगसुख जहानलेखा ॥
दो० रतनसेन का बरनों, पद्मावत कर व्याह ।
मन्दिरबेगि सँवारो, मन्दिर तोरा छाह ॥
खण्डबाईसवां ब्याह राजारतनसेनऔरपद्मावत ॥
लगन धरी औ रचा बिवाहू । सिंहल निवत फिरा सबकाहू ॥
बाजन बाजे कोटि पचासा । भा आनंद सगरे कैलासा ॥
जेहिदिनकानितदेवमनावा । सोई दिवसे पद्मावत पावा ॥
चांद सूर्य्य मन माथे भागू । औगावहिंसबनखेंत सुहागू ॥
रचरचमाणिकै माड़ौ छावहिं। औभुइँराति १४ बिछावबिछावहिं॥
चन्दन खम्भ रचे चहुँ पांती । माणिकदिया बरहिंदिनराती ॥
घर घर मन्दिर रचे दुवारा । जहँतक नगर गीत झंकारा ॥
. लड़का १ लड़की २ अलग ३ ईश्वरने पैदाकिया ४ जमाव ५ खुशी ६
टीका ७ खेलना ८ तारीफ़ करना ९ जल्द १० दिन ११ तथा सहेलियां
१२ जवाहर १३ लाल १४ ॥
पद्मावत । १३३
दो० हाट बाट सब सिंहल, जहाँ देखी तहँ राते ।
धन रानी पद्मावत, जाकर ऐसि बरात ॥
रतनसेन कहँ कपड़ा आये । हीरा मोति पँदारथ लाये ॥
कुँवर सहसँ संग अहे सभागे । बिनयै करैं राजा पहँ लागे ॥
जेहिलग तुम साधा तप योगू । लेहु राज मानो सुख भोगू ॥
मज्जनें करहु बिभूति उतारो । करो अस्नानचित्रे समसारो ॥
काढ़हु मुन्द्रा फटक अभाऊ । पहिरो कुण्डल कनकॅजड़ाऊ ॥
छोरहु जटा फुलायल लेहू । झारहु केश मुकुट शिरदेहू ॥
काढ़हु कंथौ चिरकुट लावा । पहिरो राता दगला सुहावा ॥
दो० पांवरि तजहु देहुपगपैरी, आवा बांक तुखारं ।
बांध मौर धरि छत्र शिर, वेगेँ होहु असवार ॥
साजा राजा बाजन बाजे । मदनसहाय दोउदल गाजे ॥
औ राँता सोने रथ साजा । भई बरात गोहेन सब राजा ॥
बाजत गाजत भा असवारा । सब सिंहलने कीन्ह जुहारों ॥
चहुँदिशियश अलखततँरोई । सूरज चढ़ा चांद की ताई ॥
सब दिन तपे जैस हिये माहां । तैसि रात पाई सुख छाहां ॥
ऊपर छत्र राति तस छावा । इन्द्रलोक सब सेवा आवा ॥
आज इन्द्रअप्सर सौं मिला । सब कैलास होहिं सिंहला ॥
दो० धरती स्वर्ग चहुँ दिश, पूररही मशयार ।
बाजत आवै मंदिर कहँ, होहिं मंगलाचार ॥
पद्मावत धौराहरँ चढ़ी । धौकसरवि जाकहँशशि करी॥
लाल १-१२-१७ हज़ार २ अर्ज़ ३ नहाना ४ तसवीर ५ वाली नाचीज़ ६
सोना ७ गुदड़ी ८ खड़ाऊं ९ घोड़ा १० जल्द ११ साथ १३ सलाम १४:
छोटे सितारे १५ दिल १६ इन्द्रलोक की परी १७ आसमान १८ महल २०
सूर्य २१ चांद २२ ॥
१३४ पद्मावत ।
देख बरात सखिनसों कहा। यह महँ कौनसो योगी अहा॥
कैसो योग लै ओरै निवाहा। भयो सूरै चढ़चांद बिवाहा॥
कौन सिद्धसो ऐसो अकेला। जे शिर लाय प्रेमसो खेला॥
कासों पिता बचन असहारी। उतरै न दीन्हदीन्हतेहि वौरी॥
काकहँ दई ऐसो जिव दीन्हा। जे जिहमार जीत रण लीन्हा॥
धन पूरुष अस नवै न नाये। औसैं परसहो देश पराये॥
दो० को बरबन्द वीर अस, मोहिं देखे कर चावँ।
पुनिजायहिजनवासहि, सखीरी वेगैं देखाव॥
सखी देखावहिं चमकहिं वाहू। तू जसचांद सूर्य्य तोरनाहूँ॥
छिपा न रहै सूर्य्य परकाशू। देखकमलमन भयो विकाशू॥
वह उजियार जगत उपराहीं। जगउजियारसो तेहिपरछाहीं॥
जस रवि११. देखउठै परभातों। उठा छत्र देखहिं सब राता॥
वही मांझ भा दूलह सोई। और बरात संग सब कोई॥
सहसैंहिं१३ किरणरूपविधि१४ गढ़ा। सोने के रथ आवै चढ़ा॥
मन माथे दरशन उजियारा। सौंहैं निरखनहिंजायनिहारा॥
दो० रूपवन्त जस दरपण, धन तू जाकर कन्त।
चाही जैसो मनोहरा, मिलासो मनभावन्त॥
देखा चांद सूर्य्य जस साजा। सहसैंहिं भावमदैनतनगाजा॥
हुलसे नयन दरश मदमाते। हुलसे अधरैं रंग रस राते॥
हुलसा बदनै ऊपररवि२० आई। हुलसाहियों कंचुकि२२ नसमाई॥
हुलसे कुंचैं कसनी बँद टूटी। हुलसेभुजबैलियों कर फूटी॥
आखिरतक १ सूर्य्य २-११-२० जवाब ३ लड़की ४ इतमीनान ५
