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निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

कुर्मवन्तम्-इति वा, अर्चनीयम्-इति वा, पूजनीयम्
इति वा अहरत्, यं दूतो देवानां विवस्वतः 'आदि-
त्यात्। 'विवस्वान् विवासनवान्। प्रेरितवतः पराग-
ताद् वा। अस्य अग्नेर्वैश्वानरस्य मातरिश्वानम्
आहर्त्तारम्-आह।
'मातरिश्वा' वायुः मातरि अन्तरिक्षे श्वसिति
मातरि आश्वनिति इति वा ।
अथ एनम् एताभ्याम् सर्वाणि स्थानानि अभ्या-
पादं स्तौति ॥ ४ (२६) ॥
अर्थः-"अपामुपस्थे" इस ऋचा का भरद्वाज ऋषि
और प्रातरनुवाक तथा आश्विन शस्त्र में शस्त्र है।
"अपाम्-उपस्थे" (उपस्थाने = महति अन्तरिक्षलोके)
जलों के रहने के स्थान बड़े आकाश देश में 'महिषाः' (आ-
सीनाः) बैठे हुए (महान्तः इति वा) अथवा बड़े (माध्य-
मिकाः देवगणाः) मध्यम लोक के देवगणों ने (तम्) उस
को 'अगृभ्णत' (अगृह्णत) ग्रहण किया, 'ऋग्मियम्' (ऋग्म-
न्तम् इतिवा) ऋचाओं से स्तुति वाले (अर्चनीयम्-इति वा-
पूजनीयम्-इति वा) अथवा अर्चनीय अथवा पूज्य (उस) को
"विशः राजानम्"- (इव) जैसे मनुष्य राजाको (उपस्थान
करें) 'उपतस्थुः' उपस्थान किया (सत्कृत किया) [किस
को ?] (यम्) जिस 'वैश्वानरम्' वैश्वानर 'अग्निम्' अग्नि
को 'दूतः' (देवानाम्) देवताओं का दूत 'मातरिश्वा' वायु
'परावतः' (प्रेरितवतः = प्रेरितवरात्) बहुत प्रेरित हुये

हिन्दी निरुक्तं ( १०८ ) ७ अ० ७ पा० ५ खं
'
( परांगतोद्वे वा ) अथवा दूर गएं हुये 'विवस्वतः' ( आदि
त्यात् ) विवस्वान् = आदित्य से 'आ अभरत्' ( आहरत् )
लाया था ।
“अस्य अग्नेः०” इस ( पार्थिव ) अग्नि वैश्वानर को
लाने वाले मातरिश्वा ( वायु ) को कहता है—इस प्रकार इस
मन्त्र में, जहां से लाया गया, जो लाया गया, और जो लाया
तीनों अलग २ दिखाये हैं, अर्थात्—विवस्वान् से मातरिश्वा
वैश्वानर को लाया । इस से इन दोनों विवस्वान् और मात-
रिश्व के समीप में तीसरा 'वैश्वानर' शब्द से साक्षात् ही
पार्थिव अग्नि कहा गया, इस लिये पार्थिव अग्नि वैश्वानर
है, यह व्यवस्थित होता है ।
'विवस्वान्' क्या ? विवासनवान् ( अन्धकार को हटाने
वाला ) ।
'मातरिश्वा' क्या ? वायु । क्यों ? माता = अन्तरिक्ष में
श्वसन करता है = चलता है । [ इस व्याख्या में 'मातृ' शब्द
और 'श्वस' ( अदा०प० ) धातु से 'मातरिश्वा' शब्द है । ]
अथवा मातों अन्तरिक्ष में शीघ्र चलता है । [ इस व्याख्या में
'मातृ' शब्द 'आशु' (अव्यय) 'अन' (अदा०प०) धातु से है । ]
अब इस ( अग्नि ) को इन दो ऋचाओं से सब स्थानों
को लेलेकर स्तुति करता है ( ऋषि )—॥ ४ (२६) ॥
( सं० ५ )
(निरु०–) “मूर्द्धा भुवो भवति नक्तमग्निस्ततः
सूर्यो जायते प्रातरुद्यन् । मायामूतू यज्जियाना-

