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सर्वकोश
पद्मावत (मलिक मोहम्मद जायसी - सटीक ऐतिहासिक महाकाव्य)

पद्मावत (मलिक मोहम्मद जायसी - सटीक ऐतिहासिक महाकाव्य)

Padmavat with Hindi Commentary

मलिक मोहम्मद जायसी / पं. रामचन्द्र शुक्ल द्वारा

DevanagariAwadhipublished318 पृष्ठ

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पृष्ठ 143

१४२ पद्मावत ।
कहां सो खोयहु बिरवा लोना। जेहिते होय रूप औ सोना ॥
कसं हतार पार नहिं पावा। गंधक कहां करकटो खावा ॥
कहां छिपायहु चंद हमारा। जेहिबिन रयनि जगत अँधियारा॥
दो० नयन कौड़िया हियैं समुद्र, गुरू सो तेहिम हँ ज्योति ।
मन मराजिया न होय परे, हाथ न आवै मोति ॥
का पूँछौ तुम धात निछोही । गुरुजो कीन्ह अंतरपेंट ओही॥
सिधि गुटका जो मोसों कहा। भयो रांग सत हिये न रहा।
सोन रूप जासों दुख खोलों। गयो भरोस तहां का बोलों ॥
जहँ लोना बिरवा की जाती। कहिको संदेश आनको पाती॥
कि जो पार हरतार करेजे। गन्धक देख अमहिं जिव दीजे ॥
तुम जोरा की सूरँ मयंकू । पुनि विछोय सो लीन्ह कलंकू॥
जो यहि घड़ी मिलावै मोही। शीश देउँ बलिहारी ओही ॥
दो० होय अबरक इंगुर हुआ, फेर अगिन महँ दीन्ह ।
काया पीतर होय कनकें, जो तुम चाहो कीन्ह॥
का विसाय जो गुरु असबूझा। चकाव्यूहैं अभिमनै ज्यों जूझा॥
बिष जो दीन्ह अमृत देखराई। तेहिरे निछोहैं को पतियाई॥
मरै सुजान होय तन सूना। पीर न जानै पीर बिहूनों ॥
पार न पाव जो गन्धक पिया। सो हरतार कहो किमजिया॥
हम सिधिगुटका जानहिंनाहीं। कौन धात पूँछहु तेहि पाहीं ॥
अब तेहि बाजैं रंगभां डोलों। होय सांर तो बैंरगी बोलों ॥
अबरक कै तन इंगुर कीन्हा। सो तन फेर अगिन महँ दीन्हा॥
जोड़ना १ रात २ दिल ३ बेदर्द ४ छिपाना ५ कलेजा ६ सूर्य ७ चांद ८
बदन ६ सोना १० नांम क़िला ११ बेटा अर्जुन १२ बेदर्द १३ अलग १४
बिदून उसके १५ फ़ौलाद १६ तिपतिया १७ ॥