ज़बर्दस्त ६ चाह ७ जल्द ८ ख़ाविन्द ९ खिलना १० भोर १२ हज़ार १३-
१६ ईश्वर १४ सामने देखना १५ काम पैदा हुआ १७ होंठ १८ मुँह १६
दिल २१ अँगिया २२ छाती २३ चूड़ी २४॥
पद्मावत। १३५
हुलसी लंक कि रावण राजू। रामलषणदर्र साजहिं साजू ॥
आज चांद घर आवा सूरू। आज श्रृंगारहोय सब चूरू ॥
आज कटकै जो राहत कामू। आज विरहकरहोय संग्रामू ॥
दो० अंग अंग सब हुलसैं, कोइ कतहूँ न समाय।
ठांवहिं ठांव विमोही, गइ मुरछा गत आय॥
सखी सँभार पियावहिं पानी। राजकुँवरि काहे कुँभिलानी ॥
हमतो तोहिं देखावा पीव। तू मुरझान कैस भा जीव ॥
सुनहु सखी सब कहै विवाहू। मोकहँ जैसो चांद कहँ राहू ॥
तुम जानहु आवै पिउ साजा। यह धमधम मोकहँ सब बाजा ॥
जते बराती औ असवारा। यह सब मोरे चालनहारा ॥
सो आगमँ देखत हों भली। आपन रहन न देखों सखी ॥
होय विवाह पुनि होयहै गौना। गवनवतहां बहुरि नहिं अवना ॥
दो० अब सो मिलन कितहै सखी, परा विछोवा टूट।
तैसि गांठ पिउ जोरब, जन्म न होय है छूट ॥
आय बजावत बैठ बराता। पान फूल सेंदुर सब राताँ ॥
जहाँ सोने कर चित्र सँवारी। आन बरात तहां बैठारी ॥
माझ सिंहासन पाट सँवारा। दूलह आन तहां बैठारा ॥
कनकके खंभ लागे चहुँ पांती। माणिकै दिया बरहि दिनराती ॥
भयो अचल धुवै योग पखेरू। फूलबैठ थिरै जैस सुमेरू ॥
आज दई हों कीन्ह सुभागा। जस दुख कीन्ह नेग सब लागा ॥
आज सूर शशिके घरआवा। चांद सूर्य दुहुँ भयो मिलावा ॥
फ़ौज १-३ सूर्य २-१६ लड़ाई ४ दूरअंदेशी ५ लौटके ६ लाल ७ तस-
वीर ८ बीचोबीच ६ तख्त १० सोना ११ जवाहिरात १२ नाम नखत जिसे
कुतुब कहते हैं १३ क़ायम १४ नामपहाड़ १५ चाँद १७ ॥
९३६ पद्मावत ।
दो० आज इन्द्रहोय आयोँ, मैं बरात कैलाश १
आज मिली मोहिं अप्सरा, पूजी मन की आश ॥
होय लाग ज्योनार पसारा। कनक पत्र परसे पनवारा ॥
सोन थार मणि माणिक जरे। राये रङ्क सब आगे धरे ॥
रतन जड़ाऊ खोरौखोरी। जन जन आगे सौ सौ जोरी ॥
गडुवन हीरे पदारथ लागे। देख विमोहे पुरुष सभागे ॥
जानहुँ नखत करहिं उजियारा। छिप गये दीपक औ मसयारा ॥
भइमिल चाँद सूर्य की कला। भा उदोत तैसी निरमला ॥
जेहिं मानुष कहँ ज्योति न होती। तेहि भइ ज्योति देख वह ज्योती ॥
दो० पांति पांति सब बैठी, भांति भांति ज्योनार ।
कनक पत्र दोने तरे, कनक पत्र पनवार ॥
पहिले भात परोसे आना। जनहुँ सुवास कपूर बसाना ॥
बालहिं माड़ा औ घी पोई। उजियर देख पाप गयो धोई ॥
लुचई पूरी सुहारी पूरी। एक तो ताती औ सुठ कँवरी ॥
खंडरा खांड़ जो खण्डे खण्डे। बरी अकोतर सो कहँ हण्डे ॥
पुनि सँधाने आने बहु सांधी। दूध दही कि सुरन्दों बांधी ॥
पुनि बांवन प्रकार जो आये। नहिं अस देख न कबहूँ खाये ॥
पुनि जाँवरे पीफावरे आई। घृत खांड़ का कहौं मिठाई ॥
दो० जेवँत अधिक सुवासिक, मुहँ महँ परत विलाय ।
सहसै स्वाद सो पावै, एक कौर जो खाय ॥
जेवन आवा बीन न बाजा। बिनु बाजहिं नहिं जेवैं राजा॥
इन्द्रपुरी १ सोना २-८ राजाको भाई ३ कटोरा कटोरी ४ रोशनी ५
साफ़ ६ रौनक़ ७ बारीक माड़ी ६ एक क़िस्म का खाना १० अचार बहुत
तरह का ११ लड्डुवा १२ खीर १३ मुरब्बा १४ हज़ार १५ ॥
सब कुँवरन पुनि खैंचा हाथू। ठाकुर जेवैं तो जेवैं साथू ॥
बिनय करहिं पण्डित बिचवाना। काहे नहिं जेवहिं यजमाना॥
वह कैलास इन्द्र कर बासू। जहां न अन्न न माछर मांसू ॥
पान फूल ओछी सब कोई। तुमकारणे यह कीन्ह रसोई ॥
भूख तर्जन १ अमृत है सूखा। धूपतो सीरकैं २ नींबी रूखा ॥
नींदतो सुइँ जनु सेज सैपेती ३। छांड़ो का चतुराई येती ॥
दो० कौन काज केहि कारण, बिकल भयो यजमान।