हिन्दी निरुक्त ( १०६ ) ७ अ० ७ पा० ५ खं०
मेतामपोयत्तूर्णिश्चरति प्रजानन् ॥” [ ऋ० सं०
८, ४, ११, १ ]
'मूर्द्धा' मूर्त्तम् अस्मिन् धीयते । मूर्द्धा यः सर्वेषां
भूतानाम् भवति नक्तम् अग्निः, ततः सूर्य्यो जायते
प्रातरुद्यन्, स एव, प्रज्ञां तु एतां मन्यन्ते य-
ज्ञियानां देवानां यज्ञसम्पादिनाम्, अपो यत्
कर्म चरति प्रजानन्- सर्वाणि स्थानानि अनुसं-
चरते त्वरमाणः ।
तस्य उत्तरा भूयसे निर्वचनाय ॥५[२७]॥
अर्थ :- “मूर्द्धा भुवः” । 'अग्निः' अग्निदेव 'भुवः'
पृथिवी का ( सर्वेषां भूतानाम् ) सब प्राणियों का 'मूर्द्धा'
शिर 'भवति' है, 'नक्तम्' ( विशेष कर ) रात्रि में, जिस
प्रकार शिर के बिना प्राणी का जीवन नहीं हो सकता उसी
प्रकार अग्नि के बिना भी कोई प्राणी जी नहीं सकता, क्यों
कि- उसी के अधीन अन्न का पकाना ( रांधना ) आदि है,
इसी से यह अग्नि सब भूतों का मूर्द्धा (प्रधानसम) है । 'ततः'
फिर ( रात्रि के बीत जाने पर ) “प्रातः उद्यन्” प्रातःकाल
उदय होता हुआ ( सः एव ) वही अग्नि 'सूर्य्यः' सूर्य 'जायते'
हो जाता है । अर्थात्- जो अग्नि रात्रि के समय अग्नि के
रूप से जगत् का उपकार करता है, वही अग्नि सवेरे ही दिन
के उपकारों के करने के अर्थ सूर्य हो जाता है, [ यह उसकी
माया है । ] ( तत्वविदः ) देवता तत्व के जानने वाले पुरुष
'एताम्' इसे 'यज्ञियानाम्' ( यज्ञसम्पादिनां देवानाम् )

हिन्दी निरुक्त ( ११० ) ७ अ० ७पा० ६खं

यज्ञ के सम्पादन (सिद्ध) करने वाले देवताओं की 'मायाम्'
(प्रज्ञाम्) माया या प्रज्ञान (विद्या) मानते हैं। 'यत्'
जोकि-'अपः' (कर्म) अपने अधिकार के कर्म को 'जानन्'
जानता हुआ 'तूर्णिः' (त्वरमाणः) वेग से युक्त 'चरति'
(सर्वाणि स्थानानि अनुसंचरते) सब स्थानों (तीनों लोकों)
को अनुसञ्चरण करता है-पर्यटन करता है-देवताओं में किसी
कार्य की असंभावना नही करना। वे अपनी माया से अनेक२
वैसे २ ही रूप कर सकते हैं, जैसे २ की आवश्यकता हो ।
[मन्त्र में यहां “माया” शब्द साक्षात् है, जो पुराणों में
बाहुल्य से आया है। यह शब्द देवकार्यों में असंभावना से
दबे हुए मनुष्यों को ध्यान से देखना चाहिये । ]
“तस्य उत्तरा०” उसी अर्थ को [ जो पूर्व ऋचा का
है ] बाहुल्य से कहने वाली अगली ऋचा है-पहिली ऋचा से
दो स्थानों के सम्बन्ध से अग्नि की स्तुति की गई है, कि-
रात्रि के समय भूलोक का मस्तक होता है, और प्रातःकाल
सूर्य के रूप से उदय होता है, और इस अगली ऋचा से
तीनों लोकों के सम्बन्ध से स्पष्टतया स्तुति किया जाता है-
यही अगली ऋचा का पूर्व ऋचा से आधिक्य है-॥५(२७)॥
( खं० ६ )
[निरु०] “स्तोमेन हि दिवि देवासो अग्निम्-
जीजनञ्छक्तिभी रोदसिप्राम् । तमू अकृण्वन्
त्रेधाभुवे कं स ओषधीः पचति विश्वरूपाः ॥”
[ऋ०म० ८.४.११.५]
स्तोमेन हि यं दिवि देवा अग्निम् अजनयन्

हिन्दी निरुक्त (१११) ७ अ० ७ पा० ६ सं०
शक्तिभिः कर्मभिः द्यावापृथिव्योः पूरणं तम् अ-
कुर्वन्, त्रेधा भावाय । 'पृथिव्याम्, अन्तरिक्षे,
दिवि',—इति शाकपूणिः ।
“यदस्य दिवि तृतीयं तदसावादित्यः” इति हि
ब्राह्मणम् ।
तद् अग्नीकृत्य स्तौति ।
अथ एनम् एतया आदित्यीकृत्य स्तौति-॥६।२८॥
अर्थः- “स्तोमेन हि०” । 'देवामः' (देवाः देवताओँ
ने 'स्तोमेन' स्तुतिभिः) स्तुतियों से 'दिवि' द्युलोक में 'अग्नि
म्, अग्नि को 'अजीजनन्' (अजनयन्) उत्पन्न किया । 'शक्ति-
भिः' (कर्मभिः) और कर्मों से 'रोदसिप्राम्' (द्यावापृथिव्योः
पूरणम् ) द्युलोक और पृथिवी लोक में पूर्ण (कर दिया) । 'तम्'
(एव) उसी (अग्नि) को “त्रेधा भुवे” (भावाय) तीन भागों में
बांटने के अर्थ 'अकृण्वन्' (अकुर्वन् ) किया । ( पृथिव्याम्,
अन्तरिक्षे, दिवि, इति शाकपूणिः ) पृथिवी में (अग्नि के रूप में)
अन्तरिक्ष में (विद्युत् के रूप में) द्युलोक में (आदित्य के रूप में)
[कर दिया] - यह शाकपूणि आचार्य मानते हैं ।
“यदस्य०” 'जो इसका तीसरा (भाग) है, सो वोह आदि-
त्य है'- यह ब्राह्मण है ।
“तद् अग्नी०” सो यह [उक्त ब्राह्मण] अग्नि मान कर
स्तुति करता है- इस ऋचा में देवताओं ने इस पार्थिव
अग्नि को ही द्युलोक में स्थापन किया और उसी को अन्य दो

