निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त (११६) ७ अ० ७ पा० ६ खं
(ख) “विश्वे एनं नरा नयन्ति” इति वा
सब मनुष्य इसे ले जाते हैं।
(ग) “विश्वानर एव स्यात् ०-० तस्य
वैश्वानरः ! विश्वानर कोई है, उसका
अपत्य वैश्वानर है।
(४) प्राधान्यस्तुति-- “वैश्वानरस्य सुमतौस्याम०”
(ऋ० सं० १, ७, ६, १)
(५) उसकी व्याख्या-“इतो जातः सर्वम् इदम् अभि-
विपश्यति०” इस पृथिवी या ओषधि
वनस्पतियों से उत्पन्न होकर इस सब
जगत् को देखता है।
(६) विचार- “तत् को वैश्वानरः” इत्यादि । सो कौन
वैश्वानर है इत्यादि।
(७) उपपत्ति- “यस्तु सूक्तं भजते यस्मै हविर्निर्-
प्यते” जो प्राधान्य से सूक्त को भजता है, जिस
के लिये हवि का निर्वाप होता है।
(८) अवधारण- “अयमेव सोऽग्निर्वैश्वानरः” “निपात-
मेव एते उत्तरे ज्योतिषी एतेन नाम-
धेयेन भजेते भजेते” यही वह अग्नि
वैश्वानर है, और दूसरे ज्योति इस नामधेय
से निपात को ही भजते हैं।
विचार (६) का स्पष्टीकरण।