होय रजायसुं ४ सोई, बेगि देहिं हम आन ॥
तुम पण्डित जानहु सब भेदू। पहिले नाद भयो तब बेदू ॥
आदि पिता ५ जो बिधि अवतारा। नादसंग जिवं ज्ञान सँचारा ॥
सो तुम बरजै नेकका कीन्हा। जेवन संग भोग बिधि दीन्हा ॥
नयनैं बैन नासक दुइश्रवना। यहिचारहुँ सँग जेवनश्रवना॥
जेवन देखा नयन सिरानी। जीभहिस्वादमुकै रसजानी ॥
नासक सबै बासना पाई। श्रवनहिका सँवरत पहुनाई ॥
तेहिं का होय नाद पै पोषौ १०। तब चारहुँ कर होय सँतोषौ ॥
दो० औ सब सुनहुँ शब्द इक, जिनहिं पड़ा कुछ सूझ।
नाद सुननि पण्डित बरज, कहो सो तुमकाबूझ ॥
राजा उतरै सुनहु अब सोई। महि १७ डोलै जो बेद न होई ॥
नाद वेद मर्द पैंड़े २० जो बारी। काँयों महँते लेहु बिचारी ॥
नाद हिये २२ मन उपजी कायौं। जहँमदतहां पैंड़े नहिं छाया ॥
खुराक १-१३ वास्ते २ छोड़ना ३ ठण्डा रहे धूप लगने पर भी ४
सफ़ेद बिछौना ५ हुक्म ६ जल्द ७ ब्रह्मा ८ ईश्वर ६ बदन में जानआई १०
रोक ११ आंख मुँह नाक कान १२ आसुदगी १४ क़रार १५ बात १६
जवाब १७ ज़मीन १८ मस्ती १६ शरीयत २०-२४ चदन २१-२३ दिल २२ ॥
An exact line-by-line transcription of the Devanagari text from the image:
१३८ पद्मावत।
होय अनमद जूझ सो करिये। जान वेद आंकुश शिरधरिये॥
योगी होय नाद सो सुना। जेहि सुनि कामजरै चौगुना॥
किये जो परसै तन्त मनलांवा। घूम सांत सुनि और न भांवा॥
गये जो धर्म्म पन्थ है राजा। ताकहँ पुनि जो सुनै तो बाजाँ॥
दो० जस मदपियें घूम कोउ, नाद सुनै पै घूम।
तेहिते बरजे नेकहै, चढ़ै रहसें के दूम॥
भई ज्योनाार फिरा खड़वाँनी। फिरा अरगंजा कुहकहँवानी॥
फेरे पान फिरा सब कोई। लाग्यो व्याहचार सब होई॥
माड़ो सोन कि गगन सँवारा। वन्दनवार लाग सब बाराँ॥
सजा पार्ट छत्र के छाहां। रतनै चौक पूरी तेहि मांहां॥
कंचने कलश नीर भरिधरा। इन्द्रे पास आनी अपसरों॥
गांठ दुलहिन दूलहकी जोरी। दुहूँ जगत जो जाय न छोरी॥
वेद पढ़ै पण्डित तेहि ठाऊँ। कन्या तुला राशि लै नाऊँ॥
दो० चांद सूर्य दोउ निरमलै, दोउसे योग अनूप।
सूर्य चाँद सो मूला, चांद सूर्य के रूप॥
दोहूँ नाउँ लै गावहिं वारी। करहिं सो पद्मिनी मंगलचारा॥
चाँद के हाथ दीन्ह जयमाला। चांद आन सूर्य गरेँ घाला॥
सूरज लीन्ह चांद पहिराई। हार नखतै नेरहिं सो पाई॥
पुनि धनै भर अंजुल जल लीन्हा। यौवन जन्म कंत कहँ दीन्हा॥
कन्त लीन्ह दीन्हों धन हाथा। जोरी गांठ दुहूँ इक साथा॥
१ मेहनत २ राह ३ तारीफ़ ३ राग सुननेसे दूनी कैफ़ियत होती है ४
शरबत ५ अतर ६ आसमान ७ दरवाज़ा ८ तख़्त ६ जवाहिरात १० सोना
११ पानी १२ तथा राजा १३-१७ तथा पद्मावत १४-१८ पाकसाफ़ १५
मिलना १६ लड़की १६ पद्मावत २०-२४ सूरय तथा रतनसेन २१ गरदन
२२ तथा सहेलियां २३॥
चांद सूर्य्य दुइ भांवर लीन्हीं। नखतमोत न्योछावर कीन्हीं॥
फिरहिं दोउ सतफेर गुंते के। सातहिं फेर गांठ सो एके ॥
दो० भइ भांवर न्योछावर, राजचार सब कीन्ह ।
दायज कहूं कहांलग, लिख न जाय ततदीन्ह ॥
रतनसेन जो दायज पावा। गन्ध्रवसेन आय कंठलावा ॥
मानुषचिन्तआनकुछ निन्ता। करै गुसांइन मनमहँ चिन्ता ॥
अब तुम सिंहलद्वीप गुंसाई। हम सेवक आहें सेवकाई ॥
जस चितोरगढ तुम्हरो देशू। तस तुम यहां हमार नरेंगू ॥
जम्बू दीप दूरका काजू । सिंहलद्वीप करहु नित राजू ॥
रतनसेन बिनवौं करजोरी । अस्तुति योग जीभकहँ मोरी ॥
तुम गुसाँई जे छारै छुडाई। की मानुष अति दीन्ह बड़ाई ॥
दो० जो तुम दीन्ह सो पावा, जिवों जन्मसुखभोग ।
नाहत खेहँ पाय कीं, हों योगी केहि योग ॥
धौराहर पर दीन्हा वासू । सात खण्ड जहँवां कैलासू ॥