हिन्दी निरुक्त ( ११२ ) ७ अ० ७ पा० ७ खं०
लोकों में भी पूर्ण किया, सुतराम् यह अग्नि , विद्युत् और
आदित्य सब अग्नि ही है, यह अग्नि की ही महिमा कही
गई है । [पूर्व प्रकरण से इसकी यह संगति है कि- जब अन्य
दोनों ज्योतिएं भी अग्नि ही हैं, तो वे "वैश्वानर" हैं,
ऐसा जानना भ्रम है, और अग्नि का ही "वैश्वानर"
मुख्य नाम है, यह सिद्ध हुआ ।]
“अथएनम्” अब इस [अग्नि] को आदित्य करके स्तुति
करता है-॥३[२८]॥
( खं० ७ )
(निरु०) “ यदेदेनमदधुर्यज्ञियासो दिवि देवाः
सूर्यमादितेयम् । यदा चरिष्णू मिथुनावभूता-
मादित्प्रापश्यन् भुवनानि विश्वा ॥” ऋ० सं० ८,
४, १२, १] ॥
यदा एनम् अदधुः यज्ञियाः सर्वे दिवि देवाः सूर्यम्
‘आदितेयम्’ अदितेः पुत्रम् यदा चरिष्णू मि-
थुनौ प्रादुरभूता सर्वदा सहचारिणौ उषाश्च आदि-
त्यश्च । ‘मिथुनौ’ कस्मात् ? मिनोतिः श्रयतिकर्मा
‘थु’ इति नामकरणः, थकारो वा, नयतिः परः,
वनिर्वा । समाश्रितौ अन्योन्यं नयतो, वनुतो वा
मनुष्यमिथुनौ- अपि एतस्मादेव, मेथन्तौ अन्यो-
न्यम् वनुतः इति वा ।

हिन्दी निरुक्त ( ११३ ) ७ अ० ७ पा० ७ खं०
अथ एनम् एतया अग्नीकृत्य स्तौति-॥७(२९)॥
अर्थः- 'यदेदेनम्०' । 'यदा' जब 'एनम्' इस 'आदिते-
यम्' (अदितेः पुत्रम्) आदितिके पुत्र 'सूर्यम्' सूर्यको 'यज्ञियासः'
(यज्ञिणः) यज्ञ के करने वाले 'सर्वे सब 'देवाः' देवताओं ने
'दिवि' द्युलोक में 'अदधुः' स्थापन किया, 'यदा' और जब
'चरिष्णू' [सर्वदा सहचारिणौ सब काल में एक साथ विचरने
वाले 'मिथुनौ' दोनों मिथुन 'अभूताम्' हुये (उषाश्च आदि-
त्यश्च)- उषा और आदित्य दोनों स्त्री पुरुष जुड़े हुये हुये
'आत्- इत्' [अथ तदा] उसी समय 'भुवनानि' लोकों ने
'पापश्यन्' (इन्हें) देखा ॥ इस मन्त्र में देवताओं ने द्युलोक
में सूर्य को स्थापन कियो है ॥
'मिथुन' कैसे ! सेवा अर्थ में 'मि' [स्वा० उ०] धातु 'थु'
यह प्रत्यय अथवा 'थ' प्रत्यय और 'नी' (भ्वा० उ०) धातु
पर है, अथवा 'वन' (त० आ०) धातु है । [ क्या अर्थ ? ]
“समाश्रितौ अन्योन्यं नयतः” भली भांति आश्रित
हुये हुये परस्पर को लेचलते हैं; अथवा 'वनुतः' चाहते हैं ।
मनुष्यों का मिथुन (स्त्री पुरुष का जोड़ा) भी इसी
व्याख्यान से है । “मेथन्तौ अन्योन्यं वनुतः इति वा”
आपस में लगे हुये परस्पर को लेचलते हैं या चाहते हैं ।
पूर्व पक्ष में 'मि- थु- नी' का अथवा 'मि- नी- थु' का
'मिथुन' शब्द बना, और दूसरे पक्षमें 'मि- थ- वन' का
'मिथुन' । यहां 'वन' (धा०) का 'व' 'उ' से बदल जाता है ॥
“अथ एनम्०” अब इसको इस (अगली ऋचा) से अग्नि
करके स्तुति करता है (ऋषि)--॥ ७ (२६) ॥

