निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्तं ( ११६ ) ७ अ० ७ पां० ६ खंड
एतेन नामधेयेन भजेते भजेते ॥९(३१)॥
इति सप्तमाध्यायस्य सप्तमः पादः ॥७,७,।
अर्थः- "यावन्मात्रम्०” । इस मन्त्र में न' कार
'सम्प्रति' ( अव्यय ) के अर्थ ( इस समय ) में है। क्योंकि-
उपमान अर्थ का यहां असंभव है। (लोक में भी ) उपमान
वाचक का सम्प्रति के अर्थ में प्रयोग होता है। जैसे- "इहेव
निधेहि” 'अब यहां रक्खे' ।
[ मातरिश्वा ने किसी से पूछा कि- दिव्य होता अग्निका
जो विज्ञान है, उसको क्या यह ब्राह्मण मनुष्य होता यज्ञ
में आया हुआ धारण करता है? वह उसके प्रति कहता है । ]
'मातरिश्वः' ( हे मातरिश्वन् ) हे मातरिश्व देव !
'सुपर्ण्यः' ( सुपतना. एताः रात्रयः ) सुन्दर पतन ( गमन )
करने वाली ये रात्रिएं 'उषसः' ( ज्योतिर्येष्ण्य ) उषा :
प्रकाश के 'यावन्मात्रम्' जितने अंग 'प्रतीकम्' ( प्रत्यक्तं =
प्रविष्टम् ) प्रविष्ट हुएको 'न' ( सम्प्रति ) इस समय या सच-
मुच 'वसते' ( छादयन्ति ) ओढती है या धारण करती है,
'तावत्' उतना विज्ञान 'यज्ञम्' यज्ञ में 'आयन्' आया हुआ
ब्राह्मण (अस्य) इस (अग्ने.) अग्नि 'होतु.' होता का 'अवर.'
( होता ) छोटा होता 'निषीदन्' ( होतृषदने ) होता के स्थान
में बैठा हुआ 'उप-दधाति' धारण करता है- दिव्य अग्नि
होता की अपेक्षा रात्रि में जितना प्रकाश का अंग होता है,
वैसा ही बिलकुल थोड़ासा मनुष्य होता यज्ञ संबन्धि वि-
ज्ञान को धारण करता है, अतः ऐसी अवस्था में जो कुछ
यह करता है दिव्य होता अग्नि के अनुग्रह से ही करता है,