सखी सहसँ दश सेवा पाई। जनहुँ चांदसँग नखततराई ॥
हेममंडल शशिके चहुँ पासा। शशि सूरैंहिले चढ़ी अकासा॥
चलसूरज दिन अथवै जहां । शशिनिरमलै तू पावसितहां ॥
गन्ध्रवसेन धौराहेर कीन्हा। दीन्हनराजहियोगिहिदीन्हा॥
मिलीजाहिंशशिके चहुँपाहां । सूर्य्य न चापै पावै बाहां ॥
अब योगी गुरु पायो सोई। उतरा योग भस्म गा धोई ॥
दो० सातखण्ड धौराहेरै, सात रंग नग लाग ।
गोतवाले १ राजा २ अर्ज़ करना हाथ जोड़के ३ धूर ४-५ महल ६-
१२-१५ हज़ार ७ छोटे सितारे ८ पद्मावंत ६ रतनसेन १० साफ़ ११ चाँद
तथा पद्मावंत १३ तथा राजा ख़िलवत न करसका १४ ॥
१४० पद्मावत ।
देखतका कैलासहिं, दृष्टिपाप सब भाग ॥
सातखण्ड सातों कैलासा । काबरणौं जस उत्तम बासा ॥
हीरा ईंट कपूर गिलावा । मलयागिरि ३ चन्दनसबलावा ॥
चूनाकीन्ह ओट गजमोती । मोतिहिचाह ४ अधिकतेहिज्योती ॥
बिश्वकर्महिं सैं हाथ सँवारा । सात खण्ड सातहिं चौपारा ॥
अतिनिरमलैं नहिंजायविशेखा । जसदरपनमहँदरशनदेखा ॥
भुइँ गच जनहुँ समुद्र हिलोरा । कनक ५ खम्भ जनुरचोहिंडोरा ॥
रतनपदार्थे होय उजियारा । भूले दीपक औ मसियारा ॥
दो० तहँ अप्सर पद्मावत, रतनसेन के पास ।
सातस्वर्ग हाथजनु आये, औसातों कैलास॥
पुनि तहँ रतनसेन पगधारा । जहां रतननौ सेज सँवारा ॥
पुतरी गढ़ गढ़ खम्भनकाढ़ी । जनु सजीव सेवा सब ठाढ़ी ॥
काहू हाथ चन्दन की खोरी । कोइ सेंदुर कोइ गहे सिंघौरी ॥
कोइ कुंकहि केसर लिये रहें । लावै अंगें रहस जनु चहें ॥
कोई लिये कुंकुमा चोवा । धन कब चहै ठाढ़मुखजोवौं ॥
कोइ बीरा कोइ लीन्हे बीरी । कोइपरमलअतिसुगंधसैंमीरी ॥
काहु हाथ कस्तूरी मेदू १३ । भांतिहिभांति लागसब भेदू ॥
दो० पांतिहि पांति चहूँ दिश, सब सोंधी करहाट ।
मांझै रचा इन्द्रासन, पद्मावत कहँ पौर्ट ॥
खण्ड तेईसवां मुलाक़ात पद्मावत वा
राजा रतनसेन ॥
सात खण्ड ऊपर कैलासू । तहँवाँ नारसेज सुख साजू ॥
१ निगाह २ तारीफ़ २ चन्दन ३ ज्यादा ४ पाकसाफ़ ५ सोना ६ जवाहि-
रात ७ आसमान ८ कटोरी ६ चंदन १० देखना ११ हवा १२ मुश्क १३
अम्बर १४ बीचोंबीच १५ तख़्त १६ ॥
[Header] पद्मावत। १४१
चार खम्भ चारहुँदिश धरे। हीरा रतन १ पदारथ जरे॥
माणिकै दिया जड़े औ मोती। होय उजियार रहा तेहिज्योती॥
ऊपर रातोँ चंदवा छावा। औ मुँइसुरँग विछावत्रिविछीवा॥
तेहिमहँ पलँग सेज सुखदासी। कीन्हेविछावन फूलहिवासी ॥
दोहुँदिश गेंदवा औगल सोई। कांची पार्ट भरी धुन रोई॥
फूलहिं भरे ऐसो केहि योगू। को तहँ पौढ़ मानरस भोगू ॥
दो० अतिसुकमार सेज सो डाँसी, छुवै न पावै कोय।
देखत नवै खनहिं खन, पांव धरत रिस होय ॥
राज तपत सेज जो पाई। गाँठ छोरि धन सखिन छिपाइ॥
अह्रै कुँवर हमरे अस चारु। आजुकुँवरकर करब शिंगारू ॥
हरद उतारि चढ़ावव रंगू। तब निशि० चांद सूर्य्य सो संगू ॥
जनु चातकै मुख बूँद सेवाती। राजा चकचौहत तेहिभांती ॥
योग छूटि जनु अपसर साथा। योग हाथकर भयो बिहाथा ॥
वै चतुरों कर लै अपनैसई। मित्र अमोल छीन लैगई ॥
बैठा खोय जरी औ बूटी। लाभ न पाव मूल भइ टूटी ॥
दो० खाय रहा ठग लाडू, तन्त मन्त बुधि खोय।
धौराहरे बनखंडेँ भयो, ना हँसि आव न रोय॥
अस तप करतभयो दिनभारी। चार पहर बीते युग चारी ॥
परीसांझ पुनि सखी सो आई। चांद रहा अपनी जो तराई ॥
पूँछहिं गुरु कहारे चेला। विनशेशि रेकस सूर अकेला॥
धात कमाय सिखे तूँ योगी। अबकसजसनिरधातबियोगी ॥
चारोतरफ १ जवाहिरात २-३ लाल ४- तकिया ५ रेशम ६ बिछौना ७
पद्मावत ८ रस्म ६ रात १० पपीहा ११ होशियारी १२ छिपजाना १३
महल १४ जंगल १५ छोटे नखत १६ चांद १७ सूर्य १८ दुखी १६ ॥ ...