हिन्दी निरुक्त (११४) ७ अ० ७ पा० ८ खं०
(खं० ८)
(निरु०) “यत्रा वदेते अवरः परश्च यज्ञन्योः
कतरो नौ विवेद। आशेकुरित्सधमादं सखायो
नक्षन्त यज्ञं क इदं विवोचत् ॥” [ ऋ० सं०
८, ४, १३, २, ] ॥
यत्र विवदेते दैव्यौ होतारौ—अयं च अग्निः,
असौ च मध्यमः,—कतरो नौ यज्ञे भूयो वेद-इति ।
आशक्नुवन्ति सत्सहमादनं समानख्याना ऋत्विजः
तेषां यज्ञं समश्नुनानानां, को न इदं विवक्ष्यति
इति।
तस्य उत्तरा भूयसे निर्वचनाय ॥८ ३०)॥
अर्थ:-“यत्रा वदेते०” 'यत्र' जहां 'अवरः' (अयं च
अग्निः) इधर वाला यह अग्नि 'परः च' (असौ च मध्यमः)
और वोह मध्यम (दैव्यौ होतारौ) देवताओं के होता दोनों
'आ-वदेते' (विवदेते) विवाद करते हैं—'यज्ञन्यो' (यज्ञ-
नेत्रोः) यज्ञ के नेताओं 'नौ' (आवयोः) हम दोनों में (यज्ञे)
यज्ञ के विषय में 'कतरः' कौनसा 'विवेद' (भूयोवेद) अधिक
जानता है। 'सखायः' (समानख्यानाः ऋत्विजः) समान
ज्ञान वाले ऋत्विज् 'यज्ञम्' यज्ञ को 'नक्षन्त' (समश्नुवते)
व्यापन कर रहे हैं-उस में बैठे हैं (ते) वे 'सधमादम्' (सत्
सहमदनम्) हर्ष सहित 'आशेकुः' (प्राशक्नुवन्ति) कह सकते
हैं-“को नः इदं विवक्ष्यति” हम में से कौन यह कह

हिन्दी निरुक्त ( ११५ ) ७ अ० ७ पा० ६ खं०
सकता है- ( कि-कौन इनमें अधिक विद्वान् है; अर्थात्-दोनों
ही बहुविज्ञानवान् हैं। यहाँ होतृकर्म के वर्णन से यह अग्नि-
प्रधानमन्त्र है, किन्तु सूर्यप्रधान नहीं ।
“तस्य उत्तरा०” उस अर्थ के अधिक निर्वचन के लिये
अगली ऋचा है-॥८(३०)॥
( खं० ६ )
(निरु०-) “यावन्मात्रमुषसो न प्रतीकं सुपर्णो३
वसते मातरिश्वः । तावद्दधात्युपयज्जमायन् ब्रा-
ह्मणो होतुरवरो निषीदन् ॥” (ऋ०सं०८,४,१२,३)
यावन्मात्रम् उषसः प्रत्यक्तं भवति, प्रतिदर्शनम्-
इति वा । अस्ति उपमानस्य सम्प्रत्यर्थे प्रयोगः-
'इहेव निधेहि'-इति यथा सुपर्ण्यः सुपतना एता
रात्रयः वसते मातरिश्वन् ? ज्योति र्वर्णस्य, ता-
वदुपदधाति यज्ञम् आगच्छन् ब्राह्मणो होता
अस्य अग्नेर्होतुः अवरो निषीदन् ।
होतृजपस्तु अनग्निर्वैश्वानरीयो भवति-“देव-
सवितरेतं त्वा वृणतेऽग्निं होत्राय सह पित्रा वै-
श्वानरेण” इति इममेव अग्निं सवितारमाह सर्व-
स्य प्रसवितारं, मध्यमं वा उत्तमं वा पितरम् ।
यस्तु सूक्तं भजते यस्मै हविर्निरुप्यते अयमेव
सोऽग्निर्वैश्वानरः, निपातमेव एते उत्तरे ज्योतिषी

