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निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 892, कुल 1282 में से

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पृष्ठ 892

हिन्दी निरुक्त ( १२४ ) ७ अ० ७ पा० ६ मं

नहीं, तो उससे भिन्न मध्यम ज्योति या उत्तम ज्योति ही
"वैश्वानर" है, यह सिद्ध होता है ?
(उ०) भाष्यकार कहते हैं कि- यह आपत्ति ठीक है,
किन्तु हमने भी "आदूतो अभिमभरत्" (७,७,५) इस
मन्त्र से यह स्पष्ट रीति से सिद्ध कर दिया है कि- मध्यम व
उत्तम ज्योति से भिन्न देवता अर्थात् अग्नि का ही नाम
"वैश्वानर" है ।
इस रीति से हम और तुम दोनों समान बल हैं, किन्तु
"वैश्वानर" के पार्थिव अग्नि होने में हमारे पूर्वोक्त
[७,६,६-७- ८-६] छः हेतु अधिक हैं, इससे हमारा ही
जय होता है ॥
भगवद्दुर्गाचार्य कहते हैं कि- हमारी समझ में इस
"वैश्वानर" पद के विचार प्रसंग में हविष्पान्तीय सूक्त को
बीच में [७,७,३-४-५-६-७ ८-९] डाल कर "सूर्य वैश्वानर
है" "अग्नि वैश्वानर है" इत्यादि रीति से एक ही
ज्योति तीन रूपों से स्थित है, यह बात मन्त्रों के भाव जान-
ने के लिए दिखाई है, कि- ऐसे २ शब्दों के अर्थ व उनके
न्याय तथा युक्तियों में जब संकट उपस्थित हो, तब यहां बुद्धि-
मानों की बुद्धि खिन्न या व्याकुल नहो। प्रयोजन यह है कि-
मन्त्रों में ऐसे शब्दों के अर्थ निर्णय स्थल में 'वैश्वानर'
शब्द पर दिखाई हुई युक्तियों से लाभ उठाना चाहिये ।
यह इस विषय का एक उदाहरणमात्र दिया गया है ॥७(९)॥
इति हिन्दीनिरुक्ते सप्तमाध्यायस्य सप्तम पादः ॥७,७॥