१४२ पद्मावत ।
कहां सो खोयहु बिरवा लोना। जेहिते होय रूप औ सोना ॥
कसं हतार पार नहिं पावा। गंधक कहां करकटो खावा ॥
कहां छिपायहु चंद हमारा। जेहिबिन रयनि जगत अँधियारा॥
दो० नयन कौड़िया हियैं समुद्र, गुरू सो तेहिम हँ ज्योति ।
मन मराजिया न होय परे, हाथ न आवै मोति ॥
का पूँछौ तुम धात निछोही । गुरुजो कीन्ह अंतरपेंट ओही॥
सिधि गुटका जो मोसों कहा। भयो रांग सत हिये न रहा।
सोन रूप जासों दुख खोलों। गयो भरोस तहां का बोलों ॥
जहँ लोना बिरवा की जाती। कहिको संदेश आनको पाती॥
कि जो पार हरतार करेजे। गन्धक देख अमहिं जिव दीजे ॥
तुम जोरा की सूरँ मयंकू । पुनि विछोय सो लीन्ह कलंकू॥
जो यहि घड़ी मिलावै मोही। शीश देउँ बलिहारी ओही ॥
दो० होय अबरक इंगुर हुआ, फेर अगिन महँ दीन्ह ।
काया पीतर होय कनकें, जो तुम चाहो कीन्ह॥
का विसाय जो गुरु असबूझा। चकाव्यूहैं अभिमनै ज्यों जूझा॥
बिष जो दीन्ह अमृत देखराई। तेहिरे निछोहैं को पतियाई॥
मरै सुजान होय तन सूना। पीर न जानै पीर बिहूनों ॥
पार न पाव जो गन्धक पिया। सो हरतार कहो किमजिया॥
हम सिधिगुटका जानहिंनाहीं। कौन धात पूँछहु तेहि पाहीं ॥
अब तेहि बाजैं रंगभां डोलों। होय सांर तो बैंरगी बोलों ॥
अबरक कै तन इंगुर कीन्हा। सो तन फेर अगिन महँ दीन्हा॥
जोड़ना १ रात २ दिल ३ बेदर्द ४ छिपाना ५ कलेजा ६ सूर्य ७ चांद ८
बदन ६ सोना १० नांम क़िला ११ बेटा अर्जुन १२ बेदर्द १३ अलग १४
बिदून उसके १५ फ़ौलाद १६ तिपतिया १७ ॥
यहाँ प्रस्तुत पृष्ठ का देवनागरी लिप्यंतरण दिया गया है:
पद्मावत। १४३
दो० मिल जो प्रीतम बिछुरहि, काया अगिन जराय ।
कैसु मिलै तन तप बुझै, कै अब मोहि बुझाय ॥
सुनि के बात सखी सब हँसीं । जानहुँ रयनि तरैँ परगँसी ॥
अब सो चांद गगन महँ छिपा । लाल चकै कित पावस तर्पा ॥
हमहुँ न जाने धौं सो कहां। कर खोज औ बिनवबँ तहां ॥
औ अस कहब आहि परदेशी । कर मार्या हत्या जन लेशी ॥
पीर तुम्हार सुनत भा छोहू । देव मनाय होय अस ओह ॥
तूँ योगी तप कर मन जीता । योगिहि कौन राज की कथा ॥
वह रानी जहँवाँ सुख राजू । बारह अभरण करै सो साजू ॥
दो० योगी ह्वै आसन कर, इस्थिर धरम न ठांव ।
जो न सुने तौ अब सुनि, बारह अभरण नांव ॥
प्रथमहि मज्जन होय शरीरू । पुनि पहिरै तन चंदन चीरू ॥
साज मांग शिर सेंदुर सारा । पुनि ललाट रचि तिलक सँवारा ॥
पुनि अंजन दोउ नयनहि करे । पुनि सो कानन कुण्डल पहरे ॥
पुनि नासक झल फूल अमोला । पुनि रातौ मुख खाय तमोला ॥
गयें अभरण पहिरे जहँ ताई । औ पहिरे कर कँगन कलाई ॥
कटि क्षुद्रावल अभरण पूरा । पांयन पहिरे पायलें चूरा ॥
बारह अभरण यही बखाने । ते पहिरे बारहूँ अस्थाने ॥
दो० पुनि सोरहों शिंगार जस, चारहुँ योग कुलीन ।
दीर्घ चार चार लघु, चार शुभैं चहुँखीन ॥
पद्मावत जो सँवारी लीन्हा । पून्यो रात दई शशिकरीन्हा ॥
पाद-टिप्पणी (शब्दार्थ):
१ बदन १ रात २ छोटे नखत ३ खिलना ४ आसमान ५ योगी ६ अर्ज़
करना ७ मेहरवानी ८-६ जेवर १० मज़बूत ११ क़ायम १२ पहिले १३
नहाना १४ लाल १५ गरदन १६ हाथ १७ कमर १८ करधनी १६ पांजेब
वा छुड़े २० बड़े २१ छोटे २२ मोटे २३ पतला २४ पूरनमासी २५ ॥
१४४ पद्मावत ।
करिमज्जनं १ तन कीन्ह नहानू । पहिरो चीर गयो छिप भानू २ ॥
रचि पत्रावलै ३ मांग सेंदूरी । भरिमोतिन औ माणिकैं पूरी ॥
चंदन चीर पहिर बहु भांती । मेघ घटा जानहुँ बकें ४ पांती ॥
श्री जो रतन मांग बैठारा । जानहुँ गगनैं ६ टूटिनिशि ७ तारा ॥
तिलक ललाट ८ धरातस दीठा । जनहुँ दुइज पर नखत न बैठा ॥
कानन कुंडल खूँट ९ औ खूँटी १० । जानहुँ परी केंचीची ११ टूटी ॥
दो० पहिर जड़ाउ ठाढ़ भइ, कहि न जाय तस भाव ।
मानहुँ दरपन गगनैं भा, तो शशि १२ तार देखाव ॥
बांक नयन औ अञ्जन रेखा । खंजनै १४ जानु शरदऋतु देखा ॥
जो जो हेरै १५ फेर चषै १६ मोरी । लरै शरद महँ खंजन जोरी ॥