हिन्दी निरुक्तं ( ११६ ) ७ अ० ७ पां० ६ खंड
एतेन नामधेयेन भजेते भजेते ॥९(३१)॥
इति सप्तमाध्यायस्य सप्तमः पादः ॥७,७,।
अर्थः- "यावन्मात्रम्०” । इस मन्त्र में न' कार
'सम्प्रति' ( अव्यय ) के अर्थ ( इस समय ) में है। क्योंकि-
उपमान अर्थ का यहां असंभव है। (लोक में भी ) उपमान
वाचक का सम्प्रति के अर्थ में प्रयोग होता है। जैसे- "इहेव
निधेहि” 'अब यहां रक्खे' ।
[ मातरिश्वा ने किसी से पूछा कि- दिव्य होता अग्निका
जो विज्ञान है, उसको क्या यह ब्राह्मण मनुष्य होता यज्ञ
में आया हुआ धारण करता है? वह उसके प्रति कहता है । ]
'मातरिश्वः' ( हे मातरिश्वन् ) हे मातरिश्व देव !
'सुपर्ण्यः' ( सुपतना. एताः रात्रयः ) सुन्दर पतन ( गमन )
करने वाली ये रात्रिएं 'उषसः' ( ज्योतिर्येष्ण्य ) उषा :
प्रकाश के 'यावन्मात्रम्' जितने अंग 'प्रतीकम्' ( प्रत्यक्तं =
प्रविष्टम् ) प्रविष्ट हुएको 'न' ( सम्प्रति ) इस समय या सच-
मुच 'वसते' ( छादयन्ति ) ओढती है या धारण करती है,
'तावत्' उतना विज्ञान 'यज्ञम्' यज्ञ में 'आयन्' आया हुआ
ब्राह्मण (अस्य) इस (अग्ने.) अग्नि 'होतु.' होता का 'अवर.'
( होता ) छोटा होता 'निषीदन्' ( होतृषदने ) होता के स्थान
में बैठा हुआ 'उप-दधाति' धारण करता है- दिव्य अग्नि
होता की अपेक्षा रात्रि में जितना प्रकाश का अंग होता है,
वैसा ही बिलकुल थोड़ासा मनुष्य होता यज्ञ संबन्धि वि-
ज्ञान को धारण करता है, अतः ऐसी अवस्था में जो कुछ
यह करता है दिव्य होता अग्नि के अनुग्रह से ही करता है,

हिन्दी निरुक्त ( ११७ ) ७ अ० ७पा० ६खं
स्वयम् अपने बल से नहीं। इस प्रकार होतृकर्म के प्रति-
पादन से यहां विशेष रूप से अग्नि की ही स्तुति है ॥ [ इस
प्रकार यह सूक्त अग्नि के कर्म की प्रधानता के कारण वैश्वा-
नर का है। जो इस सूक्त में "वैश्वानर" शब्द हैं, वे सब
पार्थिव अग्नि के ही विशेषण हैं।]
"होतृजपस्तु०" किन्तु होता का जप (मन्त्र) अग्नि से
भिन्न वैश्वानर का है- 'देव सवितरेतं०' अर्थात्- हे 'देव'
'सवितः' सब के जानने वाले? 'एतं त्वा अग्निम्" इस
तुझ अग्नि को 'वैश्वानरेण पित्रा सह" वैश्वानर पिता
के साथ 'होत्राय' होम के अर्थ 'वृणते' [ यजन करने वाले ]
ग्रहण करते हैं ।
"इममेव अग्निं सवितारम् आह" (इस मन्त्र में)
इस (पार्थिव) अग्नि को ही (ऋषि) सविता (सब लोक का
जनने वाला) कहता है। "मध्यमं वा उत्तमं वा पितरम्"
मध्यम ज्योति को अथवा उत्तम ज्योति को (इस अग्नि का)
पिता कहता है- बताया जाता है ।
"यस्तु सूक्तं०" किन्तु जो सूक्त को भजता है और
जिसके लिये हविः का निर्वाप होता है, वह यही (पार्थिव)
अग्नि वैश्वानर है। और दूसरे ज्योति (मध्यम उत्तम इस
नाम (वैश्वानर) से निपात को ही भजते हैं- इस नाम को
विशेषण रूप से भजते हैं ॥ ६ (३१) ॥
व्याख्या ।
स्मरण रहे कि- यह दैवत काण्ड है, इस सप्तम अध्या-

हिन्दी निरुक्त (११६) ७ अ० ७ पा० ६ खं
(ख) “विश्वे एनं नरा नयन्ति” इति वा
सब मनुष्य इसे ले जाते हैं।
(ग) “विश्वानर एव स्यात् ०-० तस्य
वैश्वानरः ! विश्वानर कोई है, उसका
अपत्य वैश्वानर है।
(४) प्राधान्यस्तुति-- “वैश्वानरस्य सुमतौस्याम०”
(ऋ० सं० १, ७, ६, १)
(५) उसकी व्याख्या-“इतो जातः सर्वम् इदम् अभि-
विपश्यति०” इस पृथिवी या ओषधि
वनस्पतियों से उत्पन्न होकर इस सब
जगत् को देखता है।
(६) विचार- “तत् को वैश्वानरः” इत्यादि । सो कौन
वैश्वानर है इत्यादि।
(७) उपपत्ति- “यस्तु सूक्तं भजते यस्मै हविर्निर्-
प्यते” जो प्राधान्य से सूक्त को भजता है, जिस
के लिये हवि का निर्वाप होता है।
(८) अवधारण- “अयमेव सोऽग्निर्वैश्वानरः” “निपात-
मेव एते उत्तरे ज्योतिषी एतेन नाम-
धेयेन भजेते भजेते” यही वह अग्नि
वैश्वानर है, और दूसरे ज्योति इस नामधेय
से निपात को ही भजते हैं।
विचार (६) का स्पष्टीकरण।

