निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
पृष्ठ 888, कुल 1282 में से
संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( १२० ) ७ अ० ७ पा० ६ सं०
प्रश्नः—"तत्को वैश्वानरः?" प्राधान्य से "वैश्वा-
नर" यह किसका नाम है ।
कुछ नैरुक्तों का मत- "मध्यम इति आचार्याः ।"
मध्यम ज्योति 'वैश्वानर" है । यह कुछ आचार्य मानते
हैं। क्यों कि— 'प्रनूमहित्वम्" [ऋ० सं० १,४,२५] इस
ऋचामें वैश्वानर की वर्ष कर्म से स्तुति है ।
पूर्व याज्ञिकों कामत— 'अथ असौ आदित्यः इति
पूर्व याज्ञिकाः"वोह आदित्य वैश्वानर है, यह पूर्व
याज्ञिक मानते हैं । क्यों कि- (१) एषां लोकानाम् ०-०
रतांत्र्यंशमति" विधि के अनुकरण में तृतीय सवन में
द्युलोक में आरूढ हुआ प्रत्यवरोहण काल में आग्निमारुत
शस्त्र को वैश्वानर के सूक्त से प्रारम्भ करता है । (२)
“अथापि वैश्वानरीयो द्वादशकपालो भवति”
वैश्वानर का १२ कपालों का पुरोडाश होता है। (३)
"अथापि ब्राह्मणं० असौ वा आदित्योऽग्निर्वैश्वा-
नरः” आदित्य वैश्वानर है । (४) "अथापि निवित्
सौर्यवैश्वानरी भवति-आयोद्यांभाति आपृथिवीम्”
और भी सूर्य वैश्वानर की निविद् है-जो द्युलोक तक पृथिवी
तक प्रकाश करता है । (५) "अथापि छान्दो मिकं सूक्तं
सौर्यवैश्वानरं भवति” और भी सूर्य वैश्वानर का छान्दो
मिक सूक्त है । 'दिविपृष्टो अरोचत” द्युलोक में सूर्य