भौंहैं धनुष धनुष पै हारा । नयन सांध जनु बाएन मारा ॥
करनफूल नासक अतिशोभा । शशि १२ मुख आय सूक जनु लोभा ॥
सुरंग अधर १७ औ लीन्ह तँवोरा । सोहै पान फूल कर जोरा ॥
कुसुम गेंद अस सुरंग कपोलों । तेहि पर अलकैं भुवंगिनैं डोला ॥
तिल कपोल अल पंकज बैठा । वेधा सोई जो वह तिल दीठा ॥
दो० देख शिंगार अनूपै २२ विधि, विरह चला तब भाग ।
कालकष्ट वह उनवा, सब मोरे जिय लाग ॥
का बरणों अभरणैं २३ औ हारा । शशि पहिरे नखतन की मारा ॥
चीर चार औ चन्दन चोला । हीर हार नग लाग अमोला ॥
तेहिं झांपी रोमावल कारी । नागिनि रूप डंसी हत्यारी ॥
कुचैं २४ कंचुकी २५ श्रीफल उभे । हुलसहिं चहहिं कंत हिय चुभे ॥
उबटन १ सूर्य २ नामदाया ३ बगुल ४ टीका ५ आसमान ६
७-१३ रात ८ माथा ९ बाली १० करनफूल ११ नाम छोटे नखत १२ चांद
१४-१९ ममोला १५ देखना १६ आंख १७ होंठ १८ गाल २० बाल २१
नागिन २२ बेमिसाल २३ ज़ेवर २४ छाती २५ अँगिया २६ ॥
बाहहिं बाहू ताड़ै सलोनी । डोलत बांह आवगत लोनी ॥
तरवन कमलंकली जनु बांधे । बसौ लंक जानहु दुइ आधे ॥
छुद्रघंट कटि कंचन बागा । चलते उठहिं छतीसो रागा ॥
दो० चूँरा पायल अनवट बिछिया पांयनपरी बियोगें ।
हिये लायटुकहमकहसमंदै नहिंतुमजानअौभोग ॥
अस बारह सोरह धने साजी । छाजनै और बहीपै छाजी ॥
विनवहिंसखी गहेरैका कीजे । जें जिवदीन्ह ताहिजिवदीजे ॥
सँवरि सेज धन मन भइ शंका । ठाढ़ तेवान टेक कर लंकाँ ॥
अनचिन्हा पियकांपोंमनमाहां । का मैं कहब गहैब जो बाहां ॥
वारि वैसगइ प्रीति न जानी । तरुणे भई मै मन्ते भुलानी ॥
यौवनगर्व न कुछ मैं चेता । नेह न जानु श्याम के सेता ॥
अब जो कंत पूँछहि सब बाता । कस मुख होय पीत कै राताँ ॥
दो० हों सुवारि औ दुलहिन, पियसो तरुणै औ तेज ।
नाजानों कस होय है, चढ़त कन्त की सेज ॥
सुनि धनडर हिरदय तब ताईं । जौलहिरहस मिलानहिंसाईं ॥
कौन कली जो भँवरन राई । डारन टूटि पहुँपै गरुवाई ॥
मात पिता जो व्याहे सोई । जन्म निवाह कंत सँग होई ॥
भरे यमवार चहै जहँ रहा । जाय न मेटा ताकर कहा ॥
ताकहँ बिलंब न कीजे वारी । जो पिय आयसु सोइ पियारी ॥
चलहुवेगि आयसु भा जैसे । कन्त बोलावे रहै सो कैसे ॥
मान न कर थोरा कर लाडू । मान करत रस मानै चाँडू ॥
:: नाम जेवर १-२-८-६ खूबसूरत ३ भँवर ४ कमर ५-७-१६ करंधनी ६
दुखी १० दिल ११ मुलाकात १२ पद्मावत १३ सोहना १४ देर १५ पकड़ना
१७ जवान १८-२३ मस्त १६ जवानो का गरूर २० काला या सफेद २१
लाल २२ फूल २४ मरनेके दमतक २५ हुक्म २६ जल्द २७ गुस्सा २८ ॥
१४६ पद्मावत ।
दो० साजन लिये पठाई, आयसु जाय न मेट ।
तनमन यौबनसाज सब, देइचलीं लै भेट ॥
पद्मिन गवनैं हंस गये दूरी । हस्तिं लाज मेलहि शिरधूरी ॥
बदनैं देख घटंचन्द छिपाना । दशनैं देखके बीजं लजाना ॥
खंजनैं छिपे देख कै नैना । कोकिलछिपी सुनतमधुवैना ॥
ग्रीवैं देखकर छिपा मयूरू । लंकैं देखकर छिपा सेंदूरू ॥
भौंहधनुष जो छिपा अकारौं । बेनी १२ बासुकिकि छिपापतारा ॥
खड्गैं छिपी नासिका विशेखी । अमृत छिपा अधरैं रसदेखी ॥
पहुँचिहिं छिपा कमल पौनारी । जंघ छिपा कदैली होय वारी ॥
दो० अप्सर रूप छिपाई, जोहि चलै धरैं साज ।
जहँलग गर्वगहेलजग, सबैछिपीमनलाज ॥
मिलीसो गोहनैं संखी तर्राईं । लीन्हचांद सूर्य पहँ आई ॥
परश रूप चांद देखराई । देखत सूर्य गयो मुरझाई ॥
सोरहकिरनदृष्टि शशिकीन्हा । सहसैं किरन सूर्यकहँ लीन्हा ॥
भा रबि २५ अस्त तर्राईं हँसी । सूर्य न रहा चांद परगँसी ॥
योगी आहि न भोगी कोई । खाय करकटौं गयो परसोई ॥
पद्मावत निरमलं जस गङ्गा । नाहिं युक्ति योगी भिखमङ्गा ॥
आय जगावहिं चेला जागहु । आवा गुरू पांय उठलागहु ॥
दो० बोलहिं शब्दैं सहेली, कानलागगहि माथ ।
गोरखै आय ठाढ़ भा, उठरे चेला नाथ ॥
हुक्म १ चाल २ हांथी ३ मुँह ४ दाँत ५ बिजुली ६ ममोला ७ मीठी
बोली ८ गर्दन ६ कमर १० चीता ११ आसमान १२ चोटी १३ नाम राजा