हिन्दी निरुक्त ( १२० ) ७ अ० ७ पा० ६ सं०
प्रश्नः—"तत्को वैश्वानरः?" प्राधान्य से "वैश्वा-
नर" यह किसका नाम है ।
कुछ नैरुक्तों का मत- "मध्यम इति आचार्याः ।"
मध्यम ज्योति 'वैश्वानर" है । यह कुछ आचार्य मानते
हैं। क्यों कि— 'प्रनूमहित्वम्" [ऋ० सं० १,४,२५] इस
ऋचामें वैश्वानर की वर्ष कर्म से स्तुति है ।
पूर्व याज्ञिकों कामत— 'अथ असौ आदित्यः इति
पूर्व याज्ञिकाः"वोह आदित्य वैश्वानर है, यह पूर्व
याज्ञिक मानते हैं । क्यों कि- (१) एषां लोकानाम् ०-०
रतांत्र्यंशमति" विधि के अनुकरण में तृतीय सवन में
द्युलोक में आरूढ हुआ प्रत्यवरोहण काल में आग्निमारुत
शस्त्र को वैश्वानर के सूक्त से प्रारम्भ करता है । (२)
“अथापि वैश्वानरीयो द्वादशकपालो भवति”
वैश्वानर का १२ कपालों का पुरोडाश होता है। (३)
"अथापि ब्राह्मणं० असौ वा आदित्योऽग्निर्वैश्वा-
नरः” आदित्य वैश्वानर है । (४) "अथापि निवित्
सौर्यवैश्वानरी भवति-आयोद्यांभाति आपृथिवीम्”
और भी सूर्य वैश्वानर की निविद् है-जो द्युलोक तक पृथिवी
तक प्रकाश करता है । (५) "अथापि छान्दो मिकं सूक्तं
सौर्यवैश्वानरं भवति” और भी सूर्य वैश्वानर का छान्दो
मिक सूक्त है । 'दिविपृष्टो अरोचत” द्युलोक में सूर्य

हिन्दी निरुक्त ( १२१ ) ७ अ० ७ पा० ६ खं०
हुआ प्रकाश करता है। (६) “अथापि हविष्पान्तीयं सूक्तं
सौर्यवैश्वानरं भवति” और भी सूर्य वैश्वानर का हवि-
ष्पान्तीय सूक्त है।
शाकपूणि आचार्य के मत से पार्थिव अग्नि ही वैश्वानर
है, इस अर्थ की स्थापना—
“अयमेव अग्नि वैश्वानरः इति शाकपूणिः”
यही अग्नि वैश्वानर है, यह शाकपूणि मानते हैं। क्यों कि-
[१] “विश्वानरौ एते०-० वैश्वानरोऽयम्” विश्वानर
मध्यम उत्तम ज्योति हैं, यह अग्नि “वैश्वानर” है। क्यों
कि यह उनसे उत्पन्न होता है।
[२] “वैश्वानरो यतते सूर्येण” वैश्वानर सूर्य से
मिलता है।
(३) “अथ यानि एतानि औत्तमिकानि०-०तेषु
वैश्वानरीयाः प्रवादा अभविष्यन्” और जो ये उत्तम
लोक के देवता भग आदि हैं, उनके सूक्तों में “वैश्वानर” शब्द
विशेषण आता, किन्तु आया नहीं।
(४) “आदित्य कर्मणा च०” और आदित्य के कर्म
[उदय आदि] से इस “वैश्वानर” की स्तुति करता, किन्तु
नहीं की है।
[५] “आग्नयेष्वेवहि सूक्तेषु” अग्नि के ही सूक्तों में
“वैश्वानर” विशेषण आता है।

हिन्दी निरुक्त (१२२) ७ अ० ७ पा० ६ खं०
(६) “अग्निकर्मणा च” और अग्नि के दाह आदि
कर्म से इस “वैश्वानर” को स्तुति करता है।
कोई निरुक्तकारों के मतका खण्डन ।
कोई निरुक्तकार “वैश्वानर” को “प्रनूमहित्वं०”
ऋचा में उसकी वर्षकर्म से स्तुति देख कर मध्यम समझते हैं,
किन्तु उनका यह मत ठीक नहीं है। क्योंकि—
(१) “अस्मिन्नपि एतदुपपद्यते” इस पार्थिव अग्नि
में भी यह वर्षकर्म उपपन्न होता है। जैसे कि- “समानमे
तत्० [ऋ०सं० २,३,२६,१] यह ऋचा कहती है।
(२) “कृष्णं नियानम्” [ऋ० सं० २,३,२३,१] इस
मन्त्र में मन्त्र के स्वरूप से आदित्य और प्रकरण से अग्नि की
वर्षकर्म से स्तुति है । सर्वथा वर्षकर्म का कर्त्ता इस में मध्यम
से भिन्न है।
याज्ञिकों के मतका खण्डन ।
(१) “रोहात्प्रत्यवरोहश्चिकीर्षितः” का उत्तर
“आम्नायवचनात्” (२) “वैश्वानरीयो द्वादश
कपालो भवति” का उत्तर “अस्तिहि सौर्य एकक-
पालः पञ्चकपालश्च” (३) “एतद् ब्राह्मणम्०”
का उत्तर “बहुभक्तिवादीनि०” (४) सौर्यवैश्वानरी
निविद्०” का उत्तर “अस्यैव सा भवति” (५)
“छान्दोमिकं सूक्तम्०” का उत्तर “अस्यैव तद्०”

