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सर्वकोश
पद्मावत (मलिक मोहम्मद जायसी - सटीक ऐतिहासिक महाकाव्य)

पद्मावत (मलिक मोहम्मद जायसी - सटीक ऐतिहासिक महाकाव्य)

Padmavat with Hindi Commentary

मलिक मोहम्मद जायसी / पं. रामचन्द्र शुक्ल द्वारा

DevanagariAwadhipublished318 पृष्ठ

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पृष्ठ 142

[Header] पद्मावत। १४१
चार खम्भ चारहुँदिश धरे। हीरा रतन १ पदारथ जरे॥
माणिकै दिया जड़े औ मोती। होय उजियार रहा तेहिज्योती॥
ऊपर रातोँ चंदवा छावा। औ मुँइसुरँग विछावत्रिविछीवा॥
तेहिमहँ पलँग सेज सुखदासी। कीन्हेविछावन फूलहिवासी ॥
दोहुँदिश गेंदवा औगल सोई। कांची पार्ट भरी धुन रोई॥
फूलहिं भरे ऐसो केहि योगू। को तहँ पौढ़ मानरस भोगू ॥
दो० अतिसुकमार सेज सो डाँसी, छुवै न पावै कोय।
देखत नवै खनहिं खन, पांव धरत रिस होय ॥
राज तपत सेज जो पाई। गाँठ छोरि धन सखिन छिपाइ॥
अह्रै कुँवर हमरे अस चारु। आजुकुँवरकर करब शिंगारू ॥
हरद उतारि चढ़ावव रंगू। तब निशि० चांद सूर्य्य सो संगू ॥
जनु चातकै मुख बूँद सेवाती। राजा चकचौहत तेहिभांती ॥
योग छूटि जनु अपसर साथा। योग हाथकर भयो बिहाथा ॥
वै चतुरों कर लै अपनैसई। मित्र अमोल छीन लैगई ॥
बैठा खोय जरी औ बूटी। लाभ न पाव मूल भइ टूटी ॥
दो० खाय रहा ठग लाडू, तन्त मन्त बुधि खोय।
धौराहरे बनखंडेँ भयो, ना हँसि आव न रोय॥
अस तप करतभयो दिनभारी। चार पहर बीते युग चारी ॥
परीसांझ पुनि सखी सो आई। चांद रहा अपनी जो तराई ॥
पूँछहिं गुरु कहारे चेला। विनशेशि रेकस सूर अकेला॥
धात कमाय सिखे तूँ योगी। अबकसजसनिरधातबियोगी ॥
चारोतरफ १ जवाहिरात २-३ लाल ४- तकिया ५ रेशम ६ बिछौना ७
पद्मावत ८ रस्म ६ रात १० पपीहा ११ होशियारी १२ छिपजाना १३
महल १४ जंगल १५ छोटे नखत १६ चांद १७ सूर्य १८ दुखी १६ ॥ ...