सांपों का १४ तलवार १५ होंठ १६ केला १७ पद्मावत १८ साथ १६ छोटे
नखत २०-२६ सूर्य २१-२५ निगाह २२ चाँद २३ हज़ार २४ खिलना
२७ टुकड़ा रोटी २८ पाक २६ आवाज़ ३० योगी ३१ ॥
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पद्मावत। १४७
गोरख शब्द शुद्ध भा राजा। रामा सुनि रावन होयं गाजा॥
गही बांह धन सेजवां आनी। अंचल ओट रही छिपारानी॥
सकुची डरी मुरी मन बीरी। गहु न बांहरे योगि भिखारी॥
ओहटैं हो योगी तोर चेरी। आवे बास करंकटों केरी॥
देखि बिभूत छूत मुहिं लागा। कांपै चांद राहु सो भागा॥
योगी तोर तपसी के कयाँ। लागी चहै अंग मोर बयाँ॥
बार भिखारन मांगसि भीखा। मांगो आयस्वर्ग चढ़शीखा॥
दो० योगि भिखारी कोई, मन्दिर नपैसै पार।
मांगलेहु कुछ भिक्षा, जाय ठाढ़हो बार॥
अन तुम कारणे प्रेम पियारी। राज छांड़िके भयौं भिखारी॥
नेह तुम्हार जो हिये समाना। चित्तौर सो निसखोहै आना॥
जसमालतिमहँ भँवरवियोगी। चढ़ाबियोग चल्यों ह्वैयोगी॥
भँवर खोज जसपावै केवौं। तुम कारण में जिवपरखेवौं॥
भयौं भिखार नारितुम लागी। दीप पतंग है अँगयोंआगी॥
एकबार मरि मिलै जो आयें। दूसर बार मरै कित जाये॥
किततोहिमीचें जोमरकेजिया। भँवर कमल मिलकैरसपिया॥
दो० भँवर जोपावै कमलकहँ, बहुआरतें बहुआस।
भँवर होय न्योछावर, कमल देय हसबास॥
अपने मुहँ न बड़ाई छाजा। योगी कतहूँ होहिं नहिंराजा॥
हौ रानी तू योगि भिखारी। योगिहि भोगिहिकौन चिन्हारी॥
योगी सबै छन्द अस खेला। तू भिखार केहिमाहँ अकेला॥
पकड़ना १ पद्मावत २ दूरहो ३ सूखा टुकड़ा रोटी ४ बदन ५-६
छाया ७ दरवाज़ा ८ आसमान ६ पैठ न सके १० वास्ते ११ दिल १२
दुखी १३ कमल १४ दुख १५-१७ मौत १६॥
१४८ पद्मावत ।
पवनबांधै अपसबैहिं अकासा। मंसहिं जहांजाहिं तहँ वासा॥
येही आंति सृष्टि बहु छरी। यही भेष रावण सियँ हरी॥
भँवरहिं मीचै नेर जो आवा। केतकि वास लेयकहँ धावा॥
दीपक ज्योति देखिउजियारी। आय पंख ह्वै परा भिखारी॥
दो० र्यनिजोदेखें चन्दमुख, मँसि तनहोयअलोपं ।
तुहूँ योग अस भूला, होय राजा के रूप॥
अनधनं तूशशेरं निशें माहां। हों दिनेरं जेहिके तूद्याहां॥
चांदहि कहां ज्योति औ कला। सूर्यकीज्योतिचांद निरमलोँ॥
भँवर बास चम्पा नहिं लेई। मालति जहां तहां जिव देई॥
तुमहुत भयों पतंगकी फिरौं। सिंहलद्वीप आय उड़परा॥
सेयों महादेव कर वारूं। तजौं अन्न भा पवनअहारू॥
तुम सों प्रीतिगांठ मैं जोरी। कटै न काटै छुटै न छोरी॥
सियँ भीख रावणकहँ दीन्ही। तूअसनिठुरअन्तरपँटँदीन्ही॥
दो० रंगतुम्हारे रात्योँ, चढ़यों गगने है सूरं ।
जहँशशिशीतलकहँतपों, मनइच्छा धनपूर॥
योगि भिखारकरेसि बहुवाता। कहेसि रंग देखों तुहि रातौँ॥
कपरा रँगे रंग नहिं होई। हिये औट उपजै रँगसोई॥
चांदकी रंग सूर्य जो राता। देखी जगत साँझ परभाताँ॥
दग्धै विरह नितहोय अँग़ारू। दहक आंच दग्धै संसारू॥
जो मँजीठ औटै बहु आंचा। सो रंग जन्म न डोलै रांचा॥
जरै विरह जो दीपक बाती। भीतर जरि ऊपर है राती॥
सांसरोकिकै १ छिपना २ दुनियां ३ सीताजी ४ मौत ५ रात ६-११
सियाही ७ ग़ायब ८ ऐपश्रावंत ६ चाँद १० सूर्य १२-२० पांकसाफ़ १३
मानिन्द १४ दरवाज़ा १५ छोड़ना १६ श्रीसीताजी १७ ओट १८ आसमान
१६ लाल २१ दिल २२ मोर २३ जलाना २४ ॥
पद्मावत। १४६
जर पलाश कोइला के भेसू । तब फूला राता हो टेम् ॥
दो० पान सुपारी खैर तहँ, मिलै करै चकमून।
तवलग रंग न राची, जबलग होय न चूना॥
धंन याका सुरँगका चूना। जेहि तननेह दगधै तेहिदूना॥
हौं तुम नेह पियरभा पानू। पेड़ी हुतसन रास बखानू ॥
सुनि तुम्हार संसार बढ़ौनी। योग लीन्ह तनकीन्ह गड़ौनी॥
करहि जो किंगिरीले बैरागी। नेवती होय बिरहकी आगी॥
फेरफेर तन कीन्ह भुजोना। औंट रखंग हिरदय अंचौना॥
सूख सुपारी भा मनमारा। शिरसरोत जनु करवट सारा ॥
हाड़ चून भै बिरहें दही। जानै सोइ जो दगधै इमि सही॥
दो० कै सुजानि बहुपीरा, जेहिं दुख ऐसो शरीर।
रक्त पियासे जे अहहिं, का जानै परपीर ॥