हिन्दी निरुक्त ( १२३ ) ७ अ० ७ पा० ६ खं०
(६) “हविष्पान्तीयं सूक्तम्०” का उत्तर “अस्यैव
तद्०” है ॥
इसके अनन्तर “अपामु॒पस्थे०” [ऋ० सं० ४, ५, १०, ४]
इस ऋचा में मन्त्र के अक्षरार्थ से मध्यम ज्योति और उत्तम
ज्योति से वैश्वानर का भेद दिखाया गया है ।
फिर इस पाद व अध्याय की समाप्ति तक हविष्पान्तीय
सूक्त की ही ६ ठी १० वीं ११ वीं तथा १६ वीं ऋचाओं से
अग्नि की ही महिमा दिखाई है, जिसके जानने से अग्नि के
‘वैश्वानर’ होने में सब सन्देह निवृत्त होजाते हैं ।
अन्तिम प्रश्न और उत्तर ।
प्रश्नः- “होतृजपस्त्वनग्निवैश्वानरीयो भवति”-
“देव सवितरेतन्त्वा वृणतेऽग्निं होत्राय सह पित्रा
वैश्वानरेण” ।
हे सवितृ देव ! ऋत्विज् लोग वैश्वानर पिता के सहित
तुझ अग्नि का होत्र के लिये स्वीकार करते हैं ।
इस मन्त्र में सविता और अग्नि एक ही को कहा गया
है, इससे यहां सविता नाम भी अग्नि का ही रहेगा, और
“वैश्वानर” पिता तथा उसका पुत्र अग्नि है, यह भी इसी
मन्त्र से उक्त होता है । इन दोनों बातो की पर्यालोचना से
यह निश्चय सहज में होजाता है कि-“वैश्वानर” देवता
अग्नि से पृथक् है, क्योंकि-पिता पुत्रभाव दोनों में परस्पर
भेद के बिना नहीं आता । जब कि- “वैश्वानर” अग्नि

हिन्दी निरुक्त ( १२४ ) ७ अ० ७ पा० ६ मं

नहीं, तो उससे भिन्न मध्यम ज्योति या उत्तम ज्योति ही
"वैश्वानर" है, यह सिद्ध होता है ?
(उ०) भाष्यकार कहते हैं कि- यह आपत्ति ठीक है,
किन्तु हमने भी "आदूतो अभिमभरत्" (७,७,५) इस
मन्त्र से यह स्पष्ट रीति से सिद्ध कर दिया है कि- मध्यम व
उत्तम ज्योति से भिन्न देवता अर्थात् अग्नि का ही नाम
"वैश्वानर" है ।
इस रीति से हम और तुम दोनों समान बल हैं, किन्तु
"वैश्वानर" के पार्थिव अग्नि होने में हमारे पूर्वोक्त
[७,६,६-७- ८-६] छः हेतु अधिक हैं, इससे हमारा ही
जय होता है ॥
भगवद्दुर्गाचार्य कहते हैं कि- हमारी समझ में इस
"वैश्वानर" पद के विचार प्रसंग में हविष्पान्तीय सूक्त को
बीच में [७,७,३-४-५-६-७ ८-९] डाल कर "सूर्य वैश्वानर
है" "अग्नि वैश्वानर है" इत्यादि रीति से एक ही
ज्योति तीन रूपों से स्थित है, यह बात मन्त्रों के भाव जान-
ने के लिए दिखाई है, कि- ऐसे २ शब्दों के अर्थ व उनके
न्याय तथा युक्तियों में जब संकट उपस्थित हो, तब यहां बुद्धि-
मानों की बुद्धि खिन्न या व्याकुल नहो। प्रयोजन यह है कि-
मन्त्रों में ऐसे शब्दों के अर्थ निर्णय स्थल में 'वैश्वानर'
शब्द पर दिखाई हुई युक्तियों से लाभ उठाना चाहिये ।
यह इस विषय का एक उदाहरणमात्र दिया गया है ॥७(९)॥
इति हिन्दीनिरुक्ते सप्तमाध्यायस्य सप्तम पादः ॥७,७॥

