निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
पृष्ठ 894, कुल 1282 में से
संदर्भ में पढ़ेंअथ अष्टमोऽध्यायः ॥८॥
प्रथमः पादः ।
( खं० १ )
( अथ त्रयोदश पदानि )
(निघ०-) द्रविणोदाः ॥१॥
(निरु०-) द्रविणोदाः कस्मात् ? धनं ‘द्रविणम्’-
उच्यते,-यद्-एनद्-अभिद्रवन्ति। बलं वा ‘द्रवि-
णम्’-यद्-एनेन अभिद्रवन्ति । तस्य दाता द्रवि-
णोदाः । तस्य एषा भवति--॥१॥
अर्थः-द्रविणोदाः (१) यह देवता-पद कैसे ? धन 'द्रविण'
कहलाता है । क्योंकि-उसे उसके अर्थी-चाहने वाले अभिद्र-
वण करते हैं-सामने दौड़ते हैं, इससे वह 'द्रविण' ( कर्म-
वाच्य ) है । अथवा बल 'द्रविण' (करणवाच्य ) है ! क्यों
कि-इससे संयुक्त होकर शत्रुओं के अभिमुख द्रवण करते हैं-
दौड़ते हैं। उस (द्रविण) का दाता-बल का दाता-अथवा
धनका दाता “द्रविणोदस्” (द्रविणोदाः) होता है। उस
(द्रविणोदस्) नाम की प्रधानता से स्तुति वाली यह ऋचा
है-जहां 'द्रविणोदस्' नाम प्रधान = विशेष्य है, और अन्य
पद उसके विशेषण रहते हैं ऐसी यह ऋचा है [ जिसे देख
कर ऋषि ने इस पद को देवतो पदों के समाम्नाय में समा-
म्नाम किया = पढ़ा है ]-॥१॥