योगिहि बहुतछन्द औराहीं। बूँद सेवाती जैसे पराहीं ॥
पड़हिं भूमि परहोय कंचूरू। पड़हिं कदेलिपर होयकपूरू ॥
पड़हिं समुद्र खारजल ओहीं। पड़ेंहि सीप सब मोती होहीं॥
पड़हिं मेरु पर अमृत होई। पड़हिंनागमुख विषहोयसोई ॥
योगी भँवर निठुर ये दोऊ । केहि आपने से कहो सो कोऊ॥
एकठांव यहिथिर न रहाहीं। रसले खेलै अन्तकहँ जाहीं ॥
होयगृही पुनि होय उदासी। अन्तकाल दोनों विश्वांसी ॥
दो० तासों नेह जोदृढ़ करहिं, थिर आयहिसहदेश।
योगी भँवर भिखारी दूर रहहिं आदेश ॥
रेझा १ पञ्चायत २ जलन ३-१० चढ़ाई ४ गढ़ौता ५ हाथ ६ महिमान ७
भुजना ८ शिरकटाना ६ इसतरह ११ मकर करना १२ ज़मीन १३
नरकधूर १४ केला १५ पहाड़ १६ जगह १७ क़ायम १८ जाना १६
बेसब्रर २० मज़बूत २१ सलाम २२ ॥
३. राघव चेतन प्रसंग व खिलजी का चित्तौड़ घेरा
१५० पद्मावत।
थलथल नगन होहिं जेहि ज्योती। जलजल सीपन उपजहिं मोती॥
बनबन बृक्ष न चन्दन होई। तनतन विरह न उपजें सोई॥
जहँउपजा सो औट मरगयो। जन्म निरारें १ न कबहूँ भयो॥
जलअम्बुज २ रबि रहै अकासा। जो प्रीति जानहुँ इकपासा॥
योगी भँवर जो थिरै न रहाहीं। जेहि खोजहिं तहँ पावै नाहीं॥
मैंतो पावा आपन जीव। छांड़ सेवात जाय नहिं पीव॥
भँवरमालती मिलै जो आई। सो तर्ज आनफूल कित जाई॥
दो० चम्पाप्रीति जो तेल है, दिन दिन आकर वास।
गलगल आप हेराय जो, सुयहिं न छांडै पास॥
ऐसैं राजकुँवर नहिं मानौ। खेल सारँपांसा तब जानौ॥
कच्ची बारहिंबार फिरासी। पकी तौ फिर थिर न रहासी॥
रहै न आठ अठारह भाखा। सोरह सत्रह रहै सो राखा॥
सतयें धरे सो खेलनहारा। द्वारा ग्यारा जासु न मारा॥
तूं लीन्हेसि आछे मन दुवा। औ यगसार चहेसिपुनि छुवा॥
हौं तूनेह रच्यों तोहि पाहीं। दसों दांत तोरे हियँ माहीं॥
तंव चौपर खेलौं कै मर्या। जो तरहेलें होय सो तिया॥
दो० जेहिमलि बिछुरन औतपन, अंते तंत तेहिनन्त।
तेहिमलि कंचन को सहै, पर बिन मिलै न चन्त॥
बोलों बचन नारि सुनि सांचा। पुरुपका बोल संस्रौ वांचा॥
यहि समलाग्योतुहि असनारी। दिनतोहिं पास और निशेंसारी॥
मैं पर बारहिंबार मनायों। शिरसों खेल निपटजिवलायों॥
पैदा १ अलग २ कमल ३ सूर्य्य ४ क़ायम ५ छोड़ना ६ चौपर ७ दिल ८
मेहरबानी ६ जो मेरे साथ बाजी हारजाय १० आख़िरको सुख ११ सोना
१२ रात १३॥
पद्मावत । १५१
भल भांती मैं रचना राची। मारेसि तोहि सबै कै काची॥
पाक उठायों आशक रीता। हौं जीतहि हारा तूँ जीता॥
मिलके युगनहिं होहुँ निरौरी। कहां बीच दोती दिन हारी॥
अब जिव जन्म जन्म तुहि पासाँ। चढ़यों योग आयों कैलासा॥
दो० जाकर जिव बसि जेहि से, तेहि पुनि ताकर टेक।
कनकें सुहागन बिछुड़ हि, औट मिलहिं जो एक॥
वेहँसीथनै सुनिके सत बाता। निश्चै तू मोरे रँगराताँ॥
निश्चै भँवर कमल रसरसा। जो जेहि मन सो तेहि मन बसा॥
जब हीरामन भयो सँदेशी। तूहुत मँडफ गयौ परदेशी॥
तोर रूप तस देखेउँ लोनाँ। जनु योगी तू मेली टोना॥
सिधि गुटका जो दृष्टि कमाई। पारे मेल रूप बेसं याई॥
भुक्ति देन कहँ मैं तुहि डीठाँ। कमल नयन होय भँवर जो बैठा॥
नयन पुहुपे तू अलि भ्रासोभी। रहा बेध तस उड़सि न लोभी॥
दो० जाकर आश होय जे कहँ, तहँ पुनि ताकर आस।
भँवर जो दाढ़ौ कमलका, कसन पाव रस बास॥
कौन मोहनी धौं हुत तोही। जो तोहि बिथा सो उपर्जी मोही॥
बिन जलमीनें तपै जस जीउ। चातुर्क भयौं कहत पिउ पीउ॥
जरों विरह जस दीपक बाती। मँग जोवत भइ सीप से बाती॥
डार डार ज्यों कोयल भई। भयौं चकोर नींद निशँ गई॥
मोरे प्रेम प्रेम तुहुँ भयो। राता हेम अगिन ज्यों तयो॥
हीरादि पहिं जोसूर उदोती। नाहत कित पाहनैं कहँ योती॥
अलग १ दो तीन का क्या कामहै २ मददगार ३ सोना ४ पद्मावत हँसी
५ यक़ीन ६ मस्त ७ खूबसूरत ८ निगाह ९ पारा मिलाके चांदी किया १०
भीख ११ देखना १२ फूल १३ भंवरा १४ आशिक़ १५ पैदा होना १६ मछली १७
पपीहा १८ राह १९ रात २० लाल सोना २१ चमक २२ सूर्य्य २३ पत्थर २४॥