हिन्दी निरुक्त ( १२५ ) ७ अ० ७ पा० ६ खं०
निरुक्त के सप्तम अध्याय का खण्ड सूत्र.—
[१ म पा०-] अथातः (१) इन्द्रोदिवः (२) (यथैतदिन्द्रः)
परोक्षकृताः (३) तद्यैन (अथाप्यष्टौ) (४) [२ य पा०-] तिस्र
एव देवताः (५) अथाकारचिन्तनम् (६) अपुरुषविधाः (७)
[३ य पा०-] तिस्रएव (८) पूषात्वेतः (९) अथैतानि (१०)
अथैतानि (एतेष्वेव) (११) सन्त्राः (उष्णिक्) (वृहती) (१२)
जगती (इतीमा) (१३) [४र्थ पा०- अथातः (१४) अग्निमीले
(१५) अग्निः पूर्वेभिः (१६) अभिप्रवन्त (१७) इन्द्रंमित्रम् (१८)
[५म पो०-] जातवेदाः (१६) (जातवेदसे) प्रनूनम् (२०)
[६ष्ठ पा०-] वैश्वानरः (२१) वैश्वानरस्य (२२) प्रनूमहित्वम्
(एषांलोकानाम्) (अथापि) (अयमेवाग्निः) (अथादित्यात्)
(अथयोनि) (समानमेतत्) (२३) [७म पा०-] कृष्णं नियानम्
(वैश्वानरोथः) (२४) हविष्पान्तम् (२५) अपामुपस्थे (२६) मूर्द्धा
भुवः (२७) स्तोमेन (२८) यदेदेनम् [२९] यत्रावदेते (३०)
यावन्मात्रम् (३१) एकत्रिंशत् ॥
इति निरुक्ते (उत्तरषट्के) सप्तमोऽध्यायः ॥७,७॥
इति हिन्दी निरुक्ते (उत्तरषट्के) सप्तमोऽध्यायः
समाप्तः ॥७,७॥

अथ अष्टमोऽध्यायः ॥८॥
प्रथमः पादः ।
( खं० १ )
( अथ त्रयोदश पदानि )
(निघ०-) द्रविणोदाः ॥१॥
(निरु०-) द्रविणोदाः कस्मात् ? धनं ‘द्रविणम्’-
उच्यते,-यद्-एनद्-अभिद्रवन्ति। बलं वा ‘द्रवि-
णम्’-यद्-एनेन अभिद्रवन्ति । तस्य दाता द्रवि-
णोदाः । तस्य एषा भवति--॥१॥
अर्थः-द्रविणोदाः (१) यह देवता-पद कैसे ? धन 'द्रविण'
कहलाता है । क्योंकि-उसे उसके अर्थी-चाहने वाले अभिद्र-
वण करते हैं-सामने दौड़ते हैं, इससे वह 'द्रविण' ( कर्म-
वाच्य ) है । अथवा बल 'द्रविण' (करणवाच्य ) है ! क्यों
कि-इससे संयुक्त होकर शत्रुओं के अभिमुख द्रवण करते हैं-
दौड़ते हैं। उस (द्रविण) का दाता-बल का दाता-अथवा
धनका दाता “द्रविणोदस्” (द्रविणोदाः) होता है। उस
(द्रविणोदस्) नाम की प्रधानता से स्तुति वाली यह ऋचा
है-जहां 'द्रविणोदस्' नाम प्रधान = विशेष्य है, और अन्य
पद उसके विशेषण रहते हैं ऐसी यह ऋचा है [ जिसे देख
कर ऋषि ने इस पद को देवतो पदों के समाम्नाय में समा-
म्नाम किया = पढ़ा है ]-॥१॥

हिन्दी निरुक्त (१२७) ८ अ० १ पा० २ खं
(खं० २)
[निरु०-] "द्रविणोदा द्रविणसो ग्रावहस्तासो
अध्वरे । यज्ञेषु देवमीलते ॥” [ऋ०सं०१,१,२९,१]
द्रविणोदा यः, तम् ।
'द्रविणसः' इति-द्रविणसादिनः इति वा। द्रवि-
णसानिनः इति वा ।
'द्रविणसः' तस्मात् पिबतु-इति वा ।
“यज्ञेषु देवमीलते” ।
याचन्ति । स्तुवन्ति । वर्द्धयन्ति । पूजयन्ति-
इति वा ॥
तत्तं को द्रविणोदाः ? इन्द्रः-इति क्रौष्टुकिः । स
बलधनयोर्दातृतमः, तस्य च सर्वा बलकृतिः ।
“ओजसो जातमुतमन्य एनम् ।” (ऋ०सं० ८ ३,
४,५) । इति च आह ॥
अथापि अग्निं 'द्राविणोदसम्' आह । एष पुनः
एतस्माज्जायते ।
“यो अश्मनोरन्तरग्निं जजान” । (ऋ०सं०२,६,
७,३) । इत्यपि निगमो भवति ॥
अथापि ऋतुयाजेषु द्राविणोदसाः प्रवादा भवन्ति।
तेषां पुनः पात्रस्य 'इन्द्रपानम्'-इति भवति ।